हाई रिस्क प्रेग्नेंसी: फ़ाइल पर लिखा ये शब्द असल में क्या कहता है

Last updated: September 02, 2026

Overview

क्लिनिक में सबसे ज़्यादा घबराहट किसी रिपोर्ट से नहीं, एक शब्द से फैलती है।

डॉक्टर फ़ाइल पर "high risk" लिख देते हैं, और महिला घर लौटते-लौटते मान लेती है कि कुछ बहुत बड़ा गड़बड़ है। रात भर नींद नहीं आती। घरवाले अलग परेशान हैं।

तो सबसे पहले वही बात, जो सबसे ज़रूरी है।

"हाई रिस्क" कोई बुरी ख़बर नहीं है। ये एक निर्देश है - डॉक्टर के लिए, आपके ख़िलाफ़ नहीं।

इसका मतलब बस इतना है कि इस प्रेग्नेंसी पर बाकी लोगों से ज़्यादा नज़र रखी जाएगी। ज़्यादा विज़िट, ज़्यादा सोनोग्राफ़ी, कुछ अतिरिक्त जाँचें। बस।

इसे ऐसे समझिए

हवाई जहाज़ में कुछ उड़ानों पर अतिरिक्त जाँच होती है - मौसम की वजह से, रूट की वजह से, या विमान की उम्र की वजह से। इसका मतलब ये नहीं कि जहाज़ गिरने वाला है। इसका मतलब ये है कि जो चीज़ें ध्यान माँगती हैं, उन पर पहले से ध्यान दिया जा रहा है।

प्रेग्नेंसी में "हाई रिस्क" का लेबल ठीक यही करता है। ये ख़तरे का ऐलान नहीं, अतिरिक्त निगरानी का इंतज़ाम है।

अमेरिका के NICHD (National Institute of Child Health and Human Development) की परिभाषा भी यही कहती है - हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वो है जिसमें माँ या बच्चे की सेहत पर असर पड़ने की संभावना ज़्यादा हो, और जिसमें विशेषज्ञ देखभाल की ज़रूरत पड़ सकती है। साथ ही ये भी कि जल्दी शुरू हुई और नियमित प्रीनेटल केयर से ऐसी बहुत सी प्रेग्नेंसी बिना किसी दिक़्क़त के पूरी होती हैं।

इस आख़िरी लाइन को दो बार पढ़िए। यही असली बात है।

कौन-कौन सी बातें प्रेग्नेंसी को हाई रिस्क बनाती हैं

ये लिस्ट डराने के लिए नहीं है - समझने के लिए है कि डॉक्टर किन चीज़ों को देखकर ये फ़ैसला लेते हैं।

पहले से मौजूद बीमारियाँ - हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़, थायरॉइड, किडनी की बीमारी, ऑटोइम्यून रोग (जैसे ल्यूपस), दिल की कोई समस्या, या HIV। ध्यान दीजिए - NICHD के मुताबिक़ ऐसी बीमारियाँ अच्छी तरह कंट्रोल में होने पर भी प्रेग्नेंसी को हाई रिस्क श्रेणी में रखा जा सकता है। ये कोई सज़ा नहीं है, बस सतर्कता है।

उम्र - 35 के बाद और किशोरावस्था में, दोनों तरफ़ जोखिम थोड़ा बढ़ता है।

वज़न - बहुत ज़्यादा वज़न होने पर ब्लड प्रेशर, प्रीक्लेम्पसिया और जेस्टेशनल डायबिटीज़ की आशंका बढ़ जाती है।

पिछली प्रेग्नेंसी का इतिहास - पहले कभी प्रीटर्म डिलीवरी हुई हो, प्रीक्लेम्पसिया रहा हो, बार-बार मिसकैरेज हुए हों, या सिज़ेरियन हुआ हो।

जुड़वाँ या उससे ज़्यादा बच्चे - ये अपने आप में एक बड़ा कारण है, और फ़र्टिलिटी ट्रीटमेंट वालों के लिए ख़ास तौर पर मायने रखता है (आगे इसी पर अलग से बात है)।

प्रेग्नेंसी के दौरान पैदा हुई स्थितियाँजेस्टेशनल डायबिटीज़, प्रीक्लेम्पसिया, प्लेसेंटा की जगह से जुड़ी दिक़्क़तें, बच्चे की ग्रोथ कम होना।

एक बात साफ़ रहे - इनमें से कोई चीज़ होने का मतलब ये नहीं कि दिक़्क़त होगी ही। NICHD ख़ुद कहती है कि इन कारकों में से एक या ज़्यादा होने का मतलब ये नहीं कि समस्या होगी, और ज़्यादातर महिलाओं को प्रेग्नेंसी में कोई जटिलता होती ही नहीं।

IVF या फ़र्टिलिटी ट्रीटमेंट के बाद की प्रेग्नेंसी

ये सवाल क्लिनिक में लगभग हर दूसरी महिला पूछती है - "IVF से हुई है, तो क्या ये अपने आप हाई रिस्क है?"

सीधा जवाब: ट्रीटमेंट अपने आप में इतनी बड़ी बात नहीं है। असली फ़र्क़ दो चीज़ों से आता है।

पहली - जिस वजह से ट्रीटमेंट की ज़रूरत पड़ी। अगर PCOS था, उम्र ज़्यादा है, या कोई और मेडिकल स्थिति है - तो वही चीज़ प्रेग्नेंसी में भी साथ चलती है।

दूसरी - और ये ज़्यादा अहम है - जुड़वाँ बच्चे।

लंबे समय तक ये माना जाता रहा कि एक साथ दो-तीन भ्रूण ट्रांसफ़र करने से सफलता की संभावना बढ़ती है। लेकिन इससे जुड़वाँ या तीन बच्चों की संभावना भी बढ़ती है, और मल्टीपल प्रेग्नेंसी माँ और बच्चों दोनों के लिए जोखिम काफ़ी बढ़ा देती है।

ASRM की गाइडलाइन में एक बहुत काम की बात है: 42 साल से कम उम्र की महिलाओं में एक जाँचा हुआ (euploid) ब्लास्टोसिस्ट ट्रांसफ़र करने पर प्रेग्नेंसी की दर वैसी ही रही जैसी दो बिना जाँचे भ्रूण ट्रांसफ़र करने पर - जबकि जुड़वाँ का जोखिम बहुत कम हो गया

यानी ज़्यादा भ्रूण डालना = ज़्यादा सफलता, ये समीकरण अब उतना सच नहीं है।

तो अगर आप अभी ट्रीटमेंट की प्लानिंग में हैं, तो सिंगल एम्ब्रियो ट्रांसफ़र पर अपने डॉक्टर से खुलकर बात कीजिए। ये एक ऐसा फ़ैसला है जो प्रेग्नेंसी शुरू होने से पहले लिया जाता है, और आगे की पूरी राह आसान कर सकता है।

हाई रिस्क में देखभाल किस तरह अलग होती है

घबराने वाली कोई बात नहीं - बदलाव ज़्यादातर इतने ही होते हैं:

  • विज़िट ज़्यादा बार, ख़ासकर आख़िरी तीन महीनों में
  • हर विज़िट पर ब्लड प्रेशर और वज़न पर बारीक़ नज़र
  • ज़्यादा सोनोग्राफ़ी, ताकि बच्चे की ग्रोथ और पानी की मात्रा पर नज़र रहे
  • कुछ अतिरिक्त ब्लड टेस्ट, स्थिति के हिसाब से
  • ज़रूरत पड़ने पर मैटरनल-फ़ीटल मेडिसिन विशेषज्ञ की सलाह

और अगर पहले कभी प्रीटर्म डिलीवरी हो चुकी है, तो डॉक्टर प्रोजेस्टेरोन की बात कर सकते हैं - NICHD के मुताबिक़ पिछली प्रीटर्म डिलीवरी वाली महिलाओं में प्रोजेस्टेरोन देने से डिलीवरी को टालने में मदद मिलती है।

दो चीज़ें जो अक्सर छूट जाती हैं

ये हिस्सा सबसे ध्यान से पढ़िए, क्योंकि हिंदी में लिखी ज़्यादातर जानकारी में ये दोनों बातें नहीं मिलतीं।

1. कम डोज़ वाली एस्पिरिन - और इसका सही समय

अगर प्रीक्लेम्पसिया का जोखिम ज़्यादा है, तो अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइन्स कम डोज़ वाली एस्पिरिन की सलाह देती हैं। ACOG और SMFM के मुताबिक़ इसे 12वें से 28वें हफ़्ते के बीच शुरू किया जाना चाहिए - सबसे बेहतर 16 हफ़्ते से पहले - और डिलीवरी तक रोज़ जारी रखना चाहिए ।

समय क्यों इतना मायने रखता है? इसे ऐसे समझिए - प्लेसेंटा की रक्त-नलिकाएँ शुरुआती महीनों में ही अपनी शक्ल लेती हैं। एक बार ढाँचा बन जाने के बाद उसे बदलना मुश्किल है। इसीलिए ये दवा जल्दी शुरू होने पर सबसे ज़्यादा काम करती है।

किन्हें ज़रूरत पड़ सकती है? USPSTF की सूची में शामिल हैं - पिछली प्रेग्नेंसी में प्रीक्लेम्पसिया, जुड़वाँ या उससे ज़्यादा बच्चे, पहले से हाई ब्लड प्रेशर, टाइप 1 या टाइप 2 डायबिटीज़, किडनी की बीमारी, और कुछ ऑटोइम्यून बीमारियाँ।

ये दवा ख़ुद से शुरू मत कीजिए। डोज़ और शुरू करने का समय आपकी स्थिति देखकर डॉक्टर तय करेंगे। लेकिन अगर ऊपर की सूची में से कुछ आप पर लागू होता है और अब तक इस पर बात नहीं हुई - तो अगली विज़िट में ख़ुद पूछ लीजिए। ये सवाल पूछना आपका हक़ है।

2. फ़ोलिक एसिड की ज़्यादा डोज़ - सबके लिए नहीं, कुछ के लिए

फ़ोलिक एसिड तो सब लेते हैं। पर कुछ महिलाओं को आम डोज़ से काफ़ी ज़्यादा चाहिए होती है।

NHS के मुताबिक़ 5 mg वाली ज़्यादा डोज़ उन्हें सलाह दी जाती है जिनकी पिछली प्रेग्नेंसी न्यूरल ट्यूब डिफ़ेक्ट से प्रभावित रही हो, या ख़ुद उन्हें या पार्टनर को ऐसी कोई स्थिति रही हो या परिवार में इतिहास हो। मिर्गी या HIV की कुछ दवाइयाँ चल रही हों, तब भी डॉक्टर ये ज़्यादा डोज़ लिख सकते हैं - और ये सिर्फ़ डॉक्टर के पर्चे से ही मिलती है।

सबसे ज़रूरी बात ये है कि फ़ोलिक एसिड का असली काम गर्भधारण से पहले और शुरुआती हफ़्तों में होता है - यानी जब कई बार पता भी नहीं होता कि प्रेग्नेंसी हो चुकी है। इसीलिए प्लानिंग के दौर में ही ये बातचीत हो जानी चाहिए, प्रेग्नेंसी कन्फ़र्म होने के बाद नहीं।

ये लक्षण दिखें तो इंतज़ार मत कीजिए

चाहे प्रेग्नेंसी हाई रिस्क हो या न हो, कुछ लक्षण ऐसे हैं जिनमें तुरंत डॉक्टर तक पहुँचना ज़रूरी है। अमेरिका की CDC ने अपने Hear Her कैम्पेन में ऐसी सूची जारी की है:

  • सिरदर्द जो जाता ही नहीं, या बढ़ता जा रहा हो
  • नज़र में बदलाव - धुंधलापन, चमक, या कुछ दिखना बंद हो जाना
  • चक्कर आना या बेहोशी
  • हाथों या चेहरे पर बहुत ज़्यादा सूजन
  • साँस लेने में तकलीफ़
  • सीने में दर्द या दिल का बहुत तेज़ धड़कना
  • पेट में तेज़ दर्द जो हट ही नहीं रहा
  • बहुत ज़्यादा उल्टी (मॉर्निंग सिकनेस से अलग तरह की)
  • बुख़ार
  • बच्चे की हलचल कम हो जाना या बंद हो जाना
  • ब्लीडिंग या पानी जाना

CDC इसमें एक और बात जोड़ती है जो शायद सबसे क़ीमती है - ये सूची हर लक्षण को नहीं समेटती। अगर आपको लग रहा है कि कुछ ठीक नहीं है, तो डॉक्टर से बात कीजिए, भले ही आप निश्चित न हों कि बात गंभीर है या नहीं।

आप अपने शरीर को सबसे बेहतर जानती हैं। "कहीं फ़ालतू परेशान तो नहीं कर रही" - इस झिझक में देर मत कीजिए। डॉक्टर के पास आकर पता चले कि कुछ नहीं था, ये हमेशा बेहतर है।

सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी

क्लिनिक में सबसे ज़्यादा जो चीज़ नुक़सान करती है, वो कोई मेडिकल स्थिति नहीं - वो है ये सोच कि "हाई रिस्क" का मतलब बिस्तर पकड़ लेना है।

बहुत सी महिलाएँ ये लेबल सुनते ही चलना-फिरना छोड़ देती हैं, काम छोड़ देती हैं, और घर में डरी हुई बैठी रहती हैं। यह मदद नहीं करता। ज़्यादातर स्थितियों में सामान्य दिनचर्या, हल्की-फुल्की गतिविधि और अच्छी नींद ही सबसे बेहतर है - और अगर किसी वजह से आराम ज़रूरी होगा तो डॉक्टर ख़ुद साफ़ बताएँगे।

दूसरी बात - इंटरनेट पर अपनी स्थिति के आँकड़े मत खोजिए। जो प्रतिशत आपको मिलेंगे, वो हज़ारों अलग-अलग महिलाओं के औसत हैं। उनमें आपकी उम्र, आपकी बाकी सेहत, आपकी दवाएँ और आपकी निगरानी शामिल नहीं हैं। वो आँकड़े आपके बारे में कुछ नहीं कहते।

जो चीज़ सच में फ़र्क़ डालती है वो बहुत साधारण है: कोई विज़िट मत छोड़िए, दवाएँ समय पर लीजिए, और जो लक्षण ऊपर लिखे हैं उन्हें नज़रअंदाज़ मत कीजिए।

Frequently Asked Questions

क्या हाई रिस्क का मतलब सिज़ेरियन ही होगा?

क्या ये लेबल पूरी प्रेग्नेंसी रहेगा?

35 के बाद प्रेग्नेंसी हो तो क्या हमेशा हाई रिस्क कहलाएगी?

क्या हाई रिस्क में एक्सरसाइज़ या सफ़र मना है?

IVF से प्रेग्नेंसी हुई है, क्या ज़्यादा डर की बात है?

कब से एक्स्ट्रा सावधानी शुरू करनी चाहिए?

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