माँ बनने के सफ़र में सोनोग्राफी सबसे ज़रूरी जाँच है। चाहे आप कंसीव करने की कोशिश कर रही हों, फर्टिलिटी ट्रीटमेंट ले रही हों, या प्रेगनेंट हों, सोनोग्राफी ही वह तरीका है जिससे हर स्टेज पर आपको और आपके डॉक्टर को सही जानकारी मिलती है। साइंस की भाषा में Sonography kya hota hai का जवाब समझते हैं, तो सोनोग्राफ़ी जिसे आम बोलचाल के तौर पर अल्ट्रासाउंड भी कहते हैं, एक ऐसी जाँच है जिसमें ध्वनि तरंगों यानी साउंड वेव्स की मदद से शरीर के अंदर की तस्वीरें ली जाती हैं। याद रहे कि सोनोग्राफ़ी शरीर के लिए पूरी तरह सुरक्षित है और इसमें कोई दर्द नहीं होता। इस आर्टिकल में समझेंगे कि फर्टिलिटी ट्रीटमेंट और प्रेगनेंसी में सोनोग्राफ़ी सोनोग्राफी कब जरुरी होती है, कौन सी सोनोग्राफ़ी कब करवानी चाहिए, इसके अलावा TVS और पेट की सोनोग्राफी में क्या फ़र्क है। इसके साथ ही सबसे महत्वपूर्ण सवाल कि IVF जैसे ट्रीटमेंट में बार बार सोनोग्राफी क्यों करवानी पड़ती है, इस आर्टिकल के माध्यम से इन्हीं सवालों के जवाब एकदम साफ तरीके से दिए जायेंगे।
सोनोग्राफी को अल्ट्रासाउंड भी कहते हैं। इसमें हाई फ्रीक्वेंसी साउंड वेव्स शरीर के अंदर भेजी जाती हैं जो अंदर के अंगों से टकराकर वापस आती हैं और स्क्रीन पर तस्वीर बनाती हैं।
मानव शरीर के लिए यह सोनोग्राफ़ी पूरी तरह सुरक्षित है क्योंकि इसमें कोई हानिकारक किरणें जैसे X-Rays वगैरह नहीं होतीं। इसीलिए प्रेगनेंसी में बार-बार सोनोग्राफी करवाने में कोई नुकसान नहीं है।
फ़र्टिलिटी ट्रीटमेंट और प्रेगनेंसी में सोनोग्राफी का बड़ा महत्त्व होता है। इससे डॉक्टर को क्लियर पता चलता है कि आपके शरीर के अंदर क्या चल रहा है जिससे वह किसी अनुमान के आधार पर कोई निर्णय लेने के बजाय एकदम पक्की जानकारी के आधार पर आपके लिए निर्णय ले पाते हैं।
टीवीएस अल्ट्रासाउंड में एक पतली प्रोब योनि मतलब वेजाइना के अंदर डाली जाती है। इससे बहुत साफ इमेज मिलती हैं क्योंकि प्रोब जिससे तरंगे निकलती हैं, वह गर्भाशय के करीब होती है। कल्पना करने में आपको थोड़ा असहज यानी अनकंफर्टेबल लग सकता है, लेकिन यह बहुत नार्मल प्रोसेस है और इसमें बिलकुल दर्द नहीं होता।
एब्डॉमिनल अल्ट्रासाउंड में पेट पर जेल लगाकर प्रोब घुमाई जाती है। प्रेगनेंसी के 12 हफ्ते के बाद ज़्यादातर सोनोग्राफी इसी से होती है। इस जाँच से पहले पानी पीकर जाना चाहिए ताकि ब्लैडर भरा रहे और इमेज साफ आए।
डॉप्लर अल्ट्रासाउंड खास तरह की सोनोग्राफी है जिससे ब्लड फ्लो देखा जाता है।
इससे बच्चे की त्रि-आयामी यानी 3D इमेज मिलती है। 4D सोनोग्राफी में रियल-टाइम मूवमेंट भी देख सकते हैं। यह मेडिकल के लिहाज़ ज़रूरी नहीं है, लेकिन कुछ पेरेंट्स बच्चे का चेहरा देखने के लिए करवाते हैं।
IVF से हुई प्रेगनेंसी में सोनोग्राफी थोड़ी ज़्यादा बार होती है, खासकर शुरुआती हफ्तों में। ज़्यादा सोनोग्राफी इसलिए होती हैं ताकि हर चीज़ पर नज़र रहे और कोई दिक्कत हो तो जल्दी पता चले।
एम्ब्रीओ ट्रांसफर के 2-3 हफ्ते बाद: पहली सोनोग्राफी TVS होती है जिसमें जैस्टेशनल सैक (gestational sac) देखते हैं।
6-7 हफ्ते: इसमें बच्चे दिल की धड़कन यानी हार्टबीट कन्फर्म करते हैं ।
8-10 हफ्ते: बच्चे की ग्रोथ देखते हैं। इसके बाद आमतौर पर रेगुलर गायनेकोलॉजिस्ट को ट्रांसफर कर दिया जाता है।
आगे: नॉर्मल प्रेगनेंसी की तरह सोनोग्राफी जैसे NT स्कैन, एनोमली स्कैन, ग्रोथ स्कैन इत्यादि किये जाते हैं।
Sonography kya hoti hai का मतलब है साउंड वेव्स से शरीर के अंदर देखने की जाँच, जो पूरी तरह सुरक्षित होती है। फर्टिलिटी ट्रीटमेंट में सोनोग्राफी से फॉलिकल्स और एंडोमेट्रियम मॉनिटर होते हैं। प्रेगनेंसी में अलग-अलग स्टेज पर अलग-अलग सोनोग्राफी होती हैं जो बच्चे की ग्रोथ और सेहत की जानकारी देती हैं।
अगर आप फर्टिलिटी ट्रीटमेंट ले रही हैं या IVF प्रेगनेंसी है, तो डॉक्टर की बताई तारीख पर सोनोग्राफी ज़रूर करवाएं। यह आपके और बच्चे दोनों की सुरक्षा के लिए बेहद ज़रूरी है।
नहीं, दर्द नहीं होता। थोड़ी असहजता हो सकती है लेकिन यह बहुत जल्दी हो जाती है।
नॉर्मल प्रेगनेंसी में 3-4 बार। हाई रिस्क या IVF प्रेगनेंसी में ज़्यादा हो सकती है।
बिल्कुल नहीं क्योंकि इसमें साउंड वेव्स से इमेज बनाते हैं। यह पूरी तरह सेफ है।
फॉलिकल मॉनिटरिंग, एंडोमेट्रियम चेक, और शुरुआती प्रेगनेंसी कन्फर्म करने के लिए।
शहर और क्लिनिक के अनुसार रेट होता है। नॉर्मल सोनोग्राफी 800-1500 रुपये, TVS 1000-2000 रुपये, और 3D/4D 2500-5000 रुपये तक में हो सकती है।