सारांश (Overview)
फोर्सेप्स डिलीवरी का नाम सुनते ही कई महिलाओं को चिंता होने लगती है कि कहीं डिलीवरी में कोई गंभीर परेशानी तो नहीं हो गई। लेकिन फोर्सेप्स का इस्तेमाल कई बार तब किया जाता है, जब बच्चा जन्म के काफी करीब होता है और उसे बाहर आने में थोड़ी मदद की जरूरत होती है।
फोर्सेप्स दो चम्मचनुमा हिस्सों वाला उपकरण है। इसे बच्चे के सिर के दोनों तरफ सावधानी से लगाया जाता है और माँ के जोर लगाने के साथ हल्का खिंचाव दिया जाता है। यह सिर को दबाता नहीं, सिर्फ दिशा और सहारा देता है।
आगे जानेंगे कि फोर्सेप्स कब लगते हैं, प्रक्रिया कैसे होती है, इसके क्या जोखिम हैं और इसके बाद रिकवरी में कितना समय लगता है।
फोर्सेप्स धातु से बना एक उपकरण है, जिसके दो हिस्से होते हैं। हर हिस्से का एक मुड़ा हुआ चम्मच जैसा भाग होता है, जो बच्चे के सिर की गोलाई के हिसाब से बना होता है। इसमें एक दूसरा मोड़ भी होता है, जो माँ के पेल्विस के रास्ते के अनुरूप होता है। दोनों हिस्सों को अलग-अलग लगाया जाता है और फिर बीच में जोड़ दिया जाता है।
फोर्सेप्स की जरूरत मुख्य रूप से तीन स्थितियों में पड़ सकती है।
बच्चे की धड़कन में बदलाव: ऐसा बदलाव जिससे बच्चे को जल्दी बाहर निकालना जरूरी लगे।
दूसरा स्टेप लंबा खिंचना: सर्विक्स पूरी तरह खुलने के बाद भी बच्चा आगे न बढ़े या माँ की ताकत जवाब देने लगे।
माँ की कोई ऐसी स्थिति: जिसमें जोर लगाना सुरक्षित न हो, जैसे दिल की बीमारी या आंखों से जुड़ी कोई गंभीर समस्या।
दूसरा चरण लंबा कब माना जाएगा, इसके लिए एक समय सीमा है।
किसकी डिलीवरी | कमर की दवा के साथ | बिना दवा के |
|---|---|---|
पहली डिलीवरी | 3 घंटे से ज्यादा | 2 घंटे से ज्यादा |
पहले डिलीवरी हो चुकी है | 2 घंटे से ज्यादा | 1 घंटे से ज्यादा |
इस समय सीमा तक पहुंचने पर भी हर बार फोर्सेप्स नहीं लगाए जाता। डॉक्टर साथ में यह भी देखते हैं कि बच्चा आगे बढ़ रहा है या नहीं और उसकी धड़कन कैसी है।
यह एक नॉर्मल प्रोसेस है। RCOG की गाइडलाइन के मुताबिक ब्रिटेन में हर दस में से एक से डेढ़ डिलीवरी में इस तरह की मदद ली जाती है। पहली बार माँ बनने वाली महिलाओं में यह करीब हर तीसरे केस में होता है।
हाँ, इसका चलन कम जरूर हुआ है। StatPearls के अनुसार 2023 में यह वजाइनल डिलीवरी के करीब 1% मामलों तक सिमट गया। क्योंकि एक तो इसकी ट्रेनिंग नहीं दी जाती और आजकल वैक्यूम का इस्तेमाल भी बढ़ गया है।
फोर्सेप्स तभी लगाया जाता है जब सभी जरूरी कंडीशन पूरी हों। इनमें से एक भी कंडीशन पूरी न हो, तो फोर्सेप्स नहीं लगाया जाता।
क्या जांचा जाता है | क्यों जरूरी है |
|---|---|
सर्विक्स पूरी तरह खुल चुका है | अधूरे खुले सर्विक्स में चोट लग सकती है |
पानी की थैली फट चुकी है | इससे बच्चे के सिर पर फोर्सेप्स की पकड़ बन पाती है |
बच्चे का सिर नीचे उतर चुका है | सिर ऊपर होने पर फोर्सेप्स नहीं लगाया जाता |
सिर किस दिशा में है, यह पक्का है | इससे फोर्सेप्स को सही जगह लगाया जा सके |
पेट से सिर लगभग महसूस नहीं हो रहा | यह बताता है कि सिर पेल्विस में उतर चुका है |
यूरिन ब्लैडर खाली है | भरा हुआ ब्लैडर रास्ते में आता है और चोट लग सकती है |
दर्द से राहत के लिए दवा दी गई है | फोर्सेप्स लगाने के दौरान दर्द कम रहे |
माँ की सहमति ली गई है | प्रोसेस से पहले इसके बारे में समझाना और सहमति लेना जरूरी है |
ऑपरेशन थिएटर तैयार है | जरूरत पड़ने पर तुरंत सिजेरियन किया जा सके |
अगर फोर्सेप्स लगाने के बाद भी बच्चा आगे नहीं बढ़ता, तो डॉक्टर प्रोसेस को रोककर दूसरे ऑप्शन पर जाते हैं। इसलिए फोर्सेप्स की कोशिश के साथ सिजेरियन की तैयारी भी रखी जाती है।
सबसे पहले माँ को सही पोजीशन में लिटाया जाता है, ब्लैडर खाली कराया जाता है और दर्द से राहत के लिए दवा दी जाती है।
इसके बाद डॉक्टर जांच करके बच्चे के सिर की दिशा और पोजीशन दोबारा देखते हैं। फिर फोर्सेप्स के दोनों हिस्सों को बच्चे के सिर के दोनों तरफ सावधानी से लगाया जाता है और आपस में जोड़ दिया जाता है।
जब गर्भाशय सिकुड़ता है और माँ जोर लगाती है, तब डॉक्टर फोर्सेप्स की मदद से बच्चे को धीरे धीरे बाहर आने में मदद करते हैं। यह खिंचाव माँ के जोर लगाने के साथ दिया जाता है, न कि बच्चे को सिर्फ फोर्सेप्स से खींचकर बाहर निकाला जाता है।
बच्चे का सिर बाहर आते ही फोर्सेप्स हटा दिया जाता है और डिलीवरी बाकी तरीके से पूरी की जाती है।जरूरत पड़ने पर बच्चे के बाहर आने के लिए वेजाइना के मुहाने पर छोटा सा चीरा लगाया जा सकता है। डिलीवरी के बाद इस जगह पर टांके लगा दिए जाते हैं।
बच्चे के जन्म के बाद उसकी जांच की जाती है, खासकर सिर और चेहरे की, जहां फोर्सेप्स लगाया गया था। इस पूरे प्रोसेस में आमतौर पर कुछ ही मिनट लगते हैं।
फोर्सेप्स लगाने से पहले डॉक्टर यह देखते हैं कि बच्चे का सिर पेल्विस में कितना नीचे आ चुका है। सिर जितना नीचे होगा, फोर्सेप्स लगाना उतना आसान होता है। इसी आधार पर इसकी स्थिति को अलग अलग कैटेगरी में बांटा जाता है।
कैटेगरी | सिर कहां है | क्या मतलब है |
|---|---|---|
आउटलेट | सिर बाहर से दिखने लगा है | सबसे आसान स्थिति, सबसे कम जोखिम |
लो | सिर काफी नीचे उतर चुका है | आमतौर पर सुरक्षित, अनुभव जरूरी |
मिड कैविटी | सिर उतरा है पर बीच में है | ज्यादा सावधानी, अक्सर थिएटर में की जाती है |
अगर बच्चे का सिर बीच की स्थिति में है, तो फोर्सेप्स डिलीवरी ऑपरेशन थिएटर में करना बेहतर होता है। इससे जरूरत पड़ने पर तुरंत सिजेरियन किया जा सकता है।
तीनों का उद्देश्य बच्चे को सुरक्षित बाहर निकालना है, लेकिन तरीका अलग होता है। फोर्सेप्स और वैक्यूम वेजाइनल डिलीवरी में मदद करते हैं, जबकि सिजेरियन में बच्चे को ऑपरेशन के जरिए बाहर निकाला जाता है।
पहलू | फोर्सेप्स | वैक्यूम | दूसरे चरण का सिजेरियन |
|---|---|---|---|
कैसे काम करता है | सिर के दोनों तरफ पकड़ बनाकर | सिर पर कप लगाकर | पेट से चीरा लगाकर |
सफलता की संभावना | ज्यादा, कोशिश के असफल होने के चांस कम होते हैं | थोड़ी कम, कप फिसल सकता है | सबसे ज्यादा |
माँ को नीचे चोट | ज्यादा, खासकर पहली डिलीवरी में | कम | नीचे कोई चोट नहीं आती, लेकिन पेट का ऑपरेशन |
बच्चे पर निशान | चेहरे पर लाल निशान | सिर पर सूजन ज्यादा आम | कोई निशान नहीं |
रिकवरी | कुछ दिन से दो हफ्ते | कुछ दिन | छह हफ्ते तक |
अगली प्रेगनेंसी | ज्यादातर सामान्य डिलीवरी संभव | ज्यादातर सामान्य डिलीवरी संभव | अगली डिलीवरी की योजना अलग हो सकती है |
बच्चे का सिर बहुत नीचे उतर चुका हो, तो सिजेरियन आसान नहीं रहता। ऐसे में सिर को ऊपर लाकर निकालना पड़ता है, जिससे खून ज्यादा बहने और चोट का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए इस स्थिति में फोर्सेप्स बेहतर विकल्प हो सकता है। फोर्सेप्स और वैक्यूम को एक के बाद एक इस्तेमाल करने से भी बचा जाता है, क्योंकि इससे बच्चे के लिए रिस्क बढ़ सकता है।
फोर्सेप्स डिलीवरी में माँ के लिए सबसे बड़ा जोखिम नीचे के हिस्से में गहरी चोट का होता है। यह फोर्सेप्स में करीब 8 से 12% मामलों में देखा जाता है, जबकि वैक्यूम में यह 1 से 4% रहता है।
इसके अलावा नीचे दिए गए रिस्क भी हो सकते हैं।
अगर नीचे के हिस्से में गहरी चोट होती है, तो डिलीवरी के बाद उसकी जांच करके टांके लगाए जाते हैं। वहाँ इन्फेक्शन न हो, इसीलिए एंटीबायोटिक की डोज़ दी जाती है।
पेशाब करने में परेशानी होने पर कुछ समय के लिए कैथेटर लगाया जा सकता है। दर्द की दवा भी दी जाती है और खून के थक्के बनने के जोखिम को देखते हुए जरूरी सावधानी बरती जाती है।
फोर्सेप्स के बाद बच्चे के चेहरे पर लाल निशान या हल्की सूजन दिखना सबसे आम है। ये आमतौर पर वहीं होते हैं जहां फोर्सेप्स लगाया गया था और कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाते हैं।
कभी-कभी चेहरे की एक तरफ की नस पर दबाव पड़ सकता है। ऐसे में बच्चा रोते समय चेहरे के उस हिस्से को कम हिलाता हुआ दिख सकता है। यह भी ज्यादातर मामलों में अपने आप ठीक हो जाता है।
गंभीर चोटें बहुत कम होती हैं। इनमें खोपड़ी में दरार या दिमाग के अंदर खून बहना शामिल है। गाइडलाइन के मुताबिक, दिमाग के अंदर खून बहने जैसी गंभीर चोट 10,000 में 5 से 15 बच्चों में होती है, यानी 1% से भी कम मामलों में।
लंबे समय में भी ज्यादातर बच्चों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। अगर शुरुआत में दिखने वाले निशानों के अलावा कोई दूसरी परेशानी नहीं है, तो बच्चे का विकास सामान्य रहता है।
ज्यादातर महिलाओं को दो हफ्तों में काफी आराम मिल जाता है और छह हफ्तों तक टांके भर जाते हैं। लेकिन दर्द बढ़ता जाए, बुखार आए, बदबूदार स्राव हो या मल यानी बाउल मूवमेंट पर काबू रखने में परेशानी हो, तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
टांके भरने के बाद डॉक्टर की सलाह से पेल्विक फ्लोर की कसरत शुरू की जा सकती है। इसे नियमित करने से पेशाब पर काबू रखने और पेल्विक फ्लोर को मजबूत करने में मदद मिलती है।
एक बार फोर्सेप्स डिलीवरी होने का मतलब यह नहीं है कि अगली बार भी इसकी जरूरत पड़ेगी। ज्यादातर महिलाएं अगली बार सामान्य डिलीवरी कर सकती हैं। ऐसी महिलाओं में सामान्य डिलीवरी की संभावना करीब 80 से 90% तक रहती है।
फोर्सेप्स डिलीवरी तब की जाती है जब बच्चा जन्म के काफी करीब हो, लेकिन उसे बाहर आने में थोड़ी मदद की जरूरत हो। यह फैसला बच्चे की पोजीशन, उसकी धड़कन और डिलीवरी कितनी आगे बढ़ी है, इन बातों को देखकर लिया जाता है।
फोर्सेप्स से माँ और बच्चे दोनों के लिए कुछ रिस्क हो सकते हैं, लेकिन गंभीर जटिलताएं कम होती हैं। सही कंडीशन में और अनुभवी डॉक्टर द्वारा की गई फोर्सेप्स डिलीवरी के बाद ज्यादातर महिलाएं और बच्चे ठीक रहते हैं। अगली बार सामान्य डिलीवरी की संभावना भी अच्छी रहती है।
अगर आपकी डिलीवरी में फोर्सेप्स की जरूरत पड़ी है, तो डॉक्टर से यह जानना चाहिए कि इसकी जरूरत क्यों पड़ी थी। इससे आपको पिछली डिलीवरी को समझने और अगली प्रेगनेंसी के लिए अच्छी तरह से तैयार होने में मदद मिल सकती है।