जब गर्भाशय हार्ट शेप का होता है तब इसे बाइकॉर्नुएट यूटेरस (Bicornuate Uterus) कहते हैं। इसमें गर्भाशय के ऊपरी हिस्से में गहरा खांचा होता है जो इसे दो सींगों जैसा बना देता है। Bicornuate uterus in hindi में समझें तो यह एक जन्मजात स्थिति है जिसमें गर्भाशय का आकार सामान्य नाशपाती जैसा न होकर दिल जैसा हो जाता है।
बाइकॉर्नुएट यूटेरस लगभग 0.4 प्रतिशत महिलाओं में पाया जाता है। इसके बारे में अक्सर तब पता चलता है जब महिला गर्भधारण की कोशिश करती है या बार-बार गर्भपात होता है। अच्छी बात यह है कि बाइकॉर्नुएट यूटेरस होने का मतलब यह नहीं कि आप मां नहीं बन सकतीं। सही देखभाल और निगरानी से ज्यादातर महिलाएं स्वस्थ बच्चे को जन्म देती हैं।
जब एक बच्ची मां के गर्भ में विकसित हो रही होती है तब उसका गर्भाशय दो अलग-अलग नलियों से बनता है जिन्हें मुलेरियन डक्ट (Müllerian Ducts) कहते हैं। सामान्य विकास में ये दोनों नलियां आपस में पूरी तरह जुड़कर एक नाशपाती के आकार का गर्भाशय बनाती हैं।
लेकिन बाइकॉर्नुएट यूटेरस में ये दोनों नलियां ऊपर की तरफ पूरी तरह नहीं जुड़ पातीं। नीचे का हिस्सा यानी गर्भाशय ग्रीवा (Cervix) तो सामान्य बनता है लेकिन ऊपर का हिस्सा दो भागों में बंटा रहता है। इसी वजह से गर्भाशय का आकार दिल या Y अक्षर जैसा हो जाता है। यह एक जन्मजात कंडीशन है जो गर्भावस्था के शुरुआती हफ्तों में ही तय हो जाती है।
अमेरिकन सोसाइटी ऑफ रिप्रोडक्टिव मेडिसिन (ASRM) के अनुसार बाइकॉर्नुएट यूटेरस को मुलेरियन डक्ट एनॉमली की क्लास 4 में रखा गया है। इसके दो मुख्य प्रकार हैं।
बाइकॉर्नुएट यूटेरस को अक्सर सेप्टेट यूटेरस (Septate Uterus) समझ लिया जाता है। दोनों में फर्क यह है कि बाइकॉर्नुएट में गर्भाशय का बाहरी आकार भी असामान्य होता है जबकि सेप्टेट में बाहर से गर्भाशय सामान्य दिखता है लेकिन अंदर एक दीवार यानी सेप्टम होती है। सेप्टेट यूटेरस का इलाज आसान है क्योंकि हिस्टेरोस्कोपी से सेप्टम हटाया जा सकता है जबकि बाइकॉर्नुएट में सर्जरी जटिल होती है।
ज्यादातर महिलाओं को पता ही नहीं चलता कि उनका गर्भाशय बाइकॉर्नुएट है क्योंकि इसके कोई खास लक्षण नहीं होते। अक्सर यह तब पता चलता है जब प्रेगनेंसी में कोई समस्या आती है या किसी और कारण से अल्ट्रासाउंड होता है।
बाइकॉर्नुएट यूटेरस का पता लगाने के लिए कई जांच की जाती हैं।
बाइकॉर्नुएट यूटेरस का मतलब यह नहीं कि आप गर्भधारण नहीं कर सकतीं। ज्यादातर महिलाएं सामान्य रूप से गर्भवती होती हैं। लेकिन प्रेगनेंसी के दौरान कुछ जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।
हर महिला को इलाज की जरूरत नहीं होती। अगर कोई लक्षण नहीं हैं और प्रेगनेंसी सामान्य है तो सिर्फ निगरानी काफी है। इलाज तब जरूरी होता है जब बार-बार गर्भपात हो या प्रेगनेंसी में गंभीर जटिलताएं आएं।
अगर सर्विक्स कमजोर है तो प्रेगनेंसी के 12 से 14 हफ्ते में गर्भाशय ग्रीवा में टांका लगाया जाता है जिसे सर्क्लेज कहते हैं। यह सर्विक्स को बंद रखता है और समय से पहले डिलीवरी रोकता है। डिलीवरी से पहले या 37 हफ्ते में यह टांका हटा दिया जाता है।
प्रोजेस्टेरोन हार्मोन की गोली या इंजेक्शन दिए जाते हैं जो गर्भाशय की परत को मजबूत रखते हैं और समय से पहले प्रसव का खतरा कम करते हैं।
यह एक सर्जरी है जिसमें गर्भाशय के दोनों सींगों को जोड़कर एक गुहा बनाई जाती है। यह उन महिलाओं के लिए है जिन्हें बार-बार गर्भपात हुआ हो और अन्य इलाज काम न आए हों। सर्जरी के बाद गर्भाशय में निशान बनता है इसलिए आगे की डिलीवरी सी-सेक्शन से होती है।
बाइकॉर्नुएट यूटेरस वाली प्रेगनेंसी को हाई-रिस्क माना जाता है इसलिए नियमित अल्ट्रासाउंड, बच्चे की ग्रोथ की निगरानी और सर्विक्स की लंबाई की जांच जरूरी है।
बाइकॉर्नुएट यूटेरस होने से IVF में कोई बाधा नहीं है। एग बनना और फर्टिलाइजेशन सामान्य रूप से होता है। लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
Bicornuate uterus in hindi में समझें तो यह गर्भाशय की एक जन्मजात स्थिति है जिसमें गर्भाशय का आकार दिल जैसा होता है। यह लगभग 0.4 प्रतिशत महिलाओं में पाई जाती है और अक्सर बिना लक्षणों के रहती है। बाइकॉर्नुएट यूटेरस होने का मतलब यह नहीं कि आप मां नहीं बन सकतीं। हां, प्रेगनेंसी में गर्भपात, प्रीटर्म डिलीवरी और ब्रीच पोजीशन जैसी जटिलताओं का खतरा थोड़ा बढ़ जाता है। लेकिन सही प्रीनेटल केयर, सर्वाइकल सर्क्लेज और प्रोजेस्टेरोन सपोर्ट से ज्यादातर महिलाएं स्वस्थ बच्चे को जन्म देती हैं। अगर बार-बार गर्भपात हो रहा है या प्रेगनेंसी में समस्या आ रही है तो फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से जरूर मिलें।
हां, कई महिलाओं की नॉर्मल डिलीवरी होती है। लेकिन बच्चा उल्टा हो तो सी-सेक्शन जरूरी होता है। डॉक्टर प्रेगनेंसी के आखिरी हफ्तों में बच्चे की पोजीशन देखकर फैसला लेते हैं।
बाइकॉर्नुएट में गर्भाशय का बाहरी आकार भी असामान्य होता है जबकि सेप्टेट में बाहर से गर्भाशय सामान्य दिखता है और अंदर दीवार होती है। सेप्टेट का इलाज हिस्टेरोस्कोपी से आसान है।
हां, लेकिन जुड़वां प्रेगनेंसी में जटिलताओं का खतरा और बढ़ जाता है क्योंकि गर्भाशय में जगह पहले से कम होती है। ऐसे में बहुत सावधानी और निगरानी जरूरी है।
स्ट्रैसमैन मेट्रोप्लास्टी सर्जरी से गर्भाशय को एक करने की कोशिश की जाती है। लेकिन यह हर किसी के लिए जरूरी नहीं है और सिर्फ बार-बार गर्भपात होने पर ही की जाती है।
यह लगभग 0.4 प्रतिशत महिलाओं में पाया जाता है। बार-बार गर्भपात वाली महिलाओं में यह 5 से 10 प्रतिशत तक देखा जाता है।
यह जेनेटिक नहीं है इसलिए आमतौर पर बच्चे को नहीं होता। लेकिन कुछ दुर्लभ मामलों में परिवार में एक से ज्यादा महिलाओं में गर्भाशय की असामान्यता देखी गई है।
IVF की सफलता दर सामान्य गर्भाशय वाली महिलाओं जैसी ही होती है। भ्रूण स्थानांतरण सही कैविटी में होना जरूरी है और प्रेगनेंसी के बाद निगरानी जरूरी है।