लो स्पर्म काउंट क्या है? कारण और समाधान (Low Sperm Count in Hindi)

Last updated: December 26, 2025

Overview

स्पर्म यानी शुक्राणु पुरुष की प्रजनन कोशिका यानी फ़र्टिलिटी सेल है जो महिला के एग को फर्टिलाइज़ करके नई जीवन की शुरुआत करती है। जब किसी पुरुष के सीमेन में स्पर्म की संख्या सामान्य से कम होती है, तो इसे लो स्पर्म काउंट या ओलिगोस्पर्मिया (Oligospermia) कहते हैं। यह मेल इनफर्टिलिटी का सबसे आम कारण है। कई कपल जो लंबे समय से बच्चे की प्लानिंग कर रहे हैं, उन्हें सीमेन एनालिसिस के बाद पता चलता है कि पुरुष पार्टनर का स्पर्म काउंट कम है। इससे निराशा तो होती है, लेकिन अच्छी बात यह है कि आधुनिक मेडिकल साइंस में लो स्पर्म काउंट के कई प्रभावी इलाज उपलब्ध हैं। चलिए गहराई से समझते हैं कि Sperm kya hota hai? लो स्पर्म काउंट के कारण क्या हैं, इसका पुरुष फर्टिलिटी पर क्या असर होता है, और कौन से उपचार विकल्प उपलब्ध हैं।

स्पर्म क्या होता है? (Sperm kya hota hai in Hindi)

Sperm kya hota hai को समझना बेहद ज़रूरी है। स्पर्म यानी शुक्राणु पुरुष का रिप्रोडक्टिव सेल है जो टेस्टिकल्स यानी अंडकोष में बनता है। हर स्पर्म एक माइक्रोस्कोपिक सेल है जिसमें तीन मुख्य हिस्से होते हैं।

हेड (सिर):

इसमें न्यूक्लियस होता है जिसमें 23 क्रोमोसोम्स होते हैं यानी इससे होने वाली संतान को मिलने वाली आधी जेनेटिक जानकारी। हेड के ऊपर एक्रोसोम नामक कैप होती है जिसमें एंजाइम्स होते हैं जो एग की बाहरी परत को तोड़ने में मदद करते हैं।

मिडपीस (मध्य भाग):

इसमें माइटोकॉन्ड्रिया होते हैं जो स्पर्म को तैरने के लिए एनर्जी प्रदान करते हैं। यह स्पर्म का पावरहाउस है।

टेल (पूंछ):

यह फ्लैजेलम कहलाती है और इसकी लहरदार गति से स्पर्म आगे बढ़ता है। एक स्वस्थ स्पर्म लगभग 25 से 30 माइक्रोमीटर प्रति सेकंड की स्पीड से तैर सकता है।

स्पर्म प्रोडक्शन की प्रक्रिया यानी स्पर्मेटोजेनेसिस

स्पर्म बनने की प्रक्रिया को स्पर्मेटोजेनेसिस कहते हैं, जो टेस्टिकल्स की सेमिनिफेरस ट्यूब्यूल्स में होती है। यह पूरी प्रक्रिया लगभग 74 दिन लेती है। इसमें कई स्टेज होते हैं।

  • प्राइमरी स्पर्म सेल्स (स्पर्मेटोगोनिया) माइटोसिस से विभाजित होती हैं।
  • फिर मीओसिस के दो चरणों से गुज़रकर हैप्लॉइड सेल्स बनती हैं।
  • अंत में ये सेल्स परिपक्व स्पर्म में बदल जाती हैं और एपिडिडायमिस में स्टोर होती हैं।

हॉर्मोनल रेगुलेशन

  • हाइपोथैलेमस से GnRH (गोनैडोट्रोपिन-रिलीज़िंग हॉर्मोन)
  • पिट्यूटरी ग्लैंड से FSH (फॉलिकल-स्टिम्युलेटिंग हॉर्मोन) और LH (ल्यूटिनाइज़िंग हॉर्मोन)
  • टेस्टिकल्स में सर्टोली सेल्स और लेडिग सेल्स
  • टेस्टोस्टेरोन का प्रोडक्शन

यह जटिल हॉर्मोनल एक्सिस किसी भी स्तर पर गड़बड़ाने से स्पर्म प्रोडक्शन प्रभावित होता है।

लो स्पर्म काउंट क्या है? (What is Low Sperm Count)

WHO (World Health Organization) के अनुसार, नॉर्मल स्पर्म काउंट 15 मिलियन स्पर्म प्रति मिलीलीटर सीमेन या उससे ज़्यादा होता है। जब स्पर्म काउंट इससे कम हो, तो इसे ओलिगोस्पर्मिया कहते हैं।

ओलिगोस्पर्मिया की ग्रेडिंग

  • माइल्ड ओलिगोस्पर्मिया: 10-15 मिलियन/ml
  • मॉडरेट ओलिगोस्पर्मिया: 5-10 मिलियन/ml
  • सीवियर ओलिगोस्पर्मिया: 5 मिलियन/ml से कम
  • एज़ूस्पर्मिया: सीमेन में स्पर्म बिल्कुल नहीं (0)

स्पर्म काउंट के साथ-साथ स्पर्म मोटिलिटी (गतिशीलता) और मॉर्फोलॉजी (आकार) भी फर्टिलिटी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुल मिलाकर स्पर्म पैरामीटर्स को देखकर ही मेल फर्टिलिटी का मूल्यांकन किया जाता है।

लो स्पर्म काउंट के कारण

लो स्पर्म काउंट के बहुत से अलग अलग कारण हैं और इन्हें मुख्य रूप से तीन कैटेगरी में बांटा जाता है:

प्री-टेस्टिक्युलर कारण (हॉर्मोनल समस्याएं)

  • हाइपोगोनैडोट्रोपिक हाइपोगोनैडिज़्म: इसमें पिट्यूटरी ग्लैंड या हाइपोथैलेमस ठीक से FSH और LH नहीं बनाते, जिससे टेस्टिकल्स को सिग्नल नहीं मिलता।
  • हाइपरप्रोलैक्टिनीमिया: प्रोलैक्टिन हॉर्मोन का बढ़ना टेस्टोस्टेरोन प्रोडक्शन को दबा देता है।
  • थायरॉइड डिसऑर्डर: हाइपोथाइरॉइडिज़्म या हाइपरथायरॉइडिज़्म दोनों ही स्पर्म प्रोडक्शन को प्रभावित करते हैं।

टेस्टिक्युलर कारण (टेस्टिकल्स की समस्याएं)

  • वैरिकोसील: यह टेस्टिकल्स की नसों में सूजन है। लगभग 40% लो स्पर्म काउंट केसेस में वैरिकोसील पाई जाती है। यह टेस्टिकल्स के तापमान को बढ़ा देती है और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाती है।
  • क्रिप्टोर्किडिज़्म: जन्म से ही अगर टेस्टिकल्स स्क्रोटम में नहीं उतरे, तो स्पर्म प्रोडक्शन प्रभावित होता है।
  • इंफेक्शन: एपिडिडायमो-ऑर्काइटिस, STIs (सेक्शुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन्स) टेस्टिकल्स को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
  • जेनेटिक फैक्टर्स: क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (47,XXY), Y क्रोमोसोम माइक्रोडिलीशन जैसी जेनेटिक समस्याएं।
  • कीमोथेरेपी और रेडिएशन: कैंसर का इलाज स्पर्म प्रोडक्शन को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकता है।

पोस्ट-टेस्टिक्युलर कारण (स्पर्म ट्रांसपोर्ट की समस्याएं)

  • एजेक्युलेटरी डक्ट ऑब्सट्रक्शन: स्पर्म के बाहर निकलने का रास्ता ब्लॉक होना।
  • वास डिफरेंस की एब्सेंस या ब्लॉकेज: कभी-कभी जन्मजात या इंफेक्शन के बाद।
  • रेट्रोग्रेड इजैक्युलेशन: सीमेन आगे न निकलकर ब्लैडर में चला जाता है। यह डायबिटीज या प्रोस्टेट सर्जरी के बाद हो सकता है।

लाइफस्टाइल और एनवायरनमेंटल फैक्टर्स

  • धूम्रपान और शराब: ये ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाते हैं और स्पर्म डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं।
  • मोटापा: BMI 30 से ऊपर होने पर टेस्टोस्टेरोन घटता है और एस्ट्रोजन बढ़ता है।
  • अत्यधिक गर्मी: लैपटॉप गोद में रखना, टाइट अंडरवियर पहनना, सौना, हॉट टब, ये सब टेस्टिकल्स के तापमान को बढ़ाते हैं।
  • स्टेरॉयड्स और ड्रग्स: एनाबॉलिक स्टेरॉयड्स, मारिजुआना स्पर्म प्रोडक्शन को दबा देते हैं।
  • एनवायरनमेंटल टॉक्सिन्स: पेस्टिसाइड्स, हेवी मेटल्स (लेड, मर्करी), प्लास्टिक में पाए जाने वाले फ़थैलेट्स।
  • स्ट्रेस: क्रॉनिक स्ट्रेस कॉर्टिसोल बढ़ाता है जो टेस्टोस्टेरोन को सप्रेस करता है।

लो स्पर्म काउंट और फर्टिलिटी (Low Sperm Count and Fertility)

लो स्पर्म काउंट नेचुरल कंसेप्शन को मुश्किल बना देता है, लेकिन असंभव नहीं। फर्टिलिटी सिर्फ काउंट पर निर्भर नहीं होती। स्पर्म क्वालिटी के तीन पिलर हैं।

काउंट (Concentration):

सीमेन में कितने स्पर्म हैं।

मोटिलिटी (Motility):

कितने स्पर्म सही तरीके से आगे बढ़ रहे हैं यानी प्रोग्रेसिव मोटिलिटी कैसी है।

मॉर्फोलॉजी (Morphology):

कितने स्पर्म सामान्य आकार के हैं

अगर काउंट कम है लेकिन मोटिलिटी और मॉर्फोलॉजी अच्छी है, तो प्रेगनेंसी की संभावना बढ़िया होती है। माइल्ड ओलिगोस्पर्मिया में नेचुरल कंसेप्शन संभव है, हालांकि समय लग सकता है। सीवियर ओलिगोस्पर्मिया या एज़ूस्पर्मिया में असिस्टेड रिप्रोडक्टिव तकनीकों जैसे IVF, IUI इत्यादि की ज़रूरत पड़ सकती है।

लो स्पर्म काउंट की डायग्नोसिस

सीमेन एनालिसिस:

यह गोल्ड स्टैंडर्ड टेस्ट है। 2 से 7 दिन के एब्सटीनेंस यानी सेक्सुअल एक्टिविटी (सेक्स अथवा मस्टरबेशन के बिना रहना) के बाद सैंपल दिया जाता है। WHO 2021 के मानकों के अनुसार जांच होती है।

हॉर्मोन टेस्ट:

सीरम टेस्टोस्टेरोन, FSH, LH, प्रोलैक्टिन, थायरॉइड फंक्शन टेस्ट।

स्क्रोटल अल्ट्रासाउंड:

वैरिकोसील या अन्य स्ट्रक्चरल समस्याओं को देखने के लिए।

जेनेटिक टेस्टिंग:

सीवियर ओलिगोस्पर्मिया या एज़ूस्पर्मिया में कैरियोटाइप, Y क्रोमोसोम माइक्रोडिलीशन टेस्ट।

टेस्टिक्युलर बायोप्सी:

एज़ूस्पर्मिया में यह पता लगाने के लिए कि स्पर्म बन रहे हैं या नहीं।

लो स्पर्म काउंट का इलाज (Low Sperm Count Treatment in Hindi)

लो स्पर्म काउंट के इलाज का तरीका उसके कारण पर निर्भर करता है।

मेडिकल ट्रीटमेंट

  • हॉर्मोनल थेरेपी: अगर हॉर्मोन असंतुलन है तो क्लोमीफीन साइट्रेट, एचसीजी, या गोनैडोट्रोपिन्स दिए जा सकते हैं।
  • इंफेक्शन का इलाज: एंटीबायोटिक्स से जेनिटोयूरिनरी इंफेक्शन ठीक करना।
  • एंटीऑक्सिडेंट सप्लीमेंट्स: विटामिन E, C, कोएंजाइम Q10, L-कार्निटाइन, जिंक, सेलेनियम - ये ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कम करते हैं।

सर्जिकल ट्रीटमेंट

  • वैरिकोसेलेक्टॉमी: वैरिकोसील को सर्जरी से ठीक करने से 60-70% मामलों में स्पर्म पैरामीटर्स में सुधार होता है।
  • ऑब्सट्रक्शन रिपेयर: इसमें ब्लॉकेज को माइक्रोसर्जरी से खोलना।

लाइफस्टाइल चेंज

  • वजन कम करना: 10-15% वजन घटाने से टेस्टोस्टेरोन में सुधार होता है।
  • धूम्रपान और शराब छोड़ना: 3-6 महीने में स्पर्म क्वालिटी बेहतर होती है।
  • संतुलित आहार: एंटीऑक्सीडेंट रिच फूड्स, नट्स, बेरीज़, डार्क लीफी ग्रीन्स, टमाटर।
  • नियमित व्यायाम: लेकिन अति नहीं क्योंकि एक्सेसिव एक्सरसाइज टेस्टोस्टेरोन घटा सकता है।
  • स्ट्रेस मैनेजमेंट: योगा, मेडिटेशन, पर्याप्त नींद।

लो स्पर्म काउंट में IVF एवं ICSI की सफलता

ICSI ने लो स्पर्म काउंट के इलाज में क्रांति ला दी है। इसमें सिर्फ एक स्वस्थ स्पर्म की ज़रूरत होती है। इसका सक्सेस रेट 60 से 80% तक हो सकती है, जो स्पर्म क्वालिटी, महिला की उम्र, और एग क्वालिटी पर निर्भर करती है। फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट स्पर्म सेलेक्शन के लिए एडवांस्ड तकनीकें इस्तेमाल करते हैं जैसे IMSI (इंट्रासाइटोप्लाज़्मिक मॉर्फोलॉजिकली सिलेक्टेड स्पर्म इंजेक्शन) या PICSI (फिज़ियोलॉजिकल ICSI)।

निष्कर्ष (Conclusion)

Sperm kya hota hai यह समझना सिर्फ बायोलॉजी का सवाल नहीं, बल्कि आपकी फर्टिलिटी जर्नी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्पर्म वह माइक्रोस्कोपिक सेल है जो पिता की आधी जेनेटिक जानकारी लेकर नई ज़िंदगी को संभव बनाती है। लो स्पर्म काउंट एक चुनौती ज़रूर है, लेकिन आज के युग में यह अनसुलझी समस्या नहीं रही। चाहे हॉर्मोनल इलाज हो, सर्जरी हो, या IVF, ICSI जैसी एडवांस्ड तकनीकें, परिस्थिति का समाधान संभव है। सबसे महत्वपूर्ण है सही समय पर सीमेन एनालिसिस करवाना, कारण का पता लगाना, और अनुभवी फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से परामर्श लेना। याद रखें, केवल एक स्वस्थ स्पर्म से भी पिता बनने का सपना पूरा हो सकता है।

स्पर्म के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

स्पर्म क्या होता है?

 

स्पर्म यानी शुक्राणु पुरुष की रिप्रोडक्टिव सेल है जो टेस्टिकल्स में बनती है। यह महिला के एग को फर्टिलाइज़ करके प्रेगनेंसी शुरू करती है।

नॉर्मल स्पर्म काउंट कितना होना चाहिए?

 

WHO के अनुसार, नॉर्मल स्पर्म काउंट 15 मिलियन प्रति मिलीलीटर या उससे ज़्यादा होना चाहिए। इससे कम होने पर लो स्पर्म काउंट या ओलिगोस्पर्मिया कहते हैं।

लो स्पर्म काउंट के मुख्य कारण क्या हैं?

 

वैरिकोसील, हॉर्मोनल असंतुलन, इंफेक्शन, जेनेटिक फैक्टर्स, मोटापा, धूम्रपान, शराब, और तनाव मुख्य कारण हैं।

क्या लो स्पर्म काउंट से पिता बन सकते हैं?

 

हाँ, माइल्ड केसेस में नेचुरली संभव है। सीवियर केसेस में IVF या ICSI से सिर्फ एक स्वस्थ स्पर्म से भी पिता बना जा सकता है।

स्पर्म काउंट कैसे बढ़ाएं?

 

स्वस्थ वजन बनाए रखें, धूम्रपान और शराब छोड़ें, पौष्टिक आहार लें, नियमित व्यायाम करें, तनाव कम करें, और एंटीऑक्सिडेंट सप्लीमेंट्स लें।

ICSI क्या है और कब ज़रूरी है?

 

ICSI में एक स्पर्म को सीधे अंडे में इंजेक्ट किया जाता है। यह सीवियर ओलिगोस्पर्मिया या खराब स्पर्म क्वालिटी में सबसे प्रभावी तकनीक है।

स्पर्म काउंट बढ़ने में कितना समय लगता है?

 

स्पर्म प्रोडक्शन साइकिल 74 दिन की होती है, इसलिए लाइफस्टाइल चेंज या ट्रीटमेंट का असर 3-6 महीने में दिखता है।

**Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
© 2026 Indira IVF Hospital Private Limited. All Rights Reserved. T&C Apply | Privacy Policy| *Disclaimer