अगर आपके पीरियड की तारीख़ निकल गई है, थोड़ी थकान लग रही है, ब्रेस्ट में हल्का दर्द है और हाल ही में अनप्रोटेक्टेड संबंध बनाये हैं, तो आपके मन में सवाल आ सकता है कि क्या मैं प्रेग्नेंट हूँ?
यह उलझन बहुत कॉमन है जिसे हम समझते हैं इस 1 month pregnancy symptoms in hindi आर्टिकल के द्वारा। इस समय जो लक्षण दिखाई देते हैं, वे कई बार पीरियड आने से पहले के लक्षणों जैसे ही होते हैं। इसीलिए कुछ महिलाओं को पता ही नहीं चलता कि वे प्रेग्नेंट हैं, जबकि कुछ को पीरियड मिस होने से पहले ही अंदाज़ा हो जाता है।
असल में प्रेग्नेंसी का पहला महीना गिनती में थोड़ा अलग होता है। डॉक्टर इसे आपके आख़िरी पीरियड के पहले दिन से गिनते हैं, न कि उस दिन से जब गर्भधारण हुआ। यानी जब आपको पता चलता है कि आप प्रेग्नेंट हैं, तब तक आप लगभग 4-5 हफ्ते की प्रेग्नेंट हो चुकी होती हैं।
इस आर्टिकल में हम समझेंगे कि पहले महीने में कौन से लक्षण दिखते हैं, ये लक्षण क्यों होते हैं, PMS यानी प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (premenstrual syndrome ) और 1 month pregnancy symptoms में कैसे अंतर करें और क्या IVF के बाद प्रेग्नेंसी के लक्षणों में कोई फ़र्क़ होता है।
यह वो लक्षण है जो सबसे पहले ध्यान खींचता है। अगर आपके पीरियड्स नियमित हैं और इस बार तारीख़ निकल गई, तो यह प्रेग्नेंसी का सबसे ठोस लक्षण है।
जब भ्रूण यानी एम्ब्रीओ (embryo) गर्भाशय की दीवार मतलब एंडोमेट्रियम (endometrium) से चिपक जाता है, तो शरीर hCG (Human Chorionic Gonadotropin) हॉर्मोन बनाना शुरू करता है। यही हॉर्मोन शरीर को बताता है कि अब पीरियड नहीं आना है। hCG की वजह से ओवरी नया अंडा नहीं बनाती और पीरियड्स नहीं आते।
PMS में पीरियड्स देर से आ सकते हैं लेकिन आते जरूर हैं वहीं प्रेग्नेंसी में पीरियड्स बिल्कुल नहीं आते।
अगर आपके पीरियड 7 दिन से ज़्यादा लेट हो गए हैं, तो प्रेग्नेंसी टेस्ट ज़रूर करें।
कुछ महिलाओं को पीरियड की तारीख़ के आसपास हल्की स्पॉटिंग होती है। ऐसे में उन्हें लगता हैं कि पीरियड आ गया हैं, लेकिन असल में यह इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग हो सकती है।
जब फ़र्टिलाइज़्ड एग (Fertilized Egg) यूट्रस की की दीवार मतलब में चिपकता है, तो उस जगह की कुछ रक्त वाहिकाएं यानी वेइन्स (veins) टूट सकती हैं। इससे हल्का खून निकलता है जो पिंक या ब्राउन रंग का होता है।
पीरियड में खून लाल होता है और 4 से 7 दिन तक आता है। वहीं इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग बहुत हल्की, कुछ बूंदें या हल्के धब्बे होती है और 1-2 दिन में बंद हो जाती है। पीरियड से अलग इसमें क्लॉट नहीं होते।
रात को अच्छी नींद लेने के बाद भी सुबह थकान लगे। दिन में आँखें भारी रहें। ऐसी थकान प्रेग्नेंसी के शुरुआती दिनों में बहुत आम है।
इस समय प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन का लेवल तेज़ी से बढ़ता है। यही हॉर्मोन यूट्रस को प्रेग्नेंसी के लिए तैयार करता है, लेकिन इसका एक असर यह भी है कि इससे शरीर धीमा हो जाता है और नींद आती है। साथ ही शरीर में खून की मात्रा बढ़ने लगती है ताकि भ्रूण को पोषण मिल सके। इस अतिरिक्त काम से भी थकान होती है।
PMS में भी थकान होती है, लेकिन वो पीरियड आने के बाद ठीक हो जाती है। प्रेग्नेंसी में थकान हफ्तों तक बनी रहती है और पहली तिमाही में सबसे ज़्यादा होती है।
इसे मॉर्निंग सिकनेस भी कहते हैं, लेकिन यह सिर्फ़ सुबह नहीं होती। मॉर्निंग सिकनेस दिन में किसी भी समय हो सकती है यानी दिन में कभी भी जी मिचला सकता है। इसमें कुछ महिलाओं को उल्टी होती है, कुछ को सिर्फ़ मतली रहती है।
1 month pregnancy में hCG हॉर्मोन का तेज़ी से बढ़ना इसकी मुख्य वजह है। कुछ एक्सपर्ट यह मानते हैं कि यह शरीर का प्रेगनेंसी के लिए हानिकारक चीज़ों को खाने से बचने का नेचुरल तरीका है। इसीलिए प्रेग्नेंट महिलाओं को कुछ खास महक या स्वाद से मतली ज़्यादा होती है। लेकिन हर महिला को मॉर्निंग सिकनेस नहीं होती। लगभग 20-30 प्रतिशत महिलाओं को कोई मतली नहीं होती और उनकी प्रेग्नेंसी बिल्कुल स्वस्थ होती है।
आमतौर पर 6 हफ्ते के आसपास, लेकिन कुछ महिलाओं को 4 हफ्ते में ही शुरू हो जाती है।
1 month pregnancy में ब्रेस्ट में भारीपन, दर्द, या छूने पर संवेदनशीलता महसूस होती है। यहाँ तक कि कई महिलाओं को ब्रा पहनने में भी तकलीफ होती है।
इस दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन ब्रेस्ट में दूध बनाने वाली ग्रंथियों को तैयार करना शुरू कर देते हैं। इससे ब्रेस्ट में खून का प्रवाह बढ़ता है और वे थोड़े बड़े और भारी लगते हैं। इस समय निप्पल के आसपास का हिस्सा यानी एरियोला (Areola) थोड़ा गहरे रंग का हो सकता है।
PMS में भी ब्रेस्ट में दर्द होता है, लेकिन पीरियड आने के बाद कम हो जाता है। प्रेग्नेंसी में यह दर्द बना रहता है और ब्रेस्ट का साइज़ बढ़ता जाता है।
रात को दो-तीन बार बाथरूम जाना पड़ सकता है। दिन में भी बार-बार पेशाब लग सकती है। यह प्रेग्नेंसी का एक आम लक्षण है जो 1 month pregnancy में ही शुरू हो सकता है।
प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर में खून की मात्रा बढ़ जाती है ऐसे में किडनी को ज़्यादा खून फ़िल्टर करना पड़ता है, जिससे ज़्यादा पेशाब बनता है।साथ ही यूट्रस थोड़ा बड़ा होने लगता है और ब्लैडर पर हल्का दबाव पड़ता है।
मूड में बहुत से बदलाव जैसे अचानक रोना आना, छोटी बात पर चिड़चिड़ापन, बिना वजह खुशी या उदासी महसूस होने लगते हैं।
1 month pregnancy में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन तेज़ी से बढ़ने लगते हैं और इससे दिमाग के उन हिस्सों पर फर्क पड़ता है जो भावनाओं यानी इमोशंस को कंट्रोल करते हैं। यह बिल्कुल नार्मल है, लेकिन अगर उदासी बहुत ज़्यादा हो या मन में नकारात्मक विचार आएं, तो डॉक्टर से बात करें।
PMC और 1 month pregnancy symptoms इतने मिलते-जुलते हैं कि उनमें फ़र्क़ करना मुश्किल हो जाता है। वैसे प्रेगनेंसी पक्की करने का तरीका है कि पीरियड मिस होने के 5-7 दिन बाद आप अपना प्रेग्नेंसी टेस्ट करें।
| लक्षण | PMS में | प्रेग्नेंसी में |
|---|---|---|
| ब्रेस्ट दर्द | पीरियड आने पर कम हो जाता है | दर्द बना रहता है, ब्रेस्ट का साइज़ बढ़ जाता है |
| थकान | पीरियड के बाद ठीक होती है | हफ्तों तक बनी रहती है |
| मतली | आमतौर पर नहीं होती | 4 से हफ्ते से शुरू हो जाती है |
| स्पॉटिंग | पीरियड में बदल जाती है | हल्की स्पॉटिंग होती है, जो 1-2 दिन बंद हो जाती है |
| पीरियड | देर से आयें पर आते हैं | पीरियड्स नहीं आते |
आईवीएफ के बाद होने वाली प्रेगनेंसी में ज़्यादातर लक्षण वही होते हैं जो नेचुरल प्रेगनेंसी में होते हैं, बस कुछ बातें अलग होती हैं।
IVF के बाद डॉक्टर प्रोजेस्टेरोन की गोली, इंजेक्शन या सपोसिटरी देते हैं। इस बाहरी प्रोजेस्टेरोन की वजह से, चाहे प्रेगनेंसी हुई हो या नहीं, ब्रेस्ट में दर्द, थकान, और ब्लोटिंग जैसे लक्षण हो सकते हैं। इसीलिए IVF के बाद सिर्फ़ लक्षणों के आधार पर यह तय करना मुश्किल है कि प्रेग्नेंसी हुई या नहीं।
IVF के बाद प्रेग्नेंसी की पुष्टि के लिए होम टेस्ट की जगह ब्लड टेस्ट यानी बीटा (Beta) hCG टेस्ट करवाया जाता है। यह टेस्ट ज़्यादा सटीक होता है और आमतौर पर एम्ब्रियो ट्रांसफर के 12 से दिन बाद करवाया जाता है।
लेकिन ध्यान रखें कि टेस्ट से पहले के दो हफ्ते (Two Week Wait) में लक्षणों को ज़्यादा महत्व न दें क्योंकि कुछ महिलाओं को कोई लक्षण नहीं होता फिर भी प्रेग्नेंसी होती है, और कुछ को सब लक्षण होते हैं फिर भी नहीं होती। इसीलिए धैर्य रखें और टेस्ट का इंतज़ार करें।
अगर प्रेगनेंसी नेचुरल है तो पीरियड मिस होने के 5 से दिन बाद प्रेगनेंसी टेस्ट करें। इसके लिए सुबह का पहला पेशाब लें क्योंकि उसमें hCG की मात्रा सबसे ज़्यादा होती है।
अगर टेस्ट निगेटिव आए और पीरियड्स भी न आयें, तो एक हफ्ते बाद दोबारा टेस्ट करें।
ये एक्टोपिक प्रेग्नेंसी या किसी और गंभीर समस्या के लक्षण हो सकते हैं।