IVF बार-बार फेल हो रहा है? जानिए कैसे 'ब्लास्टोसिस्ट' तकनीक बढ़ा सकती है आपके माता-पिता बनने के चांस। IVF की जर्नी में हर दिन एक नई उम्मीद और एक नए स्टेप से जुड़ा होता है। एग और स्पर्म के मिलने से हुए फर्टिलाइजेशन के बाद लैब में बना हुआ छोटा-सा एम्ब्रीओ आगे बढ़ते-बढ़ते एक महत्वपूर्ण स्टेज पर पहुँचता है जिसे ब्लास्टोसिस्ट (blastocyst) कहा जाता है। यह स्टेज IVF की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि ब्लास्टोसिस्ट बताता है कि एम्ब्रीओ कितना स्वस्थ है और गर्भाशय यूट्रस में जाकर इम्प्लांटेशन की उसकी क्षमता कितनी है। इस आर्टिकल में हम बहुत ही आसान भाषा में Blastocyst meaning in Hindi समझेंगे, साथ ही जानेंगे कि आईवीएफ की सफलता में यह गेम-चेंजर क्यों है।
जब लैब में एग और स्पर्म मिलते हैं, तो भ्रूण यानी एम्ब्रीओ बनने की शुरुआत होती है। शुरुआत के 2-3 दिन तो यह सिर्फ कोशिकाओं यानी सेल्स (Cells) का एक साधारण सा गोला या गुच्छा होता है। लेकिन 5वें या 6वें दिन तक यह बड़ा होकर एक बहुत ताकतवर और खास आकार ले लेता है। इसी '5 दिन के तैयार एम्ब्रीओ' को डॉक्टर 'ब्लास्टोसिस्ट' कहते हैं।
इसको आसान भाषा में समझें तो ब्लास्टोसिस्ट तीन मुख्य हिस्सों से बना होता है:
कई बार कपल्स पूछते हैं कि "सब कुछ ठीक था, फिर भी प्रेगनेंसी क्यों नहीं ठहरी?" यहां ब्लास्टोसिस्ट प्रेगनेंसी नहीं ठहरने के पीछे की वजहें सामने लाने का काम करता है।
पुराने समय में डॉक्टर डे-3 (Day-3) वाले भ्रूण को ही यूट्रस में डाल देते थे, लेकिन अब ब्लास्टोसिस्ट in IVF (डे-5 ट्रांसफर) को 'गोल्ड स्टैंडर्ड' माना जाता है। आखिर क्यों?
ब्लास्टोसिस्ट, एग और स्पर्म के मिलने के 5 या 6 दिन बाद तैयार होता है। लैब में एक्सपर्ट्स जिन्हें एम्ब्रियोलॉजिस्ट कहते हैं, माइक्रोस्कोप से इसकी बारीकी से जांच करते हैं कि यह कितना अच्छा और मजबूत बना है। डॉक्टर इसे 'ग्रेड' देते हैं। इसे गार्डनर ग्रेडिंग (Gardner Grading) कहते हैं, जिसमें तीन चीजें देखी जाती हैं:
उदाहरण के लिए, 4AA या 5AB ग्रेड के ब्लास्टोसिस्ट को सबसे बेहतरीन माना जाता है।
IVF का रास्ता आसान नहीं होता, लेकिन साइंस ने अब इसे बहुत पक्का कर दिया है। ब्लास्टोसिस्ट केवल कोशिकाओं का समूह नहीं, बल्कि यह एक 'सर्वाइवर' (Survivor) है जो तमाम मुश्किलों को पार करके यहां तक पहुंचा है। अगर आपका भ्रूण ब्लास्टोसिस्ट तक पहुंच गया है, तो समझिये आपने आधी जंग जीत ली है। सही डॉक्टर और धैर्य के साथ, यह नन्ही सी शुरुआत जल्द ही आपके घर में बच्चे की किलकारी बनकर गूंज सकती है।
नहीं। औसतन, फर्टिलाइज हुए अंडों में से केवल 40% से 50% ही 5वें दिन तक ब्लास्टोसिस्ट बन पाते हैं। यह पूरी तरह अंडों और स्पर्म की क्वालिटी पर निर्भर करता है।
अगर भ्रूण 3 दिन के बाद बढ़ना बंद कर दे, तो समझ आता है कि उसमें आगे बढ़ने की अंदरूनी ताकत नहीं थी यानी उसका अपना सिस्टम चालू नहीं हुआ। यह साफ इशारा करता है कि या तो स्पर्म कमजोर था या एग की क्वालिटी ठीक नहीं थी।
35 साल से कम उम्र की महिलाओं में ब्लास्टोसिस्ट ट्रांसफर की सक्सेस रेट 50-60% तक हो सकती है, यह 3 दिन वाले भ्रूण के मुकाबले काफी बेहतर रिजल्ट देता है।
लैब का वह तरीका है जिसमें नन्हे भ्रूण को बिल्कुल 'मां के पेट जैसा' माहौल (वही तापमान और खाना-पीना) दिया जाता है। उसे एक खास मशीन (इनक्यूबेटर) में 5 से 6 दिन तक पाल-पोसकर बड़ा किया जाता है।
ट्रांसफर के बाद, ब्लास्टोसिस्ट को गर्भाशय में चिपकने (Implantation) में 24 से 48 घंटे लगते हैं। रिजल्ट जानने के लिए आपको लगभग 10-12 दिन बाद ब्लड टेस्ट कराना होता है।