प्रेगनेंसी की शुरुआत तब नहीं होती जब पीरियड्स मिस हो जाते हैं, यह तो सिर्फ एक संभावित लक्षण हो सकता है। दरअसल प्रेगनेंसी इससे बहुत पहले शुरू हो जाती है। पहले फैलोपियन ट्यूब में एग और स्पर्म मिलते हैं, फिर एग फर्टिलाइज होता है, यह फर्टिलाइज्ड एग भ्रूण यानी एम्ब्रीओ (embryo) बनकर यूट्रस तक पहुँचता है, और फिर यह एम्ब्रीओ यूट्रस की दीवार से जुड़ता है। एम्ब्रीओ का यूट्रस की दीवार से जुड़ने की इस पूरी प्रक्रिया को इम्प्लांटेशन (Implantation) कहा जाता है। अगर आप प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं तो आप जरूर जानना चाहेंगी कि implantation kab hota hai? क्योंकि एक बार इम्प्लांटेशन हो जाये तो प्रेगनेंसी स्टार्ट हो जाती है। इस आर्टिकल में हम समझेंगे कि फर्टिलाइजेशन के बाद हर दिन क्या होता है, इम्प्लांटेशन विंडो क्या है, और कौन सी चीज़ें इम्प्लांटेशन की सफलता को प्रभावित करती हैं।
ओवरी से एक मैच्योर एग निकलता है और फैलोपियन ट्यूब में आ जाता है। यह एग सिर्फ़ 12 से 24 घंटे तक जीवित रहता है। अगर इस दौरान स्पर्म नहीं, तो एग खत्म हो जाता है और अगले पीरियड के साथ बाहर निकल जाता है।
अगर स्पर्म एग तक पहुँच जाता है, तो फर्टिलाइजेशन हो जाता है। यह फर्टिलाइजेशन फैलोपियन ट्यूब में होता है, यूट्रस में नहीं। फर्टिलाइजेशन के बाद एक सिंगल सेल (single cell) बनती है जिसे ज़ाइगोट (Zygote) कहते हैं। इसी से आगे पूरा एम्ब्रयो बनता है।
अब ज़ाइगोट के हिस्से होना शुरू होते हैं। पहले 2 सेल्स, फिर 4, फिर 8। यह फैलोपियन ट्यूब में ही होता रहता है जबकि एम्ब्रयो धीरे-धीरे यूट्रस की तरफ बढ़ रहा होता है। तीसरे दिन तक लगभग 16 सेल्स हो जाती हैं और इसे मोरुला (Morula) कहते हैं।
इस टाइम तक मोरुला यूट्रस में पहुँच जाता है। अब इसके अंदर एक खाली जगह बनने लगती है और यह ब्लास्टोसिस्ट (Blastocyst) बन जाता है। ब्लास्टोसिस्ट में दो हिस्से होते हैं, एक अंदर का हिस्सा जो बच्चा बन जाता, और बाहर का हिस्सा जो प्लेसेंटा बन जाता है।
ब्लास्टोसिस्ट के ऊपर एक खोल (protective shell) होता है जिसे ज़ोना पेलुसिडा (Zona Pellucida) कहते हैं। इम्प्लांट होने के लिए एम्ब्रयो को इस खोल से बाहर आना होता है। इस प्रक्रिया को हैचिंग कहते हैं।
अब ब्लास्टोसिस्ट यूट्रस की दीवार से जुड़ने लगता है। यह तीन स्टेप्स में होता है। पहले स्टेप में ब्लास्टोसिस्ट यूट्रस की परत को हल्के से छूता है। दूसरे स्टेप में वो मज़बूती से चिपक जाता है। तीसरे स्टेप में वो यूट्रस की परत के अंदर घुसने लगता है। इसी दौरान कुछ महिलाओं को हल्की स्पॉटिंग होती है जिसे इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग कहते हैं।
इम्प्लांटेशन पूरा होने के बाद एम्ब्रयो hCG हॉर्मोन बनाना शुरू करता है। यही वो हॉर्मोन है जिसकी वजह से प्रेगनेंसी टैस्ट पॉजिटिव आता है। लेकिन hCG का लेवल इतना बढ़ने में 2-3 दिन और लग सकते हैं कि टैस्ट पॉजिटिव आए।
यूट्रस हमेशा एम्ब्रयो को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं रहता। एक खास समय होता है जब यूट्रस की परत एम्ब्रयो को जोड़ने के लिए सबसे ज़्यादा तैयार होती है। इसे इम्प्लांटेशन विंडो (Implantation Window) कहते हैं।
28 दिन की साइकिल में यह विंडो आमतौर पर 20वें से 24वें दिन के बीच खुलती है। यह सिर्फ़ 24 से 48 घंटे के लिए होती है।
इस दौरान यूट्रस की परत मोटी हो जाती है, ब्लड सप्लाई बढ़ जाती है, और परत पर पाइनोपोड्स (Pinopods) नाम की छोटी-छोटी संरचनाएं बन जाती हैं जो एम्ब्रयो को पकड़ने में मदद करती हैं। अगर एम्ब्रयो इस विंडो से पहले या बाद में पहुँचता है, तो इम्प्लांटेशन की संभावना कम हो जाती है।
सभी महिलाओं को इम्प्लांटेशन के लक्षण महसूस नहीं होते। लगभग 30% महिलाओं को ही कुछ संकेत दिखते हैं।
ये लक्षण इतने हल्के होते हैं कि अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाते हैं। प्रेगनेंसी की पुष्टि के लिए टेस्ट ही सबसे भरोसेमंद तरीका है। एक बात याद रखें, इम्प्लांटेशन के लक्षण न होने का मतलब यह नहीं कि इम्प्लांटेशन नहीं हुआ। बहुत सी हेल्दी प्रेग्नेन्सीज़ (healthy pregnancies) में महिलाओं को कोई भी इम्प्लांटेशन लक्षण महसूस नहीं होता।
इम्प्लांटेशन की सफलता कई चीज़ों पर निर्भर करती है।
IVF में फर्टिलाइजेशन लैब में होता है, शरीर के अंदर नहीं। एम्ब्रयो को 3 दिन या 5 दिन तक लैब में बड़ा किया जाता है और फिर यूट्रस में ट्रांसफर किया जाता है।
पाँचवें दिन ब्लास्टोसिस्ट ट्रांसफर के बाद इम्प्लांटेशन आमतौर पर 1-2 दिन में शुरू हो जाता है क्योंकि एम्ब्रयो पहले से ही ब्लास्टोसिस्ट स्टेज पर होता है। एम्ब्रयो ट्रांसफर के बाद इम्प्लांटेशन में 3-4 दिन लग सकते हैं।
IVF में इम्प्लांटेशन की प्रक्रिया वही होती है जो नेचुरल तरीके से प्रेग्नेंट होने में होती है बस इसकी शुरुआत का तरीका अलग होता है।
इम्प्लांटेशन के बाद hCG हॉर्मोन बनना शुरू होता है। लेकिन यूरिन में इसका लेवल पकड़ में आने लायक बनने में कुछ दिन लगते हैं।
अगर आप नेचुरल प्रेगनेंसी से कोशिश कर रही हैं, तो पीरियड मिस होने के पहले दिन या उसके 1-2 दिन बाद टैस्ट करें। बहुत जल्दी टैस्ट करने से फाल्स नेगेटिव (false negative) आ सकता है।
सुबह का पहला यूरिन सबसे गाढ़ा यानी कंसन्ट्रेटेड (concentrated) होता है, इसलिए उसी से टैस्टकरें।
धूम्रपान एम्ब्रियो और यूट्रस दोनों को नुकसान पहुँचा सकता है, जिससे इम्प्लांटेशन की संभावना कम हो जाती है।
असल में implantation kab hota hai, यह फिक्स नहीं होता। ओव्यूलेशन के बाद के 6 से 12 दिन इम्प्लांटेशन के लिए बहुत जरुरी होते हैं जब भ्रूण यानी एम्ब्रीओ यूट्रस में अपनी जगह बनाने की कोशिश करता है।
अगर आपके हॉर्मोन्स बैलेंस्ड हैं और यूट्रस की परत पूरी तरह तैयार है, तो यह प्रोसेस बिना किसी परेशानी के पूरा हो जाता है।
लगातार कोशिश के बाद भी अगर गर्भधारण नहीं हो पा रहा, तो बेहतर होगा कि आप किसी फर्टिलिटी एक्सपर्ट से सलाह लें। वे अल्ट्रासाउंड या हॉर्मोन टेस्ट के ज़रिए यह पता लगा सकते हैं कि कहीं यूट्रस की परत या हॉर्मोन्स में कोई कमी तो नहीं है। बिना इंतज़ार किये अपने डॉक्टर से मिलें, सही समय लें और अपना माँ बनने का सपना पूरा करें।
आमतौर पर 6 से 12 दिन बाद। सबसे ज़्यादा मामलों में 8-10 दिन के बीच होता है।
1 से 2 दिन। यह बहुत हल्की होती है और पीरियड जैसी भारी नहीं होती।
हाँ, कई बार एम्ब्रयो इम्प्लांट नहीं हो पाता। इसकी वजह एम्ब्रयो की क्वालिटी, यूट्रस की समस्या, या हॉर्मोन असंतुलन हो सकती है।
Day 5 ब्लास्टोसिस्ट ट्रांसफर के 1-2 दिन बाद इम्प्लांटेशन शुरू हो जाता है।
पीरियड मिस होने के पहले दिन या उसके 1-2 दिन बाद। बहुत जल्दी टेस्ट करने से गलत नेगेटिव आ सकता है।