क्या आपकी सीमेन एनालिसिस रिपोर्ट में "low semen volume" लिखा आया है और अब आप सोच रहे हैं, कि अब पिता बनना मुश्किल होगा? हाइपोस्पर्मिया यानी 1.5 ml से कम सीमेन वॉल्यूम एक चिंता का विषय ज़रूर है, लेकिन यह मतलब नहीं है कि आप संतान पैदा नहीं कर सकते। दिलचस्प बात यह है कि सीमेन वॉल्यूम सिर्फ एक पैरामीटर है, असली बात है टोटल स्पर्म काउंट और उनकी क्वालिटी। अच्छी बात यह है कि आधुनिक मेडिकल साइंस में हाइपोस्पर्मिया की जांच और इलाज दोनों संभव हैं। इस आर्टिकल में समझिए कि Hypospermia kya hota, यह फर्टिलिटी को कैसे प्रभावित करता है, और कैसे आधुनिक ART टेक्नोलॉजी आपको संतान का सुख देने में मददगार साबित हो सकती है।
कई कपल जब लंबे समय तक नेचुरल प्रेगनेंसी की कोशिश करते हैं लेकिन सफल नहीं हो पाते, तो डॉक्टर फर्टिलिटी टेस्ट करवाते हैं। इन टेस्ट्स में महिला के साथ-साथ पुरुष की प्रजनन क्षमता की भी जांच होती है। इस दौरान कभी-कभी सीमेन से जुड़ी एक समस्या सामने आती है जिसे हाइपोस्पर्मिया (Hypospermia) कहते हैं। इस स्थिति में इजाक्युलेशन के दौरान सीमेन की मात्रा सामान्य से कम होती है। WHO के अनुसार, नॉर्मल सीमेन वॉल्यूम 1.5 ml से 5 ml होता है। जब यह 1.5 ml से कम हो जाता है, तो इसे हाइपोस्पर्मिया कहते हैं। कम सीमेन वॉल्यूम का मतलब है कि पर्याप्त स्पर्म गर्भाशय तक नहीं पहुंच पाते, जिससे प्रेगनेंसी की संभावना कम हो जाती है।
हाइपोस्पर्मिया कई कारणों से हो सकता है। कुछ कारण नीचे दिए गए हैं।
स्पर्म की कमी पुरुषों के सेक्सुअल हेल्थ और कंसीव कराने की क्षमता पर असर डाल सकती है। hypospermia kya hota hai जानने के बाद इसके लक्षण पता करते हैं।
अगर आपको स्पर्म की कमी की समस्या है, तो सही समय पर किसी अच्छे डॉक्टर से सलाह लेना बहुत जरूरी होता है। क्योंकि सही समय पर इलाज न मिलने पर यह परेशानी धीरे धीरे बढ़ सकती है और आगे चलकर कंसीव करने में दिक्कत आ सकती है। hypospermia kya hota hai जानने के बाद इसके आधुनिक इलाज के तरीके समझते हैं।
पिछले सेक्शन में hypospermia kya hota hai समझने के बाद अब नेचुरल प्रेगनेंसी न होने पर क्या करें यह समझते हैं। अगर हाइपोस्पर्मिया के बावजूद स्पर्म काउंट और क्वालिटी अच्छी है, तो नेचुरल कंसेप्शन संभव है। फिर भी इनफर्टिलिटी की समस्या बनी रहे तो असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी की मदद से प्रेगनेंसी संभव हो सकती है।
IUI (इंट्रायूटराइन इनसेमिनेशन):माइल्ड केसेस में प्रोसेस्ड स्पर्म को सीधे यूट्रस में डाला जाता है। यह स्पर्म को ट्रैवल की दूरी कम करने में मदद करता है।
IVF (इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन):मॉडरेट से सीवियर केसेस में लैब में एग और स्पर्म को फर्टिलाइज़ किया जाता है।
ICSI (इंट्रासाइटोप्लाज़्मिक स्पर्म इंजेक्शन):अगर स्पर्म काउंट भी कम है, तो एक स्पर्म को सीधे एग में इंजेक्ट किया जाता है।
स्पर्म रिट्रीवल:रेट्रोग्रेड इजाक्युलेशन में ब्लैडर से स्पर्म कलेक्ट करके IVF-ICSI किया जा सकता है।
हाइपोस्पर्मिया का फर्टिलिटी पर असर इस बात पर निर्भर करता है कि स्पर्म पैरामीटर्स कैसे हैं। अगर सीमेन वॉल्यूम कम है लेकिन स्पर्म काउंट, मोटिलिटी और मॉर्फोलॉजी नॉर्मल है, तो प्रेगनेंसी की संभावना अच्छी रहती है। हालांकि, कम वॉल्यूम का मतलब है कम टोटल स्पर्म काउंट का होना ।
इसको ऐसे समझते हैं, अगर किसी पुरुष का स्पर्म concentration 50 million/ml है लेकिन वॉल्यूम सिर्फ 1 ml है, तो टोटल स्पर्म काउंट 50 million होगा। वहीं अगर concentration 20 million/ml है लेकिन वॉल्यूम 3 ml है, तो टोटल 60 million होगा, जो कि बेहतर है।
इसलिए हाइपोस्पर्मिया में पूरे सीमेन एनालिसिस को देखना ज़रूरी है। अगर अन्य पैरामीटर्स नॉर्मल हैं, तो नेचुरल या IUI से कंसेप्शन संभव है। अगर स्पर्म काउंट भी कम है, तो IVF या ICSI सबसे अच्छा विकल्प है।
हाइपोस्पर्मिया यानी कम सीमेन वॉल्यूम एक ऐसी कंडीशन है जो मेल इनफर्टिलिटी के लिए ज़िम्मेदार हो सकती है। हालांकि, यह अकेले इनफर्टिलिटी का कारण नहीं है, स्पर्म काउंट, मोटिलिटी और मॉर्फोलॉजी भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। हाइपोस्पर्मिया के कई कारण हो सकते हैं जैसे रेट्रोग्रेड इजैक्युलेशन से लेकर हॉर्मोनल इम्बैलेंस, इंफेक्शन, या ऑब्सट्रक्शन तक। अच्छी बात यह है कि सीमेन एनालिसिस जैसे सिंपल टेस्ट से इसका पता चल सकता है और ज़्यादातर मामलों में इलाज संभव है। मेडिकल ट्रीटमेंट, सर्जरी, या लाइफस्टाइल चेंज से सीमेन वॉल्यूम और फर्टिलिटी में सुधार हो सकता है। अगर नेचुरल कंसेप्शन मुश्किल हो, तो IUI, IVF या ICSI जैसी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी बहुत प्रभावी हैं। सबसे महत्वपूर्ण है समय पर डॉक्टर से परामर्श लेना और सही जांच करवाना।
हाइपोस्पर्मिया वह स्थिति है जब इजाक्युलेशन के दौरान सीमेन की मात्रा 1.5 ml से कम होती है। WHO के अनुसार नॉर्मल सीमेन वॉल्यूम 1.5 से 5 ml होता है।
हाँ, अगर स्पर्म काउंट, मोटिलिटी और मॉर्फोलॉजी नॉर्मल हैं तो नेचुरल कंसेप्शन संभव है। अगर दिक्कत हो तो IUI, IVF या ICSI से पिता बना जा सकता है।
रेट्रोग्रेड इजाक्युलेशन (सबसे आम), इजाक्युलेटरी डक्ट ऑब्सट्रक्शन, हॉर्मोनल असंतुलन, इंफेक्शन, और फ्रीक्वेंट इजाक्युलेशन मुख्य कारण हैं।
खूब पानी पिएं, जिंक और विटामिन E युक्त आहार लें, धूम्रपान और शराब छोड़ें, स्ट्रेस कम करें, और 2-3 दिन का एब्सटिनेंस पीरियड रखें।
2-7 दिन के सेक्शुअल एब्सटिनेंस के बाद मास्टरबेशन से सैंपल कलेक्ट किया जाता है। लैब में वॉल्यूम, स्पर्म काउंट, मोटिलिटी, मॉर्फोलॉजी की जांच होती है।
इसमें सीमेन आगे की तरफ बाहर न निकलकर ब्लैडर में चला जाता है। यह डायबिटीज, नर्व डैमेज या कुछ दवाओं के कारण हो सकता है।
हाँ, कारण के आधार पर हॉर्मोनल थेरेपी, एंटीबायोटिक्स, सर्जरी, या लाइफस्टाइल चेंज से इलाज संभव है। ART तकनीकें भी बहुत प्रभावी हैं।