सारांश (Overview)
सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल में टेस्टिस या एपिडिडिमिस से सीधे स्पर्म निकाले जाते हैं। इसकी जरूरत तब पड़ती है, जब सीमेन में एक भी स्पर्म नहीं मिलता। लेकिन सीमेन में स्पर्म न मिलने का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि स्पर्म बन ही नहीं रहे हैं।
इस आर्टिकल में जानेंगे कि निल स्पर्म काउंट (nil sperm count) होने पर Surgical Sperm Retrieval कैसे किया जाता है, यह कितने तरह से किया जा सकता है, इसके रिस्क क्या हो सकते हैं और इसके बाद IVF कैसे होता है।
सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल एक छोटा प्रोसीजर है, जिसमें टेस्टिस या एपिडिडिमिस से सीधे स्पर्म निकाले जाते हैं। इसकी जरूरत तब पड़ती है, जब सीमेन में स्पर्म नहीं मिलते या किसी समस्या की वजह से बाहर नहीं आ पाते। इस कंडीशन यानी सीमेन में एक भी स्पर्म न मिलने को एजूस्पर्मिया (Azoospermia) कहा जाता है। निकाले गए स्पर्म से ICSI के जरिए एग को फर्टिलाइज किया जाता है।
इस प्रोसीजर के बाद स्पर्म बनने शुरू नहीं हो जाते। यह सिर्फ उन स्पर्म तक पहुंचने का तरीका है, जो टेस्टिस में पहले से बन रहे हैं, भले ही उनका काउंट बहुत कम हो।
Surgical Sperm Retrieval तब किया जाता है, जब दो अलग-अलग सीमेन सैंपल्स में से एक में भी स्पर्म न मिले। इसके बाद हार्मोन टेस्ट और जरूरत पड़ने पर जेनेटिक टेस्ट से यह देखा जाता है कि दिक्कत स्पर्म के रास्ते में है या स्पर्म बनने में।
सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल एनेस्थीसिया देकर किया जाता है, इसलिए प्रोसीजर के दौरान दर्द नहीं होता। सुई या छोटे चीरे से टेस्टिस या एपिडिडिमिस से सैंपल लिया जाता है और लैब में माइक्रोस्कोप से उसमें स्पर्म ढूंढे जाते हैं। आप आमतौर पर उसी दिन घर जा सकते हैं।
प्रोसीजर से पहले खाली पेट रहने को कहा जा सकता है। PESA और TESA आमतौर पर लोकल एनेस्थीसिया में हो जाते हैं, जबकि TESE और Micro-TESE में अक्सर जनरल एनेस्थीसिया दिया जाता है।
सर्जरी के तरीके के हिसाब से सुई से सैंपल खींचा जाता है या छोटा चीरा लगाकर टेस्टिस का टिश्यू लिया जाता है। इसमें कुछ मिनट से लेकर एक-दो घंटे तक लग सकते हैं।
सैंपल तुरंत IVF लैब भेजा जाता है, जहां एम्ब्रीओलॉजिस्ट माइक्रोस्कोप से उसमें स्पर्म ढूंढते हैं। मिले हुए स्पर्म उसी दिन ICSI में इस्तेमाल किए जा सकते हैं या फ्रीज करके रखे जा सकते हैं।
सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल चार तरह से किया जा सकता है।
इनमें अंतर इस बात का है कि स्पर्म एपिडिडिमिस से लिया जा रहा है या टेस्टिस से, और सुई से लिया जा रहा है या चीरा लगाकर।
PESA में पतली सुई से सीधे एपिडिडिमिस से स्पर्म निकाले जाते हैं। एपिडिडिमिस वह नली है, जहां टेस्टिस में बने स्पर्म स्टोर होते हैं। इसमें चीरा नहीं लगता और यह उस केस में किया जाता है जब स्पर्म निकलने का रास्ता बंद हो।
TESA में सुई सीधे टेस्टिस में डालकर स्पर्म निकाले जाते हैं। यह भी बिना चीरे का प्रोसीजर है। स्पर्म कम बनने वाले केसेस में इससे स्पर्म मिलने की संभावना कम रहती है, क्योंकि सुई टेस्टिस के छोटे हिस्से से ही सैंपल ले पाती है।
TESE में छोटा चीरा लगाकर टेस्टिस से टिश्यू का सैंपल लिया जाता है। सुई की तुलना में इससे ज्यादा टिश्यू मिल जाते हैं, इसलिए स्पर्म मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है।
Micro-TESE में सर्जन माइक्रोस्कोप की मदद से टेस्टिस के अंदर उन सेमिनिफेरस ट्यूब्यूल्स (seminiferous tubules) को पहचानते हैं, जिनमें स्पर्म मिलने की संभावना ज्यादा होती है। इसके बाद इन ट्यूब्यूल्स से टिशू का छोटा सैंपल लेकर लैब में स्पर्म की जांच की जाती है। AUA और ASRM की गाइडलाइन के अनुसार, जिन पुरुषों में स्पर्म कम बनते हैं, उनमें स्पर्म निकालने के लिए Micro-TESE किया जाना चाहिए।
नॉर्मल कलेक्शन में सीमेन का सैंपल दिया जाता है और लैब में उससे स्पर्म अलग किए जाते हैं। सर्जिकल रिट्रीवल तब की जाती है जब जब सीमेन में स्पर्म नहीं मिलते, और तब स्पर्म सीधे टेस्टिस या एपिडिडाइमिस से निकालना पड़ता है।
नॉर्मल स्पर्म कलेक्शन | सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल | |
|---|---|---|
स्पर्म कैसे मिलते हैं | सीमेन सैंपल से | सुई या छोटे चीरे से |
स्पर्म की संख्या | आमतौर पर लाखों में | बहुत कम |
IVF का तरीका | IVF या ICSI | लगभग हमेशा ICSI |
सर्जरी से निकले स्पर्म की संख्या बहुत कम होती है, इसलिए ICSI से ही IVF किया जाता है।
सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सीमेन में स्पर्म न होने पर भी संतान हो सकती है। यानी कई कपल्स के लिए डोनर स्पर्म के बिना अपने जेनेटिक बच्चे की संभावना बनी रहती है।
प्रोसीजर के बाद कुछ दिन सूजन, दर्द या हल्का नील पड़ना आम है, जो ज्यादातर अपने आप ठीक हो जाता है। सबसे बड़ी लिमिटेशन यह है कि हर केस में स्पर्म मिल जाएं, यह फिक्स नहीं है, खासकर जिन पुरुषों में स्पर्म कम बनते हैं।
Micro-TESE के बाद कुछ महीनों तक टेस्टोस्टेरोन हार्मोन कम हो सकता है। कई पुरुषों में यह 12 से 18 महीनों में धीरे-धीरे सुधर जाता है। जिनके टेस्टिस छोटे हैं या टेस्टोस्टेरोन पहले से कम है, उनमें यह रिस्क ज्यादा होता है।
इसलिए प्रोसीजर से पहले डॉक्टर से यह भी पूछ लें कि अगर स्पर्म न मिले, तो आगे क्या ऑप्शन हैं।
कुछ दिन सूजन और खिंचाव महसूस होना नॉर्मल है। इस दौरान आराम, सपोर्टिव अंडरवियर और साफ-सफाई सबसे जरूरी है। कितने दिन आराम करना है, यह प्रोसीजर के प्रकार पर निर्भर करता है।
अगर सर्जरी से स्पर्म मिले हैं तो लगभग हमेशा ICSI ही किया जाता है। इसमें एम्ब्रियोलॉजिस्ट एक स्पर्म चुनकर सीधे एग के अंदर इंजेक्ट करते हैं। इसलिए इस प्रोसीजर का समय फीमेल पार्टनर की IVF साइकिल और एग रिट्रीवल को ध्यान में रखकर तय किया जाता है।
AUA और ASRM गाइडलाइन के अनुसार ICSI ताजा निकाले गए स्पर्म से भी किया जा सकता है और फ्रीज किए गए स्पर्म से भी। यानी स्पर्म पहले निकालकर फ्रीज किए जा सकते हैं, और दोनों प्रोसीजर एक ही दिन करना जरूरी नहीं होता।
सफलता सबसे ज्यादा इस बात पर निर्भर करती है कि दिक्कत रास्ते में है या स्पर्म बनने में। रास्ता बंद होने पर स्पर्म मिलने की संभावना सबसे ज्यादा रहती है। स्पर्म कम बनने वाले मामलों में चुना गया तरीका भी बहुत महत्वपूर्ण होता है।
15 स्टडीज और 1,890 पुरुषों के डाटा में, जिन पुरुषों में स्पर्म कम बनते हैं, उनमें Micro-TESE से 52%, TESE से 35% और TESA से 28% पुरुषों में स्पर्म मिले। यानी Micro-TESE से हर 100 में से करीब 52 पुरुषों में स्पर्म मिल गए, जबकि TESA से करीब 28 में।
यहां यह समझना जरूरी है कि यह स्पर्म मिलने का डेटा है, प्रेगनेंसी की सफलता का नहीं।
सीमेन में स्पर्म न मिलने का मतलब यह नहीं है कि अपना बच्चा नहीं हो सकता। कई मामलों में टेस्टिस से स्पर्म निकालकर ICSI किया जा सकता है, लेकिन हर मामले में स्पर्म मिलना तय नहीं है।
अगर डॉक्टर आपको सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल की सलाह देते हैं, तो उनसे पूछें कि आपके लिए कौन सा तरीका सही है और स्पर्म मिलने की कितनी संभावना है।