Overview
गर्भाशय की अंदरूनी परत यानी एंडोमेट्रियम (Endometrium) की मोटाई कोई तय नंबर नहीं होती। यह पूरे महीने बदलती है, इसलिए साइकिल के पांचवें दिन जो मोटाई नॉर्मल मानी जाएगी, वही ओव्यूलेशन के बाद कम कही जा सकती है। endometrial thickness in hindi को समझने के लिए सबसे पहले यही समझना जरूरी है कि इस नंबर को हमेशा साइकिल के दिन, उम्र और मेनोपॉज की स्थिति के साथ पढ़ा जाता है। यह परत एस्ट्रोजन से बढ़ती है और प्रोजेस्टेरोन से एम्ब्रियो के टिकने लायक बनती है, इसलिए फर्टिलिटी में इसकी अहमियत ज्यादा है। आगे हम जानेंगे कि हर चरण और उम्र के हिसाब से सामान्य मोटाई कितनी होती है, यह मापी कैसे जाती है, और असामान्य आने पर क्या किया जाता है।
एंडोमेट्रियम गर्भाशय यानी यूट्रस (Uterus) की सबसे अंदरूनी परत को कहते हैं और अल्ट्रासाउंड में इसकी जो मोटाई नापी जाती है, उसे एंडोमेट्रियल थिकनेस कहा जाता है। इसका ऊपरी हिस्सा हर महीने पीरियड्स में निकल जाता है और नीचे का बेसल लेयर बचा रहता है, जिससे अगली परत बनती है।
एम्ब्रियो इसी परत में जाकर चिपकता है, जिसे इम्प्लांटेशन कहते हैं। इसीलिए फर्टिलिटी ट्रीटमेंट में एम्ब्रियो ट्रांसफर से पहले यह मोटाई बार बार देखी जाती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ़ वॉशिंगटन रेडियोलोजी के अनुसार एंडोमेट्रियल थिकनेस की सामान्य रेंज इस तरह है।
स्थिति | सामान्य मोटाई |
|---|---|
पीरियड्स के दिनों में | 4 से 7 mm |
प्रोलिफेरेटिव चरण | 4.5 से 8 mm |
सेक्रेटरी चरण | 6 से 12 mm |
मेनोपॉज के बाद | 1 से 2 mm |
यह रेंज एक गाइड की तरह है, इसमें थिकनेस का कम या ज्यादा होना अकेले इम्पोर्टेन्ट नहीं होता। रिपोर्ट हमेशा लक्षणों और मेंस्ट्रुअल साइकिल के दिन के साथ पढ़ी जाती है।
यह परत महीने भर में तीन स्टेप से गुजरती है।
पीरियड्स में ऊपरी परत निकल जाती है, इसलिए एंडोमेट्रियम सबसे पतला होता है। ब्लीडिंग खत्म होते ही नई परत बनना शुरू हो जाती है।
ब्लीडिंग रुकने के बाद एस्ट्रोजन से परत दोबारा बढ़ती है। शुरुआत में यह लगभग 5 से 7 mm होती है और ओव्यूलेशन के आसपास 11 mm तक पहुंच सकती है, जहां अल्ट्रासाउंड में ट्राइलैमिनार पैटर्न दिखता है।
ओव्यूलेशन के बाद प्रोजेस्टेरोन का असर शुरू होता है। अब परत सिर्फ मोटी नहीं होती, उसमें ग्लैंड्स और ब्लड सप्लाई भी बढ़ती है ताकि एम्ब्रियो टिक सके।
फर्टिलिटी में 7 mm को एक मोटा सा बॉर्डर माना जाता है। कई स्टडीज के एक मेटा एनालिसिस में पाया गया कि 7 mm से पतली परत वाली साइकिल में इम्प्लांटेशन रेट, प्रेगनेंसी रेट और लाइव बर्थ रेट कम रहे, जबकि 14 mm से ज्यादा मोटी परत का नतीजों पर कोई नकारात्मक असर नहीं दिखा।
लेकिन यह नंबर अकेले प्रेगनेंसी तय नहीं करता, इसलिए सिर्फ मोटाई देखकर साइकिल कैंसिल करने की सलाह नहीं दी जाती।
उम्र के साथ हार्मोन बदलते हैं और एंडोमेट्रियम का नेचर भी बदलता है।
जब तक पीरियड्स नियमित हैं, थिकनेस मेंस्ट्रुअल साइकिल के दिन पर निर्भर करती है। PCOS या थायरॉइड में ओव्यूलेशन न होने पर परत मोटी बनी रह सकती है।
मेनोपॉज के बाद एस्ट्रोजन कम हो जाता है, इसलिए परत पतली रहती है। ACOG के अनुसार मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग होने पर 4 mm या कम मोटाई में एंडोमेट्रियल कैंसर की आशंका बहुत कम होती है। अप्रैल 2026 में ACOG ने इसे अपडेट किया है और अब ज्यादातर मामलों में अल्ट्रासाउंड के साथ एंडोमेट्रियल सैंपलिंग भी करने को कहा गया है।
इसके लिए ट्रांसवजाइनल अल्ट्रासाउंड यानी टीवीएस (TVS) किया जाता है, क्योंकि इसमें एंडोमेट्रियम परत साफ दिखती है। मोटाई सैजिटल व्यू में, सबसे मोटी जगह पर, दोनों परतों को मिलाकर नापी जाती है। जांच किस दिन हुई, यह उतना ही जरूरी है जितना नंबर, इसीलिए डॉक्टर साइकिल का खास दिन बताकर स्कैन करवाते हैं।
अगर एस्ट्रोजन के बाद भी परत नहीं बढ़ रही, तो इसकी कुछ बहुत ही कॉमन वजहें होती हैं।
बहुत सी महिलाओं में जांच के बाद भी कोई साफ वजह नहीं मिलती।
परत का मोटा रहना अपने आप में बीमारी नहीं, लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है, इसकी वजह देखी जाती है।
ओव्यूलेशन न होने पर प्रोजेस्टेरोन नहीं बनता और एस्ट्रोजन का असर बिना रुकावट चलता रहता है। PCOS, मोटापा और थायरॉइड में यही होता है, जिससे परत बढ़ती रहती है।
इसमें परत की कोशिकाएं जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती हैं। 40 से 45 की उम्र में ज्यादा ब्लीडिंग वाली महिलाओं के एक अध्ययन में हाइपरप्लासिया उन्हीं में मिला जिनकी मोटाई 11 mm से ऊपर थी।
प्रेग्नेंसी की शुरुआत में परत मोटी दिखना सामान्य है। पॉलिप और ब्रेस्ट कैंसर में दी जाने वाली टेमॉक्सिफेन से भी मोटाई बढ़ी आ सकती है।
बहुत पतली परत में एम्ब्रियो को टिकने लायक ब्लड सप्लाई नहीं मिलती, इसलिए इम्प्लांटेशन की संभावना घट जाती है। इसी मेटा एनालिसिस में यह भी देखा गया कि पतली लाइनिंग वाली प्रेग्नेंसी में बच्चे का वजन कम होने की आशंका थोड़ी ज्यादा रही।
दूसरी तरफ, लगातार मोटी बनी रहने वाली परत अक्सर ओव्यूलेशन न होने का संकेत होती है, जो खुद कंसीव न कर पाने की वजह है।
पहला कदम साइकिल के सही दिन पर दोबारा अल्ट्रासाउंड है। इसके बाद जरूरत के हिसाब से आगे की जांच तय होती है।
इलाज मोटाई का नहीं, वजह का होता है।
परत पतली होने पर आमतौर पर एस्ट्रोजन थेरेपी दी जाती है। एशरमैन सिंड्रोम में चिपकाव हिस्टेरोस्कोपी से हटाया जाता है और क्रोनिक एंडोमेट्राइटिस में एंटीबायोटिक कोर्स दिया जाता है। जो केस दवाओं से नहीं सुधरते, उनमें PRP जैसी तकनीकें आजमाई जा रही हैं, पर इन पर अभी अध्ययन चल रहे हैं।
परत मोटी होने पर वजह के हिसाब से प्रोजेस्टेरोन दिया जाता है या पॉलिप निकाला जाता है, और हाइपरप्लासिया में इलाज बायोप्सी की रिपोर्ट देखकर तय होता है।
पीरियड्स में बहुत ज्यादा ब्लीडिंग, बीच में स्पॉटिंग, या पीरियड्स का बहुत हल्का हो जाना जांच की स्थिति है। मेनोपॉज के बाद किसी भी तरह की ब्लीडिंग को नजरअंदाज न करें। एक साल से कंसीव करने की कोशिश कर रही हैं और सफलता नहीं मिल रही, तो फर्टिलिटी एक्सपर्ट से मिलें।
एंडोमेट्रियल थिकनेस गर्भाशय की अंदरूनी परत की मोटाई है, जो एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के असर से हर महीने बदलती है। इसीलिए इसे साइकिल के दिन के साथ पढ़ा जाता है, अकेले नंबर के आधार पर नहीं। यह पीरियड्स में सबसे पतली और सेक्रेटरी चरण में सबसे मोटी होती है, जबकि मेनोपॉज के बाद पतली रहना ही सामान्य है। फर्टिलिटी में 7 mm से पतली परत के साथ इम्प्लांटेशन की संभावना कम रहती है, पर यह अकेला पैमाना नहीं। पतली परत के पीछे पुरानी सर्जरी, एशरमैन सिंड्रोम या क्रोनिक एंडोमेट्राइटिस हो सकते हैं, और मोटी के पीछे अक्सर ओव्यूलेशन न होना। इलाज हमेशा वजह का होता है, इसलिए नंबर देखकर घबराने के बजाय डॉक्टर से उसका मतलब समझें।