कई महिलाओं को अल्ट्रासाउंड के दौरान अचानक पता चलता है कि गर्भाशय यानी यूट्रस (uterus) के अंदर एक छोटी सी पॉलीप (Polyp) है। जिसका सरल भाषा में अर्थ यानी Polyps meaning in hindi होता है कि यूट्रस की अंदरूनी परत पर एक छोटी मांसल गाँठ हो गयी है। इसे एंडोमेट्रियल पॉलीप भी कहा जाता है। यह आमतौर पर बिनाइन (benign) होती है, यानी ज़्यादातर मामलों में कैंसर नहीं होती।
बहुत सी महिलाओं को जीवन भर पता ही नहीं चलता कि उनके यूट्रस में पॉलीप है, क्योंकि इसके कोई खास लक्षण नहीं होते। लेकिन जब कोई महिला प्रेगनेंसी की कोशिश कर रही हो, तो यह छोटी सी गाँठ भी महत्वपूर्ण हो जाती है। कई बार यही पॉलीप भ्रूण के यूट्रस में चिपकने यानी एम्ब्रीओ इम्प्लांटेशन (Embryo Implantation) पर असर डाल सकती है।
अच्छी बात यह है कि इसका इलाज आसान और सेफ होता है। सही समय पर जाँच और उपचार होने पर प्रेगनेंसी की संभावना बढ़ सकती है। इस आर्टिकल में हम विस्तार से जानेंगे Polyps meaning in hindi और समझेंगे कि इससे क्या समस्याएँ हो सकती हैं और कब इसका इलाज करवाना जरूरी होता है।
यूट्रस के अंदर एक मुलायम परत होती है जिसे एंडोमेट्रियम (Endometrium) कहते हैं। यही वह परत है जो हर महीने हार्मोन के प्रभाव से मोटी होती है और अगर गर्भधारण न हो तो पीरियड्स के दौरान बाहर निकल जाती है।
कभी-कभी इसी परत का एक छोटा हिस्सा ज़्यादा बढ़ने लगता है और बढ़ कर एक उभरी हुई गाँठ बन जाती है। इसी को एंडोमेट्रियल पॉलीप (Endometrial Polyps) कहते हैं।
पॉलीप का आकार अलग-अलग हो सकता है। कुछ बहुत छोटी, तिल या चावल के दाने जितनी होती हैं। और कुछ अंगूर के आकार तक बड़ी भी हो सकती हैं।
कुछ महिलाओं में केवल एक पॉलीप होती है, जबकि कुछ में एक से अधिक पॉलीप्स भी हो सकती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकांश पॉलीप्स कैंसर नहीं होतीं। लगभग 99 प्रतिशत मामलों में यह बिनाइन होती हैं, मतलब इनसे डरने की बात नहीं होती। लेकिन अगर 40 वर्ष की उम्र के बाद या रजोनिवृत्ति के बाद पॉलीप दिखाई दे, तो उसकी जाँच करवाना जरूरी होता है।
कई महिलाओं में पॉलीप होने के बावजूद कोई खास लक्षण नहीं होते। उन्हें पता ही नहीं चलता कि गर्भाशय में पॉलीप है। अक्सर यह अल्ट्रासाउंड या फर्टिलिटी जाँच के दौरान ही दिखाई देती है। लेकिन कुछ महिलाओं में कुछ संकेत दिखाई दे सकते हैं।
अगर किसी महिला की रजोनिवृत्ति हो चुकी मतलब उसका मेनोपॉज़ हो चुका है, लेकिन उसके बाद भी ब्लीडिंग होती है, तो जरूर डॉक्टर से जाँच करवानी चाहिए ।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि इन लक्षणों के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। इसलिए सही कारण पता करने के लिए डॉक्टर की जाँच आवश्यक होती है।
कई मामलों में Polyp का आकार छोटा होता है और इससे कोई समस्या नहीं होती। लेकिन जब प्रेगनेंसी की बात आती है, तो कभी-कभी polyp कोई परेशानी खड़ी कर सकती है।
सबसे पहले, अगर polyp उस जगह पर हो जहाँ फैलोपियन ट्यूब यूट्रस से जुड़ती है, तो यह स्पर्म के रास्ते में रुकावट पैदा कर सकती है। ऐसे में स्पर्म एग तक आसानी से नहीं पहुँच पाता।
दूसरा कारण यूट्रस के अंदर का वातावरण है। polyp होने पर कई बार वहाँ हल्की सूजन या इन्फ्लेमेशन (inflammation) बना रहता है। इससे एम्ब्रीओ इम्प्लांटेशन मुश्किल हो सकता है।
तीसरा कारण यह है कि polyp की मौजूदगी से एंडोमेट्रियम की संरचना यानी शेप (shape) थोड़ी बदल जाती है। इससे वह जगह उतनी अनुकूल नहीं रहती जहाँ भ्रूण को इम्प्लांट होना होता है।
फर्टिलिटी क्लीनिक में कई बार ऐसा देखा गया है कि अच्छी क्वालिटी का एम्ब्रीओ होने के बावजूद बार-बार इम्प्लांट नहीं हो पाता। बाद में जाँच करने पर एक छोटी polyp दिखाई देती है जो इस समस्या का कारण बन रही होती है।
इस सवाल का जवाब हर मरीज के लिए अलग हो सकता है। वैसे तो हर polyp को तुरंत निकालना जरूरी नहीं होता। डॉक्टर निर्णय लेते समय कुछ महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखते हैं।
सबसे पहले देखा जाता है कि polyp की पोजीशन क्या है। अगर polyp फैलोपियन ट्यूब के मुँह के पास है, तो यह स्पर्म के रास्ते में बाधा बन सकती है। ऐसी स्थिति में इसे निकालना बेहतर माना जाता है।
दूसरी बात है polyp का साइज। छोटी polyps, खासकर दो सेंटीमीटर से कम आकार की, कई बार बिना इलाज के भी छोड़ी जा सकती हैं, लेकिन तब जब कोई लक्षण नहीं हों।
लेकिन अगर polyp बड़ी है, या एक से अधिक polyps मौजूद हैं, तो उन्हें निकालना बेहतर होता है।
तीसरी महत्वपूर्ण बात है लक्षणों की मौजूदगी। अगर किसी महिला को बार-बार स्पॉटिंग, भारी पीरियड्स या अनियमित ब्लीडिंग हो रही है, तो polyp एक्टिव हो सकती है और यूट्रस के वातावरण को प्रभावित कर सकती है। ऐसी स्थिति में पॉलीप निकालना अक्सर बेहतर विकल्प होता है।
Polyp निकालने की प्रक्रिया को हिस्टेरोस्कोपी (Hysteroscopy) कहा जाता है। इस प्रक्रिया में डॉक्टर योनि मतलब वेजाइना (vegina) के रास्ते यूट्रस के अंदर एक पतली ट्यूब डालते हैं जिसमें कैमरा लगा होता है। इस कैमरे की मदद से डॉक्टर यूट्रस के अंदर की पूरी सतह को स्क्रीन पर देख सकते हैं। इस प्रोसेस में अगर पॉलीप दिखाई देती है, तो उसी समय विशेष उपकरणों की मदद से उसे काटकर निकाल दिया जाता है। इस पूरे प्रोसीजर में आमतौर पर 15 से 20 मिनट लगते हैं।
इसमें पेट पर कोई चीरा नहीं लगाया जाता और न ही टाँके लगाने पड़ते हैं। बस हल्की बेहोशी दी जाती है ताकि मरीज को असुविधा महसूस न हो।
प्रोसीजर के बाद कुछ घंटों के आराम के बाद घर जा सकते हैं। कुछ महिलाओं को एक-दो दिन हल्की ऐंठन या हल्की ब्लीडिंग हो सकती है जो जल्दी ठीक हो जाती है।
अगर आप IVF ट्रीटमेंट की तैयारी कर रही हैं और आपकी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में Polyp दिखाई देती है, तो ज़्यादातर फ़र्टिलिटी एक्सपर्ट पहले उसे निकालने की सलाह देते हैं। इसका कारण यह है कि Polyps एम्ब्रीओ के इम्प्लांटेशन को प्रभावित कर सकती है। कुछ स्टडीज़ में पाया गया है कि Polyp निकालने के बाद IVF की सक्सेस रेट बढ़ सकती है।
आम तौर पर पॉलीप निकालने के एक से दो महीने बाद IVF प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।कभी-कभी ऐसा भी होता है कि IVF के दौरान अल्ट्रासाउंड में नई पॉलीप दिखाई देती है जो पहले नहीं दिखी थी।
ऐसी स्थिति में कई डॉक्टर पहले एग्स निकालकर एम्ब्रीओ तैयार कर लेते हैं और उन्हें फ्रीज़ कर देते हैं। इसके बाद Polyp हटाकर अगली साइकिल में एम्ब्रीओ ट्रांसफर किया जाता है।
कभी-कभी IVF में अच्छे एम्ब्रीओ बनने के बावजूद प्रेगनेंसी नहीं रुकती। ऐसी स्थिति में यूट्रस की अंदरूनी जाँच करना जरूरी हो सकता है।
हिस्टेरोस्कोपी से कई बार ऐसी छोटी Polyps दिखाई देती हैं जो सामान्य अल्ट्रासाउंड में नहीं दिखतीं। जब ऐसी Polyps को हटाया जाता है, तो कई मामलों में अगली IVF साइकिल में गर्भधारण हो जाता है।
इसलिए अगर बार-बार IVF असफल हो रहा हो, तो गर्भाशय की विस्तृत जाँच करवाना एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
कुछ महिलाओं में पॉलीप दोबारा बन सकती है। लगभग 10 से 15 प्रतिशत महिलाओं में Polyp हटाने के बाद दोबारा बनने की संभावना देखी गई है।
इसी वजह से कई विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि Polyps हटाने के बाद अगर आप प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं, तो कोशिश में बहुत ज्यादा देरी नहीं करनी चाहिए।
अक्सर पॉलीप हटाने के बाद के 6 से 12 महीने गर्भधारण की कोशिश के लिए अच्छा समय माने जाते हैं।
अगर आपकी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में Polyps दिखाई दी है, तो सबसे पहले घबराने की ज़रूरत नहीं है। Polyps meaning in hindi समझने के बाद यह साफ हो जाता है कि ज़्यादातर मामलों में यह एक छोटी बिनाइन (benign) गाँठ होती है। कई महिलाओं को तो इसके बारे में तब तक पता ही नहीं चलता जब तक कोई जाँच न हो।
लेकिन अगर आप प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं, तब यूट्रस के अंदर की छोटी-सी भी चीज़ महत्वपूर्ण हो सकती है। कुछ मामलों में Polyp एम्ब्रीओ के इम्प्लांटेशन में बाधा डाल सकती है या यूट्रस के अंदर के वातावरण पर असर डाल सकती है।
अच्छी बात यह है कि आज Polyp की पहचान और इलाज दोनों आसान हैं। हिस्टेरोस्कोपी जैसी सरल प्रक्रिया से इसे सुरक्षित तरीके से हटाया जा सकता है, और उसके बाद कंसीव करने की संभावना बेहतर हो सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर Polyp का इलाज एक जैसा नहीं होता। उसका आकार, स्थान, लक्षण और आपका फर्टिलिटी प्लान इन सबको देखकर ही निर्णय लिया जाता है।
इसलिए अगर आपकी रिपोर्ट में Polyp दिखाई दे, तो सही जानकारी के साथ अपने डॉक्टर से सलाह लेना ही सबसे समझदारी भरा कदम है।