गर्भावस्था का दूसरा महीना मां और होने वाली संतान दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण समय होता है।क्योंकि इस दौरान 5वें से 8वें हफ्ते में एम्ब्रीओ का विकास तेजी से होता है और अंग बनने शुरू हो जाते हैं। जैसे-जैसे शिशु बढ़ता है, मां को भी अपने शरीर में कई तरह के बदलाव दिखाई देने लगते हैं। इसलिए इस दौरान सही खान-पान, पर्याप्त आराम और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेना बेहद जरूरी होता है। इस लेख में आप जानेंगी कि 2 mahine ki pregnancy में बच्चे का विकास कैसा होता है, कौन-कौन से लक्षण दिखते हैं, क्या खाना चाहिए और किन सावधानियों को अपनाना जरूरी है।
प्रेगनेंसी का दूसरा महीना वह समय होता है जब शरीर धीरे धीरे गर्भावस्था के अनुसार खुद को ढालने लगता है। इस समय हार्मोन तेजी से बढ़ते हैं और इसी वजह से कई तरह के लक्षण दिखाई देते हैं। हर महिला में 2 mahine ki pregnancy के लक्षण अलग तरह से महसूस हो सकते हैं, लेकिन कुछ सामान्य संकेत अक्सर ज्यादातर महिलाओं में एक जैसे दिखते हैं।
2 mahine ki pregnancy में पौष्टिक और संतुलित आहार बेहद जरूरी है। सही भोजन बच्चे के दिमाग, हड्डियों, आंखों और दिल के विकास को मजबूत करता है। आइए जानते हैं कि दूसरे महीने में कौन-कौन से पोषक तत्व जरूरी हैं और उन्हें किन चीज़ों से लिया जा सकता है।
प्रोटीन बच्चे की मांसपेशियों, त्वचा और अंग बनाने में मदद करता है और मां को ऊर्जा देता है। अंडा, मछली, चिकन, टोफू, मूंग दाल, मसूर और राजमा इसके अच्छे स्रोत हैं। रोजाना आहार में किसी एक को शामिल करना पर्याप्त होता है।
दूसरे महीने में फोलिक एसिड बहुत जरूरी होता है। यह बच्चे की रीढ़ और दिमाग के सुरक्षित विकास में मदद करता है। रोजाना 400-600 माइक्रोग्राम लेना चाहिए। पालक, अनाज, संतरा, ब्रोकली और दाल से इसे आसानी से लिया जा सकता है।
कैल्शियम बच्चे की हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है। दूध, दही, पनीर, ब्रोकोली और रागी इसके अच्छे स्रोत हैं। एक गिलास दूध और दही रोजाना लेने से कैल्शियम का संतुलन बना रहता है।
गर्भावस्था में आयरन की जरूरत बढ़ जाती है। यह बच्चे तक ऑक्सीजन पहुंचाने और मां को एनीमिया से बचाने में मदद करता है। पालक, चना, राजमा, गुड़, सूखे मेवे और रेड मीट आयरन के अच्छे स्रोत हैं। विटामिन सी वाले फल के साथ लेने से शरीर इसे बेहतर तरीके से अवशोषित करता है।
ओमेगा थ्री बच्चे के दिमाग, आंखों और नर्व सिस्टम के विकास में मदद करता है। अलसी के बीज, अखरोट, सैलमन मछली और चिया सीड इसके अच्छे स्रोत हैं। रोजाना एक मुट्ठी अखरोट या एक चम्मच अलसी के बीज लेना पर्याप्त होता है।
गर्भावस्था में पर्याप्त पानी पीना बहुत जरूरी है। यह मां की पाचन प्रक्रिया को सही रखता है और एम्नियोटिक द्रव को संतुलित करता है, जो बच्चे की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
सिर्फ क्या खाना चाहिए ही नहीं, 2 mahine ki pregnancy में यह भी पता होना चाहिए कि क्या नहीं खाना है। इस समय मां का शरीर संवेदनशील होता है और बच्चा तेजी से बढ़ रहा होता है। गलत भोजन संक्रमण, फूड प्वाइजनिंग, हार्मोनल गड़बड़ी और बच्चे के विकास को प्रभावित कर सकता है।
कुछ बड़ी मछलियां जैसे स्वोर्डफिश, किंग मैकेरल और टाइलफिश जैसी मछलियों को खाने से बचना चाहिए क्योंकि इनमें पारा ज्यादा होता है, जो बच्चे के दिमाग और नर्वस सिस्टम के विकास पर बुरा असर डाल सकता है। इसकी जगह सैलमन, रोहू या छोटी मछलियां खाना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है।
जो फूड आइटम पाश्चराइज नहीं होते, उनमें लिस्टीरिया जैसे खतरनाक बैक्टीरिया हो सकते हैं, जिससे इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए कच्चा दूध, बिना पाश्चराइज जूस और खुले डेयरी प्रोडक्ट इन दिनों में खाने या पीने से बचना चाहिए।
कच्चा या अधपका भोजन कीड़े, बैक्टीरिया और वायरस का खतरा बढ़ाता है। कच्चा अंडा, आधा पका अंडा, सुशी, कच्चा मांस, कच्चा फिश और अधपकी चिकन से बचें।
कैफीन दिल की धड़कन बढ़ा सकता है और अधिक मात्रा में लेने से बच्चे के विकास पर असर पड़ सकता है। इसीलिए चाय -कॉफ़ी कम पिनी चाहिए।
शराब बच्चे के मानसिक और शारीरिक विकास को प्रभावित कर सकती है और जन्म के बाद स्वास्थ्य जटिलताओं का कारण बन सकती है। गर्भावस्था में शराब पूरी तरह से न लें।
धूम्रपान बच्चे तक ऑक्सीजन पहुंचने में बाधा डालता है और प्रीमैच्योर डिलीवरी, कम वजन और सांस से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ाता है।
यह समय मां और बच्चे दोनों के लिए अहम होता है। 2 mahine ki pregnancy में भले ही बेबी बंप दिखना शुरू न हुआ हो, लेकिन शरीर में बदलाव और बच्चे का विकास तेज़ हो जाता है। इसलिए इस दौरान सावधानी बरतना जरूरी है।
प्रेगनेंसी का दूसरा महीना बच्चे के अंगों के बनने और माँ के शरीर में बदलाव का अहम समय होता है। इस दौरान दिखने वाले ज़्यादातर लक्षण सामान्य होते हैं। 2 mahine ki pregnancy के समय सही पोषण, पर्याप्त आराम और नियमित जांच बहुत ज़रूरी रहती है। अगर कोई असामान्य लक्षण दिखें, तो बिना देर किए डॉक्टर से बात करना जरुरी होता है।
हां, हार्मोनल बदलाव और बढ़ती ऊर्जा की जरूरत की वजह से थकान आम है। आराम और संतुलित आहार मदद करता है।
सिर्फ सुबह ही नहीं, दिन या रात कभी भी मॉर्निंग सिकनेस हो सकती है। यह हार्मोनल बदलावों पर निर्भर करती है।
हां, फ़ोलिक एसिड, आयरन और डीएचए प्रीनेटल विटामिन आमतौर पर जरूरी होते हैं।
हल्की स्पॉटिंग आम है। अगर ज्यादा ब्लीडिंग या दर्द और ऐंठन हो, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें।