Overview
ये सवाल हर साल तीज के आसपास क्लिनिक में सबसे ज़्यादा पूछे जाने वालों में होता है, और इसे पूछने में जो झिझक होती है वो समझ आती है।
एक तरफ़ बरसों की आस्था और परिवार की परंपरा है। दूसरी तरफ़ वो प्रेग्नेंसी है जिसके लिए शायद लंबा इंतज़ार और मुश्किल इलाज सहा गया है। दोनों को एक तराज़ू में तौलना आसान नहीं है।
तो इस लेख में न व्रत को हल्के में लिया जाएगा, न ही सिर्फ़ "हाँ रख लीजिए" या "नहीं मत रखिए" कह दिया जाएगा। असल बात इससे ज़्यादा बारीक़ है, और वो समझना ज़रूरी है।
पहले ये देखते हैं कि तीज का व्रत असल में है क्या, क्योंकि यही पूरे सवाल की जड़ है।
हरतालिका तीज का व्रत हिंदू परंपरा के सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी बात है - ये निर्जला व्रत होता है।
निर्जला यानी बिना पानी के। इसमें सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक, करीब 24 घंटे, न कुछ खाया जाता है और न पानी पिया जाता है।
यही "बिना पानी" वाला हिस्सा इस पूरे सवाल की जड़ है।
अगर ये सिर्फ़ खाना छोड़ने वाला व्रत होता - जैसे कई और व्रतों में फल या दूध लिया जाता है - तो बात अलग होती। पर 24 घंटे पानी न पीना, ख़ासकर गर्मी और उमस वाले मौसम में, शरीर के लिए एक असली चुनौती है। और प्रेग्नेंसी या IVF के दौरान यही चुनौती जोखिम बन सकती है।
एक राहत की बात - परंपरा ख़ुद इसमें छूट देती है। कई धार्मिक स्रोत साफ़ कहते हैं कि बीमारी या प्रेग्नेंसी जैसी स्थिति में महिलाएँ पूजा के बाद फल या जूस ले सकती हैं, और ये भी कि व्रत की कठोरता से ज़्यादा भक्ति और भाव मायने रखता है। यानी छूट लेना परंपरा के ख़िलाफ़ नहीं है।
अब दो अलग स्थितियों पर बारी-बारी से, क्योंकि दोनों के जवाब अलग हैं।
प्रेग्नेंसी में शरीर को पहले से ज़्यादा पानी चाहिए होता है, कम नहीं।
ACOG के मुताबिक़ प्रेग्नेंसी में रोज़ाना करीब 8 से 12 कप पानी की सलाह दी जाती है - सामान्य से काफ़ी ज़्यादा। इसकी वजह है कि आपका शरीर अब बच्चे के लिए भी काम कर रहा है, और एमनियोटिक फ़्लूइड (बच्चे के चारों ओर का पानी) भी बनाए रखना है।
अब जब शरीर में पानी की कमी होती है, तो कुछ ठोस असर होते हैं। चिकित्सा स्रोतों के मुताबिक़ प्रेग्नेंसी में डिहाइड्रेशन एमनियोटिक फ़्लूइड कम कर सकता है, गर्भाशय में संकुचन (contractions) पैदा कर सकता है, और समय से पहले प्रसव का जोखिम बढ़ा सकता है।
इसकी एक दिलचस्प वजह भी है। जब शरीर में पानी घटता है, तो एक हार्मोन (ADH) निकलता है जो ऑक्सीटोसिन से मिलता-जुलता है - और ऑक्सीटोसिन वही हार्मोन है जो गर्भाशय के संकुचन शुरू करता है। इसीलिए ज़्यादा डिहाइड्रेशन संकुचन को भड़का सकता है।
इसका मतलब ये नहीं कि व्रत रखते ही कुछ बुरा हो जाएगा। इसका मतलब ये है कि 24 घंटे का निर्जला व्रत प्रेग्नेंसी में एक असली जोखिम रखता है, और ये जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तिमाही में हैं, आपकी सेहत कैसी है, मौसम कैसा है, और आपकी प्रेग्नेंसी में कोई और जटिलता तो नहीं। इसीलिए इसका फ़ैसला अकेले नहीं, अपने डॉक्टर से बात करके लेना चाहिए।
IVF के दौरान व्रत का सवाल इससे भी ज़्यादा सावधानी माँगता है, और इसकी एक ख़ास वजह है जिसे बहुत कम लोग जानते हैं।
IVF में जब ओवरी को उत्तेजित करने वाली दवाएँ (स्टिमुलेशन) दी जाती हैं, तो कभी-कभी एक स्थिति बन सकती है जिसे OHSS (ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम) कहते हैं। इसमें ओवरी सूज जाती है और शरीर में तरल जमा होने लगता है।
और यहीं पानी की बात सबसे अहम हो जाती है। OHSS में शरीर का तरल संतुलन पहले से बिगड़ा होता है, और डिहाइड्रेशन इसे और बिगाड़ सकता है - इतना कि गंभीर मामलों में ख़ून के थक्के और किडनी पर असर तक का जोखिम रहता है।
यानी IVF के स्टिमुलेशन वाले दौर में जान-बूझकर 24 घंटे पानी छोड़ना ठीक उस वक़्त शरीर को सुखाना है जब उसे सबसे ज़्यादा तरल संतुलन की ज़रूरत है। फर्टिलिटी विशेषज्ञ इस दौरान अक्सर ज़्यादा पानी पीने की सलाह देते हैं - उल्टा।
इसके अलावा IVF के दौरान समय पर दवाएँ और इंजेक्शन लेना बहुत ज़रूरी होता है, और कई बार इनके साथ कुछ खाना पड़ता है। पूरा दिन भूखा-प्यासा रहना इस पूरे शेड्यूल को गड़बड़ा सकता है।
तो IVF साइकिल के बीच में - ख़ासकर स्टिमुलेशन, एग रिट्रीवल या एम्ब्रियो ट्रांसफ़र के आसपास - निर्जला व्रत रखने से पहले अपने डॉक्टर से बात करना सिर्फ़ सलाह नहीं, बहुत ज़रूरी है।
यहाँ अच्छी ख़बर ये है कि ये "व्रत रखो या मत रखो" वाला दो-टूक सवाल नहीं है। परंपरा और सेहत, दोनों का सम्मान करते हुए बीच का रास्ता मौजूद है।
जैसा कि ऊपर बताया, परंपरा ख़ुद प्रेग्नेंसी और बीमारी में छूट देती है। तो कुछ रास्ते ये हो सकते हैं -
पूजा और भाव पूरा रखें, निर्जला वाला हिस्सा छोड़ दें। व्रत का असली मन पूजा, कथा और भक्ति में है। पानी और फल लेते हुए भी ये सब पूरी श्रद्धा से किया जा सकता है। कई धार्मिक स्रोत ख़ुद कहते हैं कि भाव कठोरता से बड़ा है।
"फलाहार" वाला रूप अपनाएँ। निर्जला की जगह पानी, नारियल पानी, फल, दूध लेते हुए बाक़ी व्रत रखा जा सकता है। ये शरीर को सुरक्षित रखते हुए परंपरा भी निभाता है।
घर के बड़ों और डॉक्टर, दोनों से बात करें। अक्सर परिवार की चिंता सिर्फ़ इतनी होती है कि परंपरा टूट न जाए। जब उन्हें पता चलता है कि परंपरा ख़ुद इस स्थिति में छूट देती है, तो वो भी सहज हो जाते हैं। और मेडिकल पक्ष आपके डॉक्टर से साफ़ हो जाता है।
आख़िर में एक बात - जिस बच्चे के लिए ये व्रत, ये प्रार्थना, ये पूरी तपस्या है, उसी की सेहत की क़ीमत पर व्रत की कठोरता निभाना ख़ुद उस भाव के उलट है। अपना और अपने होने वाले बच्चे का ख़याल रखना भी एक तरह की तपस्या ही है।
अगर आप व्रत रखने की सोच रही हैं, तो अगली विज़िट में ये साफ़ कर लें -
वो आख़िरी सवाल ख़ास तौर पर ज़रूरी है।
चाहे आपने डॉक्टर से बात करके व्रत रखा हो, कुछ लक्षण ऐसे हैं जिनमें व्रत तुरंत तोड़ देना चाहिए और देर नहीं करनी चाहिए -
इनमें से कुछ भी हो तो व्रत की चिंता छोड़िए - पहले पानी पीजिए और डॉक्टर से संपर्क कीजिए। इस हालात में व्रत तोड़ना कोई पाप नहीं, समझदारी है।