जेनेटिक डिसऑर्डर क्या है? Genetic Disorder Meaning in Hindi

Last updated: January 05, 2026

Overview

WHO के अनुसार दुनियाभर में हर 33 में से 1 बच्चा किसी न किसी जेनेटिक डिसऑर्डर (Genetic Disorder) के साथ पैदा होता है। भारत में यह समस्या और भी गंभीर है। यहां हर साल लगभग 1.7 लाख बच्चे थैलेसीमिया (Thalassemia) जैसी जेनेटिक बीमारियों के साथ जन्म लेते हैं। इन बीमारियों का कोई पूर्ण इलाज नहीं है और मरीज को जीवन भर दवाइयां लेनी पड़ती हैं या बार-बार खून चढ़वाना पड़ता है।

लेकिन अच्छी बात यह है कि अब IVF तकनीक में PGT यानी प्रीइम्प्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग (Preimplantation Genetic Testing) उपलब्ध है। इसमें भ्रूण यानी एम्ब्रीओ (Embryo) को गर्भाशय में ट्रांसफर करने से पहले ही उसकी जेनेटिक जांच हो जाती है। इस आर्टिकल में genetic disorder meaning in hindi के साथ इसके प्रकार, कारण, लक्षण और IVF में PGT से बचाव की पूरी जानकारी दी गई है।

जेनेटिक डिसऑर्डर क्या होता है?

जेनेटिक डिसऑर्डर वो बीमारियां हैं जो जीन्स (Genes) या गुणसूत्रों यानी क्रोमोसोम्स (Chromosomes) में गड़बड़ी की वजह से होती हैं। हमारे शरीर की हर कोशिका यानी सेल (Cell) में 23 जोड़े क्रोमोसोम्स होते हैं। इन क्रोमोसोम्स में लगभग 20,000 से 25,000 जीन्स होते हैं। ये जीन्स ही तय करते हैं कि हमारी आंखों का रंग क्या होगा, हमारा कद कितना होगा, और हमारा शरीर कैसे काम करेगा।

जब इन जीन्स या क्रोमोसोम्स में कोई बदलाव यानी म्यूटेशन (Mutation) हो जाता है, तो शरीर का कोई अंग या सिस्टम ठीक से काम नहीं करते। कुछ जेनेटिक बीमारियां माता-पिता से बच्चे में आती हैं, जबकि कुछ अचानक हुए म्यूटेशन से होती हैं। भारत में 4 करोड़ से ज्यादा लोग थैलेसीमिया के वाहक यानी कैरियर (Carrier) हैं। इन लोगों को खुद कोई बीमारी नहीं होती, लेकिन ये अपने बच्चों को यह बीमारी दे सकते हैं।

कितनी तरह के जेनेटिक डिसऑर्डर होते हैं?

जेनेटिक डिसऑर्डर मुख्य रूप से तीन तरह के होते हैं।

1. एक जीन में गड़बड़ी से होने वाले डिसऑर्डर

इन बीमारियों में सिर्फ एक जीन में गड़बड़ी होती है। थैलेसीमिया इसका सबसे आम उदाहरण है। इस बीमारी में खून में हीमोग्लोबिन (Hemoglobin) ठीक से नहीं बनता, जिसकी वजह से मरीज को हर 15 से 20 दिन में खून चढ़वाना पड़ता है।

2. क्रोमोसोम में गड़बड़ी से होने वाले डिसऑर्डर

इन बीमारियों में पूरे क्रोमोसोम की संख्या या बनावट में गड़बड़ी होती है। डाउन सिंड्रोम (Down Syndrome) इसका सबसे जाना-माना उदाहरण है। सामान्य बच्चे में क्रोमोसोम 21 की दो कॉपी होती हैं, लेकिन डाउन सिंड्रोम वाले बच्चे में तीन कॉपी होती हैं। इससे बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है। मां की उम्र का इस पर सीधा असर पड़ता है। अगर मां की उम्र 25 साल है तो बच्चे में डाउन सिंड्रोम होने की संभावना 1,250 में से 1 होती है। वहीं 40 साल की उम्र में गर्भधारण करने पर यह संभावना बढ़कर 100 में से 1 हो जाती है।

3. कई कारणों से होने वाले डिसऑर्डर

इन बीमारियों में सिर्फ जीन्स नहीं, बल्कि खानपान, जीवनशैली और वातावरण भी भूमिका निभाते हैं। हृदय रोग, मधुमेह यानी डायबिटीज, और कुछ तरह के कैंसर ऐसी ही बीमारियां हैं। इनमें परिवार में बीमारी का इतिहास होने से खतरा बढ़ता है, लेकिन सही जीवनशैली से इन्हें रोका या टाला जा सकता है।

किन वजहों से हो सकता है जेनेटिक डिसऑर्डर?

जेनेटिक डिसऑर्डर कई कारणों से हो सकते हैं।

  • माता-पिता से आना: अगर माता और पिता दोनों किसी बीमारी के कैरियर हैं, तो उनके बच्चे में वो बीमारी होने की 25% संभावना होती है। कैरियर माता-पिता को खुद कोई बीमारी नहीं होती, इसलिए उन्हें पता भी नहीं चलता कि वे कैरियर हैं।
  • अचानक हुआ म्यूटेशन: कभी-कभी अंडे यानी एग या शुक्राणु यानी स्पर्म बनते समय या भ्रूण के शुरुआती विकास में अचानक म्यूटेशन हो जाता है। ऐसे में माता-पिता में कोई गड़बड़ी नहीं होती, फिर भी बच्चे में जेनेटिक डिसऑर्डर हो सकता है।
  • मां की उम्र: 35 साल के बाद एग की गुणवत्ता घटने लगती है और क्रोमोसोम में गड़बड़ी का खतरा बढ़ जाता है। इसीलिए 35 साल के बाद गर्भधारण करने वाली महिलाओं को अतिरिक्त जांच की सलाह दी जाती है।
  • करीबी रिश्तेदारों में शादी: चचेरे या ममेरे भाई-बहनों में शादी से कुछ जेनेटिक बीमारियों का खतरा 2 से 3 गुना बढ़ जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि दोनों पार्टनर्स में एक जैसे जीन्स होने की संभावना ज्यादा होती है।
  • बाहरी कारण: रेडिएशन (Radiation), कुछ केमिकल्स, और गर्भावस्था के दौरान कुछ वायरल इंफेक्शन (Viral Infection) भी जीन्स में बदलाव का कारण बन सकते हैं।

जेनेटिक डिसऑर्डर के लक्षण

हर जेनेटिक डिसऑर्डर के लक्षण अलग-अलग होते हैं, लेकिन कुछ सामान्य संकेत हैं जिन पर ध्यान देना चाहिए।

  • बच्चे का शारीरिक या मानसिक विकास उम्र के हिसाब से धीमा होना
  • चेहरे या शरीर की बनावट में कोई असामान्यता दिखना
  • बच्चे का बार-बार बीमार पड़ना या बार-बार इंफेक्शन होना
  • खून से जुड़ी समस्याएं जैसे खून की कमी यानी एनीमिया (Anemia) या खून का थक्का न जमना
  • मांसपेशियों में कमजोरी या चलने-फिरने में दिक्कत
  • महिलाओं में बार-बार गर्भपात यानी मिसकैरेज (Miscarriage) होना। कई कपल्स में बार-बार मिसकैरेज का कारण जेनेटिक गड़बड़ी होती है।

प्रेगनेंसी के पहले और बाद में कैसे जानें जेनेटिक डिसऑर्डर?

जेनेटिक डिसऑर्डर का पता लगाने के लिए कई जांच उपलब्ध हैं। ये जांच गर्भावस्था से पहले और गर्भावस्था के दौरान, दोनों समय कराई जा सकती हैं।

गर्भावस्था से पहले की जांच:

  • कैरियर स्क्रीनिंग (Carrier Screening): यह एक खून की जांच है जिससे पता चलता है कि आप किसी जेनेटिक बीमारी के वाहक तो नहीं हैं। शादी से पहले या गर्भावस्था की योजना बनाने से पहले यह जांच करानी चाहिए।
  • कैरियोटाइप टेस्ट (Karyotype Test): इस जांच में क्रोमोसोम की संख्या और बनावट देखी जाती है। बार-बार मिसकैरेज होने पर यह जांच कराने की सलाह दी जाती है।

गर्भावस्था के दौरान की जांच:

  • NIPT (Non-Invasive Prenatal Testing): इस जांच में मां के खून से भ्रूण के DNA की जांच होती है। यह जांच 99% सटीक होती है और इसमें कोई खतरा नहीं होता।
  • एमनियोसेंटेसिस (Amniocentesis): यह जांच 15 से 20 हफ्ते की गर्भावस्था में होती है। इसमें गर्भाशय से थोड़ा पानी निकालकर भ्रूण के क्रोमोसोम की जांच की जाती है।
  • CVS (Chorionic Villus Sampling): यह जांच 10 से 13 हफ्ते की गर्भावस्था में होती है। इसमें गर्भनाल यानी प्लेसेंटा से नमूना लेकर जांच की जाती है।

IVF में PGT से रोकथाम

IVF तकनीक ने जेनेटिक डिसऑर्डर से बचाव का एक बहुत असरदार तरीका दिया है। इसका नाम है प्रीइम्प्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग (PGT)। इस तकनीक में एम्ब्रीओ को गर्भाशय यानी यूट्रस (Uterus) में डालने से पहले ही उसकी जेनेटिक जांच कर ली जाती है। इससे सिर्फ स्वस्थ एम्ब्रीओ ही गर्भाशय में डाला जाता है।

PGT के तीन प्रकार होते हैं:

  • PGT-A (Aneuploidy के लिए): इस जांच में क्रोमोसोम्स की सही संख्या देखी जाती है। 35 साल से ऊपर की महिलाओं में इस जांच से मिसकैरेज का खतरा 30 से 40% कम हो जाता है।
  • PGT-M (Monogenic बीमारियों के लिए): इस जांच में किसी खास जेनेटिक बीमारी जैसे थैलेसीमिया या सिकल सेल की जांच होती है। अगर माता और पिता दोनों किसी बीमारी के कैरियर हैं तो यह जांच जरूर करानी चाहिए।
  • PGT-SR (Structural Rearrangements के लिए): इस जांच में क्रोमोसोम्स की बनावट में गड़बड़ी देखी जाती है। जिन कपल्स को बार-बार मिसकैरेज होता है, उनके लिए यह जांच बहुत उपयोगी है।

PGT कैसे होता है:

सबसे पहले IVF प्रक्रिया से एम्ब्रीओ बनाए जाते हैं। फिर 5वें या 6वें दिन जब एम्ब्रीओ ब्लास्टोसिस्ट (Blastocyst) स्टेज में पहुंचता है, तब उसमें से कुछ सेल्स निकाली जाती हैं। ये सेल्स वो होती हैं जो आगे चलकर प्लेसेंटा बनती हैं, बच्चा नहीं। इन सेल्स की जेनेटिक जांच होती है। जिन एम्ब्रीओ में कोई जेनेटिक गड़बड़ी नहीं होती, सिर्फ उन्हें गर्भाशय में डाला जाता है।

रिसर्च के अनुसार PGT-A से IVF की सफलता दर 60 से 70% तक बढ़ सकती है, खासकर 38 साल से ऊपर की महिलाओं में।

जेनेटिक काउंसलिंग की जरूरत किसे है?

जेनेटिक काउंसलिंग (Genetic Counseling) एक विशेष सेवा है जिसमें एक प्रशिक्षित विशेषज्ञ आपको जेनेटिक बीमारियों के खतरे को समझाता है। वो आपकी पारिवारिक और मेडिकल हिस्ट्री देखकर बताता है कि आपके बच्चे में जेनेटिक डिसऑर्डर होने की कितनी संभावना है और इससे बचने के क्या तरीके हैं।

जेनेटिक काउंसलिंग इन स्थितियों में जरूरी है।

  • परिवार में किसी को थैलेसीमिया, हीमोफीलिया, या कोई अन्य जेनेटिक बीमारी है
  • आपकी उम्र 35 साल से ज्यादा है और गर्भावस्था की योजना है
  • पहले दो या उससे ज्यादा बार मिसकैरेज हो चुका है
  • पहले बच्चे में कोई जेनेटिक समस्या थी
  • पति-पत्नी करीबी रिश्तेदार हैं

अच्छे IVF सेंटर्स में जेनेटिक काउंसलर की सुविधा होती है। वो आपको PGT की जरूरत, पूरी प्रक्रिया, और रिपोर्ट के नतीजे आसान भाषा में समझाते हैं।

निष्कर्ष

जेनेटिक डिसऑर्डर गंभीर बीमारियां हैं जो जीवनभर परेशान करती हैं। लेकिन अब मेडिकल साइंस ने इनसे बचाव के तरीके दे दिए हैं। इस आर्टिकल में आपने genetic disorder meaning in hindi के साथ इसके प्रकार, कारण, और बचाव के तरीके जाने। IVF with PGT उन कपल्स के लिए जरुरी है जिनके परिवार में जेनेटिक बीमारी है या जिनकी उम्र 35 साल से ज्यादा है। कैरियर स्क्रीनिंग, जेनेटिक काउंसलिंग, और PGT, इन तीन स्टेप के साथ प्रेगनेंसी प्लान करने से आपकी संतान के पूर्णतया स्वस्थ पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है। अगर आपके परिवार में कोई जेनेटिक बीमारी है या आप बार-बार मिसकैरेज का सामना कर रहे हैं, तो किसी अनुभवी फर्टिलिटी विशेषज्ञ से जरूर मिलें।

Common Questions Asked

क्या जेनेटिक डिसऑर्डर का पूर्ण इलाज संभव है?

 

ज्यादातर जेनेटिक डिसऑर्डर्स का पूर्ण इलाज अभी संभव नहीं है, लेकिन लक्षणों को नियंत्रण में रखा जा सकता है।

PGT कराने से IVF का खर्च कितना बढ़ जाता है?

 

PGT से IVF साइकल का खर्च लगभग 50,000 से 1,00,000 रुपये बढ़ जाता है। यह खर्च ज्यादा लग सकता है, लेकिन एक प्रभावित बच्चे के जीवनभर के इलाज के खर्च से यह बहुत कम है।

क्या PGT से एम्ब्रीओ को कोई नुकसान होता है?

 

नहीं। PGT के लिए एम्ब्रीओ से सिर्फ 5 से 6 सेल्स निकाली जाती हैं। ये सेल्स वो होती हैं जो आगे चलकर प्लेसेंटा बनती हैं, बच्चा नहीं।

कैरियर स्क्रीनिंग कब करानी चाहिए?

 

कैरियर स्क्रीनिंग प्रेगनेंसी प्लान से पहले करानी चाहिए। वैसे तो कैरियर स्क्रीनिंग का सबसे अच्छा समय शादी से पहले है। अगर दोनों पार्टनर एक ही बीमारी के कैरियर निकलते हैं, तो IVF with PGT-M से स्वस्थ बच्चा पाने का विकल्प मिलता है।

क्या नॉर्मल डिलीवरी से जेनेटिक डिसऑर्डर वाला बच्चा हो सकता है?

 

हां। जेनेटिक डिसऑर्डर का डिलीवरी के तरीके से कोई संबंध नहीं है। जेनेटिक डिसऑर्डर गर्भधारण के समय ही तय हो जाता है, जब एग और स्पर्म मिलते हैं।

35 साल के बाद गर्भधारण में PGT-A क्यों जरूरी माना जाता है?

 

35 साल के बाद महिलाओं के एग्स में क्रोमोसोम से सम्बंधित गड़बड़ी होने की संभावना बढ़ जाती है। इसी वजह से मिसकैरेज और डाउन सिंड्रोम जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ता है।

**Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
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