हाइपोस्पर्मिया क्या है? लक्षण, कारण और उपचार (Hypospermia kya hota hai in Hindi)

Last updated: December 26, 2025

Overview

क्या आपकी सीमेन एनालिसिस रिपोर्ट में "low semen volume" लिखा आया है और अब आप सोच रहे हैं, कि अब पिता बनना मुश्किल होगा? हाइपोस्पर्मिया यानी 1.5 ml से कम सीमेन वॉल्यूम एक चिंता का विषय ज़रूर है, लेकिन यह मतलब नहीं है कि आप संतान पैदा नहीं कर सकते। दिलचस्प बात यह है कि सीमेन वॉल्यूम सिर्फ एक पैरामीटर है, असली बात है टोटल स्पर्म काउंट और उनकी क्वालिटी। अच्छी बात यह है कि आधुनिक मेडिकल साइंस में हाइपोस्पर्मिया की जांच और इलाज दोनों संभव हैं। इस आर्टिकल में समझिए कि Hypospermia kya hota, यह फर्टिलिटी को कैसे प्रभावित करता है, और कैसे आधुनिक ART टेक्नोलॉजी आपको संतान का सुख देने में मददगार साबित हो सकती है।

हाइपोस्पर्मिया क्या है (hypospermia kya hota hai )

कई कपल जब लंबे समय तक नेचुरल प्रेगनेंसी की कोशिश करते हैं लेकिन सफल नहीं हो पाते, तो डॉक्टर फर्टिलिटी टेस्ट करवाते हैं। इन टेस्ट्स में महिला के साथ-साथ पुरुष की प्रजनन क्षमता की भी जांच होती है। इस दौरान कभी-कभी सीमेन से जुड़ी एक समस्या सामने आती है जिसे हाइपोस्पर्मिया (Hypospermia) कहते हैं। इस स्थिति में इजाक्युलेशन के दौरान सीमेन की मात्रा सामान्य से कम होती है। WHO के अनुसार, नॉर्मल सीमेन वॉल्यूम 1.5 ml से 5 ml होता है। जब यह 1.5 ml से कम हो जाता है, तो इसे हाइपोस्पर्मिया कहते हैं। कम सीमेन वॉल्यूम का मतलब है कि पर्याप्त स्पर्म गर्भाशय तक नहीं पहुंच पाते, जिससे प्रेगनेंसी की संभावना कम हो जाती है।

हाइपोस्पर्मिया के कारण (Causes of Hypospermia)

हाइपोस्पर्मिया कई कारणों से हो सकता है। कुछ कारण नीचे दिए गए हैं।

  • रेट्रोग्रेड इजाक्युलेशन: यह सबसे आम कारण है। इसमें सीमेन आगे की तरफ बाहर न निकलकर ब्लैडर में चला जाता है। यह डायबिटीज, रीढ़ की हड्डी की चोट, या प्रोस्टेट सर्जरी के बाद हो सकता है।
  • इजाक्युलेटरी डक्ट ऑब्सट्रक्शन: जब सीमेन ले जाने वाली नलियां आंशिक या पूरी तरह ब्लॉक हो जाती हैं। यह इंफेक्शन, सिस्ट, या जन्मजात हो सकता है।
  • हॉर्मोनल असंतुलन: टेस्टोस्टेरोन, FSH, LH जैसे हॉर्मोन्स की कमी से सेमिनल वेसिकल्स और प्रोस्टेट ग्लैंड की फंक्शनिंग प्रभावित होती है।
  • सेमिनल वेसिकल या प्रोस्टेट की समस्याएं: क्रॉनिक प्रोस्टेटाइटिस, सेमिनल वेसिकुलाइटिस से इन ग्लैंड्स का फ्लूइड प्रोडक्शन कम हो जाता है।
  • इंफेक्शन: सेक्शुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन्स (STIs) या यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन से रिप्रोडक्टिव ग्लैंड्स प्रभावित हो सकती हैं।
  • फ्रीक्वेंट इजाक्युलेशन: बहुत बार-बार इजाक्युलेशन करने से शरीर को पर्याप्त सीमेन बनाने का समय नहीं मिलता।
  • एजिंग: उम्र बढ़ने के साथ सीमेन वॉल्यूम और टेस्टोस्टेरोन लेवल स्वाभाविक रूप से घटते हैं।
  • मेडिकेशन्स: कुछ दवाएं जैसे अल्फा-ब्लॉकर्स, एंटीडिप्रेसेंट्स सीमेन प्रोडक्शन या इजाक्युलेशन को प्रभावित कर सकती हैं।
  • लाइफस्टाइल फैक्टर्स: धूम्रपान, अत्यधिक शराब, ड्रग्स, स्ट्रेस, डीहाइड्रेशन।

स्पर्म की कमी के शारीरिक लक्षण (Physical Symptoms of Low Sperm Count)

स्पर्म की कमी पुरुषों के सेक्सुअल हेल्थ और कंसीव कराने की क्षमता पर असर डाल सकती है। hypospermia kya hota hai जानने के बाद इसके लक्षण पता करते हैं।

  • स्पर्म की मात्रा में कमी (Low Sperm Volume): संभोग के दौरान सामान्य से कम स्पर्म निकलना। यह संकेत हो सकता है कि टेस्टिस में स्पर्म का बनना कम हो रहा है।
  • स्पर्म का पतला होना (Thin Sperm): स्पर्म का गाढ़ापन कम होना या पानी जैसा दिखना। इससे स्पर्म की क्वालिटी पर असर पड़ सकता है और कंसीव में मुश्किल हो सकती है।
  • सेक्स की इच्छा में कमी (Low Sexual Desire): सेक्स की इच्छा में कमी या उत्साह कम होना। यह हार्मोनल बदलाव या मानसिक तनाव की वजह से हो सकता है।
  • टेस्टिकल्स में दर्द या सूजन (Testicular Pain or Swelling): टेस्टिकल्स में भारीपन, दर्द या सूजन महसूस होना। यह संक्रमण, सूजन या किसी चोट का संकेत हो सकता है।
  • इरेक्शन में कठिनाई (Erectile Dysfunction): इरेक्शन बनाने या बनाए रखने में दिक्कत। यह भी स्पर्म की कमी या हार्मोनल असंतुलन का संकेत हो सकता है।

हाइपोस्पर्मिया का इलाज (Treatment of Hypospermia in Hindi)

अगर आपको स्पर्म की कमी की समस्या है, तो सही समय पर किसी अच्छे डॉक्टर से सलाह लेना बहुत जरूरी होता है। क्योंकि सही समय पर इलाज न मिलने पर यह परेशानी धीरे धीरे बढ़ सकती है और आगे चलकर कंसीव करने में दिक्कत आ सकती है। hypospermia kya hota hai जानने के बाद इसके आधुनिक इलाज के तरीके समझते हैं।

  • हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी अगर शरीर में टेस्टोस्टेरोन या किसी और हार्मोन की कमी हो, तो यह थेरेपी दी जाती है। इससे हार्मोन लेवल बैलेंस होता है और स्पर्म बनने की प्रक्रिया बेहतर हो सकती है।
  • एंटीबायोटिक्स अगर किसी तरह का इंफेक्शन स्पर्म की कमी की वजह बन रहा हो, तो डॉक्टर एंटीबायोटिक्स देते हैं। इससे इंफेक्शन ठीक होता है और स्पर्म की क्वालिटी में सुधार आ सकता है।
  • एंटीऑक्सीडेंट सप्लीमेंट विटामिन C, विटामिन E और जिंक जैसे सप्लीमेंट शरीर को अंदर से मजबूत बनाते हैं। ये स्पर्म को नुकसान से बचाने और उनकी क्वालिटी सुधारने में मदद करते हैं।
  • वैरिकोसील रिपेयर टेस्टिस की नसों में सूजन होने पर स्पर्म की मात्रा कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में सर्जरी के जरिए नसों की समस्या ठीक की जाती है।
  • वास डिफेरेन्स रिपेयर अगर स्पर्म निकलने वाली ट्यूब, वास डिफेरेन्स में ब्लॉकेज हो, तो उसे हटाने के लिए यह सर्जरी की जाती है। इससे स्पर्म का फ्लो दोबारा सही हो सकता है।
  • टेस्टिकुलर स्पर्म एक्सट्रैक्शन बहुत गंभीर मामलों में सीधे टेस्टिस से स्पर्म निकाले जाते हैं। बाद में इन स्पर्म का इस्तेमाल आगे के इलाज में किया जाता है।

असिस्टेड रिप्रोडक्टिव तकनीकें (ART)

पिछले सेक्शन में hypospermia kya hota hai समझने के बाद अब नेचुरल प्रेगनेंसी न होने पर क्या करें यह समझते हैं। अगर हाइपोस्पर्मिया के बावजूद स्पर्म काउंट और क्वालिटी अच्छी है, तो नेचुरल कंसेप्शन संभव है। फिर भी इनफर्टिलिटी की समस्या बनी रहे तो असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी की मदद से प्रेगनेंसी संभव हो सकती है।

IUI (इंट्रायूटराइन इनसेमिनेशन):

माइल्ड केसेस में प्रोसेस्ड स्पर्म को सीधे यूट्रस में डाला जाता है। यह स्पर्म को ट्रैवल की दूरी कम करने में मदद करता है।

IVF (इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन):

मॉडरेट से सीवियर केसेस में लैब में एग और स्पर्म को फर्टिलाइज़ किया जाता है।

ICSI (इंट्रासाइटोप्लाज़्मिक स्पर्म इंजेक्शन):

अगर स्पर्म काउंट भी कम है, तो एक स्पर्म को सीधे एग में इंजेक्ट किया जाता है।

स्पर्म रिट्रीवल:

रेट्रोग्रेड इजाक्युलेशन में ब्लैडर से स्पर्म कलेक्ट करके IVF-ICSI किया जा सकता है।

हाइपोस्पर्मिया और फर्टिलिटी (Hypospermia and Fertility)

हाइपोस्पर्मिया का फर्टिलिटी पर असर इस बात पर निर्भर करता है कि स्पर्म पैरामीटर्स कैसे हैं। अगर सीमेन वॉल्यूम कम है लेकिन स्पर्म काउंट, मोटिलिटी और मॉर्फोलॉजी नॉर्मल है, तो प्रेगनेंसी की संभावना अच्छी रहती है। हालांकि, कम वॉल्यूम का मतलब है कम टोटल स्पर्म काउंट का होना ।

इसको ऐसे समझते हैं, अगर किसी पुरुष का स्पर्म concentration 50 million/ml है लेकिन वॉल्यूम सिर्फ 1 ml है, तो टोटल स्पर्म काउंट 50 million होगा। वहीं अगर concentration 20 million/ml है लेकिन वॉल्यूम 3 ml है, तो टोटल 60 million होगा, जो कि बेहतर है।

इसलिए हाइपोस्पर्मिया में पूरे सीमेन एनालिसिस को देखना ज़रूरी है। अगर अन्य पैरामीटर्स नॉर्मल हैं, तो नेचुरल या IUI से कंसेप्शन संभव है। अगर स्पर्म काउंट भी कम है, तो IVF या ICSI सबसे अच्छा विकल्प है।

कब डॉक्टर से मिलें?

  • अगर आप एक साल से कंसीव करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन सफल नहीं हो पा रहे
  • आपको लगता है कि इजाक्युलेट की मात्रा कम आ रही है
  • इजाक्युलेशन के बाद यूरिन क्लाउडी दिखता है
  • टेस्टिकल में दर्द या सूजन है
  • सेक्शुअल डिज़ायर या इरेक्शन में समस्या है

निष्कर्ष (Conclusion)

हाइपोस्पर्मिया यानी कम सीमेन वॉल्यूम एक ऐसी कंडीशन है जो मेल इनफर्टिलिटी के लिए ज़िम्मेदार हो सकती है। हालांकि, यह अकेले इनफर्टिलिटी का कारण नहीं है, स्पर्म काउंट, मोटिलिटी और मॉर्फोलॉजी भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। हाइपोस्पर्मिया के कई कारण हो सकते हैं जैसे रेट्रोग्रेड इजैक्युलेशन से लेकर हॉर्मोनल इम्बैलेंस, इंफेक्शन, या ऑब्सट्रक्शन तक। अच्छी बात यह है कि सीमेन एनालिसिस जैसे सिंपल टेस्ट से इसका पता चल सकता है और ज़्यादातर मामलों में इलाज संभव है। मेडिकल ट्रीटमेंट, सर्जरी, या लाइफस्टाइल चेंज से सीमेन वॉल्यूम और फर्टिलिटी में सुधार हो सकता है। अगर नेचुरल कंसेप्शन मुश्किल हो, तो IUI, IVF या ICSI जैसी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी बहुत प्रभावी हैं। सबसे महत्वपूर्ण है समय पर डॉक्टर से परामर्श लेना और सही जांच करवाना।

हाइपोस्पर्मिया के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

हाइपोस्पर्मिया क्या है?

 

हाइपोस्पर्मिया वह स्थिति है जब इजाक्युलेशन के दौरान सीमेन की मात्रा 1.5 ml से कम होती है। WHO के अनुसार नॉर्मल सीमेन वॉल्यूम 1.5 से 5 ml होता है।

क्या हाइपोस्पर्मिया से पिता बन सकते हैं?

 

हाँ, अगर स्पर्म काउंट, मोटिलिटी और मॉर्फोलॉजी नॉर्मल हैं तो नेचुरल कंसेप्शन संभव है। अगर दिक्कत हो तो IUI, IVF या ICSI से पिता बना जा सकता है।

हाइपोस्पर्मिया के मुख्य कारण क्या हैं?

 

रेट्रोग्रेड इजाक्युलेशन (सबसे आम), इजाक्युलेटरी डक्ट ऑब्सट्रक्शन, हॉर्मोनल असंतुलन, इंफेक्शन, और फ्रीक्वेंट इजाक्युलेशन मुख्य कारण हैं।

सीमेन वॉल्यूम कैसे बढ़ाएं?

 

खूब पानी पिएं, जिंक और विटामिन E युक्त आहार लें, धूम्रपान और शराब छोड़ें, स्ट्रेस कम करें, और 2-3 दिन का एब्सटिनेंस पीरियड रखें।

सीमेन एनालिसिस कैसे होता है?

 

2-7 दिन के सेक्शुअल एब्सटिनेंस के बाद मास्टरबेशन से सैंपल कलेक्ट किया जाता है। लैब में वॉल्यूम, स्पर्म काउंट, मोटिलिटी, मॉर्फोलॉजी की जांच होती है।

रेट्रोग्रेड इजाक्युलेशन क्या है?

 

इसमें सीमेन आगे की तरफ बाहर न निकलकर ब्लैडर में चला जाता है। यह डायबिटीज, नर्व डैमेज या कुछ दवाओं के कारण हो सकता है।

क्या हाइपोस्पर्मिया का इलाज संभव है?

 

हाँ, कारण के आधार पर हॉर्मोनल थेरेपी, एंटीबायोटिक्स, सर्जरी, या लाइफस्टाइल चेंज से इलाज संभव है। ART तकनीकें भी बहुत प्रभावी हैं।

**Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
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