सारांश (Overview)
जन्म के तुरंत बाद बच्चा ठीक से सांस न ले या रोने में देर हो, तो माता पिता के मन में चिंता होना स्वाभाविक है। ऐसा तब होता है जब बच्चे तक ऑक्सीजन ठीक से न पहुंची हो।
जन्म के आसपास बच्चे तक ऑक्सीजन और खून की सप्लाई कम पड़ने को Birth Asphyxia कहा जाता है। यह प्रसव से पहले, प्रसव के दौरान या जन्म के तुरंत बाद हो सकता है। इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि ऑक्सीजन की कमी कितनी देर रही और कितनी गंभीर थी।
आगे जानेंगे कि Birth Asphyxia क्यों होता है, इसकी पहचान कैसे की जाती है, इलाज में क्या किया जाता है और इसका बच्चे के आगे की ग्रोथ पर क्या असर पड़ सकता है।
जन्म से ठीक पहले, जन्म के दौरान या उसके तुरंत बाद बच्चे तक ऑक्सीजन और खून की सप्लाई कम पड़ने को Birth Asphyxia कहा जाता है।
शरीर का हर अंग ऑक्सीजन से मिलने वाली ऊर्जा पर काम करता है। जब ऑक्सीजन कम पड़ती है, तो शरीर बिना ऑक्सीजन के ऊर्जा बनाने लगता है और खून में एसिड जमा होने लगता है। यही बदलाव आगे चलकर शरीर के अलग-अलग अंगों को प्रभावित कर सकता है।
इसमें समय सबसे ज्यादा मायने रखता है। थोड़े समय के लिए ऑक्सीजन की कमी होने पर शरीर अक्सर खुद संभल जाता है। लेकिन ऑक्सीजन की कमी लंबे समय तक रहे, तो पहले दिमाग और फिर किडनी, दिल और फेफड़ों पर असर पड़ सकता है।
एक बात और। जन्म के बाद बच्चे को रोने में थोड़ी देर होना अपने आप Birth Asphyxia का मतलब नहीं है। कई बच्चे कुछ सेकंड की मदद के बाद ठीक से सांस लेने लगते हैं और आगे कोई दिक्कत नहीं होती।
इसके कारण इस बात पर निर्भर करते हैं कि ऑक्सीजन की कमी प्रसव से पहले, प्रसव के दौरान या जन्म के तुरंत बाद हुई है।
कब | कॉमन कारण | बच्चे तक क्या असर पहुँचता है |
|---|---|---|
प्रसव से पहले | प्री-एक्लेम्पसिया, बच्चे की ग्रोथ रुक जाना, माँ को गंभीर एनीमिया, इन्फेक्शन, बेकाबू शुगर | प्लेसेंटा से ऑक्सीजन की सप्लाई पहले से कमजोर रहती है |
प्रसव के दौरान | प्लेसेंटा का समय से पहले अलग होना, गर्भनाल का दबना या पहले निकल आना, लंबा और मुश्किल प्रसव, कंधा फंसना, गर्भाशय का फटना | बच्चे तक ऑक्सीजन की सप्लाई अचानक या धीरे-धीरे कम हो सकती है |
जन्म के तुरंत बाद | बहुत कम वजन या समय से पहले जन्म, फेफड़ों का न खुल पाना, गंभीर इन्फेक्शन, जन्मजात दिल की दिक्कत | बच्चा खुद से ठीक तरह सांस नहीं ले पाता |
इनमें से कई कारणों का पता प्रेगनेंसी के दौरान होने वाली नियमित जांच से चल सकता है। वहीं, प्रसव के दौरान बच्चे की धड़कन पर नजर रखना जरूरी होता है, ताकि ऑक्सीजन की सप्लाई कम होने पर समय रहते फैसला लिया जा सके।
जन्म के तुरंत बाद बच्चे की हालत देखकर डॉक्टर सबसे पहले यह देखते हैं कि उसे सांस लेने में दिक्कत तो नहीं है और उसे कितनी मदद की जरूरत है। इसके लिए Apgar स्कोर लिया जाता है, लेकिन सिर्फ इसी स्कोर से Birth Asphyxia की पुष्टि नहीं होती।
जहां ऑक्सीजन की कमी का शक हो, वहां कुछ और जांचें की जाती हैं।
इन सभी जांचों को बच्चे के लक्षण और उसके व्यवहार के साथ देखा जाता है। इससे डॉक्टर यह समझ पाते हैं कि ऑक्सीजन की कमी कितनी गंभीर थी और आगे किस तरह की निगरानी या इलाज की जरूरत है।
जन्म के तुरंत बाद बच्चे में पांच चीजें देखी जाती हैं। हर चीज के लिए 0, 1 या 2 नंबर दिए जाते हैं, यानी कुल स्कोर 10 होता है।
क्या देखा जाता है | किस बात पर नंबर मिलते हैं |
|---|---|
धड़कन | धड़कन है या नहीं, और कितनी तेज है |
सांस | रोना और सांस लेने की कोशिश |
मांसपेशियों का तनाव | हाथ-पैर मुड़े हुए और हिलते हुए हैं या ढीले |
प्रतिक्रिया | छूने पर बच्चा रोता, खांसता या कोई दूसरी प्रतिक्रिया देता है या नहीं |
रंग | त्वचा का रंग, खासकर होंठ और शरीर का बीच का हिस्सा |
Apgar स्कोर आमतौर पर जन्म के पहले और पांचवें मिनट पर लिया जाता है। 5 मिनट पर 7 से 10 का स्कोर सामान्य, 4 से 6 मध्यम रूप से असामान्य और 0 से 3 कम माना जाता है।
यह स्कोर डॉक्टर को यह समझने में मदद करता है कि जन्म के तुरंत बाद बच्चे की हालत कैसी है और उसे कितनी मदद की जरूरत है। लेकिन Apgar स्कोर अकेले Birth Asphyxia की पुष्टि नहीं करता और न ही इससे बच्चे के आगे के विकास का फैसला किया जा सकता है। इसके लिए बच्चे की पूरी स्थिति और दूसरी जांचों को भी देखा जाता है।
जब ऑक्सीजन की कमी दिमाग तक पहुंचती है, तो उससे पड़ने वाले असर को तीन कैटेगरी में बांटा जाता है। यह डिवीज़न समझना इसलिए जरुरी है क्योंकि बच्चे को लेकर आगे की पूरी उम्मीद इसी पर निर्भर करती है।
कैटेगरी | बच्चे में क्या दिखता है | आगे क्या उम्मीद रहती है |
|---|---|---|
हल्की | बच्चा ज्यादा सतर्क और चिड़चिड़ा, नींद कम, दूध पीने में थोड़ी दिक्कत | ज्यादातर बच्चे कुछ दिनों में सामान्य हो जाते हैं |
मध्यम | सुस्ती, मांसपेशियां ढीली, दूध पीने में दिक्कत, कई बार दौरे | कुछ बच्चों में आगे ग्रोथ से जुड़ी दिक्कतें रह सकती हैं |
गंभीर | बेहोशी जैसी स्थिति, शरीर बिल्कुल ढीला, सांस में मदद की जरूरत | रिस्क सबसे ज्यादा, क्लोज़ ऑब्ज़र्वेशन जरूरी |
इस कंडीशन में जन्म के बाद का हर मिनट और घंटा महत्वपूर्ण होता है। शुरुआत में बच्चे की सांस और धड़कन पर ध्यान दिया जाता है। इसके बाद अगले कुछ घंटों में दिमाग और शरीर के दूसरे अंगों पर नजर रखी जाती है।
समय | क्या किया जाता है | क्यों |
|---|---|---|
पहला मिनट | बच्चे को पोंछकर गर्म रखना, सांस का रास्ता साफ करना और जरूरत होने पर मास्क से सांस देना | बच्चे की सांस शुरू कराने के लिए |
पहले 10 मिनट | सांस और धड़कन पर लगातार नजर रखना। जरूरत पड़ने पर छाती दबाकर CPR और दवाएं देना | दिल की धड़कन और शरीर में खून का बहाव बनाए रखने के लिए |
पहला घंटा | बच्चे को NICU में रखना, शुगर और शरीर का तापमान संभालना और ऑक्सीजन का स्तर सही सीमा में रखना | ऑक्सीजन की कमी से होने वाली आगे की परेशानी को कम करने के लिए |
पहले 6 घंटे | बच्चे के दिमाग की स्थिति देखना, दौरे पर नजर रखना और जरूरत होने पर ठंडा करने वाला इलाज शुरू करना | दिमाग पर ऑक्सीजन की कमी के असर को कम करने के लिए |
पहले 72 घंटे | बच्चे के अलग-अलग अंगों की निगरानी करना, दौरे होने पर उनका इलाज करना और पोषण शुरू करना | शरीर में होने वाले बदलावों को समय पर पहचानने और उनका इलाज करने के लिए |
पहला मिनट सबसे अहम होता है। जन्म के तुरंत बाद बच्चे की सांस शुरू कराने की कोशिश इसलिए की जाती है क्योंकि ज्यादातर बच्चे इसी शुरुआती मदद से संभल जाते हैं। हर बच्चे को छाती दबाने, दवा देने या लंबे समय तक NICU में रखने की जरूरत नहीं पड़ती।
इलाज की शुरुआत बच्चे की सांस शुरू कराने से होती है। बच्चे को अच्छी तरह पोंछकर गर्म रखा जाता है, सांस का रास्ता साफ किया जाता है और जरूरत होने पर मास्क और बैग की मदद से सांस दी जाती है। अगर इसके बाद भी बच्चे की हालत नहीं सुधरती, तो छाती दबाकर CPR किया जाता है और जरूरत के अनुसार दवाएं दी जाती हैं।
इसके बाद NICU में बच्चे की लगातार निगरानी की जाती है। इस दौरान शरीर का तापमान, शुगर और ऑक्सीजन का स्तर सही सीमा में रखना बहुत जरूरी होता है। ऑक्सीजन की कमी के बाद इनमें बहुत ज्यादा बदलाव होने पर दिमाग को और नुकसान हो सकता है। भारतीय प्रोटोकॉल में बताया गया है कि इन चीजों का स्तर कितना रखना चाहिए।
अगर बच्चे को दौरे पड़ते हैं, तो उन्हें दवाओं से नियंत्रित किया जाता है। कई बार दौरे बाहर से दिखाई नहीं देते और सिर्फ मशीन की मदद से पता चलते हैं। ऐसे दौरे का भी इलाज किया जाता है।
ऑक्सीजन की कमी का असर सिर्फ दिमाग पर नहीं पड़ता, इसलिए बच्चे के दूसरे अंगों पर भी नजर रखी जाती है। गुजरात के एक अस्पताल में हुए अध्ययन में ऐसे बच्चों में दिमाग पर असर 72.3% मामलों में, दौरे 36.9% में, एक से ज्यादा अंगों पर असर 16.2% में, और मशीन से सांस देने की जरूरत 23.1% में पड़ी। इसीलिए पेशाब कितना हो रहा है, धड़कन कैसी है और बच्चा ठीक से सांस ले पा रहा है या नहीं, इन सबकी लगातार निगरानी की जाती है।
अगर ऑक्सीजन की कमी से बच्चे के दिमाग पर असर पड़ने का खतरा हो, तो कुछ बच्चों में ठंडा करने वाला इलाज किया जाता है। इसमें बच्चे के शरीर का तापमान सामान्य से कम रखा जाता है। इससे दिमाग में होने वाली आगे की क्षति को कम करने में मदद मिल सकती है।
यह इलाज हर बच्चे को नहीं दिया जाता। आमतौर पर इसे जन्म के पहले 6 घंटे के अंदर शुरू करना जरूरी होता है और करीब 72 घंटे तक जारी रखा जाता है। इसलिए ऑक्सीजन की कमी के बाद बच्चे की हालत को जल्दी समझना और सही समय पर इलाज शुरू करना बहुत जरूरी है।
हल्की कैटेगरी वाले ज्यादातर बच्चों का विकास सामान्य रहता है। मध्यम कैटेगरी में कुछ बच्चों में आगे चलकर मांसपेशियों की जकड़न, बोलने या सीखने में देरी, या दौरे की समस्या दिख सकती है। गंभीर कैटेगरी में रिस्क सबसे ज्यादा रहता है।
इसीलिए डिस्चार्ज के बाद फॉलोअप छोड़ देना सबसे बड़ी गलती होती है। फॉलोअप में तीन चीजें देखी जाती हैं।
बर्थ एस्फिक्सिया में समय पर इलाज बहुत मायने रखता है। जन्म के तुरंत बाद सांस शुरू कराना और शुरुआती घंटों में बच्चे की लगातार निगरानी करना जरूरी होता है।
माता-पिता के लिए शुरुआती दिन मुश्किल हो सकते हैं, क्योंकि बच्चे पर ऑक्सीजन की कमी का कितना असर हुआ है, यह तुरंत पता नहीं चलता। इसका अंदाजा कुछ दिनों की जांच और बच्चे की हालत देखकर लगाया जाता है।
हल्के असर वाले ज्यादातर बच्चे अच्छी तरह ठीक हो जाते हैं। गंभीर मामलों में नियमित फॉलोअप से बच्चे के विकास पर नजर रखने और किसी परेशानी का समय पर पता लगाने में मदद मिलती है।