महिलाओं के शरीर में हर महीने बहुत कॉम्प्लेक्स लेकिन एकदम सधी हुई गतिविधियाँ चलती हैं। और इन्हें चलने वाले होते हैं उनके शरीर में बनने वाले हॉर्मोन। लेकिन इन सब हॉर्मोन में एक हार्मोन का आपकी फ़र्टिलिटी में बहुत बड़ा रोल होता है, और वह है एस्ट्रोजन।
अगर आप Estrogen meaning in hindi सर्च करने पर पता चलता है कि एस्ट्रोजन एक ऐसा हार्मोन है जो महिला के रिप्रोडक्टिव सिस्टम को कंट्रोल करता है। यह मुख्य रूप से अंडाशय यानी ओवरी (ovary) में बनता है और मेंस्ट्रुअल साइकिल के अलग-अलग फेज़ों में अलग-अलग काम करता है।
एस्ट्रोजन का काम एग्स जो मैच्योर करना, गर्भाशय की परत यानी एंडोमेट्रियम (endometrium) बनाना, ओवुलेशन (ovulation) को ट्रिगर करना और गर्भधारण प्रेगनेंसी के लिए सही वातावरण तैयार करना होता है।
अगर आप प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं, तो एस्ट्रोजन का सही लेवल होना और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि इसका लेवल बहुत कम या बहुत अधिक होने पर ओवुलेशन और फर्टिलिटी दोनों पर ख़राब असर पड़ सकता है।
Estrogen meaning in hindi आर्टिकल में आगे समझेंगे कि एस्ट्रोजन हार्मोन क्या होता है, मेंस्ट्रुएशन साइकिल में इसकी क्या भूमिका होती है, फर्टिलिटी पर इसका क्या असर पड़ता है और IVF ट्रीटमेंट में इसकी मॉनिटरिंग क्यों की जाती है।
एस्ट्रोजन एक स्टेरॉयड हार्मोन है जो मुख्य रूप से महिलाओं की ओवरी में बनता है। मुख्य रूप से Estrogen के तीन फॉर्म होते हैं, Estradiol (E2), Estrone (E1) और Estriol (E3)।
जब कोई महिला माँ बनने वाली आयु में होती है तब E2 यानी एस्ट्राडियोल (Estradiol) को सबसे अधिक एक्टिव और महत्वपूर्ण माना जाता है।
महिलाओं में Estrogen प्यूबर्टी यानी किशोरावस्था से लेकर मेनोपॉज़ तक शरीर के बहुत से कामों को कंट्रोल करता है।
एस्ट्रोजन के कई महत्वपूर्ण काम होते हैं।
एस्ट्रोजन का लेवल पूरे महीने एक जैसा नहीं रहता। मेंस्ट्रुअल साइकिल के हर फेज़ में इसका लेवल भी बदलता है और इसका काम भी अलग होता है।
पीरियड्स के दौरान Estrogen level सबसे कम होता है। इसी कारण इन दिनों कई महिलाओं को थकान, कमजोरी या मूड में बदलाव महसूस हो सकता है।
जैसे-जैसे पीरियड समाप्त होता है, इसका लेवल धीरे-धीरे बढ़ना शुरू करता है और शरीर अगले फेज के लिए तैयार होने लगता है।
इस फेज में ओवरी के अंदर कई छोटे फॉलिकल्स विकसित होने लगते हैं। हर फॉलिकल थोड़ा-थोड़ा Estrogen बनाता है। जैसे-जैसे एक फॉलिकल डोमिनेंट (dominant) बनता है, एस्ट्रोजन का स्तर तेजी से बढ़ता है।
इस फेज में एस्ट्रोजन दो महत्वपूर्ण काम करता है।
जब एस्ट्रोजन का लेवल अपने सबसे हाई लेवल पर पहुँचता है, तो यह दिमाग को सिग्नल देता है कि अब LH यानी ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (Luteinizing Hormone) को बढ़ाओ, इसे एलएच सर्ज (LH surge) कहा जाता है।
एलएच सर्ज के लगभग 24 से 36 घंटों के भीतर ओवरी से एग निकलता है। यही समय सबसे अधिक फर्टाइल माना जाता है।
ओवुलेशन के बाद Estrogen level थोड़ा कम होता है लेकिन मीडियम लेवल पर बना रहता है। इस फेज में प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) हार्मोन का मुख्य रोल होता है। फिर भी एस्ट्रोजन एंडोमेट्रियम को बनाए रखने में सहायता करता है।
अगर गर्भधारण नहीं होता, तो एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन दोनों हार्मोन कम हो जाते हैं और अगला पीरियड शुरू हो जाता है।
एस्ट्रोजन का बैलेंस फर्टिलिटी के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसका प्रेगनेंसी से संबंधित कई प्रोसेस पर असर पड़ता है।
Estrogen ओवरी में एग्स के मैच्योर होने होने के लिए जरुरी होता है। सही मात्रा में एस्ट्रोजन होने पर एग अच्छी तरह डेवलप होते हैं।
एस्ट्रोजन एंडोमेट्रियम को मोटा और पोषक बनाता है। अगर यह परत बहुत पतली रह जाए, तो एम्ब्रीओ का इम्प्लांटेशन मुश्किल हो सकता है।
ओवुलेशन के समय Estrogen सर्विकल म्यूकस को तरल और चिपचिपा यानी “egg white” जैसा बना देता है जो स्पर्म को जीवित रखने और उन्हें एग तक पहुँचने में मदद करता है।
एस्ट्रोजन का हाई लेवल दिमाग को LH surge का सिग्नल देता है जिससे ओवुलेशन ट्रिगर होता है।
अगर एस्ट्रोजन बहुत कम हो तो फर्टिलिटी के लिए समस्या पैदा हो सकती है। ऐसी कंडीशन में कई लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
फर्टिलिटी पर इसका असर भी पड़ सकता है।
Estrogen कम होने के कई कारण हो सकते हैं।
कुछ मामलों में Estrogen बहुत अधिक भी हो सकता है। इस स्थिति को एस्ट्रोजन डोमिनेंस (Estrogen Dominance) कहते हैं।
इसके कुछ सामान्य लक्षण हो सकते हैं।
फर्टिलिटी पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
इसके संभावित कारणों में शामिल हो सकते हैं।
अगर कोई महिला IVF ट्रीटमेंट करवा रही है, तो डॉक्टर अक्सर E2 यानी एस्ट्राडियोल (Estradiol) लेवल की रेगुलर जाँच करते हैं।
IVF स्टिमुलेशन (stimulation) के दौरान दवाइयों से ओवरी को एक्टिव किया जाता है ताकि एक से अधिक बन सकें। इस दौरान बनने वाला हर फॉलिकल थोड़ा-थोड़ा एस्ट्रोजन बनाता है, जिससे डॉक्टर समझ सकते हैं कि फॉलिकल्स कैसे बन रहे हैं।
जब अल्ट्रासाउंड में फॉलिकल्स पर्याप्त बड़े दिखते हैं और E2 लेवल सही होता है, तब ट्रिगर इंजेक्शन दिया जाता है ताकि एग मैच्योर हो सकें।
अगर Estrogen बहुत तेजी से बढ़ जाए, तो OHSS यानी ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम (Ovarian Hyperstimulation Syndrome) का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए इसकी मॉनिटरिंग जरूरी होती है।
अगर एम्ब्रीओ फ्रीज़ किया गया है, तो ट्रांसफर से पहले Estrogen की दवाइयों से एंडोमेट्रियम तैयार की जाती है। E2 लेवल से यह समझा जाता है कि एंडोमेट्रियम ट्रांसफर के लिए तैयार है या नहीं।
फर्टिलिटी को चेक करने के लिए एस्ट्रोजन का ब्लड टेस्ट कराया जाता है।
फर्टिलिटी जांच के लिए आमतौर पर साइकिल के दिन 2 या 3 पर टेस्ट किया जाता है। इस समय E2 लेवल सबसे कम होता है। आमतौर पर यह लेवल लगभग 25–75 pg/mL के बीच हो सकता है।
अगर इस समय E2 लेवल बहुत अधिक हो, तो यह ओवेरियन सिस्ट या कम ओवेरियन रिज़र्व का लक्षण हो सकता है।
ओवुलेशन के समय Estrogen level बढ़कर लगभग 200–400 pg/mL तक पहुँच सकता है।
IVF स्टिमुलेशन के समय E2 लेवल हर दो तीन दिन पर चेक किया जाता है। इससे ओवरी की प्रतिक्रिया और फॉलिकल की ग्रोथ का अंदाजा मिलता है।
Estrogen test एक नॉर्मल ब्लड टेस्ट है। इसे किसी भी स्टैण्डर्ड पैथोलॉजी लैब में करवाया जा सकता है और रिपोर्ट आमतौर पर उसी दिन या अगले दिन आ जाती है।
Estrogen केवल एक हार्मोन नहीं है,बल्कि यह महिला की फर्टिलिटी को कंट्रोल करने वाला सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर है। यह एग्स की ग्रोथ, ओवुलेशन, गर्भाशय की परत यानी एंडोमेट्रियम की तैयारी और इम्प्लांटेशन के लिए सही यूट्रस को तैयार करने में मदद करता है।
इसलिए Estrogen का बैलेंस फर्टिलिटी के लिए बहुत जरुरी है। इसका लेवल बहुत कम या बहुत अधिक होने पर प्रेगनेंसी होने में मुश्किल हो सकती है।
अगर आपके पीरियड्स रेगुलर नहीं हैं, कंसीव करने में समस्या आ रही हो या आईवीएफ ट्रीटमेंट करवाने की सोच रही हों,तो अपना Estrogen level checkup जरूर करवाएं।