गर्भाशय में रसौली – लक्षण, कारण और उपचार (Uterine Fibroids in Hindi)

Last updated: December 22, 2025

Overview

रसौली यानी फाइब्रॉयड (Fibroids) या मायोमा (Myoma) गर्भाशय में होने वाली एक नॉन-कैंसरस यानी नॉर्मल गांठ है। कई महिलाओं को रसौली होती है लेकिन उन्हें पता भी नहीं चलता क्योंकि हमेशा लक्षण नहीं दिखते। हालांकि, कुछ महिलाओं में रसौली भारी पीरियड्स, पेट दर्द, और सबसे महत्वपूर्ण बात, प्रेगनेंसी में दिक्कत का कारण बन सकती है। अगर आप माँ बनने की कोशिश कर रही हैं और सफल नहीं हो पा रही हैं, तो रसौली एक छिपा हुआ कारण हो सकता है। चलिए आसान भाषा में समझते हैं कि rasoli kya hoti hai, इसके कारण क्या हैं, लक्षण कैसे पहचानें, और इलाज के क्या विकल्प उपलब्ध हैं।

साराँश (Overview)

रसौली यानी फाइब्रॉयड (Fibroids) या मायोमा (Myoma) गर्भाशय में होने वाली एक नॉन-कैंसरस यानी नॉर्मल गांठ है। कई महिलाओं को रसौली होती है लेकिन उन्हें पता भी नहीं चलता क्योंकि हमेशा लक्षण नहीं दिखते। हालांकि, कुछ महिलाओं में रसौली भारी पीरियड्स, पेट दर्द, और सबसे महत्वपूर्ण बात, प्रेगनेंसी में दिक्कत का कारण बन सकती है। अगर आप माँ बनने की कोशिश कर रही हैं और सफल नहीं हो पा रही हैं, तो रसौली एक छिपा हुआ कारण हो सकता है। चलिए आसान भाषा में समझते हैं कि rasoli kya hoti hai, इसके कारण क्या हैं, लक्षण कैसे पहचानें, और इलाज के क्या विकल्प उपलब्ध हैं।

रसौली क्या होती है? (Rasoli kya hoti hai in Hindi)

रसौली क्या होती है इसे समझना बहुत ज़रूरी है। गर्भाशय की रसौली या यूट्राइन फाइब्रॉयड गर्भाशय की मांसपेशियों और फाइब्रस टिशू से बनी गांठें होती हैं। ये बिल्कुल सौम्य (Benign) होती हैं, मतलब ये कैंसर नहीं हैं और कैंसर में बदलने का खतरा भी बहुत कम होता है। रसौली एक हो सकती है या कई एक साथ हो सकती हैं। कुछ महिलाओं में सिर्फ़ एक छोटी सी रसौली होती है, जबकि कुछ में दर्जनों रसौलियां अलग-अलग आकार की हो सकती हैं।

रसौली के प्रकार (Types of Fibroids)

रसौली गर्भाशय में कहां स्थित है, इसके आधार पर इन्हें चार मुख्य प्रकारों में बांटा जाता है:

  • इंट्राम्यूरल फाइब्रॉयड (Intramural Fibroids): ये सबसे कॉमन रसौली है जो गर्भाशय की मांसपेशियों की दीवार के अंदर बढ़ती है। अगर ये बड़ी हो जाएं तो गर्भाशय की कैविटी को दबाकर प्रेगनेंसी में रुकावट पैदा कर सकती हैं।
  • सबम्यूकोसल फाइब्रॉयड (Submucosal Fibroids): ये रसौलियां गर्भाशय की अंदरूनी परत यानी एंडोमेट्रियम के नीचे बढ़ती हैं और गर्भाशय की कैविटी में फैलती हैं। फर्टिलिटी की दृष्टि से ये सबसे समस्याजनक होती हैं क्योंकि ये सीधे उस जगह को प्रभावित करती हैं जहां एम्ब्रीओ को इम्प्लांट होना होता है। इनकी वजह से हैवी ब्लीडिंग, बार-बार मिसकैरिज़, और इनफर्टिलिटी हो सकती है। भले ही ये छोटी हों, फिर भी प्रेगनेंसी में बहुत दिक्कत कर सकती हैं।
  • सबसेरोसल फाइब्रॉयड (Subserosal Fibroids): ये गर्भाशय की बाहरी दीवार पर बढ़ती हैं और बाहर की तरफ निकली रहती हैं। अगर ये बहुत बड़ी हो जाएं तो आस-पास के अंगों जैसे ब्लैडर या रेक्टम को दबा सकती हैं।
  • पेडनक्युलेटेड फाइब्रॉयड (Pedunculated Fibroids): ये रसौलियां एक पतले डंठल या तने से गर्भाशय से जुड़ी होती हैं। ये सबसेरोसल या सबम्यूकोसल दोनों तरह की हो सकती हैं। कभी-कभी ये अपने डंठल पर घूम जाती हैं जिससे अचानक तेज़ दर्द हो सकता है।

रसौली क्यों होती हैं?

रसौली क्यों होती है, इसका सटीक कारण अभी तक पूरी तरह से समझ में नहीं आया है। हालांकि, कुछ फैक्टर्स हैं जो रसौली के बनने और बढ़ने में योगदान देते हैं:

हॉर्मोनल असंतुलन:

एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन रसौली को बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। रसौली में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन रिसेप्टर्स नॉर्मल गर्भाशय की कोशिकाओं से ज़्यादा होते हैं। इसीलिए प्रेगनेंसी के दौरान जब हॉर्मोन का स्तर बढ़ता है, तो रसौली भी तेज़ी से बढ़ सकती है। मेनोपॉज़ के बाद जब हॉर्मोन का स्तर कम हो जाता है, तो रसौली अक्सर छोटी हो जाती है या सिकुड़ जाती है।

जेनेटिक फैक्टर्स:

अगर आपकी माँ या बहन को रसौली है, तो आपको भी होने का खतरा ज़्यादा होता है। परिवार में रसौली का इतिहास होना एक महत्वपूर्ण रिस्क फैक्टर है।

मोटापा:

जिन महिलाओं का वजन ज़्यादा है, उनमें रसौली होने का खतरा बढ़ जाता है।

विटामिन D की कमी:

कुछ स्टडीज़ बताती हैं कि विटामिन D की कमी वाली महिलाओं में रसौली का खतरा ज़्यादा होता है।

डाइट और लाइफस्टाइल:

रेड मीट और प्रोसेस्ड फूड ज़्यादा खाने से रसौली का खतरा बढ़ सकता है, जबकि हरी सब्जियां और फल खाने से खतरा कम हो सकता है।

अर्ली मेंस्ट्रुएशन:

जिन लड़कियों को 10 साल से पहले पीरियड्स शुरू हो जाते हैं, उनमें रसौली का खतरा थोड़ा बढ़ जाता है।

नल्लीपैरा:

जिन महिलाओं ने कभी बच्चे को जन्म नहीं दिया, उनमें रसौली का खतरा थोड़ा ज़्यादा होता है।

रसौली के लक्षण क्या होते हैं?

कई बार रसौली के कोई लक्षण नहीं होते और महिला को पता ही नहीं चलता। हालांकि, लगभग 25-30% महिलाओं में लक्षण दिखाई देते हैं जो रसौली के आकार, संख्या और स्थान पर निर्भर करते हैं:

भारी और लंबे पीरियड्स (Heavy Menstrual Bleeding):

यह रसौली का सबसे आम लक्षण है। पीरियड्स सामान्य से ज़्यादा दिनों तक चलते हैं, बहुत ज़्यादा ब्लीडिंग होती है, बड़े-बड़े खून के क्लॉट्स निकलते हैं। इतनी भारी ब्लीडिंग से एनीमिया यानी खून की कमी हो सकती है, जिससे कमजोरी, थकान और चक्कर आते हैं।

पेल्विक दर्द और प्रेशर:

पेट के निचले हिस्से में भारीपन या दबाव महसूस होना, लगातार या कभी-कभी दर्द होना, खासकर अगर रसौली बड़ी हो।

बार-बार पेशाब आना:

अगर रसौली ब्लैडर को दबा रही हो तो बार-बार पेशाब जाने की ज़रूरत महसूस होती है, या पूरी तरह ब्लैडर खाली न होने का एहसास होता है।

कब्ज़ या रेक्टल प्रेशर:

अगर रसौली रेक्टम की तरफ दबाव बना रही हो तो कब्ज़ या मल त्याग में दिक्कत हो सकती है।

पेट का बढ़ना:

बहुत बड़ी रसौलियां पेट को फुला सकती हैं, जैसे प्रेगनेंसी में होता है।

पीठ दर्द या पैर में दर्द:

कुछ रसौलियां नसों को दबा सकती हैं जिससे पीठ के निचले हिस्से या पैरों में दर्द होता है।

संभोग के दौरान दर्द:

कुछ पोजीशन में रसौली की वजह से दर्द या असुविधा हो सकती है।

रसौली और फर्टिलिटी

रसौली का फर्टिलिटी पर क्या असर होता है, यह उनके आकार, संख्या और स्थान पर निर्भर करता है। सभी रसौलियां प्रेगनेंसी को प्रभावित नहीं करतीं, लेकिन कुछ केसेस में ये गंभीर समस्या बन सकती हैं:

  • कंसीव करने में दिक्कत: सबम्यूकोसल फाइब्रॉयड (जो गर्भाशय की कैविटी में होती हैं) एम्ब्रीओ इम्प्लांटेशन को रोक सकती हैं। बड़ी इंट्राम्यूरल फाइब्रॉयड गर्भाशय की शेप को बदल सकती हैं या फैलोपियन ट्यूब्स के ओपनिंग को ब्लॉक कर सकती हैं, जिससे स्पर्म और एग का मिलना मुश्किल हो जाता है।
  • बार-बार मिसकैरिज़: सबम्यूकोसल और बड़ी इंट्राम्यूरल फाइब्रॉयड की वजह से गर्भाशय में भ्रूण के विकास के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती या ब्लड सप्लाई में दिक्कत आती है, जिससे मिसकैरिज़ हो सकता है।
  • प्रीटर्म डिलीवरी: प्रेगनेंसी के दौरान रसौली तेज़ी से बढ़ सकती है, जिससे समय से पहले डिलीवरी या प्रीमेच्योर बर्थ का खतरा बढ़ता है।
  • प्लेसेंटा की समस्याएं: रसौली की वजह से प्लेसेंटा प्रीविया, प्लेसेंटल एब्रप्शन जैसी जटिलताएं हो सकती हैं।
  • सिज़ेरियन डिलीवरी की ज़रूरत: रसौली की स्थिति के अनुसार नॉर्मल डिलीवरी मुश्किल हो सकती है और C-section की ज़रूरत पड़ सकती है।

अगर आप लंबे समय से कंसीव करने की कोशिश कर रही हैं और सफल नहीं हो पा रही हैं, तो फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से मिलकर रसौली की जांच ज़रूर करवाएं।

रसौली का इलाज कैसे होता है?

रसौली का इलाज कई बातों पर निर्भर करता है - लक्षण कितने गंभीर हैं, आपकी उम्र क्या है, क्या आप भविष्य में प्रेगनेंसी चाहती हैं, रसौली का आकार और स्थान क्या है।

वॉचफुल वेटिंग (Watchful Waiting)

अगर रसौली छोटी है और कोई लक्षण नहीं हैं, तो तुरंत इलाज की ज़रूरत नहीं होती। डॉक्टर नियमित फॉलो-अप और अल्ट्रासाउंड से रसौली पर नज़र रखते हैं। मेनोपॉज़ के बाद अक्सर रसौलियां अपने आप सिकुड़ जाती हैं।

मेडिकल मैनेजमेंट

हॉर्मोनल थेरेपी:

कुछ हॉर्मोनल दवाएं रसौली को बढ़ने से रोक सकती हैं या छोटा कर सकती हैं। ये सर्जरी से पहले रसौली को छोटा करने के लिए भी दी जा सकती हैं। हालांकि, ये दवाएं बंद करने के बाद रसौली फिर से बढ़ सकती है।

सर्जिकल ट्रीटमेंट:

अगर रसौली बड़ी है, लक्षण गंभीर हैं, या फर्टिलिटी को प्रभावित कर रही है, तो सर्जरी की ज़रूरत हो सकती है।

मायोमेक्टॉमी (Myomectomy):

इस सर्जरी में सिर्फ रसौली को हटाया जाता है और गर्भाशय को बचाकर रखा जाता है। यह उन महिलाओं के लिए बेहतरीन विकल्प है जो भविष्य में माँ बनना चाहती हैं। मायोमेक्टॉमी तीन तरीकों से की जा सकती है:

• हिस्टेरोस्कोपिक मायोमेक्टॉमी (सबम्यूकोसल फाइब्रॉयड के लिए) • लैप्रोस्कोपिक मायोमेक्टॉमी (छोटे चीरों से) • ओपन मायोमेक्टॉमी (बड़े चीरे से, बड़ी या ज़्यादा रसौलियों के लिए)

मायोमेक्टॉमी के बाद ज़्यादातर महिलाएं सफलतापूर्वक कंसीव कर सकती हैं। हालांकि, रसौली दोबारा बन सकती है।

हिस्टेरेक्टॉमी (Hysterectomy):

इस सर्जरी में पूरा गर्भाशय निकाल दिया जाता है। यह रसौली का स्थायी इलाज है, लेकिन इसके बाद प्रेगनेंसी संभव नहीं होती। यह उन महिलाओं के लिए विकल्प है जो अपना परिवार पूरा कर चुकी हैं या जिन्हें बहुत गंभीर लक्षण हैं।

यूट्राइन आर्टरी एम्बोलाइज़ेशन (UAE):

इस मिनिमली इनवेसिव प्रॉसिजर में रसौली को खून की सप्लाई बंद कर दी जाती है, जिससे वह सिकुड़ जाती है।

MRI-गाइडेड फोकस्ड अल्ट्रासाउंड:

यह एक नॉन-इनवेसिव प्रॉसिजर है जिसमें हाई-इंटेंसिटी अल्ट्रासाउंड वेव्स से रसौली को नष्ट किया जाता है।

रसौली और IVF

अगर रसौली की वजह से नेचुरल कंसेप्शन मुश्किल हो रहा है, तो IVF एक अच्छा विकल्प हो सकता है। हालांकि, IVF की सफलता के लिए यह ज़रूरी है कि सबम्यूकोसल फाइब्रॉयड को IVF से पहले हटा दिया जाए। यह रसौली ये गर्भाशय की कैविटी में होती हैं और एम्ब्रीओ इम्प्लांटेशन में सीधे रुकावट डालती हैं। इनकी वजह से IVF की सक्सेस रेट बहुत कम हो जाती है।

फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट आपकी रसौली की स्थिति को देखते हुए सबसे अच्छा ट्रीटमेंट प्लान तैयार करते हैं। कई महिलाएं जिन्हें रसौली थी, सही इलाज और IVF की मदद से सफलतापूर्वक माँ बन चुकी हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)

रसौली गर्भाशय में होने वाली मामूली गांठें हैं जो कई महिलाओं को प्रभावित करती हैं। हालांकि सभी रसौलियां समस्या नहीं पैदा करतीं, लेकिन कुछ केसेस में ये भारी ब्लीडिंग, दर्द, और सबसे महत्वपूर्ण प्रेगनेंसी में दिक्कत का कारण बन सकती हैं। अगर आप माँ बनने की कोशिश कर रही हैं और सफल नहीं हो पा रही हैं, तो रसौली की जांच ज़रूरी है। अच्छी बात यह है कि आधुनिक मेडिकल साइंस में रसौली के कई सफल इलाज उपलब्ध हैं। मायोमेक्टॉमी जैसी सर्जरी से रसौली को हटाकर गर्भाशय को बचाया जा सकता है, और अगर ज़रूरत हो तो IVF की मदद से स्वस्थ प्रेगनेंसी संभव है। समय पर पहचान और सही इलाज से आप अपने माँ बनने के सपने को साकार कर सकती हैं।

Common Questions Asked

रसौली क्या होती है?

 

रसौली यानी फाइब्रॉयड गर्भाशय में होने वाली नॉन-कैंसरस मांसपेशियों की गांठें हैं। ये सौम्य होती हैं और कैंसर नहीं हैं।

रसौली के क्या लक्षण होते हैं?

 

भारी और लंबे पीरियड्स, पेट के निचले हिस्से में दर्द या दबाव, बार-बार पेशाब आना, और कब्ज़ रसौली के मुख्य लक्षण हैं। कई बार कोई लक्षण नहीं होते।

क्या रसौली की वजह से प्रेगनेंट होने में दिक्कत आती है?

 

हाँ, खासकर सबम्यूकोसल फाइब्रॉयड (जो गर्भाशय की कैविटी में होती हैं) कंसेप्शन और इम्प्लांटेशन में रुकावट डाल सकती हैं। बड़ी इंट्राम्यूरल फाइब्रॉयड भी फर्टिलिटी को प्रभावित कर सकती हैं।

रसौली का इलाज क्या है?

 

इलाज रसौली के आकार, स्थान और लक्षणों पर निर्भर करता है। छोटी रसौली में सिर्फ मॉनिटरिंग की ज़रूरत होती है। बड़ी या समस्याजनक रसौली के लिए मायोमेक्टॉमी (सिर्फ रसौली हटाना) या हिस्टेरेक्टॉमी (गर्भाशय निकालना) की जा सकती है।

क्या रसौली के बाद प्रेगनेंट हो सकते हैं?

 

हाँ, मायोमेक्टॉमी के बाद ज़्यादातर महिलाएं सफलतापूर्वक प्रेगनेंट हो सकती हैं। अगर नेचुरल कंसेप्शन मुश्किल हो तो IVF एक अच्छा विकल्प है।

क्या IVF से पहले रसौली हटाना ज़रूरी है?

 

सबम्यूकोसल फाइब्रॉयड को IVF से पहले हटाना बेहद ज़रूरी है। बड़ी इंट्राम्यूरल फाइब्रॉयड को भी हटाने की सलाह दी जाती है। छोटी सबसेरोसल फाइब्रॉयड आमतौर पर IVF को प्रभावित नहीं करतीं।

क्या रसौली कैंसर बन सकती है?

 

रसौली के कैंसर में बदलने का खतरा 0.1% से भी कम होता है। ये मामूली गांठें हैं और ज़्यादातर केस में खतरनाक नहीं होतीं।

**Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
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