प्राथमिक और द्वितीयक बांझपन: कारण, जोखिम और समाधान

Last updated: January 06, 2026

Overview

एक साल तक नियमित और बिना सुरक्षा के संबंध बनाने के बाद भी गर्भधारण न हो पाना बांझपन (इन्फर्टिलिटी) कहलाता है। अगर आप प्राथमिक और द्वितीयक बांझपन के बीच का फर्क समझ लें, तो अपनी स्थिति को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं। इस लेख में हम बांझपन के इन दोनों प्रकारों के सामान्य लक्षण और कारणों पर बात करेंगे, ताकि आपको अपनी स्थिति और उपलब्ध मेडिकल समाधान स्पष्ट रूप से समझ आ सकें।

भूमिका

बांझपन का मतलब है 12 महीनों या उससे अधिक समय तक नियमित, असुरक्षित संबंध के बावजूद गर्भ न ठहरना। यह स्थिति पुरुषों और महिलाओं, दोनों को प्रभावित कर सकती है, और इसे आमतौर पर दो प्रकारों में बांटा जाता है: प्राथमिक और द्वितीयक।

  • प्राथमिक बांझपन तब माना जाता है, जब किसी कपल में पहले कभी गर्भधारण नहीं हुआ हो।
  • द्वितीयक बांझपन तब माना जाता है, जब पहले एक बार गर्भधारण/सफल प्रेग्नेंसी हो चुकी हो, लेकिन अब दोबारा गर्भ ठहरने में परेशानी हो रही हो।

यह जानना जरूरी है कि बांझपन प्राथमिक है या द्वितीयक, क्योंकि इससे जांच और इलाज की दिशा तय होती है। द्वितीयक बांझपन में पहले गर्भधारण हो चुका होने के कारण भावनात्मक उलझन और निराशा अक्सर ज्यादा होती है।

प्राथमिक बांझपन क्या है?

जब किसी कपल में पहले कभी गर्भधारण नहीं हुआ हो और फिर भी एक साल तक नियमित, असुरक्षित संबंध बनाने के बाद गर्भ न ठहरे, तो इसे प्राथमिक बांझपन कहा जाता है। यह अक्सर उन कपल्स में देखा जाता है जो पहली बार परिवार शुरू करने की कोशिश कर रहे होते हैं। कुछ मामलों में प्राथमिक बांझपन आनुवंशिक भी हो सकता है, यानी यह माता-पिता से आगे पीढ़ी में आ सकता है। ऐसे मामलों में खास जांच और उपचार की जरूरत पड़ सकती है।

प्राथमिक बांझपन की मुख्य बातें:

  • जब पहले किसी भी तरह की प्रेग्नेंसी का इतिहास न हो।
  • अक्सर शादी/रिश्ते के शुरुआती वर्षों में पहचान में आता है।
  • कारण पुरुष या महिला किसी में भी रिप्रोडक्टिव, हार्मोनल या शारीरिक (एनेटॉमिकल) समस्या हो सकती है।

द्वितीयक बांझपन क्या है?

जब पहले एक या एक से ज्यादा बार गर्भधारण/सफल प्रेग्नेंसी हो चुकी हो, लेकिन अब दोबारा गर्भ ठहरने या प्रेग्नेंसी को पूरा समय तक ले जाने में परेशानी हो, तो इसे द्वितीयक बांझपन कहा जाता है। कई लोगों को लगता है कि यह उतना गंभीर नहीं होता, लेकिन यह प्राथमिक बांझपन जितना ही गंभीर हो सकता है, और कई बार मानसिक रूप से ज्यादा तकलीफदेह भी, क्योंकि पहले गर्भधारण हो चुका होता है और फिर अचानक दिक्कत आना शॉक जैसा लग सकता है।

कुछ जरूरी बातें:

  • कुछ मामलों में यह प्राथमिक बांझपन से भी ज्यादा देखा जा सकता है, क्योंकि कई कपल्स दूसरा बच्चा देर से प्लान करते हैं, जिससे उम्र और दूसरे फैक्टर्स असर डालते हैं।
  • अक्सर सामाजिक माहौल में इसे कम आंका जाता है या गंभीरता से नहीं लिया जाता।
  • कई बार इस समस्या की पहचान देर से हो पाती है, क्योंकि “पहले तो हो गया था” वाली सोच हावी रहती है।

चाहे आप किसी भी तरह की फर्टिलिटी समस्या से गुजर रहे हों, प्रोफेशनल सलाह लेना हमेशा बेहतर रहता है, ताकि सही जांच और सही दिशा में उपचार समय पर शुरू हो सके।

महिलाओं में प्राथमिक बांझपन के आम कारण

महिलाओं में प्राथमिक बांझपन के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर कारण स्त्री रोग से जुड़ी समस्याओं से संबंधित होते हैं। आम कारण ये हैं:

  • ओव्यूलेशन से जुड़ी समस्याएं: PCOS यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम एक ऐसी स्थिति है जिसमें ओव्यूलेशन प्रभावित हो जाता है और महिलाओं का मासिक चक्र अनियमित हो जाता है।
  • फैलोपियन ट्यूब का ब्लॉक होना: ट्यूबरकुलोसिस या ट्यूब में संक्रमण के कारण रुकावट हो सकती है, जिससे अंडा और शुक्राणु मिल नहीं पाते।
  • हार्मोनल असंतुलन: हार्मोन स्तर में गड़बड़ी पीरियड्स और ओव्यूलेशन को प्रभावित कर सकती है।
  • गर्भाशय से जुड़ी समस्याएं: जन्म से गर्भाशय में बनावट की समस्या (जैसे यूटेराइन सेप्टम) या फाइब्रॉएड इम्प्लांटेशन में बाधा बन सकते हैं।
  • अंडों की गुणवत्ता में कमी या ओवरी की क्षमता कम होना: इसका सबसे आम कारण उम्र बढ़ना है। खासकर 35 साल के बाद गर्भधारण तुलनात्मक रूप से कठिन हो सकता है और प्रेग्नेंसी में जटिलताएं भी बढ़ सकती हैं।

पुरुषों में प्राथमिक बांझपन के आम कारण

पुरुषों में बांझपन की वजह कई बार शुक्राणुओं की संख्या या गुणवत्ता से जुड़ी होती है, जैसे शुक्राणु कम होना, असामान्य होना, गति कम होना या शुक्राणु न होना। आम कारण ये हैं:

  • शुक्राणुओं की संख्या कम होना या गति कम होना: शुक्राणु की गति में दिक्कत या हल्की असामान्यता भी फर्टिलाइजेशन को मुश्किल बना सकती है।
  • हार्मोन से जुड़ी समस्याएं: हार्मोन की गड़बड़ी से शुक्राणु बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिससे संख्या और गति दोनों पर असर पड़ सकता है।
  • वैरिकोसील या कोई ब्लॉकेज: अंडकोष की नसों का फूलना (वैरिकोसील) या नलिकाओं में रुकावट फर्टिलिटी को प्रभावित कर सकती है।
  • गर्भाशय से जुड़ी असामान्यताएं: जन्म से गर्भाशय की बनावट में समस्या (जैसे यूटेराइन सेप्टम) या फाइब्रॉएड होने पर एम्ब्रियो का गर्भाशय में ठीक से चिपकना (इम्प्लांटेशन) मुश्किल हो सकता है।
  • वास डिफरेंस का ब्लॉक होना: अंडकोष में शुक्राणु बनते रहने के बावजूद वीर्य में शुक्राणु की संख्या शून्य हो सकती है।

द्वितीयक बांझपन के आम कारण

अगर पहले नेचुरली गर्भधारण हो चुका हो और बाद में दोबारा गर्भ ठहरने में परेशानी आने लगे, तो यह स्थिति कपल्स के लिए मानसिक रूप से काफी तनावपूर्ण हो सकती है। ऐसा कई नए या बदलते कारणों की वजह से हो सकता है। ये कारण महिला या पुरुष, किसी में भी हो सकते हैं और पहली प्रेग्नेंसी से पहले या बाद में विकसित हो सकते हैं।

महिलाओं में

  • उम्र बढ़ने के साथ फर्टिलिटी कम होना: उम्र के साथ अंडों की संख्या और गुणवत्ता दोनों कम होने लगती हैं, खासकर 35 साल के आसपास।
  • हार्मोनल असंतुलन: थायरॉयड की समस्या, प्रोलैक्टिन का बढ़ना या इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ना, ये सब ओव्यूलेशन को रोक सकते हैं।
  • स्कार टिशू या चिपकाव (Adhesions): डिलीवरी, सी-सेक्शन या डी एंड सी जैसी प्रक्रियाओं के बाद गर्भाशय में स्कार टिशू बन सकता है या फैलोपियन ट्यूब प्रभावित हो सकती है।
  • वजन बढ़ना या मोटापा: पहली प्रेग्नेंसी के बाद वजन बहुत बढ़ना/घटना हार्मोन और ओव्यूलेशन पैटर्न को बदल सकता है।
  • मेडिकल कंडीशन्स: पहले जो समस्या असर नहीं डाल रही थी, जैसे एंडोमेट्रियोसिस या पीसीओएस, वह बाद में फर्टिलिटी को प्रभावित कर सकती है।

पुरुषों में

  • लाइफस्टाइल में बदलाव: तनाव, खराब डाइट, शराब, तंबाकू और कम शारीरिक गतिविधि, ये शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता घटा सकते हैं।
  • उम्र से जुड़े बदलाव: उम्र बढ़ने के साथ स्पर्म काउंट और स्पर्म की गति (मोटिलिटी) कम हो सकती है, जिससे फर्टिलाइजेशन प्रभावित होता है।
  • नई स्वास्थ्य समस्याएं: डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या हार्मोनल गड़बड़ी जैसी समस्याएं बीच के समय में विकसित होकर शुक्राणु उत्पादन पर असर डाल सकती हैं।
  • पर्यावरणीय टॉक्सिन्स का एक्सपोजर: काम या हॉबी बदलने के कारण केमिकल्स, ज्यादा गर्मी, या रेडिएशन का संपर्क फर्टिलिटी पर नकारात्मक असर डाल सकता है।

द्वितीयक बांझपन के इलाज में असली कारण को पहचानना सबसे जरूरी होता है। कई बार सही जांच और लाइफस्टाइल/हेल्थ में सुधार से गर्भधारण की संभावना काफी बढ़ सकती है।

प्राथमिक और द्वितीयक बांझपन की जांच कैसे होती है?

किसी भी इलाज की असली शुरुआत सही कारण पहचानने से होती है। प्राथमिक हो या द्वितीयक, दोनों तरह के बांझपन में आमतौर पर दोनों पार्टनर्स की जांच की जाती है, ताकि समस्या का स्रोत स्पष्ट हो सके।

महिलाओं में जांच

महिलाओं में फर्टिलिटी जांच की शुरुआत आम तौर पर डिटेल्ड मेडिकल हिस्ट्री और ओव्यूलेशन ट्रैकिंग से होती है।

महिलाओं के लिए

महिलाओं में फर्टिलिटी की जांच सबसे पहले विस्तृत मेडिकल हिस्ट्री और ओव्यूलेशन की स्थिति समझने से शुरू होती है।

1. ओव्यूलेशन ट्रैकिंग:

बेसल बॉडी टेम्परेचर पर नज़र रखना, ओव्यूलेशन प्रेडिक्टर किट का इस्तेमाल करना, या हार्मोन लेवल (जैसे LH और प्रोजेस्टेरोन) की जांच से यह पता चलता है कि ओव्यूलेशन नियमित रूप से हो रहा है या नहीं।

2. हार्मोन ब्लड टेस्ट:

खून के सैंपल से रिप्रोडक्टिव हार्मोन की जांच की जाती है, जैसे:

  • फॉलिकल-स्टिमुलेटिंग हार्मोन (FSH)
  • ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (LH)
  • प्रोलैक्टिन
  • थायरॉइड हार्मोन
  • ओएस्ट्राडियोल

3. पेल्विक अल्ट्रासाउंड:

ओवरी और गर्भाशय की स्थिति देखने के लिए इमेजिंग की जाती है, जैसे फाइब्रॉएड, सिस्ट या अन्य असामान्यताएं तो नहीं हैं।

4. हिस्टेरोसाल्पिंगोग्राफी (एचएसजी):

यह एक एक्स-रे जांच होती है, जिसमें डॉक्टर देखते हैं कि फैलोपियन ट्यूब खुली हैं या नहीं, और गर्भाशय की कैविटी सामान्य है या नहीं।

5. एएमएच टेस्ट:

एंटी-मुल्लेरियन हार्मोन की जांच से ओवरी रिज़र्व का अंदाज़ा लगता है, यानी ओवरी में बचे अंडों की संख्या कितनी है। फर्टिलिटी पोटेंशियल समझने में यह टेस्ट काफी उपयोगी माना जाता है।

पुरुषों में जांच

पुरुषों में जांच का फोकस मुख्य रूप से शुक्राणुओं की गुणवत्ता, हार्मोन और किसी संरचनात्मक समस्या पर होता है।

  • टेस्टिकुलर/फिजिकल एग्ज़ामिनेशन: अंडकोष का आकार, बनावट और वैरिकोसील की मौजूदगी देखी जाती है।
  • सीमन एनालिसिस: स्पर्म काउंट, स्पर्म की गति (मोटिलिटी) और बनावट (मॉर्फोलॉजी) की जांच की जाती है।
  • हार्मोन ब्लड टेस्ट: टेस्टोस्टेरोन, एफएसएच और एलएच जैसे हार्मोन की जांच।
  • स्क्रोटल अल्ट्रासाउंड: अगर किसी शारीरिक असामान्यता की आशंका हो, तो यह जांच की जा सकती है।

प्राथमिक या द्वितीयक बांझपन की जांच अक्सर दोनों पार्टनर्स की मिलकर की गई प्रक्रिया होती है और इसे पूरा होने में कई हफ्ते भी लग सकते हैं।

फर्टिलिटी विशेषज्ञ से कब मिलना चाहिए?

अगर आपको नीचे दिए गए संकेत दिखें, तो फर्टिलिटी विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर रहता है:

  • गर्भधारण की कोशिश हो रही है, लेकिन सफलता नहीं मिल रही अगर आप 12 महीनों से कोशिश कर रहे हैं (या महिला की उम्र 35 से अधिक है और 6 महीनों से कोशिश के बाद भी गर्भ नहीं ठहर रहा), तो डॉक्टर से मिलना चाहिए।
  • पीरियड्स अनियमित हों या कोई हेल्थ कंसर्न हो पीरियड्स का पैटर्न बदलना, थायरॉयड की समस्या, PCOS, या मिसकैरेज का इतिहास, ये सभी बातें फर्टिलिटी पर असर डाल सकती हैं और जांच की जरूरत हो सकती है।
  • पहले प्रेग्नेंसी हो चुकी है, फिर भी अब गर्भ नहीं ठहर रहा अगर पहले सफल प्रेग्नेंसी के बाद अब दोबारा गर्भधारण में परेशानी हो रही है, तो विशेषज्ञ सही जांच और भरोसेमंद द्वितीयक बांझपन इलाज के विकल्प बता सकते हैं।
  • समय पर विशेषज्ञ से मिलने से समस्या जल्दी समझ में आती है और सही समाधान तक पहुंचने की संभावना बढ़ती है, इसलिए देर न करें।

Also read: बांझपन के इलाज के तरीके क्या हैं?

निष्कर्ष

प्राथमिक हो या द्वितीयक, दोनों तरह का बांझपन जीवन को प्रभावित कर सकता है और अनिश्चितता व भावनात्मक उतार-चढ़ाव बढ़ा सकता है। लेकिन अगर आप दोनों के बीच का फर्क, उनके कारण, और जांच की प्रक्रिया समझ लें, तो सही समय पर सही कदम उठा पाना आसान हो जाता है। कई मामलों में प्राथमिक और द्वितीयक बांझपन का इलाज दवाओं और जीवनशैली में बदलाव से संभव होता है, बस समय और सही मार्गदर्शन जरूरी है। जल्दी जांच, समझदारी भरा सपोर्ट और विशेषज्ञ की सलाह आपके माता-पिता बनने की संभावना को बेहतर बना सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या द्वितीयक बांझपन, प्राथमिक बांझपन से ज्यादा आम है?

 

कुछ मामलों में हाँ, खासकर जब दूसरा बच्चा देर से प्लान किया जाए। हालांकि यह व्यक्ति की उम्र और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।

क्या लाइफस्टाइल बदलाव से बांझपन ठीक हो सकता है?

 

कुछ मामलों में सुधार संभव है, जैसे वजन नियंत्रण, धूम्रपान/शराब छोड़ना, तनाव कम करना और सही डाइट अपनाना। लेकिन हर केस में सिर्फ लाइफस्टाइल से समाधान नहीं होता।

प्राथमिक बांझपन का इलाज कैसे होता है?

 

कारण के अनुसार इलाज तय होता है—ओव्यूलेशन की दवाएं, हार्मोन ट्रीटमेंट, ट्यूब/यूटेरस से जुड़ी समस्या का इलाज, और जरूरत पड़े तो आईयूआई/आईवीएफ जैसे विकल्प।

क्या उम्र द्वितीयक बांझपन को प्रभावित करती है?

 

हाँ। उम्र बढ़ने के साथ अंडों की संख्या और गुणवत्ता घट सकती है, जिससे दोबारा गर्भधारण मुश्किल हो सकता है।

द्वितीयक बांझपन के बाद क्या नेचुरली गर्भधारण संभव है?

 

हाँ, कई मामलों में संभव है। सही जांच, कारण का इलाज और लाइफस्टाइल सुधार से नेचुरली कंसीव करने की संभावना बढ़ सकती है।

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