हमारे शरीर में गर्दन के सामने तितली की आकार की एक छोटी सी ग्रंथि यानी ग्लैंड होती है, इसे ही थायराइड ग्रंथि कहते हैं। थायराइड ग्रंथि से निकलने वाला हॉर्मोन शरीर की लगभग हर एक्टिविटी जैसे मेटाबॉलिज्म से लेकर हृदय गति तक, और महिलाओं में पीरियड्स से लेकर गर्भधारण तक को प्रभावित करता है।
जब हम T3 T4 TSH test in hindi पढ़ रहे हैं तो इसे ऐसे समझें कि थायराइड ग्रंथि से निकलने वाले यह तीन हॉर्मोन T3, T4 और TSH मिलकर बताते हैं कि आपकी थायराइड ग्रंथि सही से काम कर रही है या नहीं। लेकिन सबसे ज्यादा समस्या तब होती है जब रिपोर्ट देख कर ज़्यादातर लोग इसमें लिखे नंबरों को समझ नहीं पाते कि इनका मतलब क्या है।
फर्टिलिटी क्लीनिक में हर महिला और पुरुष का थायराइड टेस्ट करवाया जाता है।इसका कारण यह है कि थायराइड हॉर्मोन का असर सीधे अंडों की गुणवत्ता, स्पर्म की सेहत, भ्रूण के इम्प्लांटेशन और गर्भावस्था को बनाए रखने पर पड़ता है। कई मामलों में बार-बार गर्भपात या गर्भधारण में दिक्कत के पीछे थायराइड असंतुलन एक महत्वपूर्ण कारण होता है।
इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि T3, T4, TSH का क्या मतलब है, रिपोर्ट में किस वैल्यू को पहले देखना चाहिए, और अगर कोई नंबर सामान्य सीमा से बाहर आए तो आगे क्या कदम उठाने चाहिए।
थायराइड ग्रंथि दो मुख्य हॉर्मोन बनाती है, पहला T3 यानी ट्राईआयोडोथायरोनिन (Triiodothyronine) और दूसरा T4 यानी थायरॉक्सिन (Thyroxine) हॉर्मोन। ये दोनों हॉर्मोन शरीर की एनर्जी, टेम्परेचर, वज़न, और मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करते हैं।
TSH (थायराइड स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन) एक अलग हॉर्मोन होता है जो मस्तिष्क की पिट्यूटरी ग्रंथि से निकलता है। इस हॉर्मोन का काम है कि यह थायराइड ग्रंथि को सिग्नल देगा कि कितना T3 और T4 बनाना है।
अगर शरीर में T3 और T4 किन्हीं वजहों से कम बनने लगते हैं, तो पिट्यूटरी ग्रंथि ज़्यादा TSH बनाती है, जिससे थायराइड को अधिक हॉर्मोन बनाने के लिए सिग्नल मिल सके। दूसरी तरफ, अगर T3 और T4 की मात्रा किन्ही वजहों से ज़्यादा हो जाए, तो TSH का लेवल कम हो जाता है जिससे थायराइड की एक्टिविटी धीमी हो सके और T3 और T4 आवश्यकता के अनुसार बन सकें।
इसी वजह से थायराइड की जाँच में डॉक्टर सबसे पहले TSH की वैल्यू देखते हैं। TSH अक्सर यह पहला सिग्नल देता है कि थायराइड ग्रंथि सामान्य रूप से काम कर रही है या उसमें कोई गड़बड़ी है।
जब आप T3 T4 TSH test की रिपोर्ट देखते हैं, तो सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि किस वैल्यू को पहले देखना चाहिए। रिपोर्ट में तीनों हॉर्मोन की वैल्यू लिखी होती है, लेकिन डॉक्टर आमतौर पर एक निश्चित क्रम में उन्हें समझते हैं।
थायराइड रिपोर्ट समझने की शुरुआत TSH से होती है। इसकी सामान्य रेंज आमतौर पर 0.4 से 4.5 mIU/L मानी जाती है। लेकिन अगर आप प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं, तो कई एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि आपका TSH 2.5 mIU/L से कम होना चाहिए। इसलिए जब फर्टिलिटी की बात होती है तब TSH के लेवल थोड़ा सीरियसली देखा जाता है।
Free T4 बताता है कि शरीर में एक्टिव थायरॉक्सिन की मात्रा कितनी है। इसकी सामान्य रेंज लगभग 0.8 से 1.8 ng/dL होती है। यह वैल्यू यह समझने में मदद करती है कि थायराइड ग्रंथि वास्तव में कितना हॉर्मोन बना रही है।
T3 सबसे एक्टिव थायराइड हॉर्मोन माना जाता है और इसकी सामान्य रेंज लगभग 80 से 200 ng/dL होती है। हालांकि हर रिपोर्ट में T3 का महत्व समान नहीं होता। अक्सर इसका टेस्ट तब ज़्यादा उपयोगी होता है जब डॉक्टर को हाइपरथायरॉइडिज्म यानी थायराइड के ज़्यादा सक्रिय होने का संदेह होता है।
मतलब: इसका मतलब है कि थायराइड ग्रंथि धीमी पड़ गई है और पर्याप्त हॉर्मोन नहीं बना पा रही।
लक्षण: थकान, वज़न बढ़ना, ठंड ज़्यादा लगना, त्वचा रूखी होना, बाल झड़ना, पीरियड्स अनियमित होना, और कब्ज़।
प्रेगनेंसी पर असर: हाइपोथायरॉइडिज्म से ओव्यूलेशन में दिक्कत होती है, जिससे प्रेगनेंसी मुश्किल हो जाती है, इसके आलावा गर्भपात यानी मिसकैरिज़ का खतरा बढ़ जाता है। एक स्टडी के अनुसार में TPO एंटीबॉडी पॉज़िटिव महिलाओं में मिसकैरिज़ की दर 53 प्रतिशत पाई गई है।
इलाज: थायरॉक्सिन की गोली से TSH को कंट्रोल किया जाता है। डॉक्टर की सलाह पर सही डोज़ लेने से ज़्यादातर महिलाएं नैचुरली कंसीव कर पाती हैं।
मतलब: इसका मतलब है कि थायराइड ग्रंथि ज़रूरत से ज़्यादा हॉर्मोन बना रही है।
लक्षण: बेचैनी, घबराहट, दिल की धड़कन तेज़, वज़न घटना, पसीना ज़्यादा आना, हाथों का कांपना, और नींद न आना।
प्रेगनेंसी पर असर: हाइपरथायरॉइडिज्म से पीरियड्स हल्के या बंद हो सकते हैं, गर्भधारण में दिक्कत आती है, और गर्भावस्था में प्रीक्लेम्पसिया का खतरा बढ़ता है।
इलाज: डॉक्टर हाइपरथायरॉइडिज्म का इलाज़ एंटी-थायराइड (Anti-thyroid) दवाइयों या कभी-कभी रेडियोआयोडीन थेरेपी से करते हैं। प्रेगनेंसी के दौरान दवाइयों का चुनाव सावधानी से किया जाता है।
मतलब: इस रिजल्ट के अनुसार थायराइड थोड़ी धीमी है, लेकिन अभी पूरी तरह खराब नहीं हुई। यह सबसे ज़्यादा miss होने वाली स्थिति है। रिपोर्ट में "नॉर्मल" लिखा आ सकता है क्योंकि T4 सामान्य है, लेकिन TSH 4 से 5 के बीच होना प्रेगनेंसी के लिए आइडियल नहीं होता है।
गर्भधारण पर असर: IVF में TSH 3 mIU/L से ज़्यादा होने पर लाइव बर्थ रेट कम हो जाती है। कई फर्टिलिटी एक्सपर्ट TSH को 2.5 से कम लाने की सलाह देते हैं।
इलाज: इसका इलाज डॉक्टर अपनी समझ के हिसाब से करते हैं, कभी कभी सिर्फ़ निगरानी रखने को कहा जाता है, और कभी एंटी-थायराइड की हल्की डोज़ दी जाती है।
मतलब: थायराइड सही से काम कर रही है। लेकिन अगर TSH 2.5 से 4.5 के बीच है और आप माँ बनने की प्लानिंग कर रही हैं, तो फर्टिलिटी एक्सपर्ट से बात करें। सामान्य लोगों के लिए यह नॉर्मल है, लेकिन प्रेगनेंसी के लिए यह रेंज आइडियल नहीं है।
थायराइड हॉर्मोन ओवरी में अंडों के विकास को प्रभावित करते हैं। TSH बढ़ा होने पर अंडों की गुणवत्ता और संख्या दोनों प्रभावित होती हैं।
भ्रूण यानी एम्ब्रीओ (embryo) को गर्भाशय की दीवार से चिपकने मतलब इम्प्लांटेशन के लिए हॉर्मोन का सही वातावरण चाहिए होता है। थायराइड में गड़बड़ी से एंडोमेट्रियम की रिसेप्टिविटी यानी एम्ब्रीओ को चिपकने और रोके रहने की क्षमता कम हो जाती है।
हाइपोथायरॉइडिज्म गर्भपात के प्रमुख कारणों में से एक है। खासकर पहली तिमाही में, जब भ्रूण पूरी तरह माँ के थायराइड हॉर्मोन पर निर्भर होता है।
IVF के दौरान ओवेरियन स्टिमुलेशन से एस्ट्रोजन बहुत बढ़ जाता है। यह TSH को भी बढ़ा सकता है। इसीलिए IVF से पहले और बाद में थायराइड की निगरानी ज़रूरी है।
जिन महिलाओं का कई बार मिसकैरिज़ हो चुका होता है, उनमें से कई महिलाओं में जाँच करने पर थायराइड की समस्या मिलती है, वो भी ऐसी जो पहले नॉर्मल मान ली गई थी। TSH को 2.5 से नीचे लाने के बाद कई महिलायें सफलतापूर्वक माँ बन पायीं।
TSH की नॉर्मल रेंज 0.4 से 4.5 mIU/L है।
TSH 2.5 mIU/L से कम होना चाहिए।
पहली तिमाही में TSH 2.5 mIU/L से कम, दूसरी और तीसरी तिमाही में 3.0 mIU/L से कम होना चाहिए।
IVF ट्रीटमेंट शुरू करने से पहले TSH को 2.5 से कम करना आइडियल माना जाता है। ओवेरियन स्टिमुलेशन के दौरान और एम्ब्रीओ ट्रांसफर के बाद भी निगरानी ज़रूरी है।
अगर कोई लक्षण नहीं हैं, तो साल में एक बार TSH टेस्ट पर्याप्त है।
गर्भधारण की योजना बनाते समय, IVF या IUI से पहले, बार-बार गर्भपात होने पर, पीरियड्स अनियमित होने पर, अचानक वज़न बढ़ने या घटने पर, थकान और कमज़ोरी रहने पर, और परिवार में थायराइड की हिस्ट्री होने पर।
इस टेस्ट के लिए खाली पेट रहने की ज़रूरत नहीं है। सुबह का समय बेहतर माना जाता है क्योंकि TSH सुबह थोड़ा ज़्यादा होता है।
आमतौर पर 24-48 घंटे में रिपोर्ट आ जाती है। टेस्ट लगभग ₹300 से ₹800 के बीच हो जाता है।
थायराइड की जाँच में T3, T4 और TSH तीनों हॉर्मोन महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन रिपोर्ट समझने की शुरुआत आमतौर पर TSH से की जाती है। यह हॉर्मोन अक्सर सबसे पहले संकेत देता है कि थायराइड ग्रंथि सामान्य रूप से काम कर रही है या उसमें कोई असंतुलन है।
थायराइड सिर्फ़ महिलाओं की समस्या नहीं है। पुरुषों में भी थायराइड की गड़बड़ी से स्पर्म की क्वालिटी और काउंट पर असर पड़ता है। हाइपोथायरॉइडिज्म से स्पर्म मोटिलिटी कम होती है। हाइपरथायरॉइडिज्म से स्पर्म की संरचना प्रभावित होती है। इसीलिए निःसंतानता की जाँच में पुरुष का भी थायराइड टेस्ट ज़रूरी है।
अगर रिपोर्ट में कोई वैल्यू सामान्य सीमा से बाहर आती है, तो घबराने की जरूरत नहीं होती। थायराइड की अधिकांश समस्याएँ दवाइयों से नियंत्रित की जा सकती हैं। सही इलाज और नियमित जाँच से थायराइड स्तर को सामान्य रखा जा सकता है।
इसलिए अगर आपकी थायराइड रिपोर्ट में कोई असामान्य वैल्यू आए, तो स्वयं निर्णय लेने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेकर सही इलाज शुरू करना सबसे सुरक्षित और प्रभावी तरीका होता है।