सारांश (Overview)
फाइब्रॉएड का पता चलने के बाद अगर आपको यह चिंता हो रही है कि कहीं इससे प्रेगनेंसी में परेशानी तो नहीं होगी, तो यह आर्टिकल आपके लिए है। फाइब्रॉएड, यूट्रस की मसल्स में बनने वाली गांठें होती हैं और ज्यादातर केसेस में इनकी वजह से कोई बड़ी समस्या नहीं होती। कई महिलाओं को तो इनके लिए किसी इलाज की जरूरत भी नहीं पड़ती।
इसमें आगे जानेंगे कि फाइब्रॉएड के लक्षण क्या होते हैं, कब ये फर्टिलिटी पर असर डाल सकते हैं और अगर आप प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं तो इलाज के कौन से ऑप्शन मौजूद हैं।
यूटेराइन फाइब्रॉएड (Uterine Fibroids) यूट्रस की मसल्स यानी बच्चेदानी की मांसपेशियों में बनने वाली गांठों को कहते हैं। मेडिकल भाषा में इन्हें लियोमायोमा (Leiomyoma) कहते हैं, और बोलचाल में रसौली या बच्चेदानी में गांठ भी कहा जाता है। ये लगभग हमेशा नॉन-कैंसरस होती हैं यानी इनसे कैंसर होने का रिस्क नहीं होता। एक महिला में एक या कई फाइब्रॉएड हो सकते हैं।
50 साल की उम्र तक 20 से 80% महिलाओं में फाइब्रॉएड बन जाते हैं, यानी हर 10 में से 2 से 8 महिलाओं में। इसका मतलब यह नहीं कि इन सबको इलाज की जरूरत पड़ती है।
फाइब्रॉएड के होने की जगह के हिसाब से, ये चार तरह के होते हैं:
फाइब्रॉएड का सबसे कॉमन लक्षण है पीरियड्स में ज्यादा ब्लीडिंग होना। पेट के निचले हिस्से में भारीपन, बार-बार पेशाब आना, कब्ज, कमर दर्द और संबंध बनाते समय दर्द भी हो सकता है। लेकिन ज्यादातर फाइब्रॉएड के कोई लक्षण नहीं होते, इसलिए कई महिलाओं को पता ही नहीं होता कि उन्हें फाइब्रॉएड है।
NHS के अनुसार पीरियड्स तब हैवी माने जाते हैं, जब:
हर महीने ज्यादा ब्लीडिंग होने से आयरन की कमी वाला एनीमिया हो सकता है। इसमें थकान, सांस फूलना और स्किन पीली पड़ना जैसे लक्षण दिखते हैं।
फाइब्रॉएड का साइज बड़ा होने का मतलब यह नहीं है कि लक्षण भी ज्यादा सीरियस होंगे। बल्कि, फाइब्रॉएड यूट्रस में कहां है, इसका लक्षणों पर ज्यादा असर पड़ता है।
फाइब्रॉएड कहां है | अक्सर पर कौन से लक्षण |
|---|---|
सबम्यूकोसल (अंदर की तरफ) | हैवी पीरियड्स, प्रेगनेंसी में दिक्कत |
इंट्राम्यूरल (दीवार में) | हैवी पीरियड्स, पेल्विस में भारीपन या दबाव |
सबसीरोसल (बाहर की तरफ) | ब्लैडर या आंत पर दबाव, बार-बार यूरिन आना, कब्ज |
पेडंक्युलेटेड (डंडी वाले) | डंडी मुड़ जाए तो अचानक तेज दर्द |
छोटे सबम्यूकोसल फाइब्रॉएड की वजह से भी हैवी ब्लीडिंग हो सकती है, जबकि बाहर की तरफ बड़ी गांठ होने से कई बार कोई परेशानी नहीं होती।
फाइब्रॉएड क्यों बनते हैं, इसकी सही वजह अभी पता नहीं है। हालांकि, एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन की इसमें भूमिका मानी जाती है। इसी वजह से फाइब्रॉएड ज्यादातर 30 से 50 साल की उम्र में दिखाई देते हैं और मेनोपॉज के बाद अक्सर छोटे होने लगते हैं।
फाइब्रॉएड होने का रिस्क इन स्थितियों में ज्यादा हो सकता है:
कुछ स्टडीज में हरी सब्जियां ज्यादा खाने वाली महिलाओं में फाइब्रॉएड कम देखे गए हैं, जबकि रेड मीट ज्यादा खाने वाली महिलाओं में इसका रिस्क ज्यादा पाया गया है।
फाइब्रॉएड से फर्टिलिटी पर कितना असर पड़ेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि गांठ यूट्रस में कहां है। बच्चेदानी की कैविटी का आकार बिगाड़ने वाले फाइब्रॉएड, खासकर सबम्यूकोसल, प्रेगनेंसी में सबसे ज्यादा समस्या खड़ी कर सकते हैं।
फाइब्रॉएड कहां है | फर्टिलिटी पर असर |
सबम्यूकोसल | कैविटी का आकार बिगाड़ने पर प्रेगनेंसी में दिक्कत की संभावना ज्यादा |
इंट्राम्यूरल | कैविटी को दबाने पर असर पड़ सकता है |
सबसीरोसल | फर्टिलिटी पर असर नहीं माना जाता |
निःसंतानता की जांच कराने वाली हर 100 में से करीब 5 से 10 महिलाओं में फाइब्रॉएड पाए जाते हैं। लेकिन फाइब्रॉएड मिलने का मतलब यह नहीं है कि प्रेगनेंसी न ठहरने की वजह भी वही है। इसलिए दूसरी संभावित वजहों की भी जांच की जाती है।
सबम्यूकोसल फाइब्रॉएड, एंडोमेट्रियम (Endometrium) यानी यूट्रस की उस अंदरूनी परत के नीचे होता है, जहां एम्ब्रीओ को इम्प्लांट होना चाहिए।
जिन महिलाओं में निःसंतानता की समस्या थी, उन पर हुई स्टडीज में सबम्यूकोसल फाइब्रॉएड होने पर प्रेगनेंसी ठहरने की संभावना 63% कम पाई गई। यानी जिन महिलाओं को सबम्यूकोसल फाइब्रॉएड नहीं था, उनकी तुलना में फाइब्रॉएड वाली महिलाओं में प्रेगनेंसी ठहरने की संभावना लगभग 37% रह गई।
अच्छी बात यह है कि इसे हटाने के बाद प्रेगनेंसी रेट बेहतर पाया गया है। अमेरिका की ASRM गाइडलाइन भी ऐसी गांठ हटाने पर विचार करने की बात करती है, भले ही कोई लक्षण न हो।
अगर फाइब्रॉएड यूट्रस की दीवार के अंदर है, लेकिन कैविटी को नहीं दबा रहा, तो सिर्फ प्रेगनेंसी के लिए इसे हटाना जरूरी नहीं होता
लेकिन गांठ बड़ी है, बार-बार मिसकैरेज हुआ है या IVF फेल हुआ है, तो डॉक्टर आपके केस को देखकर इसे हटाने की सलाह दे सकते हैं।
फाइब्रॉएड की जांच पेल्विक एग्जाम और अल्ट्रासाउंड से की जाती है। ट्रांसवजाइनल अल्ट्रासाउंड (TVS) पहला टेस्ट होता है और इससे ज्यादातर फाइब्रॉएड का पता चल जाता है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर कुछ और जांच भी कर सकते हैं:
रिपोर्ट में फाइब्रॉएड का टाइप और साइज सेंटीमीटर में लिखा होता है। कुछ रिपोर्ट में FIGO टाइप 0 से 8 तक लिखा होता है, जिनमें टाइप 0, 1 और 2 सबम्यूकोसल होते हैं। अगर आप प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं, तो रिपोर्ट में फाइब्रॉएड का टाइप और उसकी जगह खास तौर पर देखना जरूरी है।
अगर फाइब्रॉएड से कोई लक्षण नहीं हो रहे हैं, तो अक्सर पर इलाज की जरूरत नहीं होती। अगर लक्षण हैं, तो इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि फाइब्रॉएड कहां है, कितना बड़ा है और आप आगे प्रेगनेंसी चाहती हैं या नहीं।
दवाओं से फाइब्रॉएड खत्म नहीं होता, लेकिन इसके लक्षणों को कंट्रोल किया जा सकता है।
इलाज | किसके लिए | प्रेगनेंसी पर असर |
|---|---|---|
हिस्टेरोस्कोपिक मायोमेक्टॉमी | कैविटी के अंदर वाले फाइब्रॉएड | यूट्रस बचा रहता है और पेट पर चीरा नहीं लगता |
लेप्रोस्कोपिक या ओपन मायोमेक्टॉमी | दीवार में या बाहर वाले बड़े फाइब्रॉएड | यूट्रस बचा रहता है, लेकिन आगे सिजेरियन की जरूरत पड़ सकती है |
गर्भनिरोधक पिल्स या हार्मोनल IUS | हैवी ब्लीडिंग | इस्तेमाल के दौरान प्रेगनेंसी नहीं होती |
यूटेराइन आर्टरी एम्बोलाइजेशन (UAE) | बड़े या कई फाइब्रॉएड | आगे प्रेगनेंसी चाहने वाली महिलाओं में अक्सर पर पहली पसंद नहीं |
हिस्टेरेक्टॉमी (बच्चेदानी निकालना) | जब आगे प्रेगनेंसी नहीं चाहिए | इसके बाद प्रेगनेंसी संभव नहीं |
अगर आप आगे प्रेगनेंसी चाहती हैं, तो इलाज चुनते समय यह बात डॉक्टर को पहले ही बताना जरूरी है। मायोमेक्टॉमी के बाद भी नई गांठें बन सकती हैं, खासकर 40 से कम उम्र और कई फाइब्रॉएड होने पर।
फाइब्रॉएड वाली ज्यादातर महिलाओं की प्रेगनेंसी नॉर्मल रहती है। प्रेगनेंसी में गांठ का साइज बदल सकता है, और ज्यादातर बढ़त पहले तीन महीनों में होती है। पेट दर्द इसकी सबसे आम तकलीफ है, जिसे आराम और डॉक्टर की बताई दवा से संभाला जाता है।
प्रेगनेंसी में क्या हो सकता है | क्या जानना जरूरी है |
पेट दर्द | फाइब्रॉएड वाली 10 में से 2 से 3 महिलाओं को हो सकता है। बिना फाइब्रॉएड वाली महिलाओं में यह करीब 10 में से 1 को होता है। |
सिजेरियन डिलीवरी | इसका रिस्क कुछ बढ़ सकता है। |
प्रीटर्म डिलीवरी | इसका रिस्क कुछ बढ़ सकता है। |
बच्चे की उल्टी पोजीशन (Breech) | इसका रिस्क कुछ बढ़ सकता है। |
पेट दर्द अक्सर रेड डीजेनरेशन (Red degeneration) की वजह से होता है, जिसमें गांठ का कुछ हिस्सा खराब होने लगता है। प्रेगनेंसी के दौरान फाइब्रॉएड निकालने की सर्जरी, अक्सर पर नहीं की जाती।
प्रेगनेंसी में यूट्रस फटने (Uterine rupture) का रिस्क करीब 1% बताया गया है, यानी हर 100 में से करीब 1 प्रेगनेंसी में ऐसा रिस्क है। अगर सर्जरी के दौरान कैविटी खुली थी, तो अक्सर पर 37 से 38 हफ्ते पर प्लान्ड सिजेरियन की सलाह दी जाती है। इसलिए पुरानी सर्जरी की रिपोर्ट अपनी प्रेगनेंसी डॉक्टर को जरूर दिखाएं।
सबसे बड़ी भ्रांति तो यही है कि फाइब्रॉएड कैंसर है, या इसके रहते प्रेगनेंसी हो ही नहीं सकती। दोनों बातें सही नहीं हैं। फाइब्रॉएड लगभग हमेशा नॉन-कैंसरस होते हैं, और इनके साथ भी प्रेगनेंसी हो सकती है।
अगर लक्षणों की वजह से आपके रोज के काम या रिश्तों पर असर पड़ रहा है, या दर्द की दवा से आराम नहीं मिल रहा, तो डॉक्टर को दिखाएं। प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं, तो इलाज चुनने से पहले डॉक्टर से अपने ऑप्शन पर बात करें।
इन कंडीशन में देर न करें:
फाइब्रॉएड का पता चलना डराने वाला लग सकता है, लेकिन ज्यादातर केसेस में यह न कैंसर है, न प्रेगनेंसी का रास्ता बंद करता है। असली सवाल यह है कि गांठ कहां है और क्या यह कैविटी को दबा रही है। सही जांच से साफ हो जाता है कि इलाज चाहिए या सिर्फ निगरानी काफी है।