पीरियड की तारीख़ नज़दीक आते ही शरीर कुछ बदलाव होने लगता है। कभी बिना वजह रोने का मन करता है, तो कभी चॉकलेट खाने का, तो कभी पेट में हल्की ऐंठन शुरू हो जाती है। अगर आपके साथ भी ऐसा होता है तो यह Period aane se pehle ke lakshan यानी PMS हैं, जिसका पूरा मतलब होता है प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (Premenstrual Syndrome) और ये पीरियड शुरू होने से 7 से 10 दिन पहले दिखने लगते हैं।
PMS हर महिला में अलग-अलग होते हैं। किसी को सिर्फ़ हल्की थकान होती है, किसी को इतना तेज़ मूड स्विंग होता है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित हो जाती है। कुछ महिलाओं को लगभग कोई लक्षण नहीं होते, जबकि कुछ के लिए यह समय बहुत मुश्किल होता है।
इस आर्टिकल में हम समझेंगे कि पीरियड से पहले शरीर में हर दिन क्या बदलाव आते हैं, कौन से लक्षण नॉर्मल हैं और कब डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। यह भी जानेंगे कि PMS और प्रेगनेंसी के लक्षणों में फर्क कैसे करें?
Period aane se pehle ke lakshan यानी PMS हॉर्मोन में बदलाव होने की वजह से दिखाई देते हैं। ओव्यूलेशन के बाद शरीर में प्रोजेस्टेरोन का लेवल बढ़ता है और एस्ट्रोजन कम होने लगता है। यह हॉर्मोन्स में यह बदलाव दिमाग यानी ब्रेन के सेरोटोनिन लेवल को प्रभावित करता है। सेरोटोनिन ही आपके मूड को कंट्रोल करता है।
जब सेरोटोनिन कम होता है तो मूड खराब होता है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है, और खाने की क्रेविंग होती है। साथ ही प्रोजेस्टेरोन की वजह से शरीर में पानी रुकने लगता है जिससे ब्लोटिंग और भारीपन महसूस होता है।
हर महिला में हॉर्मोन सेंसिटिविटी अलग होती है, इसीलिए किसी को PMS के लक्षण ज़्यादा होते हैं और किसी को कम।
इस टाइम पर लक्षण हल्के होते हैं और कई बार ध्यान भी नहीं जाता। ब्रेस्ट में हल्का भारीपन शुरू हो सकता है। मूड थोड़ा ऑफ़ लग सकता है। स्किन पर छोटे-छोटे पिंपल्स आने लगते हैं क्योंकि हॉर्मोन में चेंज होने से शरीर में तेल का प्रोडक्शन बढ़ता है।
इस समय तक लक्षण थोड़े बढ़ जाते हैं। ब्रेस्ट में दर्द या टेंडरनेस बढ़ जाती है, पेट फूला हुआ लगता है और कपड़े टाइट महसूस होने लगते हैं। थकान बढ़ती है और एनर्जी कम लगती है। मीठा या नमकीन खाने की क्रेविंग शुरू हो जाती है।
यह पीक टाइम होता है जब लक्षण सबसे ज़्यादा महसूस होते हैं। पेट के निचले हिस्से में हल्की ऐंठन शुरू हो सकती है, कमर में दर्द हो सकता है। मूड स्विंग तेज़ हो जाता है जैसे एक पल में ठीक लग रहा होता है, और अगले ही पल रोने का मन करता है। सिरदर्द हो सकता है और नींद में दिक्कत आ सकती है।
Period aane se pehle ke lakshan यानी PMS पीरियड शुरू होते ही कम होने लगते हैं या गायब हो जाते हैं। यही PMS और प्रेगनेंसी के लक्षणों में सबसे बड़ा फर्क है।
यह सबसे कॉमन period aane se pehle ke lakshan में से एक है। ब्रेस्ट टिश्यू हॉर्मोन सेंसिटिव होते हैं, इसीलिए प्रोजेस्टेरोन बढ़ने पर सूजन और दर्द होता है। कुछ महिलाओं को इतना दर्द होता है कि ब्रा पहनना भी मुश्किल लगता है।
यूट्रस की मांसपेशियाँ पीरियड की तैयारी में सिकुड़ने लगती हैं जिससे पेट के निचले हिस्से में क्रैम्प्स होते हैं। यह दर्द हल्का भी हो सकता है और तेज़ भी।
पेट फूला हुआ लगता है, जींस टाइट फील होती है। यह शरीर में वॉटर रिटेंशन की वजह से होता है। कुछ महिलाओं का वज़न भी 1-2 किलो बढ़ जाता है जो पीरियड के बाद वापस नॉर्मल हो जाता है।
बिना कुछ किए भी थकान लगती है। एनर्जी कम रहती है और काम में मन नहीं लगता। यह हॉर्मोनल शिफ्ट और सेरोटोनिन के कम होने की वजह से होता है।
एस्ट्रोजन लेवल गिरने से कुछ महिलाओं को सिरदर्द या माइग्रेन हो जाता है। यह पीरियड से 1-2 दिन पहले सबसे ज़्यादा होता है।
पिंपल्स या एक्ने निकल आते हैं क्योंकि स्किन ऑयली हो जाती है। यह हॉर्मोनल फ्लक्चुएशन की वजह से होता है।
यह period aane se pehle ke lakshan में सबसे ज़्यादा परेशान करने वाला होता है। एक मिनट में खुश, अगले मिनट में उदास। छोटी-छोटी बातों पर इरिटेशन होती है। बिना किसी ख़ास वजह के रोने का मन करता है।
धैर्य यानी पेशेंस कम हो जाता है। परिवार या पार्टनर की छोटी-सी बात पर भी गुस्सा आ जाता है। यह सेरोटोनिन लेवल गिरने की वजह से होता है।
मन में अजीब-सी बेचैनी रहती है। कुछ महिलाओं को पैनिक अटैक जैसा भी महसूस होता है।
चॉकलेट, आइसक्रीम, चिप्स या कुछ ख़ास खाने की बहुत इच्छा होती है। मीठा खाने से अस्थायी रूप से मूड बेहतर होता है, इसे सेरोटोनिन लेवल बढ़ाने का, दिमाग का अपना तरीका कह सकते हैं।
PMS के लक्षण पीरियड शुरू होते ही कम हो जाते हैं या गायब हो जाते हैं। प्रेगनेंसी के लक्षण बने रहते हैं और समय के साथ बढ़ जाते हैं।
PMS में ब्रेस्ट में दर्द होता है जो पीरियड आने पर कम हो जाता है। प्रेगनेंसी में ब्रेस्ट में दर्द के साथ निप्पल्स का रंग गहरा होने लगता है और यह कम नहीं होता।
PMS में मतली बहुत रेयर होती है। प्रेगनेंसी में मॉर्निंग सिकनेस यानी मतली और उल्टी कॉमन है, ख़ासकर सुबह के समय।
PMS के बाद नॉर्मल पीरियड ब्लीडिंग होती है जो 3-7 दिन तक चलती है। प्रेगनेंसी में बहुत हल्की, पिंक या ब्राउन रंग की, इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग हो सकती है जो 1-2 दिन में खत्म हो जाती है।
PMS में पेशाब की फ्रीक्वेंसी नॉर्मल रहती है। प्रेगनेंसी में बार-बार पेशाब आना कॉमन है क्योंकि hCG हॉर्मोन किडनी में ब्लड फ्लो बढ़ाता है।
अगर इनमें से कोई भी लक्षण हो तो डॉक्टर से ज़रूर मिलें। PMDD का इलाज संभव है।
नमक कम खायें क्योंकि इससे ब्लोटिंग बढ़ती है। कैफीन कम करें क्योंकि यह ब्रेस्ट टेंडरनेस और एंग्ज़ाइटी बढ़ा सकता है। छोटे-छोटे मील्स खाएं ताकि ब्लड शुगर स्टेबल रहे। कैल्शियम और मैग्नीशियम से भरपूर डाइट जैसे दूध, दही, पालक, और बादाम खाएं।
हल्की वॉक, योगा, या स्विमिंग से एंडॉर्फिन रिलीज़ होता है जो नेचुरल पेनकिलर और मूड बूस्टर है। हफ्ते में कम से कम 3-4 बार 30 मिनट की एक्सरसाइज़ करें।
PMS के समय स्ट्रेस इसके लक्षणों को और बढ़ा देता है ऐसे में डीप ब्रीदिंग, मेडिटेशन, या कोई भी रिलैक्सिंग एक्टिविटी मददगार होती है।
7-8 घंटे की नींद लें। नींद की कमी मूड स्विंग और थकान को बढ़ाती है।
पेट में ऐंठन के लिए हीटिंग पैड या गर्म पानी की बोतल से सिकाई करें। इससे मसल्स को आराम मिलता है।
Period aane se pehle ke lakshan को समझना और पहचानना ज़रूरी है। अगर आप जानती हैं कि पीरियड से 5-7 दिन पहले आपका मूड खराब होता है या पेट में भारीपन आता है, तो आप पहले से तैयार रह सकती हैं।
ज़्यादातर PMS नॉर्मल होते हैं और लाइफस्टाइल में बदलाव से मैनेज हो जाते हैं। लेकिन अगर लक्षण इतने गंभीर हों कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित हो, तो डॉक्टर से बात करें।
आमतौर पर 7 से 10 दिन पहले। कुछ महिलाओं में ओव्यूलेशन के तुरंत बाद यानी 14 दिन पहले से भी शुरू हो सकते हैं।
PMS के लक्षण पीरियड आने पर खत्म हो जाते हैं, प्रेगनेंसी के लक्षण बने रहते हैं। प्रेगनेंसी में मतली और बार-बार पेशाब आना ज़्यादा कॉमन है।
ज़रूरी नहीं। स्ट्रेस, डाइट, नींद, और अन्य फैक्टर्स की वजह से हर महीने लक्षणों की तीव्रता अलग हो सकती है।
जब लक्षण इतने गंभीर हों कि काम या रिश्ते प्रभावित हों, जब डिप्रेशन या एंग्ज़ाइटी बहुत तीव्र हो, या जब घरेलू उपाय काम न करें।
हाँ, 30 और 40 की उम्र में PMS के लक्षण बढ़ सकते हैं। पेरीमेनोपॉज़ के दौरान भी लक्षणों में बदलाव आता है।