Overview
इस ब्लॉग में इनफर्टिलिटी यानी बांझपन का मतलब, इसके महिला और पुरुष दोनों से जुड़े कारण और सही समय पर जाँच कराने की जरूरत को आसान भाषा में समझाया गया है। इसमें सीमन एनालिसिस, हार्मोन जाँच, सोनोग्राफ़ी और HSG जैसी जाँचों के साथ जीवनशैली में बदलाव, दवाओं, IUI, IVF और सर्जरी जैसे इलाज के विकल्पों की जानकारी दी गई है। साथ ही, उम्र के आधार पर कब डॉक्टर से मिलना चाहिए और इनफर्टिलिटी से जुड़े मानसिक व सामाजिक दबाव को कैसे समझें, यह भी बताया गया है।
इनफर्टिलिटी यानी बांझपन को लेकर भारत में जो सबसे बड़ी और सबसे नुक़सानदेह ग़लतफ़हमी है, वो एक ही वाक्य में है - "समस्या तो औरत में होती है।"
ये सोच न सिर्फ़ ग़लत है, बल्कि इसकी वजह से आधे मामलों की असली जड़ की जाँच ही नहीं हो पाती। तो इस लेख की शुरुआत ही इस ग़लतफ़हमी को तोड़ने से करते हैं, क्योंकि आगे की हर बात इसी पर टिकी है।
पहले साफ़ कर लें कि इनफर्टिलिटी असल में है क्या।
सीधे शब्दों में - जब कोई कपल एक साल तक बिना किसी गर्भनिरोधक के, नियमित संबंध बनाने के बावजूद गर्भधारण न कर पाए, तो इसे इनफर्टिलिटी कहा जाता है।
पर यहाँ एक ज़रूरी बारीक़ी है, जो समय बचा सकती है। ये "एक साल" वाला नियम सबके लिए एक जैसा नहीं है। अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइन के मुताबिक़ अगर महिला की उम्र 35 साल से कम है तो 12 महीने बाद जाँच शुरू करनी चाहिए, पर अगर 35 या उससे ज़्यादा है तो सिर्फ़ 6 महीने बाद।
क्यों? क्योंकि उम्र के साथ फर्टिलिटी घटती है, और 35 के बाद इंतज़ार करना महँगा पड़ सकता है। इसलिए अगर आप 35 से ऊपर हैं, तो एक साल का इंतज़ार मत कीजिए।
और एक बात जो अब की परिभाषा में साफ़ है - अगर पहले से कोई ज्ञात समस्या हो (जैसे PCOS, अनियमित पीरियड्स, पुरुष में शुक्राणु की दिक़्क़त, या ट्यूब की समस्या), तो एक-छह महीने का इंतज़ार भी ज़रूरी नहीं। ऐसे में शुरू से ही जाँच करवा लेना बेहतर है।
इनफर्टिलिटी को अब एक बीमारी (disease) माना जाता है, कोई अभिशाप या किसी की "कमी" नहीं। और ये बेहद आम है - दुनिया भर में हर छह में से एक व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी इससे गुज़रता है।
अब वो आँकड़ा जो हर किसी को जानना चाहिए, और जो पूरी सोच बदल देता है।
इनफर्टिलिटी के मामलों को मोटे तौर पर तीन बराबर हिस्सों में बाँटा जा सकता है - एक-तिहाई मामलों में वजह महिला में, एक-तिहाई में पुरुष में, और बाक़ी एक-तिहाई में या तो दोनों में, या कोई साफ़ वजह नहीं मिलती।
इसे और सीधे कहें तो - लगभग 40 से 50% मामलों में पुरुष की भूमिका होती है।
यानी लगभग आधे मामले। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइन साफ़ कहती है कि दोनों पार्टनर की जाँच एक साथ होनी चाहिए - सिर्फ़ महिला की नहीं।
भारत में क्या होता है? महीनों तक सिर्फ़ महिला की जाँच और इलाज चलता है, ताने भी उसी को मिलते हैं, और पुरुष की एक साधारण सी जाँच (सीमन एनालिसिस) तक नहीं होती - जबकि वो सबसे आसान, सस्ती और अहम जाँचों में से एक है। ये सबसे बड़ी और सबसे आम गलती है।
तो अगर आप जाँच शुरू कर रहे हैं, तो पहला उसूल यही - दोनों की जाँच, साथ में।
कारणों को तीन हिस्सों में समझना आसान है - महिला से जुड़े, पुरुष से जुड़े, और साझा/अज्ञात।
गर्भधारण के लिए तीन चीज़ें ठीक होनी चाहिए - अंडाशय (ovaries), फैलोपियन ट्यूब, और गर्भाशय (uterus)। इनमें से किसी में भी दिक़्क़त कारण बन सकती है -
पुरुष में ज़्यादातर वजहें शुक्राणुओं से जुड़ी होती हैं -
कभी दोनों में हल्की-हल्की दिक़्क़तें मिलकर समस्या बनाती हैं। और कुछ मामलों में पूरी जाँच के बाद भी कोई साफ़ वजह नहीं मिलती - इसे "अनएक्सप्लेंड इनफर्टिलिटी" कहते हैं। इसका मतलब ये नहीं कि इलाज नहीं है - बल्कि इलाज लक्षणों और स्थिति के हिसाब से किया जाता है।
अच्छी बात ये है कि जाँच एक तयशुदा, समझदार क्रम में होती है - सबसे आसान और सस्ती जाँच पहले, फिर ज़रूरत के हिसाब से आगे।
इनफर्टिलिटी की सबसे बुनियादी जाँच है - इतिहास (history) और सीमन एनालिसिस। सीमन एनालिसिस शुक्राणुओं की संख्या, गतिशीलता और बनावट बताता है।
ये पहले इसलिए, क्योंकि ये सबसे आसान, सस्ती और तेज़ जाँच है - और लगभग आधे मामलों की जड़ यहीं मिल सकती है। इसे टालना पूरी जाँच को अधूरा छोड़ देता है।
महिला में मुख्य रूप से देखा जाता है - ओव्यूलेशन ठीक हो रहा है या नहीं, ट्यूब खुली हैं या नहीं, और गर्भाशय की स्थिति। इसके लिए -
कौन सी जाँच कब ज़रूरी है, ये आपकी स्थिति देखकर डॉक्टर तय करते हैं। सारी जाँचें सबके लिए ज़रूरी नहीं होतीं।
एक बात ध्यान दें - बिना क्रम के, एक साथ हर जाँच करवा लेना अक्सर पैसा और उलझन दोनों बढ़ाता है। सही तरीक़ा है - विशेषज्ञ की सलाह से, सही क्रम में जाँच।
इलाज पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि वजह क्या मिली। और यहाँ सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी ये है कि "इनफर्टिलिटी का इलाज मतलब IVF।" ऐसा नहीं है।
इलाज कई परतों में होता है, और असली वजह का इलाज सबसे पहले किया जाता है -
जीवनशैली और बुनियादी इलाज - वज़न ठीक करना, धूम्रपान-शराब छोड़ना, थायरॉइड या शुगर जैसी समस्या का इलाज। कई बार इतने से ही बात बन जाती है।
दवाएँ - जैसे ओव्यूलेशन न होने पर उसे शुरू करने वाली दवाएँ।
IUI (इंट्रायूटरिन इनसेमिनेशन) - कुछ मामलों में शुक्राणुओं को सीधे गर्भाशय तक पहुँचाना।
IVF और उससे जुड़ी तकनीकें - जब बाक़ी तरीक़े काम न करें या स्थिति ऐसी हो (जैसे दोनों ट्यूब बंद हों)। IVF एक विकल्प है, पहला या इकलौता रास्ता नहीं।
सर्जरी - कुछ स्थितियों में, जैसे कोई रुकावट या संरचना की समस्या।
मतलब ये कि रास्ते कई हैं, और ज़्यादातर मामलों में कुछ न कुछ किया जा सकता है। सही इलाज वो है जो आपकी असली वजह पर आधारित हो।
इनफर्टिलिटी सिर्फ़ एक मेडिकल स्थिति नहीं, एक भावनात्मक सफ़र भी है। और भारत में इसके साथ सामाजिक दबाव, ताने, और अकेलापन भी जुड़ जाता है - ख़ासकर महिला के लिए।
ये सब महसूस करना कमज़ोरी नहीं है। और ये बोझ अकेले या सिर्फ़ एक पार्टनर के कंधों पर नहीं होना चाहिए। ये दोनों का साझा सफ़र है। ज़रूरत लगे तो काउंसलिंग या सहयोग माँगना पूरी तरह वाजिब है।
और सबसे ज़रूरी - दोनों पार्टनर साथ जाएँ।