आपका एक शुक्राणु बना सकता है पिता !

June 12, 2020

एक शुक्राणु

पुरूष बांझपन कुछ वर्षों पहले तक सामान्य और स्वीकार्य नहीं था लेकिन समय के साथ पुरूषों ने अपनी कमजोरी को मान लिया है और वे अपने उपचार को लेकर गंभीर हुए हैं। भारत में निःसंतानता के 30-40 प्रतिशत तक मामलों में पुरूष जिम्मेदार हैं। पुरूष बांझपन के लिए मेडिकल समस्याओं के साथ लाइफस्टाइल भी बड़ा कारण है। महिलाओं की तरह पुरूषों में निःसंतानता के लक्षण दिखाई नहीं देते और वे अपनी समस्या को लेकर जल्दी डिसकस भी नहीं करते हैं लेकिन कम शुक्राणु और निल शुक्राणु की समस्या आम होती जा रही है ऐसी स्थिति में भी आईवीएफ की उन्नत इक्सी तकनीक से स्वयं के शुक्राणुओं पिता बना जा सकता है। आजकल ज्यादातर आईवीएफ सेटर्स में पुरूष बांझपन के केसेज में इक्सी तकनीक का इस्तेमाल अधिक किया जाता है।

जैसा कि क्रिकेट में देखने को मिलता है छक्के के लिए गेंद को उठाकर मारना काफी नहीं है इसके लिए सही दिशा, टाईमिंग और सही प्लेसमेंट होना चाहिए, उसी प्रकार कृत्रिम गर्भाधान में भी यह निश्चित होना आवश्यक है कि निषेचन की प्रक्रिया सफलतापूर्वक हो गयी है। इक्सी को आईवीएफ से बेहतर इसलिए माना जाता है क्योंकि आईवीएफ में निषेचन के लिए शुक्राणुओं को अण्डों के सामने छोड़ा जाता है इसमें जरूरी नहीं कि शुक्राणु अण्डे के भीतर चला ही जाए लेकिन इक्सी में एक शुक्राणु को अण्डे के केन्द्र में इंजेक्शन के माध्यम से प्रवेश करवाया जाता है ताकि निषेचन की प्रक्रिया सुनिश्चित हो जाए।

कौनसे पुरूष अपनाएं इक्सी – विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 15 मीलियन प्रति एमएल से अधिक शुक्राणुओं को सामान्य माना गया है लेकिन इससे कम होने पर प्राकृतिक गर्भधारण में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कुछ वर्षों पूर्व तक शुक्राणु कम होने पर डोनर शुक्राणु के लिए कदम बढ़ाना पड़ता था लेकिन आज वे पुरूष जिनके शुक्राणु बेहद ही कम हैं यानि 1 से 5 मीलियन प्रति एमएल हैं वे अपने शुक्राणुओं से पिता बन सकते हैं। वैसे तो 10 से 15 मीलियन शुक्राणु प्रति एमएल के लिए आईयूआई, 5 से 10 मीलियन शुक्राणु प्रति एमएल के लिए आईवीएफ तकनीक पहले सजेस्ट की जाती है लेकिन इक्सी की सफलता दर अधिक होने के कारण दम्पती सीधे इक्सी तकनीक की और रूख करते हैं। इसमें कुछ ही स्वस्थ शुक्राणुओं से पिता बनना संभव हो गया है।

क्या होता है इक्सी में – प्रक्रिया के तहत महिला की ओवरी को सामान्य से अधिक अण्डे बनाने के लिए इंजेक्शन व दवाइयां दी जाती है यह करीब 2 सप्ताह का प्रोसेस है जब अण्डे बन जाते हैं तब उन्हें शरीर से बाहर निकाल कर लैब में रखा जाता है इसके बाद मेल पार्टनर के सिमन सेम्पल में से पुष्ट शुक्राणुओं का चयन कर एक अण्डे में एक शुक्राणु को इंजेक्ट किया जाता है, इसमें निषेचन की संभावना सर्वाधिक होती है, इससे भ्रूण बनने वाले भू्रण के विकास पर चार-पांच दिन तक नजर रखी जाती है और सबसे अच्छे भ्रूण को महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जताा है।

निल शुक्राणु (अजूस्पर्मिया) में क्या करें- पुरूष में शुक्राणुओं की संख्या शून्य है ऐसी स्थिति में भी अपने शुक्राणुओं से पिता बनना आसान हो गया है। शुक्राणुओं का निर्माण तो हो रहा है लेकिन किसी कारण से बाहर नहीं आ रहे हैं ऐसी स्थिति में टेस्टिक्यूलर बायोप्सी की मदद से सीधे अंडकोष शुक्राणु निकाले जा सकते हैं इनमें स्वस्थ शुक्राणुओं का चयन किया जाता है व निषेचन की प्रक्रिया इक्सी के माध्यम से की जाती है । यह पूरी प्रक्रिया संतुलित व संक्रमणरहित वातावरण में की जाती है। शून्य शुक्राणु की स्थिति में पिता कहलाना अब सपना नहीं रहा है।

पुरूषों को किन स्थितियों अपनाना चाहिए इक्सी –
शुक्राणु की संख्या, बनावट, गतिशीलता में कमी
मृत शुक्राणुओं की अधिकता
निल शुक्राणु
शुक्राणुओं का निर्माण तो होता है लेकिन बाहर नहीं आ पाते हैं ।
भारत में कम उम्र के पुरूषों में निःसंतानता बढ़ना चिंता का विषय है लेकिन अवेयरनेस और उपलब्ध चिकित्सा तकनीकों से अपने शुक्राणुओं से पिता बनने की राह सरल है।

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