हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम: प्रेगनेंसी में ज्यादा उल्टी कब खतरनाक होती है?

Last updated: September 17, 2026

सारांश (Overview)

प्रेगनेंसी में मितली और उल्टी होना आम है। लेकिन अगर उल्टी इतनी ज्यादा हो जाए कि पानी और खाना भी न टिके, वजन कम होने लगे और शरीर में पानी की कमी होने लगे, तो इसे सामान्य मॉर्निंग सिकनेस मानकर नहीं छोड़ना चाहिए।

इस स्थिति को हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम (Hyperemesis Gravidarum) कहते हैं। यह प्रेगनेंसी में होने वाली गंभीर उल्टी की एक मेडिकल स्थिति है, जिसमें समय पर इलाज जरूरी होता है।

आगे हम समझेंगे कि सामान्य उल्टी और hyperemesis gravidarum में क्या फर्क है, इसके लक्षण और खतरे के संकेत क्या हैं, इलाज कैसे होता है और अस्पताल जाने की जरूरत कब पड़ती है।

प्रेगनेंसी में उल्टी कब खतरनाक होती है?

प्रेगनेंसी में मितली और उल्टी आम है। लेकिन अगर उल्टी इतनी ज्यादा हो कि खाना-पानी टिकना मुश्किल हो जाए, वजन कम होने लगे या रोज़मर्रा के काम प्रभावित होने लगें, तो यह हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम हो सकता है।

प्रेगनेंसी से पहले के वजन का 5% या उससे ज्यादा कम होना, शरीर में पानी की कमी और इलेक्ट्रोलाइट का असंतुलन इसके महत्वपूर्ण संकेत हैं।

 

पहलू

सामान्य मॉर्निंग सिकनेस

Hyperemesis gravidarum

कितनी बार उल्टी

दिन में एक दो बार हो सकती है 

बार-बार, गिनना मुश्किल

पानी और खाना

कुछ खाना और तरल भोजन टिक जाता है 

पानी तक टिकना मुश्किल हो सकता है 

वजन

लगभग वही रहता है

5% या उससे ज़्यादा घट जाता है

रोज़मर्रा का काम

थोड़ी परेशानी के बावजूद जारी रहते हैं 

सामान्य काम करना भी मुश्किल हो सकता है 

कब तक

ज़्यादातर 12 से 16 हफ्ते तक

कई बार 20 हफ्ते या उससे आगे तक

इलाज

खानपान में बदलाव से राहत मिल सकती है 

दवा और अक्सर अस्पताल की ज़रूरत

हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम क्यों होता है? (Hyperemesis Gravidarum causes )

पहले हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम को अक्सर हॉर्मोनल बदलाव या मानसिक कमजोरी से जोड़कर देखा जाता था। अब इसके पीछे शरीर में होने वाले बदलावों की बेहतर समझ मिली है।

GDF15 हॉर्मोन की क्या भूमिका है?

GDF15 एक हॉर्मोन है, जो प्रेगनेंसी में प्लेसेंटा से बनता है। इसकी मात्रा शुरुआती महीनों में बढ़ती है और यह दिमाग के उन हिस्सों पर असर करता है जो मितली और उल्टी को नियंत्रित करते हैं।

लेकिन हर महिला पर इसका असर एक जैसा नहीं होता। जिन महिलाओं के शरीर में प्रेगनेंसी से पहले GDF15 का स्तर कम होता है, उनका शरीर प्रेगनेंसी में बढ़े हुए GDF15 के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकता है। इसी वजह से उन्हें मितली और उल्टी ज्यादा गंभीर हो सकती हैं।

किन महिलाओं में जोखिम ज्यादा हो सकता है?

कुछ स्थितियों में हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम का जोखिम बढ़ सकता है। 

मोलर प्रेगनेंसी की जांच क्यों होती है?

मोलर प्रेगनेंसी में प्रेगनेंसी हॉर्मोन बहुत ज्यादा बढ़ सकता है और उल्टी भी तेज़ हो सकती है। इसलिए जरूरत पड़ने पर अल्ट्रासाउंड से इसे अलग किया जाता है।

हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम के लक्षण और खतरे के संकेत

हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम की शुरुआत अक्सर 4 से 7वें हफ्ते में होती है और 9वें हफ्ते के आसपास लक्षण सबसे ज्यादा हो सकते हैं। ज्यादातर महिलाओं में 20वें हफ्ते तक राहत मिलने लगती है।

शुरुआत में मितली, बार-बार उल्टी, गंध से परेशानी, मुंह में ज्यादा लार, कमज़ोरी, चक्कर और सिरदर्द जैसे लक्षण हो सकते हैं।

लेकिन शरीर कुछ ऐसे सिग्नल देता है जिससे पता लगता है कि उल्टी का असर अब शरीर पर पड़ रहा है और डॉक्टर की जरूरत है। 

  • 24 घंटे से पानी न टिकना
  • पेशाब बहुत कम या गहरे रंग का होना
  • वजन लगातार कम होना
  • खड़े होने पर तेज़ चक्कर या धड़कन बढ़ना
  • उल्टी में खून या भूरा रंग आना
  • उलझन, धुंधला दिखना या चलने में लड़खड़ाहट
  • तेज़ बुखार या पेट में तेज़ दर्द

इनमें से कुछ भी दिखाई दे, तो इंतज़ार न करें। उसी दिन डॉक्टर से संपर्क करें। उल्टी में खून, उलझन या चलने में लड़खड़ाहट हो, तो तुरंत अस्पताल जाएं।

हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम का डायग्नोसिस कैसे होता है?

हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम की पहचान किसी एक टेस्ट से नहीं होती। डॉक्टर लक्षणों, वजन और जांचों को देखकर स्थिति की गंभीरता समझते हैं और यह भी देखते हैं कि उल्टी की वजह कोई दूसरी समस्या तो नहीं है।

कौन-कौन सी जांच होती हैं?

  • वजन: प्रेगनेंसी से पहले के वजन से तुलना करके देखा जाता है कि कितना वजन कम हुआ है।
  • पेशाब की जांच: इससे डिहाइड्रेशन और शरीर में ऊर्जा की कमी के संकेत मिल सकते हैं।
  • खून की जांच: सोडियम, पोटैशियम, किडनी और लिवर की स्थिति देखी जाती है। जरूरत पड़ने पर थायरॉइड की भी जांच होती है।
  • लक्षणों की गंभीरता: पिछले 24 घंटे में मितली कितने समय रही, कितनी बार उल्टी हुई और कितनी बार उबकाई आई, इसके आधार पर PUQE स्कोर से गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

अगर उल्टियां फर्स्ट ट्राइमेस्टर के बाद शुरू होती हैं, तो डॉक्टर दूसरी संभावित वजहों की भी जांच करते हैं।

हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम का इलाज कैसे होता है?

इसका इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि उल्टी कितनी गंभीर है और शरीर पर उसका कितना असर पड़ रहा है। हल्की तकलीफ़ में खानपान में बदलाव से शुरुआत की जाती है। जरूरत पड़ने पर दवाएं और अस्पताल में एडमिट करने को बोला जा सकता है।

खानपान में बदलाव

हल्की तकलीफ़ में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में खाना, पर्याप्त हाइड्रेशन रखना, अदरक और विटामिन B6 से राहत मिल सकती है।

मितली और उल्टी की दवाएं

अगर इससे राहत न मिले, तो डॉक्टर मितली रोकने वाली दवाएं दे सकते हैं। लेकिन कोई भी दवा खुद से न लें। प्रेगनेंसी में कौन सी दवा दी जा सकती यह प्रेगनेंसी के समय के अनुसार डॉक्टर तय करते हैं।

नस से पानी और विटामिन B1

जब पानी और खाना मुंह से नहीं टिकता या डिहाइड्रेशन हो जाता है, तो नस से तरल और इलेक्ट्रोलाइट दिए जा सकते हैं। लंबे समय से उल्टी होने पर विटामिन B1 भी दिया जाता है।

गंभीर मामलों में स्टेरॉयड

अगर दूसरी दवाओं से भी राहत न मिले और उल्टी गंभीर बनी रहे, तो डॉक्टर स्टेरॉयड पर विचार कर सकते हैं।

नस से ग्लूकोज देने से पहले विटामिन B1 देना भी जरूरी हो सकता है, क्योंकि इसकी कमी में ग्लूकोज देने से नस से ग्लूकोज देने से पहले विटामिन B1 दिया जाता है। लंबे समय से उल्टी होने पर शरीर में B1 की कमी हो सकती है, और ऐसी स्थिति में पहले B1 देना जरूरी होता है। 

हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम में अस्पताल में भर्ती कब होती है?

अगर दवाओं के बावजूद उल्टी नहीं रुक रही, पानी नहीं टिक रहा या डिहाइड्रेशन और वजन कम होने की समस्या बढ़ रही है, तो अस्पताल में भर्ती की जरूरत पड़ सकती है। साथ में डायबिटीज या यूरिन इन्फेक्शन जैसी दूसरी समस्या हो, तो डॉक्टर जल्दी भर्ती करने का फैसला ले सकते हैं।

अस्पताल में क्या होता है?

अस्पताल में डिहाइड्रेशन और इलेक्ट्रोलाइट की कमी को ठीक किया जाता है। खून की जांच से सोडियम, पोटैशियम और किडनी की स्थिति पर नजर रखी जाती है। जरूरत के अनुसार दवाएं और विटामिन भी दिए जाते हैं।

लंबे समय तक बिस्तर पर रहने और डिहाइड्रेशन से खून के थक्के बनने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए कुछ महिलाओं को इससे बचाव के लिए इंजेक्शन दिए जाते हैं।

कुछ मामलों में पूरी रात अस्पताल में रहने की जरूरत नहीं होती। हालत ज्यादा गंभीर न हो, तो डे केयर में इलाज देकर उसी दिन घर भेजा जा सकता है।

प्रेगनेंसी और बच्चे पर हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम का असर

समय पर इलाज मिलने पर ज्यादातर महिलाओं की प्रेगनेंसी सामान्य रूप से आगे बढ़ती है और बच्चा स्वस्थ पैदा होता है।

बच्चे पर क्या असर हो सकता है?

लंबे समय तक हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम का इलाज न होने पर लगातार वजन कम होना और पोषण की कमी बच्चे की ग्रोथ को प्रभावित कर सकती है। इससे बच्चे का जन्म के समय वजन कम होने और प्रीटर्म डिलीवरी का रिस्क बढ़ सकता है।

माँ पर क्या असर पड़ता है?

इसका असर सिर्फ़ शरीर पर नहीं पड़ता। लंबे समय तक उल्टी, कमजोरी और रोज़मर्रा के काम न कर पाना मानसिक रूप से भी परेशान कर सकते हैं। अगर उदासी या घबराहट बढ़ रही हो, तो डॉक्टर को बताना भी इलाज का हिस्सा है।

हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम में घरेलू उपाय क्या हैं?

दवा के साथ कुछ घरेलू उपाय मितली और उल्टी को संभालने और डिहाइड्रेशन से बचने में मदद कर सकते हैं। 

  • थोड़ा-थोड़ा खाएं: हर दो घंटे में थोड़ी मात्रा में खाएं। सुबह उठते ही खाली पेट न रहें। बिस्तर पर ही टोस्ट या भुना चना जैसी सूखी चीज़ खा सकती हैं।
  • तरल चीज़ें घूंट-घूंट लें: खाने के साथ ज्यादा पानी पीने के बजाय दिनभर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में तरल लें। ओआरएस, नारियल पानी, छाछ और सूप से पानी के साथ इलेक्ट्रोलाइट भी मिलते हैं।
  • तेज़ गंध और भारी खाना छोड़ें: तली, बहुत मसालेदार या तेज़ गंध वाली चीज़ों से परेशानी बढ़ती हो, तो उनसे बचें। खाना बनाते समय रसोई में ज्यादा देर खड़े रहने से भी बचें।
  • उल्टी के बाद तुरंत ब्रश न करें: पेट का एसिड दांतों की ऊपरी परत को नुकसान पहुंचा सकता है। पहले पानी से कुल्ला करें और करीब 30 मिनट बाद ब्रश करें।
  • वजन और उल्टी का रिकॉर्ड रखें: रोज़ वजन और दिन में कितनी बार उल्टी हुई, यह नोट करें। इससे डॉक्टर को इलाज तय करने में मदद मिलती है।

याद रखने वाली मुख्य बातें (Key takeaways)

  • हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम सामान्य मॉर्निंग सिकनेस से अलग है।
  • GDF15 हॉर्मोन और शरीर की संवेदनशीलता इसमें भूमिका निभाते हैं।
  • 24 घंटे से पानी न टिकना खतरे का संकेत है।
  • इलाज लक्षणों की गंभीरता के अनुसार किया जाता है।
  • समय पर इलाज से प्रेगनेंसी का रिजल्ट आमतौर पर अच्छा रहता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम में सबसे जरूरी है कि इसे सामान्य प्रेगनेंसी की उल्टी समझकर टाला न जाए। बार-बार उल्टी के साथ वजन कम होना, पानी न टिकना या पेशाब कम होना इस बात का संकेत है कि शरीर पर इसका असर पड़ रहा है।

अगर आप इन लक्षणों से गुजर रही हैं, तो डॉक्टर को बताएं कि कितनी बार उल्टी हो रही है, पानी कितना टिक रहा है और वजन में कितना बदलाव आया है। समय पर इलाज मिलने से ज्यादातर महिलाओं की प्रेगनेंसी सामान्य रूप से आगे बढ़ती है।

Hyperemesis gravidarum से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम क्या है?

हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम दोबारा हो सकता है?

क्या हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम का इलाज संभव है?

क्या उल्टी रोकने वाली दवाएं प्रेगनेंसी में सुरक्षित हैं?

क्या हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम में अस्पताल में भर्ती होना जरूरी है?

क्या जुड़वां बच्चों में हाइपरएमेसिस का खतरा ज्यादा होता है?

क्या हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम से प्रेगनेंसी को नुकसान हो सकता है?

क्या हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम सिर्फ़ शुरुआती प्रेगनेंसी में होता है?

क्या हाइपरएमेसिस ग्रेविडेरम मानसिक कमजोरी की वजह से होता है?

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