हर महीने पीरियड्स का इंतज़ार करना और उनका न आना। वज़न का बढ़ते चले जाना और कोशिश करने पर कम न होना। चेहरे पर बाल और मुंहासे जो बहुत से उपाय करने के बाद भी नहीं जा रहे। और सबसे बड़ा डर कि कोशिश करने के बावजूद क्या मैं कभी माँ बन पाऊंगी? अगर आप इनमें से कुछ भी महसूस कर रही हैं तो आप अकेली नहीं हैं। भारत में हर 5 में से 1 महिला इसी दौर से गुज़र रही है। आपने शायद PCOD या PCOS के बारे में सुना होगा। कुछ लोग कहते हैं दोनों कंडीशन को एक ही बात समझते हैं, लेकिन क्या है सही जानकारी। आगे हम PCOD and PCOS difference in hindi में समझेंगे ताकि आप सही जानकारी के साथ सही फैसला ले सकें।
PCOS और PCOD में कुछ लक्षण कॉमन होते हैं लेकिन इनके बनने और स्वास्थ्य पर इसका कितना गंभीर असर पड़ेगा यानी सीवियरिटी (severity), इन सब बातों में काफी अंतर होता है।
| PCOD | PCOS | |
|---|---|---|
| क्या है यह समस्या | PCOD में ओवरीज़ सही तरह से काम नहीं करतीं, लेकिन इसका असर आमतौर पर ओवरीज़ तक ही सीमित रहता है | PCOS एक हार्मोनल डिसऑर्डर है जो पूरे शरीर के एंडोक्राइन सिस्टम को प्रभावित करता है |
| गंभीरता | PCOD आमतौर पर बहुत सीरियस कंडीशन नहीं मानी जाती और यह सही डाइट, एक्सरसाइज़ और वज़न कंट्रोल से सुधर सकती है | PCOS को एक गंभीर मेडिकल कंडीशन माना जाता है जिसमें लंबे समय तक इलाज और निगरानी की ज़रूरत होती है |
| कितनी महिलाओं में पाया जाता है | यह बहुत कॉमन है और लगभग हर 3 में से 1 महिला में यह कंडीशन हो सकती है | PCOS अपेक्षाकृत कम पाया जाता है, लगभग 5–10% महिलाओं में |
| गर्भधारण पर असर | PCOD में ज़्यादातर महिलाएं प्राकृतिक तरीके से गर्भधारण कर पाती हैं | PCOS में ओव्यूलेशन की समस्या के कारण गर्भधारण में दिक्कत आ सकती है |
| हार्मोनल असर | हार्मोनल असंतुलन हल्का होता है | एंड्रोजन हार्मोन बढ़ जाते हैं, जिससे चेहरे पर बाल, मुँहासे और अनियमित पीरियड हो सकते हैं |
| लॉन्ग-टर्म रिस्क | लंबे समय की गंभीर समस्याएं आमतौर पर नहीं होतीं | डायबिटीज़, हार्ट डिज़ीज़ और एंडोमेट्रियल कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है |
PCOD और PCOS दोनों में दिखने वाले लक्षण
PCOD और PCOS दोनों में यह लक्षण कॉमन होते हैं। दो मेंस्ट्रुअल साइकिल के बीच 35 दिन से अधिक का अंतर, साल में 8 से कम पीरियड्स, या बहुत हैवी ब्लीडिंग हॉर्मोनल असंतुलन का संकेत है। PCOD में पीरियड्स देर से आते हैं जबकि PCOS में कई महीनों तक पीरियड्स न आना भी संभव है।
चेहरे पर विशेषकर ठोड़ी, ऊपरी होंठ, छाती या पेट पर मोटे काले बाल आना जिसे हिर्सुटिज़्म (Hirsutism) कहते हैं, दोनों कंडीशंस में देखा जाता है। PCOS में यह अधिक स्पष्ट होता है क्योंकि एंड्रोजन का लेवल काफी हाई होता है।
पेट के आसपास वज़न बढ़ना और डाइट या व्यायाम से भी कम न होना दोनों में देखा जाता है। PCOD में वज़न जीवनशैली में बदलाव से नियंत्रित हो सकता है जबकि PCOS में इंसुलिन रेज़िस्टेंस के कारण वज़न कम करना अधिक कठिन होता है।
किशोरावस्था के बाद भी लगातार मुँहासे जो सामान्य इलाज से ठीक न हों, दोनों में हॉर्मोनल असंतुलन का संकेत है। PCOS में मुँहासे अधिक गंभीर और जिद्दी होते हैं।
सिर के बाल पतले होना या पुरुषों जैसा हेयर लॉस दिखना दोनों स्थितियों में हो सकता है, लेकिन PCOS में यह अधिक स्पष्ट होता है।
मुख्य रूप से PCOS में दिखने वाले लक्षण
गर्दन, बगल या जांघों की त्वचा का काला पड़ना जिसे एकैंथोसिस निग्रिकन्स (Acanthosis Nigricans) कहते हैं, इंसुलिन रेज़िस्टेंस का संकेत है और मुख्य रूप से PCOS में देखा जाता है।
चिंता, अवसाद या चिड़चिड़ापन PCOS में अधिक गंभीर रूप में देखा जाता है क्योंकि हॉर्मोनल असंतुलन अधिक होता है। PCOD में मूड में उतार-चढ़ाव होते हैं लेकिन ये आमतौर पर हल्के होते हैं।
PCOD और PCOS दोनों का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि आपको सही क्या करना है।
यह सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि अधिकतर महिलाओं को यह चिंता होती है। सच यह है कि PCOD और PCOS दोनों में प्रेगनेंसी संभव है। हां, जर्नी थोड़ी लम्बी हो सकती है लेकिन असंभव नहीं है।
PCOD में लाइफस्टाइल में बदलाव और ओव्यूलेशन इंडक्शन से 70 से 80 प्रतिशत महिलाएं स्वाभाविक रूप से गर्भधारण कर लेती हैं। PCOS में यह प्रतिशत थोड़ा कम है लेकिन फिर भी संभव है।
अगर ओव्यूलेशन हो रहा है लेकिन स्वाभाविक गर्भधारण नहीं हो रहा तो IUI एक ऐसा ऑप्शन है जिसमें तैयार किए गए स्पर्म को सीधे यूट्रस में ट्रांसफर किया जाता है।
जब दूसरे ट्रीटमेंट से परिणाम न मिले तो IVF सबसे अच्छा ऑप्शन है। PCOS मरीज़ों में IVF की सक्सेस रेट अच्छी है क्योंकि इनमें एग रिज़र्व आम तौर पर अच्छा होता है। हालांकि OHSS यानी ओवेरियन हाइपरस्टिम्युलेशन सिंड्रोम (Ovarian Hyperstimulation Syndrome) का जोखिम रहता है, इसलिए सावधानीपूर्वक निगरानी ज़रूरी है। अब एंटागोनिस्ट प्रोटोकॉल और फ्रीज़-ऑल स्ट्रैटेजी से यह जोखिम काफी कम हो गया है।
PCOD और PCOS का ट्रीटमेंट संभव है इसीलिए इनसे डरने की नहीं, समझने की ज़रूरत है। इस आर्टिकल में हमने PCOD and PCOS difference in hindi में समझाया कि दोनों कैसे अलग हैं। PCOD कॉमन और नॉर्मल कंडीशन है जो लाइफस्टाइल में बदलाव से कंट्रोल हो सकती है, जबकि PCOS एक गंभीर मेटाबॉलिक समस्या है जिसमें मेडिकल ट्रीटमेंट की जरुरत पड़ती है।
मानसिक स्वास्थ्य यानी मेंटल हैल्थ पर भी ध्यान दें क्योंकि PCOS और अवसाद का संबंध है। अगर आप उदास महसूस कर रही हैं तो यह सिर्फ आपकी सोच नहीं है, यह हॉर्मोन्स भी हो सकते हैं। इसीलिए बिना किसी संकोच के डॉक्टर से संपर्क करें और स्वस्थ जीवन के साथ अपना माँ बनने का सपना भी साकार करें।
PCOD लाइफस्टाइल में बदलाव से काफी हद तक कंट्रोल हो जाता है। PCOS एक लॉन्ग-टर्म कंडीशन है जिसे पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता लेकिन सही मैनेजमेंट से एक सामान्य स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है।
बिल्कुल हो सकती हैं। लाइफस्टाइल में बदलाव और दवाओं से 70 प्रतिशत से अधिक महिलाएं गर्भधारण कर लेती हैं।
सर्जरी सिर्फ तब विचार की जाती है जब ओव्यूलेशन इंडक्शन से प्रतिक्रिया न मिले।
हां, लगभग 20 से 30 प्रतिशत PCOS मरीज़ दुबली होती हैं जिसे लीन PCOS कहते हैं।
डॉक्टर प्रोजेस्टेरॉन की दवा देते हैं जिससे विड्रॉअल ब्लीडिंग होती है। लॉन्ग टर्म के लिए वज़न सही करें, लाइफस्टाइल बदलें।
कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फूड जैसे साबुत अनाज, सब्जियां और लीन प्रोटीन खाएं। प्रोसेस्ड फूड, चीनी और रिफाइंड कार्ब्स से बचें। ओमेगा-3 युक्त फूड जैसे मछली, अखरोट और अलसी फायदेमंद हैं।
अगर आपकी माँ या बहन को PCOS है तो आपका जोखिम बढ़ जाता है।