बाइकॉर्नुएट यूटेरस: कारण, लक्षण और प्रेगनेंसी पर असर

Last updated: January 05, 2026

Overview

जब गर्भाशय हार्ट शेप का होता है तब इसे बाइकॉर्नुएट यूटेरस (Bicornuate Uterus) कहते हैं। इसमें गर्भाशय के ऊपरी हिस्से में गहरा खांचा होता है जो इसे दो सींगों जैसा बना देता है। Bicornuate uterus in hindi में समझें तो यह एक जन्मजात स्थिति है जिसमें गर्भाशय का आकार सामान्य नाशपाती जैसा न होकर दिल जैसा हो जाता है।

बाइकॉर्नुएट यूटेरस लगभग 0.4 प्रतिशत महिलाओं में पाया जाता है। इसके बारे में अक्सर तब पता चलता है जब महिला गर्भधारण की कोशिश करती है या बार-बार गर्भपात होता है। अच्छी बात यह है कि बाइकॉर्नुएट यूटेरस होने का मतलब यह नहीं कि आप मां नहीं बन सकतीं। सही देखभाल और निगरानी से ज्यादातर महिलाएं स्वस्थ बच्चे को जन्म देती हैं।

बाइकॉर्नुएट यूटेरस कैसे बनता है?

जब एक बच्ची मां के गर्भ में विकसित हो रही होती है तब उसका गर्भाशय दो अलग-अलग नलियों से बनता है जिन्हें मुलेरियन डक्ट (Müllerian Ducts) कहते हैं। सामान्य विकास में ये दोनों नलियां आपस में पूरी तरह जुड़कर एक नाशपाती के आकार का गर्भाशय बनाती हैं।

लेकिन बाइकॉर्नुएट यूटेरस में ये दोनों नलियां ऊपर की तरफ पूरी तरह नहीं जुड़ पातीं। नीचे का हिस्सा यानी गर्भाशय ग्रीवा (Cervix) तो सामान्य बनता है लेकिन ऊपर का हिस्सा दो भागों में बंटा रहता है। इसी वजह से गर्भाशय का आकार दिल या Y अक्षर जैसा हो जाता है। यह एक जन्मजात कंडीशन है जो गर्भावस्था के शुरुआती हफ्तों में ही तय हो जाती है।

बाइकॉर्नुएट यूटेरस के प्रकार

अमेरिकन सोसाइटी ऑफ रिप्रोडक्टिव मेडिसिन (ASRM) के अनुसार बाइकॉर्नुएट यूटेरस को मुलेरियन डक्ट एनॉमली की क्लास 4 में रखा गया है। इसके दो मुख्य प्रकार हैं।

  • बाइकॉर्नुएट यूनिकॉलिस (Bicornuate Unicollis): इसमें गर्भाशय के दो सींग होते हैं लेकिन सर्विक्स एक ही होती है।
  • बाइकॉर्नुएट बाइकॉलिस (Bicornuate Bicollis): इसमें गर्भाशय के दो सींग होने के साथ-साथ दो अलग-अलग सर्विक्स भी होती हैं।

सेप्टेट यूटेरस से अंतर

बाइकॉर्नुएट यूटेरस को अक्सर सेप्टेट यूटेरस (Septate Uterus) समझ लिया जाता है। दोनों में फर्क यह है कि बाइकॉर्नुएट में गर्भाशय का बाहरी आकार भी असामान्य होता है जबकि सेप्टेट में बाहर से गर्भाशय सामान्य दिखता है लेकिन अंदर एक दीवार यानी सेप्टम होती है। सेप्टेट यूटेरस का इलाज आसान है क्योंकि हिस्टेरोस्कोपी से सेप्टम हटाया जा सकता है जबकि बाइकॉर्नुएट में सर्जरी जटिल होती है।

बाइकॉर्नुएट यूटेरस के लक्षण

ज्यादातर महिलाओं को पता ही नहीं चलता कि उनका गर्भाशय बाइकॉर्नुएट है क्योंकि इसके कोई खास लक्षण नहीं होते। अक्सर यह तब पता चलता है जब प्रेगनेंसी में कोई समस्या आती है या किसी और कारण से अल्ट्रासाउंड होता है।

  • पीरियड्स में तेज दर्द: कुछ महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान सामान्य से ज्यादा दर्द होता है जिसे डिसमेनोरिया (Dysmenorrhea) कहते हैं।
  • अनियमित ब्लीडिंग: पीरियड्स के बीच में हल्की ब्लीडिंग या स्पॉटिंग हो सकती है जो गर्भाशय के असामान्य आकार के कारण होती है।
  • संबंध बनाते समय दर्द: शारीरिक संबंध के दौरान पेट के निचले हिस्से में असुविधा या दर्द महसूस हो सकता है।
  • बार-बार गर्भपात: दो या उससे ज्यादा बार गर्भपात होना बाइकॉर्नुएट यूटेरस का संकेत हो सकता है और इसकी जांच जरूरी है।
  • समय से पहले डिलीवरी का इतिहास: अगर पहले भी प्रीटर्म डिलीवरी हो चुकी है तो गर्भाशय की जांच करवानी चाहिए।

जांच और डायग्नोसिस

बाइकॉर्नुएट यूटेरस का पता लगाने के लिए कई जांच की जाती हैं।

  • 2D अल्ट्रासाउंड (2D Ultrasound): पेट या वेजाइना के रास्ते किया जाने वाला अल्ट्रासाउंड गर्भाशय का आकार दिखाता है लेकिन कभी-कभी बाइकॉर्नुएट और सेप्टेट में फर्क करना मुश्किल होता है।
  • 3D अल्ट्रासाउंड (3D Ultrasound): यह गर्भाशय की 3D तस्वीर देता है जिससे गर्भाशय का सही आकार और दोनों सींगों की गहराई साफ दिखती है।
  • एचएसजी टेस्ट (HSG Test): हिस्टेरोसैल्पिंगोग्राम में गर्भाशय में डाई डालकर एक्स-रे लिया जाता है जो गर्भाशय की गुहा और फैलोपियन ट्यूब का आकार दिखाता है।
  • एमआरआई (MRI): यह सबसे सटीक जांच है जो गर्भाशय के बाहरी और अंदरूनी दोनों आकार को विस्तार से दिखाती है और बाइकॉर्नुएट को सेप्टेट से अलग पहचानने में मदद करती है।
  • लेप्रोस्कोपी (Laparoscopy): पेट में छोटा चीरा लगाकर कैमरा डालकर गर्भाशय का बाहरी आकार देखा जाता है।

प्रेगनेंसी पर प्रभाव

बाइकॉर्नुएट यूटेरस का मतलब यह नहीं कि आप गर्भधारण नहीं कर सकतीं। ज्यादातर महिलाएं सामान्य रूप से गर्भवती होती हैं। लेकिन प्रेगनेंसी के दौरान कुछ जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।

  • गर्भपात का खतरा: बाइकॉर्नुएट यूटेरस वाली महिलाओं में गर्भपात की दर थोड़ी ज्यादा होती है क्योंकि गर्भाशय की गुहा छोटी होने से भ्रूण को बढ़ने की पूरी जगह नहीं मिलती।
  • समय से पहले प्रसव: प्रीटर्म लेबर यानी 37 हफ्ते से पहले डिलीवरी का खतरा बढ़ जाता है क्योंकि गर्भाशय बच्चे के बढ़ते आकार को संभाल नहीं पाता।
  • ब्रीच पोजीशन: बच्चे का उल्टा होना यानी सिर की जगह पैर नीचे होना बाइकॉर्नुएट यूटेरस में ज्यादा देखा जाता है जिससे सी-सेक्शन की जरूरत पड़ सकती है।
  • गर्भाशय ग्रीवा की कमजोरी: कुछ मामलों में सर्विक्स कमजोर होती है जो प्रेगनेंसी के बीच में खुल सकती है जिसे सर्वाइकल इनकॉम्पिटेंस (Cervical Incompetence) कहते हैं।
  • बच्चे की धीमी ग्रोथ: गर्भ में बच्चे का विकास धीमा हो सकता है जिसे इंट्रायूटेराइन ग्रोथ रिस्ट्रिक्शन (IUGR) कहते हैं।
  • प्लेसेंटा की समस्या: प्लेसेंटा प्रीविया यानी प्लेसेंटा का नीचे होना बाइकॉर्नुएट यूटेरस में थोड़ा ज्यादा देखा जाता है।

बाइकॉर्नुएट यूटेरस का इलाज

हर महिला को इलाज की जरूरत नहीं होती। अगर कोई लक्षण नहीं हैं और प्रेगनेंसी सामान्य है तो सिर्फ निगरानी काफी है। इलाज तब जरूरी होता है जब बार-बार गर्भपात हो या प्रेगनेंसी में गंभीर जटिलताएं आएं।

  • सर्वाइकल सर्क्लेज (Cervical Cerclage)

    अगर सर्विक्स कमजोर है तो प्रेगनेंसी के 12 से 14 हफ्ते में गर्भाशय ग्रीवा में टांका लगाया जाता है जिसे सर्क्लेज कहते हैं। यह सर्विक्स को बंद रखता है और समय से पहले डिलीवरी रोकता है। डिलीवरी से पहले या 37 हफ्ते में यह टांका हटा दिया जाता है।

  • प्रोजेस्टेरोन सपोर्ट

    प्रोजेस्टेरोन हार्मोन की गोली या इंजेक्शन दिए जाते हैं जो गर्भाशय की परत को मजबूत रखते हैं और समय से पहले प्रसव का खतरा कम करते हैं।

  • स्ट्रैसमैन मेट्रोप्लास्टी (Strassman Metroplasty)

    यह एक सर्जरी है जिसमें गर्भाशय के दोनों सींगों को जोड़कर एक गुहा बनाई जाती है। यह उन महिलाओं के लिए है जिन्हें बार-बार गर्भपात हुआ हो और अन्य इलाज काम न आए हों। सर्जरी के बाद गर्भाशय में निशान बनता है इसलिए आगे की डिलीवरी सी-सेक्शन से होती है।

  • हाई-रिस्क प्रेगनेंसी केयर

    बाइकॉर्नुएट यूटेरस वाली प्रेगनेंसी को हाई-रिस्क माना जाता है इसलिए नियमित अल्ट्रासाउंड, बच्चे की ग्रोथ की निगरानी और सर्विक्स की लंबाई की जांच जरूरी है।

IVF और बाइकॉर्नुएट यूटेरस

बाइकॉर्नुएट यूटेरस होने से IVF में कोई बाधा नहीं है। एग बनना और फर्टिलाइजेशन सामान्य रूप से होता है। लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

  • भ्रूण स्थानांतरण की जगह: IVF में भ्रूण को यूटेरस में अल्ट्रासाउंड गाइडेंस से सही जगह चुन कर की उस चैम्बर यानी कैविटी में रखा जाता है जो ज्यादा बड़ा और स्वस्थ हो।
  • सिंगल एम्ब्रियो ट्रांसफर: बाइकॉर्नुएट यूटेरस में एक समय में एक ही भ्रूण रखना बेहतर है क्योंकि जुड़वां प्रेगनेंसी में जटिलताओं का खतरा और बढ़ जाता है।
  • प्री-इम्प्लांटेशन जांच: IVF से पहले गर्भाशय की पूरी जांच जरूरी है ताकि पता चले कि कौन सा चैम्बर या कैविटी बेहतर है और कोई अन्य समस्या तो नहीं है।
  • प्रेगनेंसी के बाद निगरानी: IVF से प्रेगनेंसी होने के बाद भी नियमित जांच जरूरी है क्योंकि जटिलताओं का खतरा वही रहता है जो सामान्य गर्भधारण में होता है।

निष्कर्ष

Bicornuate uterus in hindi में समझें तो यह गर्भाशय की एक जन्मजात स्थिति है जिसमें गर्भाशय का आकार दिल जैसा होता है। यह लगभग 0.4 प्रतिशत महिलाओं में पाई जाती है और अक्सर बिना लक्षणों के रहती है। बाइकॉर्नुएट यूटेरस होने का मतलब यह नहीं कि आप मां नहीं बन सकतीं। हां, प्रेगनेंसी में गर्भपात, प्रीटर्म डिलीवरी और ब्रीच पोजीशन जैसी जटिलताओं का खतरा थोड़ा बढ़ जाता है। लेकिन सही प्रीनेटल केयर, सर्वाइकल सर्क्लेज और प्रोजेस्टेरोन सपोर्ट से ज्यादातर महिलाएं स्वस्थ बच्चे को जन्म देती हैं। अगर बार-बार गर्भपात हो रहा है या प्रेगनेंसी में समस्या आ रही है तो फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से जरूर मिलें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

क्या बाइकॉर्नुएट यूटेरस में नॉर्मल डिलीवरी हो सकती है?

 

हां, कई महिलाओं की नॉर्मल डिलीवरी होती है। लेकिन बच्चा उल्टा हो तो सी-सेक्शन जरूरी होता है। डॉक्टर प्रेगनेंसी के आखिरी हफ्तों में बच्चे की पोजीशन देखकर फैसला लेते हैं।

बाइकॉर्नुएट यूटेरस और सेप्टेट यूटेरस में क्या फर्क है?

 

बाइकॉर्नुएट में गर्भाशय का बाहरी आकार भी असामान्य होता है जबकि सेप्टेट में बाहर से गर्भाशय सामान्य दिखता है और अंदर दीवार होती है। सेप्टेट का इलाज हिस्टेरोस्कोपी से आसान है।

क्या बाइकॉर्नुएट यूटेरस में जुड़वां बच्चे हो सकते हैं?

 

हां, लेकिन जुड़वां प्रेगनेंसी में जटिलताओं का खतरा और बढ़ जाता है क्योंकि गर्भाशय में जगह पहले से कम होती है। ऐसे में बहुत सावधानी और निगरानी जरूरी है।

क्या बाइकॉर्नुएट यूटेरस ठीक हो सकता है?

 

स्ट्रैसमैन मेट्रोप्लास्टी सर्जरी से गर्भाशय को एक करने की कोशिश की जाती है। लेकिन यह हर किसी के लिए जरूरी नहीं है और सिर्फ बार-बार गर्भपात होने पर ही की जाती है।

बाइकॉर्नुएट यूटेरस कितना आम है?

 

यह लगभग 0.4 प्रतिशत महिलाओं में पाया जाता है। बार-बार गर्भपात वाली महिलाओं में यह 5 से 10 प्रतिशत तक देखा जाता है।

क्या बाइकॉर्नुएट यूटेरस बच्चे को भी हो सकता है?

 

यह जेनेटिक नहीं है इसलिए आमतौर पर बच्चे को नहीं होता। लेकिन कुछ दुर्लभ मामलों में परिवार में एक से ज्यादा महिलाओं में गर्भाशय की असामान्यता देखी गई है।

IVF में बाइकॉर्नुएट यूटेरस की सफलता दर क्या है?

 

IVF की सफलता दर सामान्य गर्भाशय वाली महिलाओं जैसी ही होती है। भ्रूण स्थानांतरण सही कैविटी में होना जरूरी है और प्रेगनेंसी के बाद निगरानी जरूरी है।

**Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
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