सारांश (Overview)
जब कोई कपल प्रेगनेंसी की प्लानिंग करता है, तो सबसे पहले उम्र, हॉर्मोन और मेडिकल जाँच की बात होती है। लेकिन एक चीज़ जिस पर अक्सर ध्यान नहीं जाता, वह है आप प्रतिदिन खाते क्या हैं, यानी कि आपकी डेली डाइट क्या है। एग और स्पर्म शरीर अपने आप नहीं बनाता। इन्हें बनने और स्वस्थ रहने के लिए सही पोषण की जरूरत होती है। इसलिए फ़र्टिलिटी सिर्फ़ उम्र और हॉर्मोन पर ही नहीं, बल्कि आपकी डाइट पर भी निर्भर करती है।
कुछ पोषक तत्व एग और स्पर्म दोनों की क्वालिटी को बढ़िया बनाये रखने में मदद करते हैं। ये शरीर की कोशिकाओं यानी सेल्स (cells) को ऊर्जा देते हैं, उन्हें ऑक्सीडेटिव नुकसान से बचाते हैं और हॉर्मोन का बैलेंस बनाये रखने में मदद करते हैं। यही वजह है कि फर्टिलिटी एक्सपर्ट प्रेगनेंसी की तैयारी के दौरान बैलेंस और पोषण से भरपूर डाइट लेने की सलाह देते हैं।
इस आर्टिकल में हम समझेंगे कि फर्टिलिटी के लिए कौन-कौन से पोषक तत्व ज़रूरी हैं, वे शरीर में क्या काम करते हैं, पुरुषों और महिलाओं की फर्टिलिटी में उनकी क्या भूमिका है, और ये आपको किन सामान्य खाद्य पदार्थों से मिल सकते हैं। साथ ही यह भी जानेंगे कि क्या सिर्फ़ सप्लीमेंट (Supplement) लेना काफ़ी है, या अच्छी डाइट और हेल्दी लाइफस्टाइल भी उतनी ही ज़रूरी है।
पोषण की भूमिका समझने के लिए पहले यह जानना ज़रूरी है कि एग और स्पर्म बनते कैसे हैं। ये दोनों कोशिकाएं शरीर में लगातार चलने वाली एक जटिल प्रक्रिया का नतीजा होती हैं। हर प्रक्रिया की तरह इनके बनने के लिए भी ऊर्जा और सही निर्माण सामग्री चाहिए होती है, जो हमें भोजन से मिलती है।
एग की परिपक्वता और स्पर्म के बनने, दोनों में कोशिका के अंदर मौजूद ऊर्जा घर यानी माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria) की अहम भूमिका होती है। जब कोशिकाओं को पर्याप्त ऊर्जा मिलती है, तो वे सही तरीके से विभाजित और परिपक्व होती हैं। पोषण की कमी इस प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
शरीर में सामान्य चयापचय के दौरान कुछ अस्थिर अणु बनते हैं, जिन्हें फ्री रेडिकल्स (Free Radicals) कहते हैं। जब इनकी मात्रा बढ़ जाती है और शरीर की रक्षा प्रणाली उन्हें संतुलित नहीं कर पाती, तो कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है। इसे ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस (Oxidative Stress) कहते हैं। कई पोषक तत्व एंटीऑक्सीडेंट (Antioxidant) की तरह काम करते हैं और एग व स्पर्म को इस नुकसान से बचाने में मदद करते हैं।
कुछ पोषक तत्व और स्वस्थ वसा हॉर्मोन बनने की प्रक्रिया को सहारा देते हैं। ये हॉर्मोन ओवरी (Ovary) और टेस्टिस (Testis) दोनों के सामान्य काम के लिए ज़रूरी होते हैं। इस तरह पोषण एक साथ तीन स्तर पर काम करता है। यह कोशिकाओं को ऊर्जा देता है, उन्हें नुकसान से बचाता है और हॉर्मोन का बैलेंस बनाए रखने में मदद करता है।
यह समझना भी ज़रूरी है कि पोषण उम्र के असर को पूरी तरह नहीं बदल सकता और न ही किसी मेडिकल समस्या का इलाज है। अगर गर्भधारण में कठिनाई किसी हॉर्मोनल या संरचनात्मक समस्या की वजह से है, तो सिर्फ़ डाइट बदलना काफ़ी नहीं होता। पोषण का काम शरीर को सही आधार देना है, ताकि उसकी सामान्य प्रक्रियाएं ठीक तरह से चल सकें और ज़रूरत पड़ने पर इलाज को भी अच्छा सहयोग मिल सके। इसलिए इसे इलाज की जगह एक सहायक कदम के रूप में देखना चाहिए।
अब उन प्रमुख पोषक तत्वों को एक एक करके समझते हैं जिनका प्रजनन स्वास्थ्य से गहरा संबंध देखा गया है। ध्यान रहे, इनमें से कोई भी अकेला जादुई उपाय नहीं है, बल्कि ये मिलकर शरीर को सहारा देते हैं।
कोएंजाइम Q10 शरीर में स्वाभाविक रूप से बनने वाला एक तत्व है जो माइटोकॉन्ड्रिया में ऊर्जा उत्पादन में मदद करता है और एक एंटीऑक्सीडेंट की तरह भी काम करता है। उम्र के साथ शरीर में इसका स्तर घटता है, और यही वह समय होता है जब एगओं को अतिरिक्त ऊर्जा की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है। अध्ययनों का एक विश्लेषण बताता है कि इस तरह के एंटीऑक्सीडेंट अंडाशय के कार्य को सहारा देकर निकाले गए एगओं की संख्या और अच्छी गुणवत्ता वाले एम्ब्रीओ (embryo) की दर बढ़ा सकते हैं। पुरुषों में भी यह स्पर्मओं की गतिशीलता को सहारा देने से जुड़ा पाया गया है।
ओमेगा-3 फैटी एसिड (omega-3 fatty acid) एक स्वस्थ वसा है जो कोशिका की झिल्ली को लचीला और स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है। स्पर्म की झिल्ली में इस वसा की अच्छी मात्रा उसकी गतिशीलता और आकार के लिए मायने रखती है। स्टडीज़ में ओमेगा-3 को स्पर्मओं की गतिशीलता और मॉर्फोलॉजी यानी आकार से जुड़ा हुआ पाया गया है। महिलाओं में भी यह स्वस्थ वसा कोशिकाओं और सूजन के संतुलन में सहायक मानी जाती है।
फोलिक एसिड (folic acid) यानी विटामिन B9 कोशिका विभाजन और डीएनए (DNA) बनने के लिए बेहद ज़रूरी है, इसलिए यह गर्भधारण से पहले और शुरुआती गर्भावस्था दोनों में महत्वपूर्ण होता है। यही कारण है कि प्रमुख स्वास्थ्य संस्थान गर्भधारण की योजना बना रही महिलाओं को रोज़ाना 400 माइक्रोग्राम फोलिक एसिड लेने की सलाह देते हैं, क्योंकि यह शिशु में न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट यानी तंत्रिका तंत्र की जन्मजात गड़बड़ियों को आधे या उससे ज़्यादा मामलों में रोक सकता है।
विटामिन D सिर्फ़ हड्डियों के लिए नहीं, हार्मोन के संतुलन और प्रजनन ऊतकों के कार्य से भी जुड़ा है। इसकी कमी हमारे यहां आम है, क्योंकि धूप में कम निकलना और खानपान की आदतें इसका स्तर घटा देती हैं। संतुलित स्तर बनाए रखना पुरुष और महिला दोनों के प्रजनन स्वास्थ्य के लिए सहायक माना जाता है, हालांकि इसकी कमी होने पर ही पूरक की ज़रूरत होती है, जिसे जांच से तय किया जाता है।
जिंक (zinc) और सेलेनियम (selenium) दो ऐसे खनिज हैं जो खासकर पुरुष प्रजनन स्वास्थ्य से गहराई से जुड़े हैं। ये स्पर्म बनने की प्रक्रिया में और उन्हें ऑक्सीडेटिव नुकसान से बचाने में भूमिका निभाते हैं। रिसर्च बताती कि सेलेनियम की उचित मात्रा कुछ महीनों तक लेने पर स्पर्मओं की गतिशीलता, कुल संख्या और आकार में सुधार देखा गया, और इसी तरह जिंक की पूर्ति स्पर्म की कुल गतिशीलता और संख्या को बेहतर करने से जुड़ी पाई गई। महिलाओं में भी ये मिनरल कोशिकाओं की सुरक्षा में सहायक होते हैं।
ऊपर बताए तत्वों के अलावा कुछ और पोषक तत्व भी प्रजनन स्वास्थ्य में पर्दे के पीछे भूमिका निभाते हैं। आयरन खून में ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए ज़रूरी है, और इसकी कमी, जो हमारे यहां महिलाओं में आम है, थकान के साथ ओव्यूलेशन यानी एग निकलने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकती है। पौधों से मिलने वाला आयरन बेहतर अवशोषित हो, इसके लिए उसके साथ विटामिन C वाले खाद्य पदार्थ लेना उपयोगी रहता है।
विटामिन B12 फोलिक एसिड के साथ मिलकर कोशिका निर्माण और तंत्रिका तंत्र के स्वास्थ्य में मदद करता है, इसलिए शाकाहारी लोगों को इसकी पूर्ति पर खास ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यह मुख्य रूप से पशु स्रोतों से मिलता है। आयोडीन (iodine) थायरॉइड (thyroid) ग्रंथि के सही काम के लिए ज़रूरी है, और थायरॉइड का असंतुलन सीधे मासिक चक्र और गर्भधारण को प्रभावित कर सकता है। इस तरह प्रजनन स्वास्थ्य किसी एक तत्व पर नहीं, बल्कि कई पोषक तत्वों के आपसी संतुलन पर टिका होता है।
नीचे दी गई तालिका इन पोषक तत्वों की मुख्य भूमिका को एक नज़र में समझा देती है।
पोषक तत्व | शरीर में मुख्य भूमिका |
|---|---|
कोएंजाइम Q10 | कोशिकाओं को ऊर्जा देना और एंटीऑक्सीडेंट के रूप में सुरक्षा |
ओमेगा-3 फैटी एसिड | कोशिका झिल्ली को स्वस्थ रखना, स्पर्म की गतिशीलता में सहायता |
फोलिक एसिड | कोशिका विभाजन और डीएनए निर्माण, शिशु में जन्मजात दोष रोकने में मदद |
विटामिन D | हार्मोन संतुलन और प्रजनन ऊतकों के कार्य में सहयोग |
जिंक और सेलेनियम | स्पर्म निर्माण और उन्हें ऑक्सीडेटिव नुकसान से बचाना |
आयरन | ओव्यूलेशन को सहारा, कमी से थकान और चक्र पर असर |
विटामिन B12 | कोशिका निर्माण और तंत्रिका तंत्र के स्वास्थ्य में सहयोग |
आयोडीन | थायरॉइड के सही कार्य और मासिक चक्र के संतुलन में मदद |
महिलाओं में हर महीने एक एग परिपक्व होकर निकलता है, और इस परिपक्वता की प्रक्रिया कई हफ़्तों तक चलती है। इस दौरान एग को भरपूर ऊर्जा और सुरक्षा दोनों की ज़रूरत होती है, और यहीं पोषण की भूमिका सामने आती है।
एग की गुणवत्ता का सीधा संबंध उसके भीतर मौजूद माइटोकॉन्ड्रिया की सेहत से होता है। जब कोशिका को पर्याप्त ऊर्जा और एंटीऑक्सीडेंट सुरक्षा मिलती है, तो परिपक्वता बेहतर होती है और आगे निषेचन (fertilization) की संभावना को सहारा मिलता है। एक स्टडी में पाया गया है कि एंटीऑक्सीडेंट का इस्तेमाल करने वाली उप-प्रजनन क्षमता वाली महिलाओं में जीवित शिशु जन्म की दर, कोई एंटीऑक्सीडेंट न लेने वाली महिलाओं की तुलना में कुछ बेहतर हो सकती है, हालांकि इस बात के एविडेंस थोड़े कम ही हैं।
ओवेरियन फंक्शन यानी अंडाशय के कार्य को भी पोषण सहारा देता है। हार्मोन बनने के लिए स्वस्थ वसा और कुछ विटामिन ज़रूरी होते हैं, और लगातार पोषक तत्वों की कमी अंडाशय के सामान्य चक्र को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि गर्भधारण की तैयारी में सिर्फ़ किसी एक सप्लीमेंट पर नहीं, बल्कि पूरे आहार के संतुलन पर ध्यान देने की सलाह दी जाती है। खासकर उन महिलाओं में, जिनका अंडाशयी भंडार यानी ओवेरियन रिजर्व उम्र के साथ घट रहा हो, पोषण को एक सहायक कदम के रूप में देखा जाता है, न कि अकेले इलाज के रूप में।
यहां वज़न की भूमिका को समझना भी ज़रूरी है। शरीर का बहुत अधिक या बहुत कम वज़न, दोनों ही हार्मोन के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं और ओव्यूलेशन को अनियमित कर सकते हैं। इसलिए पोषण का लक्ष्य सिर्फ़ कुछ खास तत्व जोड़ना नहीं, बल्कि एक स्वस्थ वज़न बनाए रखना भी है। संतुलित आहार और सक्रिय जीवनशैली इस लक्ष्य को स्वाभाविक रूप से सहारा देते हैं। इसी तरह अत्यधिक कैफीन और बहुत ज़्यादा मीठे व प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ, जो रक्त शर्करा को तेज़ी से बढ़ाते हैं, उन्हें सीमित रखना अंडाशय के संतुलित कार्य के लिए बेहतर रहता है। कुल मिलाकर महिला की प्रजनन क्षमता के लिए पोषण एक धीमा लेकिन लगातार सहारा देने वाला कारक है, जिसका असर हफ़्तों और महीनों में बनता है।
स्पर्म एक दिन में नहीं बनते। उन्हें बनने और पूरी तरह विकसित होने में करीब ढाई से तीन महीने का समय लगता है। इसलिए खानपान और जीवनशैली में किए गए बदलावों का असर भी तुरंत नहीं दिखता। इसका फर्क कुछ महीनों बाद स्पर्म की गुणवत्ता में दिखाई दे सकता है।
स्पर्म बनने की प्रक्रिया और उनकी गतिशीलता के लिए शरीर को कई पोषक तत्वों की जरूरत होती है। जिंक, सेलेनियम, ओमेगा-3 और कोएंजाइम Q10 इनमें अहम हैं। इनकी पर्याप्त मात्रा शरीर को स्पर्म बनाने और उनकी सामान्य गतिशीलता बनाए रखने में मदद करती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि किसी एक पोषक तत्व को लेने से स्पर्म की गुणवत्ता तुरंत बेहतर हो जाएगी। बल्कि संतुलित आहार के जरिए शरीर को जरूरी पोषक तत्व मिलते रहना महत्वपूर्ण है।
पोषण की दूसरी बड़ी भूमिका स्पर्म को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में होती है। स्पर्म की संरचना उन्हें फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान के प्रति संवेदनशील बनाती है। अगर यह नुकसान ज्यादा हो, तो स्पर्म की कार्यक्षमता के साथ उनके DNA पर भी असर पड़ सकता है।
एंटीऑक्सिडेंट पोषक तत्व शरीर में इस तरह के नुकसान को कम करने में मदद कर सकते हैं। कुछ अध्ययनों में सेलेनियम, जिंक, ओमेगा-3 और कोएंजाइम Q10 का संबंध स्पर्म की गतिशीलता और आकार जैसे मानकों से देखा गया है। हालांकि, एंटीऑक्सिडेंट की मात्रा भी संतुलित होना जरूरी है। जरूरत से ज्यादा सप्लीमेंट लेना हमेशा फायदेमंद नहीं होता। इसलिए किसी भी सप्लीमेंट को डॉक्टर की सलाह के बिना शुरू नहीं करना चाहिए।
स्पर्म बनने की प्रक्रिया सिर्फ पोषण पर निर्भर नहीं करती। वृषण का तापमान भी स्पर्म की गुणवत्ता के लिए महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक बहुत गर्म वातावरण में रहना, बहुत तंग कपड़े पहनना या घंटों तक गोद में लैपटॉप रखकर काम करना वृषण के आसपास का तापमान बढ़ा सकता है, जिसका स्पर्म की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है।
इसलिए अगर आप गर्भधारण की योजना बना रहे हैं, तो खानपान के साथ इन आदतों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
स्पर्म बनने का पूरा चक्र करीब ढाई से तीन महीने का होता है। इसलिए खानपान या जीवनशैली में बदलाव करने के कुछ दिनों बाद ही परिणाम की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। इन बदलावों को लगातार बनाए रखना जरूरी है, ताकि नए बनने वाले स्पर्म पर उनका असर दिखाई दे सके।
यही वजह है कि गर्भधारण की योजना बना रहे पुरुषों के लिए स्वस्थ खानपान और बेहतर जीवनशैली की शुरुआत कुछ महीने पहले से करना ज्यादा व्यावहारिक होता है।
स्पर्म की क्वालिटी और फर्टिलिटी के लिए जरूरी कई पोषक तत्व आपको रोज़मर्रा के खाने से ही मिल सकते हैं। इसलिए हर पोषक तत्व के लिए सप्लीमेंट लेना जरूरी नहीं होता। सही खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करके आप अपनी जरूरत का पोषण काफी हद तक पूरा कर सकते हैं।
दालें: फोलेट, आयरन, जिंक और प्रोटीन
चना और राजमा: फोलेट, आयरन, मैग्नीशियम और प्रोटीन
ओट्स: मैग्नीशियम, आयरन, जिंक और फाइबर
साबुत गेहूं: आयरन, मैग्नीशियम, जिंक और बी विटामिन
पालक: फोलेट, आयरन, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट
मेथी: आयरन, मैग्नीशियम और फोलेट
ब्रोकली: फोलेट, विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट
आंवला: विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट
संतरा और नींबू: विटामिन C और फोलेट
टमाटर: लाइकोपीन और विटामिन C
शिमला मिर्च: विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट
गाजर: बीटा-कैरोटीन और एंटीऑक्सीडेंट
दूध: कैल्शियम, विटामिन B12 और फोर्टिफाइड होने पर विटामिन D
दही: कैल्शियम, प्रोटीन और विटामिन B12
पनीर: प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन B12
इस तरह आपकी डाइट में जिंक, सेलेनियम, मैग्नीशियम, फोलेट, आयरन, विटामिन D, विटामिन B12 और ओमेगा-3 जैसे पोषक तत्व अलग-अलग खाद्य पदार्थों से आसानी से शामिल हो सकते हैं। कोशिश करें कि रोज़ एक ही तरह का खाना खाने के बजाय अलग-अलग तरह के अनाज, दालें, सब्जियां, मेवे और बीज डाइट में शामिल हों। इससे शरीर को अलग-अलग पोषक तत्व मिलते रहते हैं और डाइट ज्यादा संतुलित रहती है।
मिनरल | खाद्य स्रोत |
जिंक | ऑयस्टर, क्रैब, लॉब्स्टर, बीफ, मटन, चिकन, अंडा, कद्दू के बीज, तिल, काजू, चिया सीड्स, दालें, चना, राजमा, साबुत अनाज |
सेलेनियम | ब्राज़ील नट्स, ऑयस्टर, सार्डिन, सामन, टूना, झींगा, अंडा, चिकन, टर्की, मटन, सूरजमुखी के बीज |
मैग्नीशियम | कद्दू के बीज, चिया सीड्स, अलसी, बादाम, काजू, अखरोट, पाइन नट्स, तिल, कोको/डार्क चॉकलेट, ओट्स, क्विनोआ, पालक, दालें |
आयरन | ऑयस्टर, क्लैम्स, मसल्स, बीफ, मटन, चिकन, लीवर, पालक, मेथी, तिल, कद्दू के बीज, चना, राजमा, दालें, क्विनोआ |
कैल्शियम | दूध, दही, पनीर, चीज़, तिल, चिया सीड्स, बादाम, टोफू, एडामेमे, सार्डिन और खाने योग्य हड्डियों वाली छोटी मछलियाँ, कैल्शियम वाला प्लांट मिल्क |
कॉपर | ऑयस्टर, काजू, बादाम, तिल, कद्दू के बीज, सूरजमुखी के बीज, डार्क चॉकलेट, मशरूम, चना, राजमा, गोट लीवर |
पोटैशियम | एवोकाडो, नारियल पानी, आलू, शकरकंद, पालक, टमाटर, दालें, चना, राजमा, एडामेमे, केला, सूखे खुबानी, प्रून्स, दही |
मैंगनीज | ओट्स, साबुत अनाज, पेकान, हेज़लनट्स, बादाम, ब्राउन राइस, चना, सोयाबीन, पालक, अनानास |
फॉस्फोरस | कद्दू के बीज, चिया सीड्स, तिल, डेयरी, अंडा, चिकन, मछली, मीट, दालें, सोयाबीन |
आयोडीन | समुद्री मछली, ऑयस्टर, झींगा, समुद्री शैवाल यानी सीवीड, अंडा, दूध और डेयरी, आयोडीन युक्त नमक |
हर मिनरल के लिए महंगा और प्रीमियम फ़ूड लेना जरूरी नहीं है। उदाहरण के लिए, ज़िंक के लिए ऑयस्टर बहुत अच्छा स्रोत है, लेकिन कद्दू के बीज, अंडा, दालें और मीट से भी जिंक आसानी से मिल जाता है। साथ ही, प्लांट फूड्स से मिलने वाला ज़िंक एनिमल फूड्स से मिलने वाले जिंक की तुलना में शरीर में कम लगता है क्योंकि प्लांट से मिलने वाले जिंक में फायटिक एसिड होता है जो अब्सॉर्प्शन को प्रभावित करते हैं।
मिनरल्स के अलावा कुछ दूसरे पोषक तत्व भी स्पर्म की गुणवत्ता और प्रजनन क्षमता के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इन्हें भी रोज़ के आहार में अलग-अलग खाद्य पदार्थों के जरिए शामिल किया जा सकता है।
पोषक तत्व | किन खाद्य पदार्थों से मिल सकता है? |
ओमेगा-3 फैटी एसिड | मछलियां जैसे सामन, सार्डिन, मैकेरल, और ट्राउट, चिया सीड्स, अलसी, अखरोट, हेम्प सीड्स |
फोलेट | पालक, मेथी, ब्रोकली, एवोकाडो, चना, राजमा, मसूर दाल, एडामेमे, एस्पैरागस |
विटामिन D | सामन, सार्डिन, मैकेरल, अंडे की जर्दी, फोर्टिफाइड दूध, फोर्टिफाइड सोया मिल्क, मशरूम |
विटामिन E | बादाम, सूरजमुखी के बीज, हेज़लनट्स, पाइन नट्स, मूंगफली, एवोकाडो, पालक |
विटामिन C | आंवला, अमरूद, कीवी, संतरा, नींबू, स्ट्रॉबेरी, शिमला मिर्च, ब्रोकली |
विटामिन B12 | मछलियां जैसे सामन और सार्डिन, ऑयस्टर, अंडा, दूध, दही, चिकन, मीट, फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ |
एंटीऑक्सीडेंट्स | आंवला, बेरीज़, अनार, अंगूर, टमाटर, पालक, ब्रोकली, शिमला मिर्च, डार्क चॉकलेट |
लाइकोपीन | टमाटर, टमाटर प्यूरी, तरबूज, गुलाबी अंगूर |
कोलीन | अंडे की जर्दी, लीवर, सामन, चिकन, सोयाबीन, दूध |
यह एक ऐसा सवाल है जिस पर अक्सर भ्रम रहता है। बाज़ार में फर्टिलिटी सप्लीमेंट की भरमार है, और यह मान लेना आसान है कि बस एक गोली से सब ठीक हो जाएगा। लेकिन असल तस्वीर इससे कुछ अलग है।
सबसे पहली बात, सप्लीमेंट हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी नहीं होते। अगर आपका आहार संतुलित है और शरीर में किसी पोषक तत्व की कमी नहीं है, तो अतिरिक्त सप्लीमेंट से कोई खास फायदा नहीं मिलता। कई मामलों में शरीर की ज़रूरत सामान्य भोजन से ही पूरी हो जाती है।
दूसरी बात, ज़रूरत से ज़्यादा सप्लीमेंट लेना नुकसानदेह भी हो सकता है। जैसा हमने देखा, एंटीऑक्सीडेंट की बहुत अधिक मात्रा स्पर्म के कार्य पर उल्टा असर डाल सकती है। इसीलिए बिना जांच और सलाह के अपने मन से सप्लीमेंट शुरू करना ठीक नहीं है। सही तरीका यह है कि पहले जांच से देखा जाए कि किसी तत्व की कमी है या नहीं, और फिर डॉक्टर की सलाह से ही पूरक तय हो।
तीसरी बात, सप्लीमेंट संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली की जगह नहीं ले सकते। भोजन से पोषक तत्व फाइबर और अन्य सहायक तत्वों के साथ मिलते हैं, जो अकेली गोली से नहीं मिलते। इसलिए सप्लीमेंट को एक सहारे की तरह देखें, न कि पूरे इलाज की तरह।
पोषण अपनी पूरी भूमिका तभी निभा पाता है जब उसके साथ कुछ अच्छी आदतें भी जुड़ी हों। ये आदतें पूरे शरीर के साथ प्रजनन स्वास्थ्य को भी सहारा देती हैं।
किसी एक तत्व पर ज़ोर देने की जगह पूरे आहार का संतुलन ज़रूरी है। साबुत अनाज, दालें, मौसमी फल और सब्जियां, स्वस्थ वसा और पर्याप्त प्रोटीन, ये सब मिलकर शरीर को वह पोषण देते हैं जो एग और स्पर्म दोनों के लिए उपयोगी है। अत्यधिक प्रोसेस्ड और मीठे खाद्य पदार्थों को सीमित रखना भी उतना ही मायने रखता है।
नियमित शारीरिक गतिविधि वज़न को संतुलित रखने, रक्त संचार सुधारने और हार्मोन संतुलन में मदद करती है। हालांकि यहां संतुलन ज़रूरी है, क्योंकि बहुत अधिक और थका देने वाला व्यायाम भी प्रजनन हार्मोन पर उल्टा असर डाल सकता है। रोज़ाना मध्यम स्तर की गतिविधि सबसे उपयोगी मानी जाती है।
धूम्रपान और ज़्यादा शराब दोनों ही शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाते हैं और एग व स्पर्म की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इनसे दूरी बनाना प्रजनन स्वास्थ्य के लिए उठाए जा सकने वाले सबसे असरदार कदमों में से एक है।
नींद के दौरान शरीर खुद की मरम्मत करता है और हार्मोन का संतुलन बनाए रखता है। लगातार कम नींद और अधिक तनाव इस संतुलन को बिगाड़ सकते हैं। इसलिए पर्याप्त और नियमित नींद के साथ तनाव को नियंत्रित रखना पोषण जितना ही ज़रूरी है। रोज़ करीब सात से आठ घंटे की नींद और सोने जागने का एक तय समय शरीर की आंतरिक घड़ी को स्थिर रखता है, जो प्रजनन हार्मोन के नियमित स्राव में मदद करती है।
तनाव को लेकर एक व्यावहारिक बात यह है कि गर्भधारण की कोशिश खुद एक तनाव का कारण बन सकती है, खासकर जब कई महीनों तक इंतज़ार करना पड़े। ऐसे में गहरी सांस लेने के अभ्यास, हल्का योग, टहलना या किसी पसंदीदा गतिविधि में समय बिताना मन को शांत रखने में मदद करता है। यह ज़रूरी नहीं कि तनाव अकेले गर्भधारण को रोकता हो, लेकिन लंबे समय तक बना तनाव नींद, भूख और हार्मोन को प्रभावित करके अप्रत्यक्ष रूप से असर डाल सकता है। इसलिए पोषण के साथ मानसिक सेहत का ध्यान रखना पूरी तस्वीर को संतुलित बनाता है।
पोषण और अच्छी आदतें एक अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन कुछ स्थितियों में विशेषज्ञ की सलाह लेना ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि तब सिर्फ़ आहार से बात नहीं बनती।
अगर आप एक साल से नियमित प्रयास कर रहे हैं और गर्भधारण नहीं हो रहा, तो सलाह लेनी चाहिए। महिला की उम्र 35 साल या उससे अधिक हो, तो यह अवधि घटकर 6 महीने हो जाती है, क्योंकि इस उम्र के बाद समय अधिक मायने रखता है। इसके अलावा अनियमित पीरियड्स, एंडोमेट्रियोसिस (endometriosis) की जानकारी, या स्पर्मओं से जुड़ी किसी समस्या का संकेत होने पर देर नहीं करनी चाहिए।
अगर आप किसी फर्टिलिटी उपचार की तैयारी कर रहे हैं, तब भी पोषण और जीवनशैली को लेकर विशेषज्ञ से बात करना उपयोगी होता है, क्योंकि सही तैयारी उपचार के परिणाम को सहारा दे सकती है। डॉक्टर आपकी जांच देखकर बता पाते हैं कि किन पोषक तत्वों पर ध्यान देना है और क्या किसी सप्लीमेंट की सच में ज़रूरत है।
प्रजनन स्वास्थ्य एक बड़ी तस्वीर है, और पोषण उसका एक अहम हिस्सा है। कोएंजाइम Q10, ओमेगा-3, फोलिक एसिड, विटामिन D, जिंक और सेलेनियम जैसे पोषक तत्व एग और स्पर्म को ऊर्जा देने, उन्हें ऑक्सीडेटिव नुकसान से बचाने और हार्मोन संतुलन को सहारा देने में मदद करते हैं। लेकिन इनमें से कोई भी अकेला गर्भधारण की गारंटी नहीं देता।
सबसे व्यावहारिक तरीका यह है कि किसी एक सप्लीमेंट के पीछे भागने की जगह संतुलित और विविध आहार को आधार बनाया जाए, और उसके साथ नियमित व्यायाम, अच्छी नींद, तनाव नियंत्रण और धूम्रपान व शराब से दूरी जैसी आदतें जोड़ी जाएं। यही मिलकर प्रजनन क्षमता के लिए एक मज़बूत ज़मीन तैयार करते हैं।
अंत में यह याद रखना ज़रूरी है कि हर व्यक्ति की ज़रूरत अलग होती है। इसलिए अगर आप गर्भधारण की योजना बना रहे हैं और पोषण या फर्टिलिटी को लेकर कोई चिंता है, तो फर्टिलिटी विशेषज्ञ से बात करके अपनी जांच के आधार पर सही योजना बनाना सबसे अच्छा कदम है।