क्रिप्टोरकिडिज्म (Cryptorchidism) यानी अंडकोष का न उतरना (Undescended Testicle) एक ऐसी स्थिति है जिसमें जन्म के समय बच्चे का एक या दोनों अंडकोष अपनी सही जगह यानी स्क्रोटम (अंडकोष की थैली) में नहीं होते। दरअसल, गर्भ में बच्चे का विकास होते समय अंडकोष पेट से नीचे अपनी जगह यानी स्क्रोटम तक पहुंचता है। लेकिन कुछ बच्चों में यह प्रोसेस पूरा नहीं हो पाता। यह समस्या लगभग 3-4% ऐसे नवजात लड़कों में देखी जाती है जिनका जन्म पूरे टाइम के बाद होता है, जबकि प्रीमेच्योर लड़कों में यह प्रतिशत और भी ज़्यादा होता है। अच्छी बात यह है कि ज़्यादातर मामलों में यह अपने आप ठीक हो जाता है। लेकिन कुछ बच्चों को इलाज की जरुरत पड़ती है।अगर समय पर इलाज न किया जाए तो यह भविष्य में फर्टिलिटी यानी प्रजनन क्षमता और टेस्टिकुलर कैंसर के खतरे को बढ़ा सकती है। चलिए समझते हैं कि cryptorchidism meaning in hindi, इसके कारण क्या हैं, लक्षण कैसे पहचानें, और इसका इलाज कैसे किया जाता है।
क्रिप्टोरकिडिज्म एक जन्मजात स्थिति है जिसमें एक या दोनों अंडकोष (टेस्टिस) जन्म के समय स्क्रोटम में नहीं उतरते। सामान्य विकास में, गर्भावस्था के दौरान टेस्टिकल्स पेट से नीचे उतरकर स्क्रोटम में आ जाते हैं। यह प्रक्रिया आमतौर पर गर्भावस्था के आखिरी कुछ महीनों में पूरी होती है। जब यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो एक या कभी कभी दोनों टेस्टिस पेट में, इनगुइनल कैनाल में, या स्क्रोटम के ऊपर कहीं अटके रह जाते हैं।
यह स्थिति एक तरफ (यूनिलेटरल) या दोनों तरफ (बाइलेटरल) हो सकती है। लगभग 70% मामलों में सिर्फ एक अंडकोष प्रभावित होता है, जबकि 30% मामलों में दोनों अंडकोष नहीं उतरते। ज़्यादातर मामलों में, जन्म के 3 से 6 महीने के भीतर टेस्टिस अपने आप नीचे उतर आते हैं। लेकिन अगर 6 महीने तक ऐसा न हो, तो डॉक्टर की सलाह से इलाज की ज़रूरत होती है।
टेस्टिकल्स कहाँ स्थित है, इसके आधार पर क्रिप्टोरकिडिज्म को कई प्रकारों में बांटा जाता है:
इसमें टेस्टिकल्स इनगुइनल कैनाल (ग्रोइन का रास्ता) में होता है और डॉक्टर इसे छूकर महसूस कर सकते हैं। यह सबसे आम प्रकार है और लगभग 80% मामलों में देखा जाता है।
इसमें टेस्टिकल्स पेट के अंदर होता है या बिल्कुल अनुपस्थित (एब्सेंट) होता है। इसे छूकर महसूस नहीं किया जा सकता और इमेजिंग या सर्जरी से पता लगाया जाता है।
इसमें टेस्टिकल्स स्क्रोटम में होता है लेकिन मांसपेशियों की प्रतिक्रिया (क्रेमास्टेरिक रिफ्लेक्स) के कारण ऊपर खिंच जाता है। यह सामान्य स्थिति है और आमतौर पर इलाज की ज़रूरत नहीं होती।
इसमें टेस्टिकल्स सामान्य रास्ते से भटककर गलत जगह पर चला जाता है, जैसे जांघ या पेट की दीवार में।
क्रिप्टोरकिडिज्म क्यों होता है, इसका सटीक कारण अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। हालांकि, कुछ फैक्टर्स इसके होने के खतरे को बढ़ाते हैं।
समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में क्रिप्टोरकिडिज्म का खतरा सबसे ज़्यादा होता है क्योंकि अंडकोष के उतरने की प्रक्रिया गर्भावस्था के आखिरी हफ्तों में पूरी होती है।
कम वज़न वाले नवजात शिशुओं में यह समस्या ज़्यादा देखी जाती है।
टेस्टिस के उतरने के लिए कुछ हॉर्मोन्स ज़िम्मेदार होते हैं। इनमें किसी भी तरह की गड़बड़ी इस समस्या का कारण बन सकती है।
अगर परिवार में पहले किसी को क्रिप्टोरकिडिज्म रहा है, तो बच्चे में भी इसका खतरा बढ़ जाता है।
गर्भावस्था के दौरान माँ द्वारा धूम्रपान करने से बच्चे में क्रिप्टोरकिडिज्म का खतरा बढ़ता है।
माँ को जेस्टेशनल डायबिटीज़ होने पर भी यह खतरा बढ़ सकता है।
क्रिप्टोरकिडिज्म का मुख्य और सबसे स्पष्ट लक्षण यह है कि स्क्रोटम में एक या दोनों अंडकोष महसूस नहीं होते। इसके अलावा:
ज़्यादातर मामलों में क्रिप्टोरकिडिज्म का पता जन्म के तुरंत बाद की शारीरिक जांच में लग जाता है। पेरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चे के जन्म के बाद नियमित चेकअप कराते रहें।
क्रिप्टोरकिडिज्म का निदान मुख्य रूप से शारीरिक जांच से किया जाता है:
डॉक्टर स्क्रोटम और इनगुइनल एरिया को छूकर अंडकोष की स्थिति का पता लगाते हैं।
अगर अंडकोष छूकर महसूस नहीं होता, तो अल्ट्रासाउंड से उसकी स्थिति देखी जाती है।
कुछ जटिल मामलों में MRI की ज़रूरत हो सकती है।
नॉन-पैल्पेबल टेस्टिस के मामले में लैप्रोस्कोपिक सर्जरी से निदान और इलाज दोनों किए जा सकते हैं।
अगर दोनों अंडकोष महसूस न हों, तो हॉर्मोन टेस्ट से पता लगाया जाता है कि टेस्टिकुलर टिशू मौजूद है या नहीं।
क्रिप्टोरकिडिज्म का फर्टिलिटी पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, खासकर अगर इलाज में देरी हो। स्क्रोटम का तापमान शरीर के बाकी हिस्सों से थोड़ा कम होता है, जो स्पर्म प्रोडक्शन के लिए ज़रूरी है। जब अंडकोष पेट में या इनगुइनल कैनाल में रहता है, तो वहां का तापमान ज़्यादा होने से स्पर्म बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
अगर किसी पुरुष को क्रिप्टोरकिडिज्म की वजह से फर्टिलिटी में दिक्कत आ रही है, तो ART (Assisted Reproductive Technology) जैसे IVF और ICSI जैसी तकनीकें मददगार हो सकती हैं।
क्रिप्टोरकिडिज्म का इलाज बच्चे की उम्र, अंडकोष की स्थिति और समस्या की गंभीरता पर निर्भर करता है।
जन्म के बाद पहले 6 महीनों में अंडकोष अपने आप नीचे उतर सकता है। इसलिए डॉक्टर शुरू में इंतज़ार करने की सलाह देते हैं और नियमित फॉलो-अप करते हैं।
कुछ मामलों में hCG (Human Chorionic Gonadotropin) हॉर्मोन के इंजेक्शन दिए जाते हैं जो अंडकोष को नीचे उतरने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, इसकी सफलता दर सीमित है और ज़्यादातर मामलों में सर्जरी की ज़रूरत होती है।
ऑर्किओपेक्सी क्रिप्टोरकिडिज्म का मुख्य और सबसे प्रभावी इलाज है। इस सर्जरी में नीचे दी गयी विधियों से इलाज किया जाता है।
ऑर्किओपेक्सी की सफलता दर 90 से 95% से ज़्यादा है। समय पर सर्जरी से न केवल फर्टिलिटी बची रहती है, बल्कि भविष्य में टेस्टिकुलर कैंसर की जांच भी आसान हो जाती है।
Cryptorchidism meaning in Hindi समझना और समय पर इसकी डायग्नोसिस करना बेहद ज़रूरी है। क्रिप्टोरकिडिज्म एक आम जन्मजात समस्या है जो ज़्यादातर नवजात लड़कों में देखी जाती है। अच्छी बात यह है कि ज़्यादातर मामलों में अंडकोष 6 महीने के भीतर अपने आप नीचे उतर आते हैं। जो मामले अपने आप ठीक नहीं होते, उनमें ऑर्किओपेक्सी सर्जरी बेहद सफल है। समय पर इलाज से संतान की भविष्य में फर्टिलिटी भी बचायी जा सक ती है और टेस्टिकुलर कैंसर का खतरा कम किया जा सकता है। पेरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चे के जन्म के बाद नियमित चेकअप कराएं और किसी भी असामान्यता को नज़रअंदाज़ न करें। सही समय पर सही इलाज से आपका बच्चा स्वस्थ और सामान्य जीवन जी सकता है।
क्रिप्टोरकिडिज्म एक जन्मजात स्थिति है जिसमें बच्चे का एक या दोनों टेस्टिकल्स जन्म के समय स्क्रोटम (अंडकोष की थैली) में नहीं होते।
अगर टेस्टिकल 6 महीने तक अपने आप नहीं उतरता, तो 6 से 12 महीने की उम्र में ऑर्किओपेक्सी सर्जरी करवानी चाहिए। देरी से फर्टिलिटी प्रभावित हो सकती है।
हाँ, समय पर इलाज (ऑर्किओपेक्सी) से ज़्यादातर पुरुष सामान्य फर्टिलिटी रखते हैं। यूनिलेटरल क्रिप्टोरकिडिज्म में फर्टिलिटी आमतौर पर प्रभावित नहीं होती।
हाँ, लगभग 50 से 70% मामलों में टेस्टिस जन्म के बाद पहले 3 से 6 महीनों में अपने आप स्क्रोटम में उतर आते है।
मुख्य रूप से शारीरिक जांच से पता लगता है। अगर टेस्टिस महसूस न हो, तो अल्ट्रासाउंड, MRI या लैप्रोस्कोपी की ज़रूरत हो सकती है।
हाँ, अनट्रीटेड क्रिप्टोरकिडिज्म में टेस्टिकुलर कैंसर का खतरा थोड़ा बढ़ जाता है। समय पर ऑर्किओपेक्सी से यह खतरा कम होता है और कैंसर की जांच आसान हो जाती है।
ऑर्किओपेक्सी एक बेहद सुरक्षित सर्जरी है जिसकी सफलता दर 90-95% से ज़्यादा है। यह आमतौर पर डे-केयर प्रॉसिजर है और बच्चा जल्दी ठीक हो जाता है।