जब काफी समय तक कोशिश करने के बाद भी नेचुरल तरीके से गर्भधारण यानी कंसीव (conceive) नहीं हो पाता और जाँचों में कोई गंभीर समस्या भी सामने नहीं आती, तब डॉक्टर अक्सर IUI (Intrauterine Insemination) की सलाह देते हैं।
फर्टिलिटी ट्रीटमेंट में इसे अक्सर पहला और दूसरे ट्रीटमेंट के मुकाबले संतान प्राप्ति का आसान तरीका माना जाता है।
IUI process in hindi को समझें तो इस प्रक्रिया में चुने हुए स्वस्थ स्पर्म को सीधे गर्भाशय यानी यूट्रस (uterus) के अंदर ट्रांसफर कर दिया जाता है, ताकि वे एग के अधिक करीब पहुँच सकें। इससे स्पर्म को एग तक पहुँचने का लंबा सफर तय नहीं करना पड़ता और कंसीव करने की संभावना थोड़ी बढ़ सकती है।
ध्यान रखने वाली बात यह है कि फर्टिलाइजेशन (fertilization) यानी स्पर्म और एग का मिलना अभी भी शरीर के अंदर ही होता है। इसलिए इसे प्राकृतिक गर्भधारण के सबसे करीब माने जाने वाले ट्रीटमेंट में से एक माना जाता है।
कई कपल्स यह सोचकर आते हैं कि अब शायद IVF ही एकमात्र विकल्प है, लेकिन कई मामलों में IUI से ही कंसीव हो जाता है।
इस आर्टिकल में हम विस्तार से समझेंगे कि IUI क्या है, यह किन लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है, इसकी तैयारी कैसे होती है, प्रक्रिया के दिन क्या होता है और सफलता की संभावना कितनी होती है।
IUI का पूरा नाम इंट्रा-यूटेराइन इनसेमिनेशन (Intrauterine Insemination) होता है।
प्राकृतिक गर्भधारण में स्पर्म को योनि मतलब वेजाइना (vegina) से यूट्रस और फिर यूट्रस से फैलोपियन ट्यूब (fallopian tubes) तक पहुँचना पड़ता है। इस लंबी यात्रा के दौरान बहुत से स्पर्म रास्ते में ही कमजोर पड़ जाते हैं या आगे नहीं बढ़ पाते।
IUI Process में डॉक्टर तैयार किए गए स्वस्थ स्पर्म को सीधे यूट्रस के अंदर ट्रांसफर देते हैं। इससे स्पर्म एग के ज्यादा करीब पहुँच जाते हैं और उन्हें पूरा रास्ता तय नहीं करना पड़ता।
हालाँकि इसके बाद की प्रक्रिया पूरी तरह नेचुरल प्रेगनेंसी की तरह ही रहती है। स्पर्म को अभी भी फैलोपियन ट्यूब तक जाना होता है और वहीं एग से मिलकर फर्टिलाइजेशन होता है।
नेचुरल प्रेगनेंसी में पार्टनर के साथ शारीरिक संबंध बनाने के बाद स्पर्म वेजाइना में पहुँचते हैं। वहाँ से वे यूट्रस के मुँह यानी सर्विक्स (cervix) को पार करते हुए यूट्रस में जाते हैं। इसके बाद वे फैलोपियन ट्यूब में पहुँचते हैं जहाँ एग से मिलकर फर्टिलाइजेशन होता है।
इस पूरी जर्नी में लाखों स्पर्म में से केवल कुछ ही स्पर्म एग तक पहुँच पाते हैं।
वहीं, IUI में पहले स्पर्म को लैब में प्रोसेस किया जाता है। इस प्रक्रिया को स्पर्म वॉश (sperm wash) कहते हैं। इसमें सीमेन के तरल यानी लिक्विड वाले हिस्से को अलग करके सबसे एक्टिव और हेल्दी स्पर्म को चुना जाता है। इसके बाद एक पतली कैथेटर (catheter) की मदद से इन्हें सीधे यूट्रस में ट्रांसफर कर दिया जाता है।
इसके बाद स्पर्म स्वाभाविक तरीके यानी जैसे नेचुरल प्रेगनेंसी की तरह ही फैलोपियन ट्यूब की ओर बढ़ते हैं और एग से मिलते हैं।
हर कपल के लिए IUI उपयुक्त नहीं होता, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है।
अगर स्पर्म काउंट या मोटिलिटी (motility) सामान्य से थोड़ी कम हो, तो IUI में लैब में बेहतर स्पर्म चुनकर यूट्रस में ट्रांसफर किये जाते हैं। इससे कंसीव करने की संभावना कुछ बढ़ सकती है।
कुछ महिलाओं में सर्विक्स का म्यूकस स्पर्म के लिए सही नहीं होता। इससे स्पर्म को यूट्रस में प्रवेश करने में कठिनाई हो सकती है। इस कंडीशन में IUI के द्वारा स्पर्म सीधे यूट्रस में ट्रांसफर कर दिए जाते हैं, इसलिए यह रुकावट कम हो जाती है।
कई बार सभी जाँचें सामान्य आती हैं लेकिन फिर भी कंसीव करना संभव नहीं हो पाता। इस कंडीशन को अनएक्सप्लेंड इन्फर्टिलिटी (Unexplained Infertility) यानी ऐसी निःसंतानता जिसका मेडिकल साइंस कोई निश्चित कारण पता नहीं बताया जा सकता, कहा जाता है। ऐसे मामलों में IUI को शुरुआती उपचार के रूप में आजमाया जाता है।
अगर ओवुलेशन रेगुलर नहीं है, जैसे हल्के PCOS के मामलों में, तो दवाइयों के साथ IUI करने से अच्छे परिणाम मिल सकते हैं।
कुछ कंडीशन में डोनर स्पर्म (donor sperm) का उपयोग करके भी IUI किया जाता है।
IUI प्रोसेस से पहले कुछ जरूरी जाँचें और तैयारी की जाती है ताकि IUI सही समय पर और बेहतर तरीके से हो सके।
IUI का दिन आमतौर पर बहुत लंबा या कॉम्प्लेक्स नहीं होता। IUI Process आमतौर पर 5 से 10 मिनट में पूरा हो जाता है।
IUI process के दौरान अधिकतर महिलाओं को हल्की सी ऐंठन या पीरियड जैसी असहजता यानी अनकंफर्ट (uncomfort) महसूस हो सकता है। कई महिलाओं को कोई विशेष दर्द भी महसूस नहीं होता।
IUI के बाद लगभग 10 से 15 मिनट आराम करने के लिए कहा जाता है। इसके बाद अधिकांश महिलाएँ सामान्य कामकाज कर सकती हैं।
आईयूआई के बाद से लेकर प्रेगनेंसी कन्फर्म होने तक के समय को टू-वीक वेट (Two Week Wait) कहते हैं। इन दो हफ़्तों के बाद प्रेगनेंसी टेस्ट करना होता है। आमतौर पर IUI Process के 14 से 15 दिन बाद प्रेगनेंसी टेस्ट करने की सलाह दी जाती है। इससे पहले टेस्ट करने पर गलत परिणाम आने की संभावना रहती है। लेकिन इस दौरान कुछ विशेष सावधानियाँ बरतने की जरुरत होती है।
IUI में पहली ही बार सफलता मिल जाए, ऐसा जरूरी नहीं है। अधिकतर मामलों में डॉक्टर 3 से 4 साइकिल तक IUI करने की सलाह देते हैं।
अगर इतने प्रयासों के बाद भी गर्भधारण नहीं होता, तो आगे IVF जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि IUI में फर्टिलाइजेशन शरीर के अंदर ही होता है और इस प्रक्रिया को पूरी तरह कंट्रोल करना संभव नहीं होता जबकि IVF में फर्टिलाइजेशन महिला के शरीर के बाहर लैब में होता है।
IUI की सफलता कई अलग-अलग कारकों पर निर्भर करती है, इसलिए हर कपल में इसकी संभावना अलग हो सकती है।
IUI Process को अक्सर फर्टिलिटी ट्रीटमेंट का फर्स्ट स्टेप माना जाता है। यह उन कपल्स के लिए उपयोगी हो सकता है जिनमें गंभीर समस्या नहीं है, लेकिन फिर भी नेचुरल तरीके से कंसीव नहीं हो पा रहा होता। अन्य ART आर्टिफिशियल रिप्रोडक्टिव ट्रीटमेंट (Artificial Reproductive Treatment) की तुलना में IUI Process आसान होता है।
हालाँकि IUI Process की हर साइकिल में सफल होने की संभावना कम होती है, इसलिए कई बार एक से अधिक साइकिल की आवश्यकता पड़ सकती है।
लेकिन यदि IUI से गर्भधारण न हो पाए, तो आगे IVF जैसे विकल्प उपलब्ध रहते हैं।