स्पर्म यानी शुक्राणु पुरुष की प्रजनन कोशिका यानी फ़र्टिलिटी सेल है जो महिला के एग को फर्टिलाइज़ करके नई जीवन की शुरुआत करती है। जब किसी पुरुष के सीमेन में स्पर्म की संख्या सामान्य से कम होती है, तो इसे लो स्पर्म काउंट या ओलिगोस्पर्मिया (Oligospermia) कहते हैं। यह मेल इनफर्टिलिटी का सबसे आम कारण है। कई कपल जो लंबे समय से बच्चे की प्लानिंग कर रहे हैं, उन्हें सीमेन एनालिसिस के बाद पता चलता है कि पुरुष पार्टनर का स्पर्म काउंट कम है। इससे निराशा तो होती है, लेकिन अच्छी बात यह है कि आधुनिक मेडिकल साइंस में लो स्पर्म काउंट के कई प्रभावी इलाज उपलब्ध हैं। चलिए गहराई से समझते हैं कि Sperm kya hota hai? लो स्पर्म काउंट के कारण क्या हैं, इसका पुरुष फर्टिलिटी पर क्या असर होता है, और कौन से उपचार विकल्प उपलब्ध हैं।
Sperm kya hota hai को समझना बेहद ज़रूरी है। स्पर्म यानी शुक्राणु पुरुष का रिप्रोडक्टिव सेल है जो टेस्टिकल्स यानी अंडकोष में बनता है। हर स्पर्म एक माइक्रोस्कोपिक सेल है जिसमें तीन मुख्य हिस्से होते हैं।
इसमें न्यूक्लियस होता है जिसमें 23 क्रोमोसोम्स होते हैं यानी इससे होने वाली संतान को मिलने वाली आधी जेनेटिक जानकारी। हेड के ऊपर एक्रोसोम नामक कैप होती है जिसमें एंजाइम्स होते हैं जो एग की बाहरी परत को तोड़ने में मदद करते हैं।
इसमें माइटोकॉन्ड्रिया होते हैं जो स्पर्म को तैरने के लिए एनर्जी प्रदान करते हैं। यह स्पर्म का पावरहाउस है।
यह फ्लैजेलम कहलाती है और इसकी लहरदार गति से स्पर्म आगे बढ़ता है। एक स्वस्थ स्पर्म लगभग 25 से 30 माइक्रोमीटर प्रति सेकंड की स्पीड से तैर सकता है।
स्पर्म बनने की प्रक्रिया को स्पर्मेटोजेनेसिस कहते हैं, जो टेस्टिकल्स की सेमिनिफेरस ट्यूब्यूल्स में होती है। यह पूरी प्रक्रिया लगभग 74 दिन लेती है। इसमें कई स्टेज होते हैं।
यह जटिल हॉर्मोनल एक्सिस किसी भी स्तर पर गड़बड़ाने से स्पर्म प्रोडक्शन प्रभावित होता है।
WHO (World Health Organization) के अनुसार, नॉर्मल स्पर्म काउंट 15 मिलियन स्पर्म प्रति मिलीलीटर सीमेन या उससे ज़्यादा होता है। जब स्पर्म काउंट इससे कम हो, तो इसे ओलिगोस्पर्मिया कहते हैं।
स्पर्म काउंट के साथ-साथ स्पर्म मोटिलिटी (गतिशीलता) और मॉर्फोलॉजी (आकार) भी फर्टिलिटी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुल मिलाकर स्पर्म पैरामीटर्स को देखकर ही मेल फर्टिलिटी का मूल्यांकन किया जाता है।
लो स्पर्म काउंट के बहुत से अलग अलग कारण हैं और इन्हें मुख्य रूप से तीन कैटेगरी में बांटा जाता है:
लो स्पर्म काउंट नेचुरल कंसेप्शन को मुश्किल बना देता है, लेकिन असंभव नहीं। फर्टिलिटी सिर्फ काउंट पर निर्भर नहीं होती। स्पर्म क्वालिटी के तीन पिलर हैं।
सीमेन में कितने स्पर्म हैं।
कितने स्पर्म सही तरीके से आगे बढ़ रहे हैं यानी प्रोग्रेसिव मोटिलिटी कैसी है।
कितने स्पर्म सामान्य आकार के हैं
अगर काउंट कम है लेकिन मोटिलिटी और मॉर्फोलॉजी अच्छी है, तो प्रेगनेंसी की संभावना बढ़िया होती है। माइल्ड ओलिगोस्पर्मिया में नेचुरल कंसेप्शन संभव है, हालांकि समय लग सकता है। सीवियर ओलिगोस्पर्मिया या एज़ूस्पर्मिया में असिस्टेड रिप्रोडक्टिव तकनीकों जैसे IVF, IUI इत्यादि की ज़रूरत पड़ सकती है।
यह गोल्ड स्टैंडर्ड टेस्ट है। 2 से 7 दिन के एब्सटीनेंस यानी सेक्सुअल एक्टिविटी (सेक्स अथवा मस्टरबेशन के बिना रहना) के बाद सैंपल दिया जाता है। WHO 2021 के मानकों के अनुसार जांच होती है।
सीरम टेस्टोस्टेरोन, FSH, LH, प्रोलैक्टिन, थायरॉइड फंक्शन टेस्ट।
वैरिकोसील या अन्य स्ट्रक्चरल समस्याओं को देखने के लिए।
सीवियर ओलिगोस्पर्मिया या एज़ूस्पर्मिया में कैरियोटाइप, Y क्रोमोसोम माइक्रोडिलीशन टेस्ट।
एज़ूस्पर्मिया में यह पता लगाने के लिए कि स्पर्म बन रहे हैं या नहीं।
लो स्पर्म काउंट के इलाज का तरीका उसके कारण पर निर्भर करता है।
ICSI ने लो स्पर्म काउंट के इलाज में क्रांति ला दी है। इसमें सिर्फ एक स्वस्थ स्पर्म की ज़रूरत होती है। इसका सक्सेस रेट 60 से 80% तक हो सकती है, जो स्पर्म क्वालिटी, महिला की उम्र, और एग क्वालिटी पर निर्भर करती है। फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट स्पर्म सेलेक्शन के लिए एडवांस्ड तकनीकें इस्तेमाल करते हैं जैसे IMSI (इंट्रासाइटोप्लाज़्मिक मॉर्फोलॉजिकली सिलेक्टेड स्पर्म इंजेक्शन) या PICSI (फिज़ियोलॉजिकल ICSI)।
Sperm kya hota hai यह समझना सिर्फ बायोलॉजी का सवाल नहीं, बल्कि आपकी फर्टिलिटी जर्नी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्पर्म वह माइक्रोस्कोपिक सेल है जो पिता की आधी जेनेटिक जानकारी लेकर नई ज़िंदगी को संभव बनाती है। लो स्पर्म काउंट एक चुनौती ज़रूर है, लेकिन आज के युग में यह अनसुलझी समस्या नहीं रही। चाहे हॉर्मोनल इलाज हो, सर्जरी हो, या IVF, ICSI जैसी एडवांस्ड तकनीकें, परिस्थिति का समाधान संभव है। सबसे महत्वपूर्ण है सही समय पर सीमेन एनालिसिस करवाना, कारण का पता लगाना, और अनुभवी फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से परामर्श लेना। याद रखें, केवल एक स्वस्थ स्पर्म से भी पिता बनने का सपना पूरा हो सकता है।
स्पर्म यानी शुक्राणु पुरुष की रिप्रोडक्टिव सेल है जो टेस्टिकल्स में बनती है। यह महिला के एग को फर्टिलाइज़ करके प्रेगनेंसी शुरू करती है।
WHO के अनुसार, नॉर्मल स्पर्म काउंट 15 मिलियन प्रति मिलीलीटर या उससे ज़्यादा होना चाहिए। इससे कम होने पर लो स्पर्म काउंट या ओलिगोस्पर्मिया कहते हैं।
वैरिकोसील, हॉर्मोनल असंतुलन, इंफेक्शन, जेनेटिक फैक्टर्स, मोटापा, धूम्रपान, शराब, और तनाव मुख्य कारण हैं।
हाँ, माइल्ड केसेस में नेचुरली संभव है। सीवियर केसेस में IVF या ICSI से सिर्फ एक स्वस्थ स्पर्म से भी पिता बना जा सकता है।
स्वस्थ वजन बनाए रखें, धूम्रपान और शराब छोड़ें, पौष्टिक आहार लें, नियमित व्यायाम करें, तनाव कम करें, और एंटीऑक्सिडेंट सप्लीमेंट्स लें।
ICSI में एक स्पर्म को सीधे अंडे में इंजेक्ट किया जाता है। यह सीवियर ओलिगोस्पर्मिया या खराब स्पर्म क्वालिटी में सबसे प्रभावी तकनीक है।
स्पर्म प्रोडक्शन साइकिल 74 दिन की होती है, इसलिए लाइफस्टाइल चेंज या ट्रीटमेंट का असर 3-6 महीने में दिखता है।