अल्ट्रासाउंड में ओवरी में गांठ दिखी और डॉक्टर ने बताया कि इसमें बाल और दांत जैसी चीजें हैं। सुनने में अजीब लगता है लेकिन यह डर्मोइड सिस्ट (Dermoid Cyst) लक्षण हैं। Dermoid cyst in hindi में समझें तो यह एक अनोखी गांठ है जो जन्म से पहले ही बनना शुरू हो जाती है और सालों बाद पता चलती है। वैसे तो यह सिस्ट नार्मल होती है, जो अगर छोटी है तो उससे कोई नुकसान नहीं होता लेकिन यही सिस्ट अगर बड़ी है तो आगे चल कर कुछ परेशानी पैदा कर सकती है। तब डॉक्टर की देखरेख में इसका उचित समाधान किया जाना जरूरी हो जाता है।
डर्मोइड सिस्ट ओवरी में बनने वाली एक ऐसी गाँठ होती है जिसमें त्वचा, बाल, दांत, हड्डी और तेल ग्रंथियां जैसे टिश्यू हो सकते हैं। डर्मॉइड सिस्ट की शुरुआत गर्भ में ही हो जाती है। जब भ्रूण विकसित हो रहा होता है तब उसमें टोटीपोटेंट कोशिकाएं (Totipotent Cells) होती हैं। ये वो खास कोशिकाएं हैं जो शरीर का कोई भी अंग जैसे त्वचा, बाल, हड्डी, दांत या नर्व बन सकती हैं।
सामान्य विकास में ये कोशिकाएं अपनी जगह पर जाकर सही अंग बनाती हैं। लेकिन कभी-कभी कुछ कोशिकाएं गलत जगह जैसे ओवरी में फंस जाती हैं। ये फंसी हुई कोशिकाएं वहीं रहती हैं और धीरे-धीरे एक थैली यानी सिस्ट बनाती हैं।
डर्मॉइड सिस्ट शरीर के अलग-अलग हिस्सों में बन सकता है। इसके मुख्य प्रकार नीचे दिये जा रहे हैं।
यह सबसे कॉमन है जो अंडाशय में या उसके ऊपर बनती है। यह 15 से 40 साल की महिलाओं में ज्यादा पायी जाती है और अक्सर एक ओवरी में होती है लेकिन 10 से 20 प्रतिशत मामलों में दोनों ओवरी में हो सकती है।
यह आंख की भौंह के पास बनती है और जन्म के समय या बचपन में दिखती है। यह त्वचा के नीचे एक छोटी गांठ जैसी होती है जिसमें आमतौर पर दर्द नहीं होता।
यह रीढ़ की हड्डी में बनती है और धीरे-धीरे बढ़ती है। बड़ी होने पर यह रीढ़ की नसों पर दबाव डाल सकती है जिससे पैरों में कमजोरी या सुन्नपन हो सकता है।
यह दिमाग में बनती है और बहुत रेयर है। ज्यादातर मामलों में यह कोई लक्षण नहीं देता लेकिन फटने पर गंभीर समस्या हो सकती है।
यह नाक में या उसके आसपास बनती है और बच्चों में ज्यादातर होती है।
ज्यादातर डर्मोइड सिस्ट धीरे-धीरे बढ़ती हैं। इसके शुरू में कोई लक्षण नहीं दिखते । बहुत सी महिलाओं को किसी और जांच के दौरान अल्ट्रासाउंड में इसका पता चलता है। जब सिस्ट बड़ी हो जाती है तब ये लक्षण दिख सकते हैं।
डर्मॉइड सिस्ट का पता लगाने के लिए डॉक्टर नीचे लिखी जांच करते हैं।
डर्मॉइड सिस्ट का इलाज उसके आकार, लक्षण और महिला की उम्र पर निर्भर करता है।
अगर सिस्ट 4 से 6 सेंटीमीटर से छोटी है और कोई लक्षण नहीं है तो डॉक्टर हर 6 महीने में अल्ट्रासाउंड से निगरानी रखते हैं। अगर सिस्ट नहीं बढ़ रही तो सर्जरी की जरूरत नहीं होती।
इस सर्जरी में पेट में 3 से 4 छोटे छेद करके कैमरा और उपकरण डाल कर सिस्ट को निकालते हैं और ओवरी को बचा लेते हैं।
अगर सिस्ट बहुत बड़ी है या कैंसर की आशंका है तो पेट में बड़ा चीरा लगाकर ओपन सर्जरी की जाती है।
अगर सिस्ट बहुत बड़ी है या ओवरी को नुकसान हो चुका है या कैंसर का खतरा है तो पूरी ओवरी निकालनी पड़ सकती है। अगर एक ओवरी निकल जाए तो दूसरी ओवरी से प्रेगनेंसी हो सकती है।
डर्मॉइड सिस्ट आमतौर पर फर्टिलिटी को सीधे प्रभावित नहीं करता क्योंकि यह हार्मोन नहीं बनाती लेकिन कुछ स्थितियों में समस्या हो सकती है।
अच्छी बात यह है कि ज्यादातर महिलाएं डर्मोइड सिस्ट की सर्जरी के बाद भी सामान्य रूप से गर्भधारण कर पाती हैं।
अगर आप IVF की तैयारी कर रही हैं और डर्मोइड सिस्ट है तो कुछ बातों का ध्यान रखें।
Dermoid cyst in hindi में समझें तो यह एक जन्मजात गांठ है जो ओवरी में सबसे ज्यादा पाई जाती है और इसमें बाल, दांत, त्वचा जैसे ऊतक हो सकते हैं। 95 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में यह कैंसर रहित होता है इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है। छोटे सिस्ट को निगरानी में रखा जा सकता है जबकि बड़े या लक्षण देने वाले सिस्ट को लेप्रोस्कोपिक सर्जरी से निकाला जाता है। फर्टिलिटी पर इसका सीधा असर नहीं होता और ज्यादातर महिलाएं सर्जरी के बाद भी गर्भधारण कर पाती हैं। IVF की तैयारी में बड़े सिस्ट को पहले निकालना बेहतर रहता है। अगर पेट में दर्द, भारीपन या अनियमित पीरियड्स हों तो स्त्री रोग विशेषज्ञ से जरूर मिलें।
बहुत रेयर मामलों में यानी 1 से 2 प्रतिशत से भी कम मामलों में डर्मोइड सिस्ट कैंसर में बदल सकता है।
इसमें त्वचा, बाल, दांत, हड्डी, तेल ग्रंथियां और नर्व जैसे ऊतक हो सकते हैं। इसमें एक चिकना पीला पदार्थ भी होता है जो सीबम जैसा होता है।
नहीं, डर्मोइड सिस्ट अपने आप खत्म नहीं होती, इसे निकालने के लिए सर्जरी जरूरी होती है।
हां, लेकिन ऐसा रेयर होता है। लगभग 3 से 4 प्रतिशत मामलों में सिस्ट दोबारा बन सकती है इसलिए सर्जरी के बाद नियमित फॉलो-अप जरूरी है।
छोटी सिस्ट से आमतौर पर कोई परेशानी नहीं होती। लेकिन प्रेगनेंसी में बढ़ते गर्भाशय से सिस्ट के मुड़ने यानी ओवेरियन टॉर्शन का खतरा बढ़ जाता है इसलिए निगरानी जरूरी है।
लेप्रोस्कोपिक सर्जरी के बाद 1 से 2 हफ्ते में रिकवरी हो जाती है। ओपन सर्जरी यानी लेप्रोटॉमी में 4 से 6 हफ्ते लग सकते हैं।
नहीं, यह जन्मजात होता है इसलिए इसे रोकना संभव नहीं है। नियमित स्त्री रोग जांच से इसका जल्दी पता लग सकता है जिससे समय पर इलाज हो सके।