हर 10 में से 7 महिलायें में 50 साल की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते फाइब्रॉइड होता है, लेकिन ज़्यादातर महिलाओं को इसका पता भी नहीं चलता। आइये समझते हैं Fibroid meaning in hindi, फाइब्रॉएड को हिंदी में गर्भाशय की गाँठ, रसौली, या बच्चेदानी में गाँठ कहते हैं। यह गर्भाशय की मांसपेशियों में बनने वाली एक गैर-कैंसरस गाँठ है जो छोटी सी मटर से लेकर बड़े तरबूज़ तक किसी भी साइज़ की हो सकती है।
अच्छी खबर यह है कि फाइब्रॉइड होने का मतलब बीमार होना नहीं है। कई महिलाएँ पूरी ज़िंदगी फाइब्रॉइड के साथ बिना किसी परेशानी के जीती हैं, माँ बनती हैं, और उन्हें कभी इलाज की ज़रूरत नहीं पड़ती।
इस आर्टिकल में आपको समझाया जाएगा कि fibroid का पता चलने से पहले, पता चलने पर, और आगे क्या करें ताकि आप इसे पूरी तरह समझ सकें और सही फ़ैसला ले सकें।
फाइब्रॉइड गर्भाशय यानी यूट्रस (Uterus) की मांसपेशियों से बनने वाली एक गाँठ को कहते हैं। डॉक्टरों की भाषा में इसे लेयोमायोमा (Leiomyoma) या यूटरिन मायोमा (Uterine Myoma) भी कहते हैं।
इसके बारे में तीन बातें समझना जरुरी होता है।
फाइब्रॉइड बच्चेदानी मतलब यूट्रस में चार जगहों पर बन सकता है।
इसमें डॉक्टर पेट और पेल्विक एरिया को छूकर यूट्रस का साइज़ और आकार चेक करते हैं। अगर फाइब्रॉइड बड़े हैं तो इसी तरह से पकड़ में आ जाते हैं।
डॉक्टर सबसे पहले TVS अल्ट्रासाउंड करते हैं। इससे फाइब्रॉइड का साइज़, संख्या, और लोकेशन पता चलती है।
अगर डॉक्टर सर्जरी प्लान करते हैं तब उन्हें fibroid की ज़्यादा डिटेल चाहिए होती है ऐसे में एमआरआई से फाइब्रॉइड का एकदम सटीक मैप बनाया जाता है।
इसमें डॉक्टर एक पतली कैमरा ट्यूब द्वारा यूट्रस के अंदर देखते हैं जिससे सबम्यूकोसल फाइब्रॉइड की पुष्टि की जाती है।
गर्भाशय में पानी डालकर अल्ट्रासाउंड करना। Uterine cavity पर फाइब्रॉइड का असर देखने के लिए।
जब अल्ट्रासाउंड में फाइब्रॉइड दिखता है, तो रिपोर्ट में कुछ खास शब्द लिखे होते हैं। इन्हें समझ लेना आसान है।
फाइब्रॉइड का आकार यानी उसकी लम्बाई, चौड़ाई, और गहराई आमतौर पर mm या cm में लिखी होती है।
इससे पता चलता है कि फाइब्रॉइड यूट्रस यानी बच्चेदानी के किस हिस्से में है।
यह बताता है कि फाइब्रॉइड बच्चेदानी की किस परत में बना है। रिपोर्ट में आमतौर पर इंट्राम्यूरल (Intramural), सबम्यूकोसल (Submucosal), या सबसेरोसल (Subserosal) लिखा होता है।
ज़्यादातर महिलाएँ फाइब्रॉइड होने के बावजूद नेचुरली प्रेगनेंट हो जाती हैं। फाइब्रॉइड वाली केवल 2 से 3 प्रतिशत महिलाओं में ही यह निःसंतानता का मुख्य कारण होता है। लगभग 10 से 12 प्रतिशत प्रेग्नेंट महिलाओं को फाइब्रॉइड होता है, जिनमें से अधिकतर की प्रेगनेंसी सामान्य रहती है।
यह यूट्रस की अंदरूनी परत में बनता है और इम्प्लांटेशन में रुकावट डाल सकता है, इसलिए फर्टिलिटी पर इसका असर सबसे ज्यादा माना जाता है। ऐसे मामलों में अक्सर हिस्टेरोस्कोपी से फाइब्रॉइड हटाने की सलाह दी जाती है।
अगर fibroid का आकार 5 सेमी से बड़ा हो, तो यह यूट्रस की बनावट बदलकर फर्टिलिटी को कुछ हद तक प्रभावित कर सकता है। इसके इलाज के लिए साइज़, लोकेशन और लक्षण देखकर फिर फैसला किया जाता है।
यह यूट्रस के बाहरी हिस्से में बनता है और आमतौर पर फर्टिलिटी पर असर नहीं डालता। इसलिए ज़्यादातर मामलों में इसे हटाने की जरूरत नहीं होती।
यह डंठल से जुड़ा होता है और सामान्यतः प्रेगनेंसी की क्षमता को प्रभावित नहीं करता, इसलिए इसे अक्सर बिना इलाज के ही छोड़ दिया जाता है।
हर फाइब्रॉइड के मामले में IVF की जरूरत नहीं होती। ज़्यादातर महिलाएँ इलाज के बाद नेचुरली कंसीव कर लेती हैं। लेकिन कुछ स्थितियों में डॉक्टर IVF की सलाह दे सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर सबम्यूकोसल फाइब्रॉइड हटाने के बाद भी 6 से 12 महीने तक प्रेगनेंसी न हो, तो आगे की फर्टिलिटी ट्रीटमेंट पर विचार किया जाता है। इसी तरह अगर महिला की उम्र 35 साल से ज्यादा हो, तो समय की वजह से IVF एक बेहतर विकल्प माना जा सकता है। कई बार अन्य फर्टिलिटी समस्याएँ, जैसे ओव्यूलेशन या स्पर्म से जुड़ी दिक्कतें, साथ में होने पर भी IVF की जरूरत पड़ सकती है।
गर्भाशय की गाँठ या रसौली बहुत कॉमन कंडीशन है जो ज़्यादातर मामलों में गंभीर नहीं होती। लेकिन तीन बातें याद रखें।
इसीलिए जानकारी लें, घबराएं नहीं, अपने डॉक्टर से खुलकर बात करें और उसके बाद अपनी स्थिति के अनुसार सही फैसला लें।
अक्सर रूटीन अल्ट्रासाउंड या प्रेगनेंसी प्लानिंग के दौरान अचानक पता चलता है। कभी-कभी हैवी पीरियड्स, पेट में भारीपन, या बार-बार पेशाब जैसे लक्षणों से शक होता है और जाँच होती है।
नहीं, हर फाइब्रॉइड को ऑपरेशन की ज़रूरत नहीं। छोटे और बिना लक्षण वाले फाइब्रॉइड को सिर्फ़ मॉनिटर किया जा सकता है।
हाँ, ज़्यादातर महिलाएँ फाइब्रॉइड के साथ नेचुरली कंसीव करती हैं। सबम्यूकोसल फाइब्रॉइड फर्टिलिटी पर सबसे ज़्यादा असर डालता है, जबकि सबसीरोसल आमतौर पर फ़र्टिलिटी के लिहाज़ से कोई असर नहीं डालता।
फाइब्रॉइड के साइज़ से ज़्यादा लोकेशन और लक्षण मायने रखते हैं। आमतौर पर डॉक्टर 5 सेमी से बड़े फाइब्रॉइड के ट्रीटमेंट की सलाह देते हैं , खासकर तब जब लक्षण हों या फर्टिलिटी पर असर पड़ रहा हो।
हाँ, 15 से 30 प्रतिशत मामलों में 5 साल के अंदर नया फाइब्रॉइड बन सकता है। हिस्टेरेक्टॉमी ही 100% गारंटी देता है, लेकिन यह आखिरी विकल्प है।
एस्ट्रोजन लेवल गिरने से ज़्यादातर फाइब्रॉइड मेनोपॉज़ के बाद खुद सिकुड़ जाते हैं और लक्षण कम हो जाते हैं। इसीलिए 45 से 50+ उम्र की महिलाओं को कभी-कभी इंतज़ार करने की सलाह दी जाती है।