सर्वाइकल कैंसर क्या है? – लक्षण, कारण, इलाज और Reproductive health पर असर

Last updated: December 22, 2025

Overview

सर्वाइकल कैंसर को लेकर सबसे बड़ी समस्या जानकारी की कमी नहीं, बल्कि अधूरी और डर पैदा करने वाली जानकारी है। अक्सर महिलाएँ यह सुनकर घबरा जाती हैं कि यह “कैंसर” है, लेकिन यह नहीं बताया जाता कि यह बीमारी कैसे शुरू होती है, कितने समय में बढ़ती है, और किस स्टेज में पूरी तरह रोकी जा सकती है।

चलिए समझते हैं कि cervical cancer kya hota hai, यह क्यों होता है, किन महिलाओं में इसका खतरा अधिक होता है, इसकी जांच कैसे की जाती है, और इलाज के साथ-साथ प्रजनन यानी फ़र्टिलिटी (fertility)और भविष्य के जीवन पर इसका क्या असर पड़ सकता है।

सर्वाइकल कैंसर क्या होता है?

सर्वाइकल कैंसर गर्भाशय के निचले हिस्से, यानी गर्भाशय ग्रीवा या सर्विक्स (cervix) में विकसित होने वाला कैंसर है। सर्विक्स वह संकरा भाग है जो गर्भाशय यानी यूट्रस (Uterus) को योनि मतलब वजाइना (Vagina) से जोड़ता है और महिला के प्रजनन तंत्र अर्थात रिप्रोडक्टिव सिस्टम (Reproductive System) में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सर्वाइकल कैंसर अचानक नहीं होता बल्कि शुरुआत में सर्विक्स की कोशिकाओं यानी सेल्स (cells) में हल्के-हल्के असामान्य बदलाव आते हैं, जिन्हें प्रीकैंसरस बदलाव कहा जाता है। इन्हें मेडिकल भाषा में सर्वाइकल इंट्राएपिथेलियल नियोप्लाजिया या सीआईएन (CIN – cervical intraepithelial neoplasia) कहा जाता है।

सर्वाइकल कैंसर की असली जड़

लगभग सभी सर्वाइकल कैंसर के मामलों में एक चीज़ समान पाई जाती है, वो है ह्यूमन पैपिलोमा वायरस यानी एचपीवी (HPV – human papillomavirus) का लंबे समय तक शरीर में बने रहना। एचपीवी एक बहुत आम यौन संचारित यानी सेक्सुअली ट्रांसमिटेड वायरस (Sexually Transmitted Virus) है।

ज़्यादातर यौन रूप से सक्रिय महिलाओं के शरीर में यह वायरस जीवन में कभी न कभी आ सकता है। एचपीवी अक्सर बिना किसी लक्षण के शरीर में बना रहता है।

  • अधिकांश मामलों में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी इस वायरस को अपने आप 1–2 साल में ख़त्म कर देती है
  • लेकिन समस्या तब होती है जब यह वायरस शरीर में लगातार बना रहता है

जब एचपीवी लंबे समय तक सर्विक्स की सेल्स में मौजूद रहता है, तो वह धीरे-धीरे इन सेल्स के डीएनए में बदलाव करने लगता है। यही बदलाव पहले प्रीकैंसरस कंडीशन बनाते हैं और अगर वर्षों तक इसका पता न चले, तो सर्वाइकल कैंसर में बदल सकते हैं। अक्सर एचपीवी संक्रमण से कैंसर बनने में 10 से 20 साल लग सकते हैं।

यह लंबा समय रेगुलर स्क्रीनिंग और समय पर इस कंडीशन को पकड़ने का पर्याप्त मौका देता है।

क्या हर एचपीवी इंफेक्शन से कैंसर होता है?

यह सवाल बहुत स्वाभाविक है। अगर एचपीवी इतना आम है, तो हर महिला को कैंसर क्यों नहीं होता? इसका जवाब यह है कि सर्वाइकल कैंसर सिर्फ वायरस की वजह से नहीं बनता। cervical cancer kya hota hai का जवाब है कि जब कई फ़ैक्टर्स एक साथ मिल जाते हैं, तब सेल्स में आये बदलाव कैंसर में तब्दील हो जाते हैं। कुछ फ़ैक्टर्स नीचे दिए गए हैं।

  • शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कितनी मजबूत है
  • वायरस कितने समय तक शरीर में रहा?
  • क्या महिला धूम्रपान करती है?
  • महिला का पोषण और लंबे समय का मानसिक तनाव कैसा है?

इसीलिए दो महिलाओं में एक जैसा एचपीवी होने के बावजूद नतीजा अलग हो सकता है। एक महिला में वायरस चुपचाप खत्म हो जाता है, जबकि दूसरी में सेल्स के बदलाव आगे बढ़ सकते हैं। यही कारण है कि सर्वाइकल कैंसर को “प्रिवेंटिव कैंसर ” कहा जाता है, क्योंकि यह धीरे-धीरे बनता है, इसके पहले चेतावनी चरण यानी वार्निंग स्टेज होती हैं, और इन्हें जांच के ज़रिये पकड़ा जा सकता है।

क्या सर्वाइकल कैंसर और रिप्रोडक्टिव हैल्थ में कोई संबंध है?

सर्वाइकल कैंसर अक्सर उन महिलाओं में पाया जाता है, जो संतान पैदा करने की आयु की होती हैं। भारत में इसका सामान्यतः 35 से 45 वर्ष की आयु की महिलाओं में जाँच के दौरान यह पाया गया है। यह वह समय है जब अधिकाँश महिलायें फैमिली प्लानिंग कर रहीं होती हैं। वैसे अगर जाँच के दौरान सर्वाइकल कैंसर निकलता है तो इसका यह मतलब नहीं होता महिला कभी माँ नहीं बन सकती।

लेकिन माँ बनना इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी किस स्टेज में पकड़ी गई और किस तरह का इलाज किया गया।

इलाज का फर्टिलिटी पर प्रभाव

  • शल्य चिकित्सा यानी सर्जरी: सर्वाइकल कैंसर की एडवांस स्टेज में अक्सर हिस्टरेक्टॉमी (गर्भाशय को हटाना) करनी पड़ती है, जिसके बाद स्वाभाविक गर्भधारण संभव नहीं होता।
  • विकिरण यानी रेडिएशन और कीमोथेरेपी: ये उपचार अंडाशय यानी ओवरी (Ovaries) को नुकसान पहुँचा सकते हैं और समय से पहले मेनोपॉज़ का कारण बन सकते हैं।

प्रजनन संरक्षण यानी फ़र्टिलिटी प्रिजर्वेशन (Fertility Preservation) के विकल्प

अगर सर्वाइकल कैंसर का इलाज शुरू होने वाला है और महिला भविष्य में माँ बनने की इच्छा रखती है, तो फ़र्टिलिटी प्रिजर्वेशन पर बात करना इलाज से पहले बेहद ज़रूरी होता है। यह बातचीत जितनी जल्दी होती है, विकल्प उतने ही बेहतर रहते हैं।

  • अंडाणु संरक्षण यानी एग फ़्रीज़िंग (egg freezing): इस प्रक्रिया में इलाज शुरू होने से पहले अंडाशयों से परिपक्व एग निकालकर सुरक्षित रख लिए जाते हैं, ताकि इलाज के बाद उनका उपयोग किया जा सके।
  • भ्रूण संरक्षण यानी एम्ब्रीओ फ़्रीज़िंग (embryo freezing): जिन महिलाओं का पार्टनर है, उनके लिए यह विकल्प उपयोगी हो सकता है, जिसमें एग और स्पर्म को मिलाकर बने एम्ब्रीओ को भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जाता है।
  • फ़र्टिलिटी प्रिजर्वेशन सर्जरी यानी प्रजनन-संरक्षण शल्य चिकित्सा: शुरुआती स्टेज के सर्वाइकल कैंसर में कुछ मामलों में कोनाइज़ेशन (conization) या रेडिकल ट्रैकलेक्टॉमी (radical trachelectomy) के ज़रिये सिर्फ़ सर्विक्स के प्रभावित हिस्से को हटाकर गर्भाशय को बचाया जा सकता है जिससे महिला के भविष्य में माँ बनने की संभावना बनी रहती है।
  • ओवेरियन ट्रांसपोज़िशन (ovarian transposition): अगर इलाज में रेडिएशन शामिल हो, तो ओवरीज़ को पहले ही रेडिएशन क्षेत्र से दूर सुरक्षित स्थान पर ले जाया जा सकता है, ताकि उन्हें नुकसान से बचाया जा सके।

सर्वाइकल कैंसर के लक्षण

सर्वाइकल कैंसर की एक चुनौती यह भी है कि इसके शुरुआती चरणों में अक्सर कोई साफ़ लक्षण दिखाई नहीं देते। महिला खुद को बिल्कुल सामान्य महसूस कर सकती है, और यही वजह है कि यह बीमारी कई बार बिना जांच के पकड़ में नहीं आती। cervical cancer kya hota hai जानने के लिए नीचे दिए गए लक्षण इस बीमारी के संकेत हो सकते हैं।

  • पीरियड्स के बीच या संभोग के बाद ब्लीडिंग होना: अगर पहले ऐसा कभी नहीं हुआ और अचानक यह बदलाव दिखे, तो इसे हार्मोनल मानकर नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
  • मेनोपॉज़ के बाद किसी भी तरह की ब्लीडिंग: इस उम्र में ब्लीडिंग को कभी भी नॉर्मल नहीं माना जाता और यह तुरंत जांच की माँग करती है।
  • पानी जैसा, खूनी या बदबूदार डिस्चार्ज: ऐसा डिस्चार्ज जो सामान्य से अलग लगे, मात्रा में बढ़ रहा हो या उसमें दुर्गंध हो, सर्विक्स से जुड़े बदलाव का संकेत हो सकता है।
  • पेल्विक हिस्से या पीठ के निचले भाग में लगातार दर्द या भारीपन: ऐसा दर्द जो पीरियड से जुड़ा न हो और धीरे-धीरे बढ़ता जाए, उसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
  • एडवांस स्टेज में पेशाब या मल त्याग से जुड़ी परेशानी: बार-बार पेशाब आना, पेशाब में जलन या खून आना, या मल त्याग में बदलाव बीमारी के आगे बढ़ने का संकेत हो सकता है।
  • लगातार थकान और बिना वजह वज़न कम होना: लंबे समय तक बनी रहने वाली कमजोरी और अनजाने में वज़न घटने को शरीर की चेतावनी के रूप में देखना चाहिए।

सर्वाइकल कैंसर की जांच और डायग्नोसिस

सर्वाइकल कैंसर की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे बीमारी बनने से पहले भी पकड़ा जा सकता है। इसके लिए अलग-अलग तरह की जांचें होती हैं। एक होती है स्क्रीनिंग जांच और दूसरी डायग्नोसिस की पुष्टि करने वाली जांच।

स्क्रीनिंग जांच क्यों ज़रूरी होती है?

स्क्रीनिंग का मकसद यह देखना होता है कि सर्विक्स की सेल्स में कोई शुरुआती, प्री-कैंसरस बदलाव तो नहीं हो रहे। यह जांच उन महिलाओं के लिए भी उतनी ही ज़रूरी है, जिन्हें कोई लक्षण नहीं हैं।

  • वी.आई.ए यानी विज़ुअल इंस्पेक्शन विद एसिटिक एसिड (VIA – Visual Inspection with Acetic Acid): यह भारत में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली, आसान और कम खर्च वाली जांच है। इसमें सर्विक्स पर हल्का एसिटिक एसिड लगा कर देखा जाता है कि कहीं कोई संदिग्ध सफ़ेद पैच तो नहीं बन रहा।
  • पैप स्मियर (Pap smear): इस जांच में सर्विक्स से कुछ सेल्स लेकर लैब में देखी जाती हैं, ताकि यह पता चल सके कि कोशिकाओं में प्री-कैंसरस बदलाव शुरू तो नहीं हुए हैं।
  • एचपीवी डीएनए टेस्ट (HPV DNA test): यह सबसे संवेदनशील जांच मानी जाती है, जिसमें हाई-रिस्क एचपीवी टाइप्स की मौजूदगी सीधे पकड़ी जाती है। कई मामलों में यह बीमारी के बहुत शुरुआती जोखिम को भी पहचान लेती है।

अगर स्क्रीनिंग में गड़बड़ी मिले तो आगे क्या होता है?

स्क्रीनिंग में कोई असामान्यता दिखने का मतलब यह नहीं होता कि कैंसर हो ही गया है। इसका मतलब सिर्फ़ यह होता है कि अब जांच को एक कदम आगे बढ़ाने की ज़रूरत है।

  • कोलपोस्कोपी (colposcopy): इसमें एक खास आवर्धन यंत्र की मदद से सर्विक्स को ज़्यादा बारीकी से देखा जाता है, ताकि असामान्य हिस्से साफ़ दिख सकें।
  • बायोप्सी (biopsy): अगर कोलपोस्कोपी में कोई संदिग्ध जगह दिखती है, तो वहाँ से थोड़ा सा ऊतक लेकर लैब में जांच की जाती है। यही जांच यह पक्के तौर पर बताती है कि बदलाव प्री-कैंसरस हैं या कैंसरस।
  • इमेजिंग जांचें: अगर कैंसर की पुष्टि हो जाए, तो बीमारी कितनी फैली है, यह समझने के लिए एम.आर.आई (MRI), सी.टी स्कैन (CT scan) या पी.ई.टी स्कैन (PET scan) कराए जा सकते हैं।

सर्वाइकल कैंसर का इलाज

सर्वाइकल कैंसर का इलाज एक जैसा नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी किस स्टेज में पकड़ी गई है, महिला की उम्र क्या है, उसकी कुल सेहत कैसी है और वह भविष्य में प्रेग्नेंसी चाहती है या नहीं। इसी वजह से हर महिला के लिए इलाज की प्लानिंग अलग तरह से की जाती है।

  • शुरुआती स्टेज में सीमित सर्जरी: अगर कैंसर बहुत शुरुआती स्टेज में है और सिर्फ़ सर्विक्स तक सीमित है, तो कुछ मामलों में कोनाइज़ेशन (conization) या सीमित सर्जरी से ही बीमारी को पूरी तरह हटाया जा सकता है, जिससे गर्भाशय सुरक्षित रह सकता है।
  • एडवांस स्टेज में सर्जरी और अन्य इलाज: जब कैंसर ज़्यादा फैल चुका हो, तब हिस्टरेक्टॉमी यानी गर्भाशय को निकालने की सर्जरी के साथ रेडिएशन और कीमोथेरेपी की ज़रूरत पड़ सकती है, ताकि बची हुई कैंसर सेल्स को खत्म किया जा सके।
  • कुछ विशेष मामलों में एडवांस इलाज: चुनिंदा स्थितियों में टार्गेटेड थैरेपी (targeted therapy) या इम्यूनोथेरेपी (immunotherapy) का इस्तेमाल किया जाता है।

यह समझना ज़रूरी है कि इलाज का उद्देश्य सिर्फ़ बीमारी को हटाना नहीं, बल्कि महिला की आगे की ज़िंदगी की क्वालिटी को भी बेहतर बनाए रखना होता है। इसलिए इलाज शुरू करने से पहले सभी विकल्पों पर खुलकर चर्चा करना बेहद अहम होता है।

क्या सर्वाइकल कैंसर को रोका जा सकता है?

सर्वाइकल कैंसर उन गिनी-चुनी बीमारियों में से है, जिन्हें सही जानकारी और समय पर कदम उठाकर काफी हद तक रोका जा सकता है।

एचपीवी टीकाकरण (HPV vaccination):

सर्वाइकल कैंसर के लगभग 70 से 90% मामलों में एचपीवी वैक्सीन से सुरक्षा मिल सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और आई.सी.एम.आर (ICMR) के अनुसार 9 से 14 वर्ष की आयु में टीकाकरण सबसे ज़्यादा असरदार होता है, लेकिन 15–26 वर्ष की उम्र तक भी इससे लाभ मिल सकता है। यह वैक्सीन संक्रमण से पहले सबसे बेहतर काम करती है, लेकिन बाद में भी जोखिम को काफी हद तक कम कर सकती है।

नियमित स्क्रीनिंग:

30 से 65 वर्ष की महिलाओं के लिए हर 5 साल में वी.आई.ए (VIA) या एचपीवी डीएनए टेस्ट करवाने की सलाह दी जाती है, चाहे कोई लक्षण हों या न हों। नियमित जांच से प्री-कैंसरस बदलाव समय रहते पकड़ में आ जाते हैं, जिससे सर्वाइकल कैंसर का खतरा 80–90% तक कम किया जा सकता है।

जीवनशैली में सुधार:

धूम्रपान यानी किसी भी तरह की स्मोकिंग से दूरी रखना ज़रूरी है, क्योंकि तंबाकू सर्विक्स की सेल्स को नुकसान पहुँचाता है। प्रोटेक्टेड सेक्स अपनाने से एचपीवी संक्रमण का जोखिम कम होता है। संतुलित आहार और नियमित हल्की-फुल्की एक्सरसाइज शरीर की इम्यूनिटी को मज़बूत बनाती है, जिससे शरीर वायरस से बेहतर तरीके से लड़ पाता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

सर्वाइकल कैंसर एक गंभीर बीमारी है, लेकिन यह उन गिने-चुने कैंसरों में से है जिसे सही समय पर कदम उठाकर काफी हद तक रोका और शुरुआती चरण में पूरी तरह संभाला जा सकता है। इसलिए सबसे ज़रूरी है समय पर जांच कराना, सही जानकारी रखना और बिना झिझक डॉक्टर से खुलकर बात करना।

cervical cancer kya hota hai का सही जवाब डर में नहीं, बल्कि समझ और जागरूकता में छुपा है। अगर महिलाएं अपने शरीर के संकेतों को गंभीरता से लें और नियमित स्क्रीनिंग को आदत बनाएं, तो इस बीमारी का बोझ समाज से काफी हद तक कम किया जा सकता है।

सर्वाइकल कैंसर के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

सर्वाइकल कैंसर क्या होता है और यह कैसे शुरू होता है?

 

सर्वाइकल कैंसर गर्भाशय ग्रीवा यानी सर्विक्स (cervix) की कोशिकाओं में धीरे-धीरे होने वाले असामान्य बदलावों से शुरू होता है, जो ज़्यादातर मामलों में एचपीवी (HPV) इंफेक्शन से जुड़े होते हैं।

क्या हर एचपीवी इंफेक्शन से सर्वाइकल कैंसर हो जाता है?

 

नहीं, ज़्यादातर एचपीवी इंफेक्शन शरीर खुद ही खत्म कर देता है, लेकिन जब हाई-रिस्क एचपीवी लंबे समय तक बना रहे, तभी कैंसर का खतरा बढ़ता है।

सर्वाइकल कैंसर के शुरुआती लक्षण क्या होते हैं?

 

शुरुआत में अक्सर कोई लक्षण नहीं होते, इसलिए नियमित स्क्रीनिंग सबसे ज़रूरी होती है; बाद में असामान्य ब्लीडिंग या डिस्चार्ज दिख सकता है।

सर्वाइकल कैंसर की जांच कब से करवानी चाहिए?

 

आमतौर पर 30 वर्ष की उम्र के बाद हर 5 साल में वी.आई.ए (VIA) या एचपीवी डीएनए टेस्ट (HPV DNA test) कराने की सलाह दी जाती है।

क्या सर्वाइकल कैंसर पूरी तरह ठीक हो सकता है?

 

हाँ, अगर यह शुरुआती चरण में पकड़ में आ जाए, तो इलाज से इसे पूरी तरह नियंत्रित या ठीक किया जा सकता है।

क्या सर्वाइकल कैंसर के इलाज के बाद प्रेग्नेंसी संभव है?

 

यह बीमारी के स्टेज और इलाज के तरीके पर निर्भर करता है; शुरुआती स्टेज में कई महिलाओं में प्रेगनेंसी संभव रहती है।

क्या एचपीवी वैक्सीन लेने के बाद स्क्रीनिंग की ज़रूरत नहीं रहती?

 

नहीं, वैक्सीन के बाद भी नियमित स्क्रीनिंग ज़रूरी होती है, क्योंकि वैक्सीन सभी एचपीवी टाइप्स से सुरक्षा नहीं देती।

**Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
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