सारांश (Overview)
आप महीनों से कोशिश कर रहे हैं, सब कुछ ठीक लग रहा है, फिर भी प्रेगनेंसी नहीं ठहर रही। यह इंतज़ार धीरे धीरे चिंता में बदल जाता है, और मन में एक ही सवाल आता है, आखिर दिक्कत कहां है।
सबसे पहले एक बात समझ लीजिए। प्रेगनेंसी ना ठहरने के पीछे कोई एक वजह नहीं होती। यह महिला, पुरुष या दोनों से जुड़ी कई वजहों में से कुछ भी हो सकती है। एग का सही समय पर बनना, स्पर्म का उस तक पहुंचना, दोनों का मिलकर एम्ब्रीओ (embryo) बनाना और उसका गर्भाशय में ठीक से टिकना, इन सब में से किसी भी जगह रुकावट देरी की वजह बन सकती है।
इस आर्टिकल में हम प्रेगनेंसी ना ठहरने के 10 आम कारण एक एक करके समझेंगे। साथ ही यह भी देखेंगे कि देरी कब मानी जाती है, डॉक्टर कौन से टेस्ट कराते हैं और आपको कब फर्टिलिटी डॉक्टर से मिलना चाहिए। यह जानकारी इसलिए है ताकि आप सही समय पर सही कदम उठा सकें। अपनी स्थिति के हिसाब से सटीक सलाह के लिए फर्टिलिटी डॉक्टर से मिलना सबसे अच्छा रहता है।
हर महीने कोशिश के बाद भी प्रेगनेंसी ना ठहरना, अपने आप में कोई बीमारी नहीं है। एक हेल्दी कपल में भी हर महीने प्रेगनेंसी के चांस सीमित होते हैं, और ज़्यादातर लोगों को इसमें कुछ महीने लग ही जाते हैं। इसलिए एक या दो महीने में सफलता ना मिले, तो घबराने की ज़रूरत नहीं।
सवाल यह है कि देरी कब मानी जाए। आमतौर पर इनफर्टिलिटी की परिभाषा यह है कि एक साल तक बिना किसी गर्भनिरोधक के नियमित संबंध के बाद भी प्रेगनेंसी ना ठहरे। यानी एक साल की नियमित कोशिश के बाद टेस्ट कराना सही रहता है।
लेकिन यह समय हर उम्र के लिए एक जैसा नहीं है। उम्र यहां बड़ी भूमिका निभाती है। अगर महिला की उम्र 35 साल या उससे ज़्यादा है, तो 6 महीने की कोशिश के बाद ही टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इस उम्र के बाद हर महीना मायने रखता है। कुछ हालात में तो इससे भी पहले मिलना चाहिए, जैसे पीरियड्स बहुत अनियमित हों, पहले से कोई दिक्कत पता हो, या बार बार मिसकैरेज हुआ हो।
अब एक एक कारण को समझते हैं। इससे पहले एक ज़रूरी बात। प्रेगनेंसी में देरी को अक्सर सिर्फ़ महिला से जोड़ दिया जाता है, जो गलत है। यह महिला, पुरुष या दोनों से जुड़ी हो सकती है। इसलिए दोनों को साथ में टेस्ट कराना चाहिए और इसे एक टीम की तरह देखना चाहिए। कई बार एक से ज़्यादा कारण एक साथ भी होते हैं।
प्रेगनेंसी के लिए हर महीने एक हेल्दी एग का सही समय पर निकलना ज़रूरी है। इसे ओव्यूलेशन (ovulation) कहते हैं। जब यह ठीक से या समय पर नहीं होता, तो स्पर्म को एग तक पहुंचने का सही मौका ही नहीं मिलता। ओव्यूलेशन की गड़बड़ी प्रेगनेंसी में देरी की सबसे आम वजहों में से एक है।
इसका सबसे बड़ा इशारा अनियमित या बहुत देर से आने वाले पीरियड्स होते हैं। ओव्यूलेशन के पीछे कई हार्मोन मिलकर काम करते हैं, और इनमें से किसी एक का बिगड़ना भी इसे रोक सकता है। थायरॉइड (thyroid) का बहुत ज़्यादा या कम काम करना, या प्रोलैक्टिन (prolactin) नाम के हार्मोन का बढ़ जाना, इसकी आम वजहें हैं। अच्छी बात यह है कि ये दिक्कतें टेस्ट में आसानी से पकड़ में आ जाती हैं और सही इलाज से कंट्रोल हो जाती हैं। जैसे थायरॉइड की दवा या प्रोलैक्टिन कम करने वाली दवा से कई महिलाओं का ओव्यूलेशन दोबारा नियमित हो जाता है। कुछ मामलों में डॉक्टर ओव्यूलेशन शुरू कराने वाली दवाएं भी देते हैं। इसलिए अनियमित पीरियड्स को हल्के में ना लें, टेस्ट कराएं, क्योंकि यह अक्सर सबसे आसानी से ठीक होने वाली वजहों में से एक है।
PMOS महिलाओं में हार्मोन से जुड़ी एक आम कंडीशन है, जिसे कई लोग PCOD भी कहते हैं। यह अनियमित ओव्यूलेशन की एक बड़ी वजह है। इसमें अक्सर इंसुलिन रेज़िस्टेंस (insulin resistance) की भूमिका होती है। इंसुलिन रेज़िस्टेंस PMOS की एक बड़ी पहचान है और यह मोटी व दुबली, दोनों तरह की महिलाओं में देखी जाती है।
बढ़ा हुआ इंसुलिन ओवरी को ज़्यादा पुरुष हार्मोन बनाने का सिग्नल देता है, जिससे एग नियमित रूप से नहीं निकल पाता और पीरियड्स गड़बड़ा जाते हैं। इसके साथ वज़न बढ़ना, चेहरे पर अनचाहे बाल और मुंहासे भी दिख सकते हैं। PMOS का पता आमतौर पर लक्षणों, हार्मोन टेस्ट और अल्ट्रासाउंड को मिलाकर लगाया जाता है, जिसमें ओवरी में कई छोटे फॉलिकल दिख सकते हैं। यह एक बहुत आम कंडीशन है, इसलिए अगर आपको ऐसे लक्षण हैं, तो आप अकेली नहीं हैं और इसका इलाज मौजूद है। इसीलिए PMOS वाली कई महिलाओं को प्रेगनेंसी में देरी होती है। राहत की बात यह है कि इसे कंट्रोल किया जा सकता है। सही डाइट, रोज़ की एक्सरसाइज़ और थोड़ा वज़न कम करना अक्सर ओव्यूलेशन वापस पटरी पर ले आता है, और ज़रूरत पड़ने पर डॉक्टर कुछ दवाएं भी देते हैं। PMOS का पता चलना प्रेगनेंसी के दरवाज़े बंद होना नहीं है, बल्कि सही दिशा में कदम उठाने का इशारा है।
महिला जितने एग के साथ पैदा होती है, उनकी संख्या उम्र के साथ घटती जाती है। जब यह जमा पूंजी, यानी ओवेरियन रिजर्व (ovarian reserve), उम्र के हिसाब से कम हो जाती है, तो प्रेगनेंसी में दिक्कत आ सकती है। इसका अंदाज़ा AMH यानी एंटी म्यूलेरियन हार्मोन (AMH) टेस्ट से लगाया जाता है।
यहां एक बात समझना ज़रूरी है। AMH एग की संख्या का अंदाज़ा देता है, उनकी क्वालिटी का नहीं। इसका मतलब है कि कम AMH होने पर भी प्रेगनेंसी हो सकती है, बशर्ते एग की क्वालिटी ठीक हो। इसलिए इस टेस्ट के नतीजे से घबराने के बजाय उसे डॉक्टर के साथ मिलकर समझें। कम AMH का मतलब मेनोपॉज या पूरी तरह प्रेगनेंसी की उम्मीद खत्म होना नहीं है, यह सिर्फ़ यह बताता है कि जमा पूंजी घट रही है। इसे और साफ़ करने के लिए अल्ट्रासाउंड में ओवरी के छोटे फॉलिकल गिने जाते हैं, जिसे एंट्रल फॉलिकल काउंट (antral follicle count) कहते हैं। कम ओवेरियन रिजर्व का पता चलने पर समय की अहमियत बढ़ जाती है, इसलिए ऐसे में देर किए बिना प्लान बनाना और डॉक्टर से बात करना बेहतर रहता है।
फैलोपियन ट्यूब (fallopian tube) वह रास्ता है जहां एग और स्पर्म मिलते हैं। अगर यह ट्यूब किसी इन्फेक्शन, सूजन या पुरानी बीमारी से बंद या खराब हो जाए, तो एग और स्पर्म का मिलना ही मुश्किल हो जाता है। ट्यूब की गड़बड़ी प्रेगनेंसी में देरी की एक बड़ी वजह मानी जाती है।
ट्यूब के बंद होने के पीछे अक्सर पेल्विक इन्फेक्शन, यानी प्रजनन अंगों का पुराना इन्फेक्शन, या पहले हुई कोई सर्जरी होती है। एंडोमेट्रियोसिस भी ट्यूब को प्रभावित कर सकता है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसके अक्सर कोई साफ़ लक्षण नहीं होते, इसलिए यह टेस्ट में ही सामने आती है। अगर सिर्फ़ एक ट्यूब बंद हो और दूसरी खुली व स्वस्थ हो, तो कई बार नैचुरल प्रेगनेंसी हो जाती है। लेकिन अगर दोनों ट्यूब बंद हों, तो एग और स्पर्म का मिलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में डॉक्टर स्थिति के हिसाब से आगे के विकल्प बताते हैं, जिनमें कुछ मामलों में ट्यूब की सर्जरी और कुछ में IVF शामिल हो सकता है, जहां एग और स्पर्म को लैब में मिलाया जाता है।
प्रेगनेंसी में देरी को अक्सर सिर्फ़ महिला से जोड़ना एक बड़ी गलती है। स्टडीज़ बताती हैं कि पुरुष से जुड़ी वजहें इनफर्टिलिटी के करीब आधे मामलों में होती हैं। इसलिए पुरुष की जांच उतनी ही ज़रूरी है जितनी महिला की।
स्पर्म काउंट यानी स्पर्म की संख्या कम होना, स्पर्म मोटिलिटी यानी चाल कमज़ोर होना, या स्पर्म का आकार यानी मॉर्फोलॉजी सही ना होना, ये सब एग तक पहुंचने और उसे फर्टिलाइज़ करने की ताकत घटा देते हैं। स्पर्म की क्वालिटी कई वजहों से बिगड़ती है, जैसे हार्मोन का असंतुलन, वृषण की नसों में सूजन यानी वैरिकोसील (varicocele), इन्फेक्शन, धूम्रपान, ज़्यादा शराब, मोटापा और बहुत गर्म माहौल में रहना। इनमें से कई चीज़ें बदली या ठीक की जा सकती हैं, इसलिए सही समय पर पता चलने से सुधार की अच्छी गुंजाइश रहती है। पुरुष की सबसे पहली और आसान जांच सीमेन एनालिसिस (semen analysis) होती है, जो शुरुआत में ही करा लेनी चाहिए।
एक बात जो कई पुरुषों को राहत देती है, वह यह है कि स्पर्म की क्वालिटी अक्सर सुधारी जा सकती है। स्पर्म बनने का पूरा चक्र करीब ढाई से तीन महीने का होता है, इसलिए आदतों में बदलाव का असर तीन महीने बाद की रिपोर्ट में दिखता है। धूम्रपान और ज़्यादा शराब छोड़ना, वज़न कंट्रोल करना, तंग कपड़े और लंबे समय तक गर्मी से बचना, और खाने में हरी सब्ज़ियां व मेवे बढ़ाना, ये सब स्पर्म की सेहत में मदद करते हैं। अगर सीमेन एनालिसिस में वैरिकोसील या इन्फेक्शन जैसी कोई साफ़ वजह मिलती है, तो उसका इलाज भी संभव है। इसलिए रिपोर्ट खराब आने पर घबराने के बजाय डॉक्टर से बात करना सही रहता है।
उम्र फर्टिलिटी पर असर डालने वाला एक नैचुरल फैक्टर है। उम्र बढ़ने के साथ एग की संख्या और क्वालिटी, दोनों घटती हैं, और उनमें गुणसूत्र यानी क्रोमोसोम से जुड़ी गड़बड़ी की गुंजाइश बढ़ती है। एग की संख्या 37 साल के बाद और तेज़ी से घटती है, और घटती क्वालिटी प्रेगनेंसी को मुश्किल बना देती है।
यह असर अचानक नहीं आता, धीरे धीरे बढ़ता है। इसका मतलब यह नहीं कि 35 के बाद प्रेगनेंसी नहीं हो सकती, बल्कि यह कि चांस थोड़े घट जाते हैं और सावधानी की ज़रूरत बढ़ जाती है। एक बड़ी स्टडी में यह अंतर साफ़ दिखता है। साल भर कोशिश करने पर प्रेगनेंसी के चांस 30 से 31 साल की उम्र में करीब 87 प्रतिशत थे, जो 36 से 37 साल में घटकर 76 प्रतिशत और 40 से 41 साल में 54 प्रतिशत रह गए। नीचे दी गई टेबल इसे आसान करती है।
उम्र | साल भर कोशिश पर प्रेगनेंसी का करीब चांस |
|---|---|
30 से 31 साल | करीब 87 प्रतिशत |
36 से 37 साल | करीब 76 प्रतिशत |
40 से 41 साल | करीब 54 प्रतिशत |
इसलिए बड़ी उम्र में प्रेगनेंसी प्लान कर रहे कपल को समय को लेकर ज़्यादा सजग रहना चाहिए और सफलता ना मिलने पर जल्दी सलाह लेनी चाहिए। पुरुषों में भी उम्र का कुछ असर स्पर्म की क्वालिटी पर पड़ता है, हालांकि यह महिलाओं जितना तेज़ नहीं होता।
एंडोमेट्रियोसिस (endometriosis) एक ऐसी कंडीशन है जिसमें गर्भाशय की भीतरी परत जैसी कोशिकाएं गर्भाशय के बाहर बढ़ने लगती हैं। इससे पेल्विक हिस्से में सूजन और चिपकाव हो सकता है, और कई बार ओवरी व ट्यूब की बनावट भी बदल जाती है।
इसका एक आम लक्षण पीरियड्स के दौरान तेज़ दर्द है, हालांकि हर मामले में लक्षण साफ़ नहीं होते। एंडोमेट्रियोसिस प्रेगनेंसी को कई तरह से प्रभावित करता है। यह ओवेरियन रिजर्व घटा सकता है, पेल्विक अंगों की बनावट बिगाड़ सकता है और स्थानीय सूजन पैदा करता है, जो एग और स्पर्म, दोनों के लिए ठीक नहीं होती। इसकी गंभीरता हर महिला में अलग होती है। हल्के मामलों में प्रेगनेंसी हो जाती है, जबकि गंभीर मामलों में डॉक्टर की मदद ज़रूरी हो जाती है। एंडोमेट्रियोसिस का शक अल्ट्रासाउंड और लक्षणों से होता है, लेकिन इसे पक्के तौर पर लैप्रोस्कोपी (laparoscopy) नाम की एक छोटी दूरबीन जांच से देखा जाता है, जिसमें ज़रूरत पड़ने पर उसी समय इलाज भी हो सकता है। इसलिए लगातार तेज़ दर्द या प्रेगनेंसी में देरी हो, तो इसकी जांच कराना सही रहता है, ना कि दर्द को सामान्य मानकर टालते रहना।
रोज़ की कुछ आदतें भी फर्टिलिटी पर चुपचाप असर डालती हैं। धूम्रपान, ज़्यादा शराब, बहुत ज़्यादा या बहुत कम वज़न, गलत खानपान और शारीरिक निष्क्रियता, ये सब हार्मोन बैलेंस और एग व स्पर्म की क्वालिटी को बिगाड़ सकते हैं।
अच्छी बात यह है कि ये आदतें आपके हाथ में हैं, इसलिए इन्हें बदलकर प्रेगनेंसी के चांस बेहतर किए जा सकते हैं। शुरुआत छोटे बदलावों से करें, जैसे मीठे और प्रोसेस्ड खाने की जगह घर का ताज़ा खाना, रोज़ थोड़ी देर की वॉक, और नींद का एक तय समय। बहुत ज़्यादा कैफीन और लगातार बैठे रहने की आदत को भी कम करना मदद करता है। ये आदतें दोनों पर लागू होती हैं, सिर्फ़ महिला पर नहीं। पुरुष में भी धूम्रपान, ज़्यादा शराब और मोटापा स्पर्म की क्वालिटी घटाते हैं। इसलिए प्रेगनेंसी की तैयारी को एक साझा कोशिश की तरह देखें, जिसमें दोनों संतुलित डाइट, रोज़ की एक्सरसाइज़ और अच्छी आदतें अपनाएं। यह ना सिर्फ़ फर्टिलिटी, बल्कि आगे आने वाली प्रेगनेंसी की सेहत के लिए भी एक मज़बूत आधार बनाता है।
लंबे समय तक बना तनाव और रोज़ की अधूरी नींद शरीर के हार्मोन बैलेंस को बिगाड़ सकते हैं, जिसका असर ओव्यूलेशन और फर्टिलिटी पर पड़ता है। यह ज़रूरी नहीं कि तनाव अकेले प्रेगनेंसी रोकता हो, लेकिन यह आपकी नींद, भूख और आदतों को बिगाड़कर पूरी तस्वीर पर असर डालता है।
प्रेगनेंसी की कोशिश खुद एक तनाव बन सकती है, खासकर जब महीनों इंतज़ार करना पड़े और आसपास से सवाल बढ़ते जाएं। ऐसे में खुद पर ज़्यादा दबाव डालने से बात और मुश्किल हो जाती है। गहरी सांस की एक्सरसाइज़, हल्का योग, टहलना, पूरी नींद और पार्टनर का साथ इस दबाव को कम करते हैं। ज़रूरत लगे तो किसी काउंसलर से बात करना भी समझदारी है, कमज़ोरी नहीं।
नींद को लेकर एक बात ध्यान रखें। रोज़ करीब सात से आठ घंटे की नींद और सोने जागने का एक तय समय हार्मोन को स्थिर रखता है। लगातार देर रात तक जागना और स्क्रीन देखना नींद की क्वालिटी बिगाड़ता है, जिसका असर आगे चलकर पीरियड्स और ओव्यूलेशन पर भी पड़ सकता है। इसलिए तनाव और नींद, दोनों को साथ में सुधारना ज़्यादा असरदार रहता है, ना कि किसी एक पर काम करना।
कई बार सारे टेस्ट ठीक आते हैं, फिर भी प्रेगनेंसी नहीं ठहरती। इसे अनएक्सप्लेन्ड इनफर्टिलिटी (unexplained infertility) कहते हैं। स्टडीज़ के मुताबिक करीब 15 प्रतिशत कपल में कोई साफ़ कारण नहीं मिल पाता।
यह सुनने में निराशाजनक लग सकता है, क्योंकि जब कोई साफ़ वजह ना मिले, तो आगे क्या करें, यह समझना मुश्किल होता है। लेकिन इसे इस तरह देखिए कि कोई बड़ी और गंभीर दिक्कत टेस्ट में नहीं मिली, जो अपने आप में अच्छी बात है। ऐसे मामलों में डॉक्टर अक्सर चरण दर चरण आगे बढ़ते हैं, पहले आसान उपाय आज़माते हैं और ज़रूरत पड़ने पर ही अगले विकल्पों की ओर जाते हैं। कई बार लाइफस्टाइल सुधार और सही समय पर कोशिश से ही प्रेगनेंसी हो जाती है। कुछ मामलों में डॉक्टर ओव्यूलेशन शुरू कराने वाली दवाओं या IUI जैसे आसान इलाज से शुरुआत करते हैं। यानी साफ़ कारण ना मिलने का मतलब रास्ता बंद होना नहीं है, बल्कि यह कि आगे की योजना धीरे धीरे और आपकी स्थिति देखकर बनाई जाती है।
ऊपर बताए गए कारणों को एक नज़र में समझने के लिए नीचे दी गई टेबल देखिए।
कारण | किससे जुड़ा है | आम इशारा |
|---|---|---|
अनियमित ओव्यूलेशन | हार्मोन का असंतुलन | अनियमित पीरियड्स |
PMOS | इंसुलिन और हार्मोन का असंतुलन | अनियमित पीरियड्स, वज़न बढ़ना |
कम ओवेरियन रिजर्व | एग की घटती संख्या | कम AMH |
फैलोपियन ट्यूब की दिक्कत | ट्यूब का बंद या खराब होना | अक्सर कोई साफ़ लक्षण नहीं |
स्पर्म की दिक्कत | पुरुष की फर्टिलिटी | सीमेन एनालिसिस में गड़बड़ी |
बढ़ती उम्र | एग की संख्या और क्वालिटी | उम्र के साथ बढ़ता समय |
एंडोमेट्रियोसिस | गर्भाशय के बाहर कोशिकाओं का बढ़ना | पीरियड्स में तेज़ दर्द |
लाइफस्टाइल | आदतें और वज़न | बदली जा सकने वाली वजह |
तनाव और नींद | हार्मोन पर परोक्ष असर | थकान, अनियमितता |
अनएक्सप्लेन्ड इनफर्टिलिटी | टेस्ट में साफ़ कारण नहीं | रिपोर्ट ठीक, फिर भी देरी |
जब प्रेगनेंसी में देरी हो रही हो, तो डॉक्टर सिर्फ महिला की ही नहीं, बल्कि दोनों पार्टनर की जांच करते हैं। इसकी वजह यह है कि प्रेगनेंसी में देरी का कारण महिला, पुरुष या दोनों में से किसी में भी हो सकता है। इन टेस्ट का मकसद यह पता लगाना होता है कि प्रेगनेंसी ठहरने की प्रक्रिया में किसी तरह की रुकावट तो नहीं है।
AMH यानी एंटी मुलेरियन हार्मोन (Anti-Müllerian Hormone) टेस्ट से ओवेरियन रिजर्व के बारे में जानकारी मिलती है। इससे यह अंदाज़ा लगाने में मदद मिलती है कि ओवरी में कितने एग बचे हुए हैं। हालांकि, सिर्फ AMH के आधार पर प्रेगनेंसी होने की संभावना तय नहीं की जाती है।
थायरॉइड हार्मोन का असंतुलन पीरियड्स और ओव्यूलेशन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए प्रेगनेंसी में देरी होने पर डॉक्टर थायरॉइड की जांच भी करा सकते हैं।
प्रोलैक्टिन हार्मोन का स्तर बढ़ने पर ओव्यूलेशन प्रभावित हो सकता है। इसलिए जरूरत पड़ने पर डॉक्टर प्रोलैक्टिन टेस्ट से हार्मोन के स्तर की जांच करते हैं।
प्रोजेस्टेरॉन टेस्ट से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि ओव्यूलेशन हुआ है या नहीं। यह टेस्ट आमतौर पर पीरियड्स शुरू होने से करीब 7 दिन पहले कराया जाता है। 28 दिन के नियमित पीरियड्स में यह समय लगभग 21वें दिन के आसपास हो सकता है।
अल्ट्रासाउंड से ओवरी और गर्भाशय की स्थिति देखी जाती है। इससे ओवरी में मौजूद छोटे फॉलिकल्स को भी देखा जा सकता है। इनकी संख्या से डॉक्टर को ओवेरियन रिजर्व के बारे में कुछ जानकारी मिल सकती है।
HSG यानी हिस्टेरोसैल्पिंगोग्राफी (Hysterosalpingography) टेस्ट से यह देखा जाता है कि फैलोपियन ट्यूब खुली हैं या नहीं। इस टेस्ट में एक खास डाई डालकर एक्स-रे की मदद से ट्यूब का रास्ता देखा जाता है। अगर ट्यूब में रुकावट हो, तो इससे प्रेगनेंसी ठहरने में दिक्कत हो सकती है।
पुरुष में सबसे पहली और अहम जांच सीमेन एनालिसिस होती है। इससे स्पर्म काउंट, स्पर्म मोटिलिटी और स्पर्म मॉर्फोलॉजी के बारे में जानकारी मिलती है।
एक बात यहां समझना जरूरी है कि एक ही सीमेन एनालिसिस रिपोर्ट से हमेशा पूरी तस्वीर नहीं मिलती। स्पर्म की क्वालिटी में समय के साथ बदलाव हो सकता है। इसलिए जरूरत पड़ने पर डॉक्टर कुछ हफ्तों के अंतर पर दोबारा सीमेन एनालिसिस कराने की सलाह दे सकते हैं।
इनमें से ज्यादातर टेस्ट आसान होते हैं और इन्हें कराने में ज्यादा समय नहीं लगता। पुरुष की शुरुआती जांच भी अपेक्षाकृत आसान होती है, इसलिए डॉक्टर कई बार सीमेन एनालिसिस से जांच शुरू करने की सलाह देते हैं।
इन टेस्ट का मकसद यह पता लगाना है कि प्रेगनेंसी में देरी की वजह क्या हो सकती है और कहां इलाज या मदद की जरूरत है। इसका मकसद किसी एक पार्टनर को जिम्मेदार ठहराना नहीं है। सही जांच के बाद डॉक्टर आगे के कदम तय करते हैं।
टेस्ट | किसके लिए | क्या पता चलता है |
|---|---|---|
हार्मोन टेस्ट (AMH सहित) | महिला | ओव्यूलेशन और ओवेरियन रिजर्व |
अल्ट्रासाउंड | महिला | ओवरी और गर्भाशय की स्थिति |
HSG | महिला | फैलोपियन ट्यूब खुली है या नहीं |
सीमेन एनालिसिस | पुरुष | स्पर्म काउंट, मोटिलिटी, मॉर्फोलॉजी |
डॉक्टर की सलाह और जरूरी टेस्ट अपनी जगह हैं, लेकिन इस दौरान आप अपनी तरफ से भी कुछ चीज़ों का ध्यान रख सकते हैं। ये बदलाव प्रेगनेंसी के नैचुरल चांस को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।
इन बदलावों का मतलब यह नहीं है कि इससे प्रेगनेंसी की गारंटी हो जाएगी। इनका मकसद शरीर को प्रेगनेंसी के लिए बेहतर स्थिति में रखना है। अगर कोई मेडिकल कारण है, तो इन बदलावों से उसका इलाज नहीं होता और न ही ये डॉक्टर की जांच या इलाज का विकल्प हैं। इसलिए जरूरी टेस्ट और डॉक्टर की सलाह के साथ इन चीज़ों का भी ध्यान रखें।
कई कपल प्रेगनेंसी के लिए कोशिश करते हैं, लेकिन सही दिनों को पहचान नहीं पाते। इससे भी प्रेगनेंसी में देरी हो सकती है। इसलिए फर्टाइल विंडो (fertile window) को समझना जरूरी है।
फर्टाइल विंडो वे दिन होते हैं, जब प्रेगनेंसी के चांस सबसे ज्यादा होते हैं। यह आमतौर पर ओव्यूलेशन से करीब 5 दिन पहले शुरू होकर ओव्यूलेशन के दिन तक रहती है। इसकी वजह यह है कि स्पर्म महिला के शरीर में कुछ दिनों तक जिंदा रह सकता है, जबकि एग निकलने के बाद करीब एक दिन तक ही फर्टिलाइज़ हो सकता है।
अगर आपका पीरियड्स चक्र 28 दिन का है, तो ओव्यूलेशन आमतौर पर 14वें दिन के आसपास हो सकता है। हालांकि, हर महिला का पीरियड्स चक्र एक जैसा नहीं होता, इसलिए सिर्फ कैलेंडर के हिसाब से ओव्यूलेशन का दिन तय करना सही नहीं है।
ओव्यूलेशन के आसपास शरीर में कुछ बदलाव दिखाई दे सकते हैं। योनि से निकलने वाला डिस्चार्ज इन दिनों में साफ और लसदार हो सकता है, जो अंडे की सफेदी जैसा दिखाई देता है।
ओव्यूलेशन किट भी इसमें मदद कर सकती है। यह पेशाब में LH हार्मोन के बढ़ने को पहचानकर ओव्यूलेशन का अंदाज़ा देती है। कुछ महिलाएं रोज सुबह शरीर का तापमान भी ट्रैक करती हैं, क्योंकि ओव्यूलेशन के बाद इसमें थोड़ा बदलाव देखा जा सकता है।
फर्टाइल विंडो के दौरान हर 1 से 2 दिन में संबंध बनाना काफी होता है। रोज़ या बहुत ज्यादा संबंध बनाने से प्रेगनेंसी के चांस जरूरी नहीं कि बढ़ जाएं। हर 1 से 2 दिन में संबंध बनाने से फर्टाइल दिनों को कवर करने में मदद मिलती है।
आजकल कई मोबाइल ऐप पीरियड्स और ओव्यूलेशन को ट्रैक करने में मदद करते हैं। लेकिन ये ऐप आमतौर पर पिछले पीरियड्स के डेटा के आधार पर ओव्यूलेशन का अनुमान लगाते हैं। इसलिए सिर्फ ऐप के बताए दिन पर निर्भर रहना सही नहीं है।
पीरियड्स ट्रैक करने के साथ शरीर के संकेतों और जरूरत पड़ने पर ओव्यूलेशन किट का इस्तेमाल करना ज्यादा मददगार हो सकता है।
अगर पीरियड्स बहुत अनियमित हैं और ओव्यूलेशन के दिनों का पता लगाना मुश्किल हो रहा है, तो डॉक्टर से मिलना जरूरी है। अनियमित पीरियड्स के पीछे हार्मोन से जुड़ी समस्या या ओव्यूलेशन में दिक्कत हो सकती है, जिसकी जांच करना जरूरी होता है।
सही समय पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। इससे प्रेगनेंसी में देरी की वजह समझने और आगे की सही दिशा तय करने में मदद मिलती है।
अगर आपकी उम्र 35 साल से कम है और 1 साल तक नियमित कोशिश के बाद भी प्रेगनेंसी नहीं हुई है, तो फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से मिलें। अगर उम्र 35 साल या उससे ज्यादा है, तो 6 महीने की कोशिश के बाद ही डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।
अगर नीचे दी गयी कुछ कंडीशन आपके साथ भी हैं तब इतना इंतजार करने की जरूरत नहीं होती।
कई कपल फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से मिलने में इसलिए हिचकते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि डॉक्टर से मिलते ही किसी बड़े इलाज की जरूरत पड़ेगी। लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है। पहली मुलाकात में डॉक्टर आमतौर पर आपकी स्थिति समझते हैं और जरूरत के हिसाब से कुछ बुनियादी टेस्ट कराने की सलाह देते हैं। इसके बाद यह तय किया जाता है कि आगे क्या करना है।
इसलिए फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से मिलना किसी बड़े इलाज की शुरुआत नहीं, बल्कि प्रेगनेंसी में देरी की वजह समझने का पहला कदम हो सकता है।
प्रेगनेंसी ना ठहरना अपने आप में निराशा की वजह नहीं है, बल्कि यह एक इशारा है कि शायद कहीं टेस्ट और समझ की ज़रूरत है। जैसा हमने देखा, इसके पीछे अनियमित ओव्यूलेशन, PMOS, कम ओवेरियन रिजर्व, ट्यूब की दिक्कत, स्पर्म से जुड़ी परेशानी, बढ़ती उम्र, एंडोमेट्रियोसिस, लाइफस्टाइल, तनाव या कोई अनएक्सप्लेन्ड वजह, इनमें से एक या कई कारण हो सकते हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि यह किसी एक पार्टनर की दिक्कत नहीं है। इसमें महिला और पुरुष, दोनों की भूमिका बराबर देखी जानी चाहिए, इसलिए टेस्ट और इलाज भी दोनों को ध्यान में रखकर होना चाहिए। कई कारण ऐसे हैं जिन्हें सही समय पर पहचानकर और सही कदम उठाकर संभाला जा सकता है।
अगर आप लंबे समय से कोशिश कर रहे हैं और सफलता नहीं मिल रही, तो इंतज़ार को अनिश्चितता में बदलने देने के बजाय फर्टिलिटी डॉक्टर से बात करें। सही जानकारी, समय पर टेस्ट और सही सलाह मिलकर इस सफर को आसान और उम्मीद भरा बना देते हैं।
आखिर में एक बात याद रखें। प्रेगनेंसी में देरी का मतलब यह नहीं कि आगे कभी प्रेगनेंसी नहीं होगी। बहुत से कपल सही कारण पता चलने और सही कदम उठाने के बाद माता पिता बनते हैं। ज़रूरत बस इतनी है कि समय पर सजग रहें, दोनों साथ मिलकर टेस्ट कराएं, और डॉक्टर की सलाह पर भरोसा रखें। जल्दबाज़ी में इंटरनेट या इधर उधर की सलाह पर चलने के बजाय, एक भरोसेमंद फर्टिलिटी डॉक्टर की देखरेख में उठाया गया कदम सबसे सही रहता है।