आज के समय में भागदौड़ भरी जिंदगी और बिगड़ती लाइफस्टाइल की वजह से महिलाओं में हार्मोनल प्रॉब्लम्स तेजी से बढ़ रही हैं।
पीरियड्स लेट होना, वज़न बढ़ना, चेहरे पर बाल आना इन सबको अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। ज़्यादातर महिलाएं तब तक इन
समस्याओं को छोटा मान कर इन्हें गंभीरता से नहीं लेतीं। जब तक बात समझ में आती है, तब तक ये छोटी-छोटी दिक्कतें एक बड़ी
प्रॉब्लम का रूप ले चुकी होती हैं जिसे पीसीओडी (PCOD) यानी पॉलिसिस्टिक ओवेरियन डिजीज के नाम से जाना जाता है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के अनुसार भारत में लगभग 10% महिलाएं पीसीओडी से जूझ रही हैं। यानी हर दस में से एक महिला इस
समस्या का सामना कर रही है। पीसीओडी का डर सबसे ज्यादा उन महिलाओं को होता है जो प्रेगनेंसी प्लान कर रही होती हैं क्योंकि
उनके मन में पहला सवाल यही आता है कि क्या मैं माँ बन पाऊंगी?
सच यह है कि पीसीओडी में प्रेगनेंसी मुश्किल होती है, लेकिन यह नामुमकिन नहीं होती। एक रिसर्च में 1,779 पीसीओडी महिलाओं को
फॉलो किया गया और पाया गया कि 67% महिलाएं पीसीओडी की समस्या को ठीक करके माँ बन सकीं।
पीसीओडी को लेकर आम तौर पर यही उलझन रहती है कि यह समस्या आखिर पैदा कैसे होती है और क्या इसकी वजह से प्रेगनेंसी में
परेशानी होना तय है। इस आर्टिकल में हम पीसीओडी संबंधित सभी जानकारी जैसे कि pcod kaise hota hai, इसमें शरीर के अंदर किस
तरह के बदलाव आते हैं, और पीसीओडी होने पर प्रेगनेंसी यानी गर्भधारण की प्रक्रिया में क्या दिक्कतें आती हैं तथा किस तरह
पीसीओडी होने बाद भी माँ बनना संभव होता है।
सामान्य मेंस्ट्रुअल साइकिल में हर महीने ओवरी में कई छोटे-छोटे फॉलिकल्स (follicles) बनते हैं, जिनमें से एक फॉलिकल परिपक्व यानी मैच्योर होता है और उसमें से एग रिलीज़ होता है। इसी को ओव्यूलेशन कहते हैं। ओव्यूलेशन के बाद अगर एग स्पर्म से मिल जाए तो गर्भधारण होता है, नहीं तो पीरियड्स आ जाते हैं। PCOD में शरीर में पुरुष हार्मोन यानी एंड्रोजन (androgen) का लेवल बढ़ जाता है। यह बढ़ा हुआ हार्मोन उन फॉलिकल्स को मैच्योर होने से रोक देता है। नतीजा यह होता है कि कोई भी एग रिलीज नहीं हो पाता और वे छोटे-छोटे पानी के बुलबुलों जैसे सिस्ट्स (cysts) बनकर ओवरी के किनारों पर जमा हो जाते हैं। अल्ट्रासाउंड में यही 'मोतियों की माला' जैसा दिखता है, जिसे लोग गलती से सिस्ट या गांठ समझ लेते हैं।
पीसीओडी होने का कोई एक कारण नहीं होता। कई चीज़ें मिलकर इसे ट्रिगर करती हैं।
PCOD होने की सबसे बड़ी और कॉमन वजह इंसुलिन रेजिस्टेंस है। इंसुलिन एक हॉर्मोन है जो आपके खाने को एनर्जी में बदलता है।
जब आपकी लाइफस्टाइल खराब होती है, तो शरीर की सेल्स (cells) इंसुलिन के प्रति रेजिस्टेंट (resistant) हो जाती हैं। यानी शरीर इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता। इसके जवाब में शरीर और ज्यादा इंसुलिन बनाने लगता है। खून में बढ़ा हुआ यह इंसुलिन लेवल सीधे ओवरी पर हमला करता है और उसे एंड्रोजन बनाने के लिए मजबूर करता है।
यही वजह है कि PCOD वाली महिलाओं का वजन जल्दी बढ़ता है और उन्हें मीठा खाने की इच्छा यानी क्रेविंग (craving) ज्यादा होती है। इंसुलिन को कंट्रोल करना ही PCOD को ठीक करने का पहला स्टेप है।
जब हम पूछते हैं कि pcod kaise hota hai, तो इसमें आपकी डाइट का बहुत बड़ा हाथ होता है। आज के समय में हमारा खाना-पीना PCOD का सबसे बड़ा ट्रिगर बन गया है।
PCOD को एक 'लाइफस्टाइल डिसऑर्डर' (lifestyle disorder) कहा जाता है। आपकी ये अनहेल्दी लाइफस्टाइल और ख़राब आदतें इसे बढ़ावा देती हैं।
PCOD माँ बनने की राह में रुकावट ज़रूर डालता है, लेकिन यह निःसंतानता यानी इनफर्टिलिटी नहीं है। यह प्रेगनेंसी को तीन मुख्य तरीकों से प्रभावित करता है।
अगर लाइफस्टाइल बदलाव और दवाओं के बाद भी प्रेगनेंसी नहीं हो रही, तो आईवीएफ (IVF) एक कामयाब विकल्प हो सकता है। PCOD वाली महिलाओं के लिए आईवीएफ बहुत सफल होता है क्योंकि उनके पास एग रिजर्व (egg reserve) बहुत अच्छा होता है। आईवीएफ में एग रिट्रीवल के दौरान एक साथ कई मैच्योर एग्स मिल जाते हैं, जिससे अच्छे एम्ब्रीओ (embryo) बनने की संभावना बढ़ जाती है।
pcod kaise hota hai यह सवाल आपकी माँ बनने की क्षमता पर सवाल नहीं है। यह सिर्फ कंडीशन है जो खुद की केयर और अनुशासन से सही हो सकती है। PCOD के साथ भी माँ बनना पूरी तरह संभव है। ज़रुरत है तो बस सही समय पर सही सलाह की। अपनी डाइट पर ध्यान दें, एक्टिव रहें और अगर 6 महीने कोशिश के बाद भी कंसीव न हो, तो फर्टिलिटी एक्सपर्ट (fertility expert) से मिलकर दूसरे विकल्पों जैसे IVF इत्यादि पर विचार करें।
हाँ, 80% महिलाएं सही लाइफस्टाइल और मामूली दवाओं की मदद से नैचुरली कंसीव करती हैं।
ज्यादा कैफीन हॉर्मोन्स को डिस्टर्ब कर सकता है और इंसुलिन लेवल को बढ़ा सकता है, जो PCOD को और खराब कर सकता है।
हाँ, इसे लीन पीसीओडी (Lean PCOD) कहते हैं। इसमें वजन नहीं बढ़ता, लेकिन अंदरूनी हॉर्मोनल गड़बड़ी वैसी ही रहती है।
देर रात तक स्क्रीन देखने से मेलाटोनिन (melatonin) हॉर्मोन कम बनता है, जो एग्स की क्वालिटी और ओव्यूलेशन को प्रभावित करता है।
नहीं, दवाइयां सिर्फ आपके सिम्पटम्स (symptoms) जैसे पीरियड्स को रेगुलर करने या ओव्यूलेशन में मदद करती हैं।