अगर आपकी थायरॉइड की रिपोर्ट में TSH का स्तर सामान्य सीमा से बाहर आया है, तो घबराने से पहले TSH test in hindi में समझना ज़रूरी है कि TSH कितना बढ़ा या घटा है, साथ में T3 और T4 के स्तर क्या हैं, और आपको कोई लक्षण महसूस हो रहे हैं या नहीं।
थायरॉइड की समस्या आज हर 10 में से 1 महिला को है। लेकिन ज़्यादातर महिलाओं को पता ही नहीं चलता जब तक कि कोई और समस्या जैसे पीरियड्स का अनियमित होना, वज़न का बेवजह बढ़ना, या प्रेगनेंसी में दिक्कत आना, सामने न आए।
TSH test in hindi में समझेंगे कि यह टेस्ट क्या होता है, रिपोर्ट के नंबर का क्या मतलब है, हाई और लो TSH में क्या फर्क है, और सबसे ज़रूरी कि अगर आप माँ बनना चाहती हैं तो आपका TSH कितना होना चाहिए और IVF में थायरॉइड का क्या रोल है।
TSH test in hindi को समझने के लिए पहले यह जानना ज़रूरी है कि थायरॉइड क्या होता है।
थायरॉइड ग्लैंड गर्दन में सामने तितली के आकार की एक ग्रंथि यानी गॉँठ होती है। यह दो मुख्य हॉर्मोन T3 यानी ट्राईआयोडोथायरोनिन और T4 यानी थायरॉक्सिन बनाती है। ये हॉर्मोन शरीर के मेटाबॉलिज़्म को कंट्रोल करते हैं, यानी खाना कैसे एनर्जी में बदलता है, दिल कितनी तेज़ धड़कता है, शरीर का तापमान कैसा रहता है, और यहां तक कि मूड भी इन्हीं हॉर्मोन से प्रभावित होता है।
अब सवाल है कि थायरॉइड को कैसे पता चलता है कि कितना हॉर्मोन बनाना है? यहीं TSH की भूमिका आती है।
TSH यानी थायरॉइड स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन (Thyroid Stimulating Hormone) दिमाग में मौजूद पिट्यूटरी ग्लैंड बनाती है, जिसका काम है थायरॉइड ग्लैंड को सिग्नल देना।
जब शरीर में T3 और T4 कम होते हैं, तो पिट्यूटरी ग्लैंड ज़्यादा TSH बनाती है ताकि थायरॉइड को मैसेज जाए कि और हॉर्मोन बनाओ। और जब T3/T4 ज़्यादा हो जाते हैं, तो TSH कम हो जाता है।
इसीलिए TSH test in hindi में समझें तो यह एक इनडायरेक्ट तरीका है थायरॉइड की हेल्थ जानने का। TSH हाई है तो थायरॉइड कम काम कर रही है, TSH लो है तो थायरॉइड ज़्यादा काम कर रही है।
TSH टेस्ट सिर्फ बीमार लोगों के लिए नहीं है। कई स्थितियों में यह रूटीन चेकअप का हिस्सा होना चाहिए।
यह समझना ज़रूरी है कि 4.0 के अंदर होने का मतलब हमेशा ठीक नहीं होता। अगर आप फर्टिलिटी ट्रीटमेंट ले रही हैं और TSH 3.5 है, तो भी डॉक्टर दवाई शुरू कर सकते हैं।
अगर TSH 4.5 या उससे ज़्यादा है, तो इसका मतलब है कि थायरॉइड ग्लैंड कम हॉर्मोन बना रही है और पिट्यूटरी उसे ज़्यादा सिग्नल भेज रही है। इस कंडीशन को हाइपोथायरॉइडिज़्म (Hypothyroidism) कहते हैं।
आपकी रिपोर्ट में TSH अगर 0.4 से कम है, तो इसका मतलब है कि थायरॉइड ग्लैंड ज़्यादा हॉर्मोन बना रही है। इस कंडीशन को हाइपरथायरॉइडिज़्म (Hyperthyroidism) कहते हैं।
लेकिन अगर आप प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं, तो सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज़्म का भी इलाज किया जाता है। क्योंकि TSH 2.5 से ऊपर होने पर मिसकैरेज का रिस्क थोड़ा बढ़ जाता है।
प्रेगनेंसी के दौरान थायरॉइड की ज़रूरत बढ़ जाती है क्योंकि बच्चे के विकास के लिए भी थायरॉइड हॉर्मोन चाहिए।
IVF या अन्य ART यानी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी में थायरॉइड ऑप्टिमाइज़ करना जरुरी है।
TSH टेस्ट एक सिंपल ब्लड टेस्ट है जो किसी भी लैब में हो जाता है।
TSH टेस्ट सिर्फ थकान या वज़न की समस्या के लिए नहीं है। अगर आप TSH test in hindi पढ़ चुकी हैं और आप प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं, तो TSH चेक करवाना बहुत ही ज़रूरी है।
रिपोर्ट में नंबर देखकर घबराएं नहीं। बिना प्रेगनेंसी के 4.0 के अंदर होना नॉर्मल है, लेकिन फर्टिलिटी के लिए 2.5 के अंदर रखना बेहतर माना जाता है।
अगर TSH हाई है तो यह दवाई से आसानी से कंट्रोल हो जाता है। इसकी दवाई प्रेगनेंसी में पूरी तरह सेफ है और इसे बंद नहीं करना चाहिए। प्रेगनेंसी के दौरान हर तिमाही में TSH चेक करवाएं क्योंकि प्रेगनेंसी में थायरॉइड की ज़रूरत बदलती रहती है और दवाई की डोज़ एडजस्ट करनी पड़ सकती है।
IVF प्लान कर रही हैं तो साइकिल शुरू करने से पहले TSH ऑप्टिमाइज़ करवाएं। इससे IVF की सक्सेस रेट बेहतर होती है और मिसकैरेज का रिस्क कम होता है।
TSH हाई होने का मतलब है हाइपोथायरॉइडिज़्म यानी थायरॉइड कम काम कर रही है। इससे थकान, वज़न बढ़ना, बाल झड़ना, और पीरियड्स की समस्या हो सकती है।
हो सकती है, लेकिन मिसकैरेज का रिस्क बढ़ जाता है। प्रेगनेंसी से पहले TSH कंट्रोल करना ज़रूरी है।
ज़रूरी नहीं, लेकिन सुबह खाली पेट करवाने से सबसे सही रिज़ल्ट आता है। थायरॉइड दवाई टेस्ट के बाद लें।
IVF से पहले TSH 2.5 mIU/L से कम रखना बेहतर माना जाता है। इससे IVF की सक्सेस रेट बेहतर होती है।
बिल्कुल नहीं। थायरॉइड की दवाई प्रेगनेंसी में सेफ है और इसे जारी रखना ज़रूरी है। प्रेगनेंसी में डोज़ बढ़ानी पड़ सकती है।