कई लोग यह महसूस करते हैं कि उनकी यौन इच्छा पहले जैसी नहीं रही, लेकिन वे इसे ठीक से समझ या बता नहीं पाते। यौन इच्छा यानी लिबिडो को लेकर हम अक्सर दो तरीके से सोचते हैं कि या तो सब ठीक है, या फिर सब खत्म। जबकि असल ज़िंदगी में लिबिडो का कोई ऑन-ऑफ बटन नहीं होता। यह धीरे-धीरे बदलती है, हालात के हिसाब से ढलती है, और कई बार बिना किसी बीमारी के भी कम या ज़्यादा हो जाती है। आगे हम यही समझेंगे कि लिबिडो क्या है, इसमें बदलाव क्यों होता है, और कब इसे लेकर चिंता करना ज़रूरी होता है और कब नहीं।
लिबिडो (libido) का मतलब होता है यौन इच्छा, यानी सेक्स को लेकर किसी व्यक्ति की रुचि या चाह। लेकिन इसे सिर्फ “सेक्स की भूख” समझना अधूरा सच है। लिबिडो असल में इस बात का संकेत होती है कि आपका शरीर और दिमाग इस समय किस हालत में हैं।
जब आप मानसिक रूप से ठीक महसूस करते हैं, शरीर थका हुआ नहीं होता और भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस होता है, तब यौन इच्छा अपने आप आती है।
इसके उलट, जब दिमाग लगातार किसी चिंता में उलझा रहता है या शरीर लगातार थकान में जी रहा होता है, तो सबसे पहले जो चीज़ पीछे जाती है, वह यौन इच्छा ही होती है।
यह समझना बहुत ज़रूरी है कि नॉर्मल लिबिडो जैसी कोई एक चीज़ नहीं होती। किसी की सेक्स की इच्छा ज़्यादा हो सकती है, किसी की कम और दोनों ही तब तक नॉर्मल हैं, जब तक व्यक्ति खुद उससे परेशान न हो।
जब किसी कपल को गर्भधारण में दिक्कत आने लगती है, तो ध्यान अक्सर सिर्फ रिपोर्ट्स, टेस्ट और इलाज पर चला जाता है, जबकि यौन इच्छा यानी लिबिडो को एक “छोटी समस्या” मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
असल में लिबिडो और निःसंतानता का रिश्ता सीधा नहीं, लेकिन महत्वपूर्ण ज़रूर होता है, क्योंकि यह गर्भधारण की पूरी प्रक्रिया को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकता है।
लिबिडो बेहतर करने का मतलब किसी एक दवा या उपाय से “तुरंत ठीक” करना नहीं होता, बल्कि यह समझना होता है कि इस समय शरीर और दिमाग को किस तरह के सहारे की ज़रूरत है। ज़्यादातर मामलों में छोटे लेकिन सही बदलाव, लगातार और धैर्य के साथ किए जाएँ, तो यौन इच्छा धीरे-धीरे स्वाभाविक रूप से बेहतर हो सकती है।
जब शरीर को रोज़ पर्याप्त नींद और रिकवरी मिलती है, तो हार्मोन संतुलन सुधरता है और यौन इच्छा को वापस आने का मौका मिलता है।
लगातार तनाव में दिमाग यौन प्रतिक्रिया को दबा देता है, इसलिए तनाव कम करना लिबिडो सुधारने की सबसे ज़रूरी शर्त होती है।
बहुत ज़्यादा थकाने वाले व्यायाम की बजाय नियमित हल्की गतिविधि शरीर में रक्त प्रवाह और ऊर्जा को बेहतर करती है, जो लिबिडो के लिए फायदेमंद होती है।
जब पार्टनर के साथ खुलकर बात होती है और भावनात्मक सुरक्षा महसूस होती है, तो यौन इच्छा स्वाभाविक रूप से बेहतर होने लगती है।
अगर यौन संबंध के दौरान दर्द या असहजता है, तो उसका इलाज ज़रूरी है, क्योंकि दर्द का डर लिबिडो को अपने आप दबा देता है।
ये आदतें हार्मोन, नसों और रक्त प्रवाह को प्रभावित करती हैं, जिससे यौन इच्छा कमजोर पड़ सकती है।
जब सेक्स को आनंद की बजाय एग्जाम बना लिया जाता है, तो डर इच्छा पर हावी हो जाता है, इसलिए सहजता और भरोसा ज़्यादा ज़रूरी होता है।
अगर लाइफस्टाइल में सुधार के बाद भी लिबिडो में सुधार न दिखे, तो हार्मोन या दूसरी मेडिकल जाँच से मदद मिल सकती है।
लिबिडो सिर्फ सेक्स की इच्छा तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह शरीर, दिमाग और रिश्ते तीनों की स्थिति को दर्शाती है। इसीलिए जब लिबिडो में बदलाव आता है, तो उसका असर सिर्फ सेक्स लाइफ पर ही नहीं, बल्कि प्रेगनेंसी की कोशिश और आपसी जुड़ाव पर भी पड़ सकता है।
अगर लिबिडो में कमी के साथ प्रेगनेंसी में भी दिक्कत आ रही हो, तो दोनों को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ समझकर देखना ज़्यादा सही रहता है।
सबसे अहम बात यह है कि लिबिडो के बदलाव को शर्म या चुप्पी से नहीं, बल्कि समझ और सही समय पर सलाह से देखा जाए जिससे कि शरीर और मन, दोनों को ज़रूरी सहारा मिल सके।
लिबिडो कम होना सीधे प्रेग्नेंसी को नहीं रोकता, लेकिन इससे शारीरिक संबंध कम हो सकते हैं, जिससे सही समय पर गर्भधारण की संभावना घट सकती है।
हाँ, प्रेगनेंसी को लेकर बढ़ा हुआ तनाव, टाइमिंग का दबाव और चिंता कई कपल्स में लिबिडो को अस्थायी रूप से कम कर सकता है।
लिबिडो सीधे ओव्यूलेशन को कंट्रोल नहीं करती, लेकिन तनाव और हार्मोनल चेंज जो लिबिडो को प्रभावित करते हैं, इसका ओव्यूलेशन पर भी असर पड़ सकता है।
अगर पुरुषों में लिबिडो कम होने के पीछे हार्मोनल समस्या या लंबे समय का तनाव हो, तो वही कारण स्पर्म हेल्थ को भी प्रभावित कर सकता है।
हाँ, क्योंकि निःसंतानता के इलाज के दौरान बढ़ा हुआ मानसिक दबाव लिबिडो को और कम कर सकता है, जिससे एक दुष्चक्र बन सकता है।