पुरुषों में निःसंतानता की जाँच के दौरान अक्सर डॉक्टर Scrotal Ultrasound करवाते हैं। और जब रिपोर्ट में "scrotum" या "scrotal sac" लिखा होता है तो कई लोग सोचते हैं कि यह क्या है और इसका फर्टिलिटी से क्या लेना-देना है। Scrotum meaning in hindi समझें तो यह अंडकोष है, वो थैली जो पुरुषों के दोनों अंडकोष (Testes) को बाहर से ढककर रखती है, और इसका सीधा संबंध स्पर्म बनने की प्रक्रिया से है।
स्पर्म बनने के लिए शरीर के तापमान से 2 से 3 डिग्री कम तापमान चाहिए। इसीलिए अंडकोष शरीर के बाहर इस थैली में होते हैं। अगर इस थैली या इसके अंदर की संरचनाओं में कोई समस्या हो, तो स्पर्म की संख्या और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं।
पुरुष निःसंतानता के लगभग 40% मामलों में Scrotum से जुड़ी कोई न कोई समस्या पाई जाती है जैसे वैरीकोसेल (Varicocele), हाइड्रोसील (Hydrocele), या इन्फेक्शन (Infection)। अच्छी बात यह है कि इनमें से ज़्यादातर का इलाज संभव है।
इस आर्टिकल में सबसे पहले समझते हैं Scrotum meaning in hindi, उसके बाद जानेंगे कि इसका मेल फ़र्टिलिटी से क्या संबंध है। इसके अलावा यह भी समझेंगे कि अगर scrotum में समस्या की वजह से आप पिता नहीं बन पा रहे हैं तो मॉडर्न मेडिकल साइंस आपके लिए क्या समाधान प्रदान कर सकती है।
Scrotum meaning in hindi है अंडकोष यानी त्वचा की वह थैली जो पुरुषों के लिंग मतलब पेनिस (Penis) के नीचे लटकी रहती है। इसके अंदर दो अंडकोष यानी टेस्टिस (Testes) होते हैं जो स्पर्म और टेस्टोस्टेरोन बनाते हैं।
Scrotum के अंदर सिर्फ़ अंडकोष नहीं होते, बल्कि इसके अंदर कुछ और महत्वपूर्ण हिस्से भी होते हैं जो स्पर्म बनने और उसे आगे पहुँचाने के लिए बहुत जरुरी होते हैं।
शरीर का नॉर्मल टेंपरेचर लगभग 37°C होता है। स्पर्म बनने के लिए शरीर के सामान्य से थोड़ा कम टेंपरेचर चाहिए होता है। आमतौर पर 34 से 35°C का टेंपरेचर इसके लिए सबसे सही माना जाता है। इसी वजह से टेस्टिस शरीर के बाहर इस थैली में रहते हैं।
Scrotum का एक खास काम टेंपरेचर को संतुलित रखना भी है। जब मौसम ठंडा होता है, तो यह थैली सिकुड़कर टेस्टिस को शरीर के थोड़ा करीब ले आती है ताकि वे गर्म रहें। और जब गर्मी होती है, तो यह ढीली होकर टेस्टिस को नीचे लटका देती है ताकि उनका तापमान कम रहे। आसान भाषा में कहें तो स्क्रोटम एक तरह की प्राकृतिक “तापमान नियंत्रण प्रणाली” है, जो स्पर्म को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
Varicocele को हिंदी में वैरिकोसील या अंडकोष की नसों में सूजन कहते हैं। यह scrotum की नसों में खून जमा होने से होता है बिल्कुल वैसे जैसे पैरों में वैरिकोज़ वेन्स होती हैं।
लगभग 15% पुरुषों में वैरिकोसील होता है। लेकिन जो पुरुष पिता नहीं बन पा रहे, उनमें से 40% को वैरिकोसील होता है।
नसों में खून जमा होने से अंडकोष का टेंपरेचर बढ़ जाता है। यह बढ़ा हुआ टेंपरेचर स्पर्म बनने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है, जिससे स्पर्म की क्वालिटी घट जाती है।
वैरिकोसील होने पर आपको खड़े होने पर scrotum में "कीड़ों की गठरी" जैसा महसूस होता है। स्क्रोटम में एक तरफ़, आमतौर पर बाईं ओर, सूजन या भारीपन, और दिन भर खड़े रहने के बाद हल्का दर्द होता है।
वैरिकोसील होने पर सर्जरी की जरुरत पड़ती है। सर्जरी के बाद कई मामलों में स्पर्म काउंट और स्पर्म क्वालिटी दोनों में सुधार हो जाता है।
हाइड्रोसील में अंडकोष के चारों ओर पानी जैसा तरल पदार्थ जमा हो जाता है। आमतौर पर यह धीरे-धीरे बढ़ता है और कई लोगों को शुरुआत में इसका पता भी नहीं चलता।
छोटे हाइड्रोसील का आमतौर पर फर्टिलिटी पर सीधा असर नहीं पड़ता। लेकिन अगर यह बड़ा हो जाए, तो टेस्टिस पर दबाव पड़ सकता है और वहाँ का तापमान बढ़ सकता है। लंबे समय तक ऐसा रहने से स्पर्म बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
हाइड्रोसील होने पर scrotum एक तरफ़ से फूला दिखाई देता है। आमतौर पर इसमें तेज़ दर्द नहीं होता, लेकिन भारीपन महसूस हो सकता है। इसकी एक और पहचान यह है कि अगर टॉर्च की रोशनी टेस्टिस पर डालें, तो रोशनी अंदर से गुजरती हुई दिखाई देती है क्योंकि अंदर पानी भरा होता है।
अगर हाइड्रोसील छोटा है और परेशानी नहीं दे रहा, तो कई बार डॉक्टर सिर्फ निगरानी रखने की सलाह देते हैं। लेकिन अगर सूजन ज़्यादा हो या असहजता बढ़ रही हो, तो एक छोटी सर्जरी से इसे ठीक किया जा सकता है।
एपिडिडाइमिस वह पतली नली होती है जो अंडकोष के पीछे लगी रहती है। यही वह जगह है जहाँ स्पर्म कुछ समय तक रहकर मैच्योर होते हैं। जब इस नली में इन्फेक्शन हो जाता है, तो उसे एपिडिडीमाइटिस (Epididymitis) कहते हैं।
यह अक्सर किसी इंफेक्शन की वजह से होता है। कई बार यह STI यानी सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ जैसे क्लैमीडिया (Chlamydia) या गोनोरिया (Gonorrhea) से हो सकता है। कुछ केस में पेशाब के रास्ते होने वाले इंफेक्शन यानी यूटीआई (UTI) की वजह से भी हो जाता है। कभी-कभी कोई स्पष्ट कारण पता नहीं चलता, फिर भी इंफेक्शन हो सकता है।
अगर इस इंफेक्शन का समय पर इलाज न हो, तो एपिडिडाइमिस में सूजन और रुकावट आ सकती है। इससे स्पर्म का रास्ता बंद हो सकता है। ऐसी स्थिति को ऑब्सट्रक्टिव एज़ूस्पर्मिआ (Obstructive Azoospermia) कहते हैं, जिसमें सीमेन में स्पर्म दिखाई नहीं देते।
इसमें अंडकोष में दर्द होता है जो धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। साथ में सूजन और लालिमा भी दिखाई दे सकती है। कई लोगों को पेशाब करते समय जलन, बुखार या शरीर में कमजोरी भी महसूस होती है।
इसका इलाज आमतौर पर एंटीबायोटिक दवाओं से किया जाता है। अगर इंफेक्शन का जल्दी इलाज हो जाए, तो फर्टिलिटी पर पड़ने वाले असर को टाला जा सकता है।
टेस्टिकुलर टॉर्सन एक मेडिकल इमरजेंसी है। इसमें टेस्टिस अपनी जगह पर घूम जाता है और उससे जुड़ी खून की नसें मुड़ जाती हैं। इससे टेस्टिस तक खून की सप्लाई अचानक कम या बंद हो जाती है।
टेस्टिकुलर टॉर्सन में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। अगर 6 घंटे के अंदर इलाज न मिले, तो टेस्टिस को परमानेंट नुकसान हो सकता है।
इसमें अचानक बहुत तेज़ दर्द होता है। टेस्टिस में सूजन आ जाती है और कई बार मतली या उल्टी भी हो सकती है। कुछ लोगों को लगता है कि अंडकोष ऊपर की तरफ खिंच गया है या अपनी सामान्य स्थिति में नहीं है।
अगर अचानक ऐसा दर्द हो, तो इसे सामान्य दर्द समझकर इंतज़ार नहीं करना चाहिए। तुरंत नज़दीकी अस्पताल या इमरजेंसी में जाएँ। टेस्टिकुलर टॉर्सन में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है और जल्दी इलाज से टेस्टिस को बचाया जा सकता है।
कई बार सीमेन रिपोर्ट नॉर्मल होने के बावजूद स्पर्म की क्वालिटी अच्छी नहीं होती। इसका कारण अक्सर कोई बीमारी नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की आदतें होती हैं जो धीरे-धीरे scrotum के तापमान और माइक्रो-एनवायरनमेंट को प्रभावित करती हैं।
अंडकोष की छोटी-सी दिखने वाली समस्याएँ भी पुरुष फर्टिलिटी को प्रभावित कर सकती हैं। Varicocele, Hydrocele या संक्रमण जैसे कारण कई बार स्पर्म की संख्या और गुणवत्ता को कम कर देते हैं। अच्छी बात यह है कि इनमें से कई समस्याओं का इलाज संभव है, खासकर अगर समय पर पहचान हो जाए। इसलिए अगर अंडकोष में दर्द, सूजन, गाँठ या भारीपन महसूस हो, या सीमेन एनालिसिस में स्पर्म कम आए हों, तो जाँच करवाना ज़रूरी है। सही समय पर की गई जाँच और इलाज से कई पुरुषों की फर्टिलिटी में सुधार हो सकता है और प्राकृतिक गर्भधारण भी संभव हो जाता है।