आईए अपने हौसले ,अपने अनुशासन पर तालियां बजाएँ

March 21, 2020

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हर इंसान किसी माँ की संतान है। जब एक औरत निसंतानता का दंश नहीं झेल पाती सोचिए ,किसी पाले -पोसे हुए को छटपटाते हुए कैसे देख सकती है। इसलिए सबसे यहीं गुजारिश है ,घर में रहें और हाँ शाम को अपनी बालकनी में जरूर आएं। घर की बालकनी। बाहर की दुनिया देखने और ऐसा करते-करते खुद के भीतर झांकने के लिए सबसे मुफीद कोना। बालकनी में उपेक्षित पड़ी एक कुर्सी। वह जो सिर्फ आपके आने से मुस्कुराती है। उसे मौका दें तो कुछ ही पल में आपको सेल्फ रियलाइजेशन की गहरी दुनिया में ले जा सकती है। बाहर से भीतर की मीलों लंबी यह यात्रा बालकनी में सुगमता से हो पाती है। यहां दूर तक दृष्टि डाल पाने की सुविधा जो है। खुलापन है।

मैड्रिड की हर बालकनी गुलजार है। शहर लॉकडाउन है। रात आठ बजते ही हर बालकनी से सीटियां, तालियां और बर्तन बजने शुरू हो जाते हैं। यह खुलापन कम, हौसला बनाए रखने की जद्दोजहद ज्यादा है। डॉक्टर, नर्स, जरूरी सेवाएं पहुंचाने वाले नायकों की हौसला अफजाई और खुद को बिखरने से बचाने की कोशिश है। अपनी-अपनी चारदीवारी में अकेले कैद होकर रह जाने के बावजूद बालकनी में आते ही मैड्रिड के ये लोग एक हो जाते हैं। ऐतिहासिक विपत्ति से मिलकर लड़ने के संकल्प दोहराए जाते हैं। राष्ट्रगान गाते हुए झंडे लहराए जाते हैं। पूरे स्पेन में 533 लोग कोरोना से मारे जा चुके हैं। 11 हजार 826 कुल मामले बुधवार सुबह तक सामने आ चुके हैं। स्टेज 3, कम्युनिटी ट्रांसमिशन। यानी ज्यादा जटिल लड़ाई। इसके बावजूद मैड्रिड के लोग चेहरे पर मुस्कुराहट लिए थाली बजा रहे हैं। बालकनी में उन्हें दूर का दिखाई दे रहा है। यह कि बिना बुलंद रहे हम इस लड़ाई को नहीं जीत सकते।

यहां भारत में हम मैड्रिड की तुलना में काफी पहले बालकनी पर इकट्‌ठे हो रहे हैं। एकजुट हो रहे हैं। उस अदृश्य दुश्मन के खिलाफ जिसे फिलहाल हम विदेश से आने वालों की जांच में ही ढूंढ़ रहे हैं। जब वह ‘व्यक्ति’ से आगे बढ़कर ‘वातावरण’ में आ जाएगा तो हमारे एक होने की परीक्षा होगी।

सरकार की भी होगी। जनता लॉकडाउन के लिए तैयार है, सरकार कोरोना से निपटने की योजना के साथ तैयार है क्या? सवा सौ करोड़ के देश में क्या 50 के करीब टेस्ट सेंटर काफी होंगे? कम मामले सामने आने के पीछे कम टेस्ट किए जाने की रणनीति को कारण बताया जा रहा है। कोरोना से सबसे सही तरीके से लड़ रहा दक्षिण कोरिया हर दिन 5 हजार लोगों की जांच करते हुए अब तक 2 लाख 40 हजार टेस्ट कर चुका है। हमारे यहां अब तक सिर्फ 15 हजार। जांच के बाद पॉजिटिव आने वाले लोगों के इलाज के लिए संसाधन काफी हैं? 130 करोड़ की आबादी और अस्पतालों में कुल 10 लाख बिस्तर। 10 हजार की आबादी पर सिर्फ 8 डॉक्टर। इटली में यह आंकड़ा 41 होते हुए भी वह बुरी तरह से लड़खड़ा चुका है। यह सब आजादी के बाद से आज तक शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूल जरूरतों पर सबसे कम ध्यान दिए जाने का परिणाम है। हमारे यहां स्वास्थ्य सेवाओं में सरकारी निवेश जीडीपी के 1.5 फीसदी से भी कम है। दुनिया में हेल्थ पर सबसे कम निवेश वाले मुल्कों में हैं हम।

सबसे जरूरी चीज में इस कदर तंगहाली और तंग सोच इस देश के लिए नई नहीं है, यही हमारी नियति है। आज जो नया है वह यह कि इन सीमित संसाधनों में हमे सुरसा जैसे खतरे से लड़ना है। हमारा मनोबल और अनुशासन ही हमारे हनुमान हैं। वे विशालकाय होकर कोरोना को चुनौती दे सकते हैं।

लॉकडाउन बेबसी वाला शब्द है। प्रधानमंत्री ने संकल्प वाला शब्द गढ़ा-जनता कर्फ्यू। आइए इसका हिस्सा बनें। मैड्रिड की बेबसी वाली बालकनी की जगह हमारी बालकनी में उम्मीदों की बयार है। घर में रहिए और पांच बजे कोरोना से लड़ने में आपकी मदद कर रहे नायकों के लिए ताली बजाइए। ताली बजाइए इस देश के जुझारूपन के लिए जो अपने अल्प संसाधनों लेकिन अनंत हौसलो की वजह से हर युद्ध जज्बे के साथ लड़ता आया है। जयहिंद।

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