थायरॉइड टेस्ट की रिपोर्ट कैसे पढ़ें? (TSH Test in Hindi)

Last updated: February 23, 2026

Overview

अगर आपकी थायरॉइड की रिपोर्ट में TSH का स्तर सामान्य सीमा से बाहर आया है, तो घबराने से पहले TSH test in hindi में समझना ज़रूरी है कि TSH कितना बढ़ा या घटा है, साथ में T3 और T4 के स्तर क्या हैं, और आपको कोई लक्षण महसूस हो रहे हैं या नहीं।

थायरॉइड की समस्या आज हर 10 में से 1 महिला को है। लेकिन ज़्यादातर महिलाओं को पता ही नहीं चलता जब तक कि कोई और समस्या जैसे पीरियड्स का अनियमित होना, वज़न का बेवजह बढ़ना, या प्रेगनेंसी में दिक्कत आना, सामने न आए।

TSH test in hindi में समझेंगे कि यह टेस्ट क्या होता है, रिपोर्ट के नंबर का क्या मतलब है, हाई और लो TSH में क्या फर्क है, और सबसे ज़रूरी कि अगर आप माँ बनना चाहती हैं तो आपका TSH कितना होना चाहिए और IVF में थायरॉइड का क्या रोल है।

TSH क्या है और थायरॉइड कैसे काम करता है?

TSH test in hindi को समझने के लिए पहले यह जानना ज़रूरी है कि थायरॉइड क्या होता है।

थायरॉइड ग्लैंड गर्दन में सामने तितली के आकार की एक ग्रंथि यानी गॉँठ होती है। यह दो मुख्य हॉर्मोन T3 यानी ट्राईआयोडोथायरोनिन और T4 यानी थायरॉक्सिन बनाती है। ये हॉर्मोन शरीर के मेटाबॉलिज़्म को कंट्रोल करते हैं, यानी खाना कैसे एनर्जी में बदलता है, दिल कितनी तेज़ धड़कता है, शरीर का तापमान कैसा रहता है, और यहां तक कि मूड भी इन्हीं हॉर्मोन से प्रभावित होता है।

अब सवाल है कि थायरॉइड को कैसे पता चलता है कि कितना हॉर्मोन बनाना है? यहीं TSH की भूमिका आती है।

TSH यानी थायरॉइड स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन (Thyroid Stimulating Hormone) दिमाग में मौजूद पिट्यूटरी ग्लैंड बनाती है, जिसका काम है थायरॉइड ग्लैंड को सिग्नल देना।

जब शरीर में T3 और T4 कम होते हैं, तो पिट्यूटरी ग्लैंड ज़्यादा TSH बनाती है ताकि थायरॉइड को मैसेज जाए कि और हॉर्मोन बनाओ। और जब T3/T4 ज़्यादा हो जाते हैं, तो TSH कम हो जाता है।

इसीलिए TSH test in hindi में समझें तो यह एक इनडायरेक्ट तरीका है थायरॉइड की हेल्थ जानने का। TSH हाई है तो थायरॉइड कम काम कर रही है, TSH लो है तो थायरॉइड ज़्यादा काम कर रही है।

TSH टेस्ट किसे और क्यों करवाना चाहिए?

TSH टेस्ट सिर्फ बीमार लोगों के लिए नहीं है। कई स्थितियों में यह रूटीन चेकअप का हिस्सा होना चाहिए।

  • थायरॉइड के लक्षण दिखने पर: बिना वजह थकान जो आराम से भी न जाए, वज़न बढ़ना या अचानक कम होना, बाल झड़ना और स्किन ड्राई होना, ठंड या गर्मी ज़्यादा लगना, कब्ज़ या दस्त की समस्या, मूड स्विंग्स या डिप्रेशन जैसा महसूस होना, इन सबमें TSH चेक करवाना चाहिए।
  • पीरियड्स की समस्या में: अनियमित पीरियड्स, बहुत हैवी ब्लीडिंग, बहुत लाइट पीरियड्स, या महीनों पीरियड न आना, इन सबका एक कारण थायरॉइड हो सकता है। थायरॉइड हॉर्मोन सीधे ओवरी के फंक्शन को प्रभावित करते हैं।
  • फर्टिलिटी वर्कअप में: अगर आप प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं या 6-12 महीने कोशिश के बाद भी कंसीव नहीं हो रहा, तो TSH टेस्ट सबसे पहले करवाया जाता है। फर्टिलिटी क्लिनिक में यह बेसिक टेस्ट है।
  • प्रेगनेंसी कंफर्म होने पर: प्रेगनेंसी के दौरान थायरॉइड मॉनिटर करना ज़रूरी है क्योंकि बच्चे के ब्रेन डेवलपमेंट के लिए मां का थायरॉइड सही होना चाहिए।
  • IVF या फर्टिलिटी ट्रीटमेंट से पहले: IVF साइकिल शुरू करने से पहले TSH ऑप्टिमाइज़ करना प्रोटोकॉल का हिस्सा है।
  • फैमिली हिस्ट्री होने पर: अगर मां, बहन, या नानी को थायरॉइड है, तो आपको भी रिस्क है। साल में एक बार TSH चेक करवाना अच्छा है।

TSH की नॉर्मल रेंज क्या है?

  • सामान्य वयस्क के लिए: 0.4 से 4.0 mIU/L को नॉर्मल माना जाता है। कुछ लैब्स में यह रेंज 0.5 से 5.0 तक भी हो सकती है।
  • प्रेगनेंसी प्लान करने वाली महिलाओं के लिए: 2.5 mIU/L से कम रखना बेहतर माना जाता है। कई फर्टिलिटी एक्सपर्ट्स 2.5 से ऊपर होने पर भी ट्रीटमेंट शुरू कर देते हैं भले ही वो 4.0 के अंदर हो।
  • पहली तिमाही में: 0.1 से 2.5 mIU/L होना चाहिए। पहली तिमाही में TSH थोड़ा कम होना नॉर्मल है क्योंकि hCG हॉर्मोन थायरॉइड को स्टिम्युलेट करता है।
  • दूसरी तिमाही में: 0.2 से 3.0 mIU/L तक नॉर्मल माना जाता है।
  • तीसरी तिमाही में: 0.3 से 3.0 mIU/L तक।

यह समझना ज़रूरी है कि 4.0 के अंदर होने का मतलब हमेशा ठीक नहीं होता। अगर आप फर्टिलिटी ट्रीटमेंट ले रही हैं और TSH 3.5 है, तो भी डॉक्टर दवाई शुरू कर सकते हैं।

रिपोर्ट में हाई TSH आए तो क्या समझें?

अगर TSH 4.5 या उससे ज़्यादा है, तो इसका मतलब है कि थायरॉइड ग्लैंड कम हॉर्मोन बना रही है और पिट्यूटरी उसे ज़्यादा सिग्नल भेज रही है। इस कंडीशन को हाइपोथायरॉइडिज़्म (Hypothyroidism) कहते हैं।

  • हाइपोथायरॉइडिज़्म का कारण: इसका सबसे कॉमन कारण है हाशिमोटो थायरॉइडाइटिस जो एक ऑटोइम्यून कंडीशन है, जिसमें शरीर की इम्यूनिटी खुद थायरॉइड पर अटैक करती है। इसके अलावा यह आयोडीन की कमी, थायरॉइड सर्जरी, या रेडिएशन से भी हो सकता है।
  • हाइपोथायरॉइडिज़्म का इलाज: हाइपोथायरॉइडिज़्म के इलाज के लिए डॉक्टर दवाई देते हैं जो सिंथेटिक T4 होती है एवं थायरॉइड हॉर्मोन की कमी को पूरा करती है। सही डोज़ से 6 से 8 हफ्तों में TSH नॉर्मल हो जाता है।

रिपोर्ट में लो TSH आए तो क्या समझें?

आपकी रिपोर्ट में TSH अगर 0.4 से कम है, तो इसका मतलब है कि थायरॉइड ग्लैंड ज़्यादा हॉर्मोन बना रही है। इस कंडीशन को हाइपरथायरॉइडिज़्म (Hyperthyroidism) कहते हैं।

  • हाइपरथायरॉइडिज़्म का कारण: इसका भी सबसे कॉमन कारण एक ऑटोइम्यून कंडीशन है जिसे ग्रेव्स डिज़ीज़ कहते हैं। इसके अलावा थायरॉइड नोड्यूल या थायरॉइडाइटिस से भी हो सकता है।
  • हाइपरथायरॉइडिज़्म का इलाज: इसके इलाज के लिए एंटी-थायरॉइड दवाइयां दी जाती हैं। कुछ मामलों में रेडियोएक्टिव आयोडीन या सर्जरी की ज़रूरत पड़ती है।

जब थायरॉइड बॉर्डरलाइन हो?

  • सबक्लिनिकल थायरॉइड Subclinical Thyroid): कई बार TSH थोड़ा हाई या लो होता है, लेकिन T3 और T4 नॉर्मल रेंज में होते हैं। इसे Subclinical Thyroid कहते हैं।
  • सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज़्म (Subclinical Hypothyroidism): जब TSH 4.5 से 10 के बीच है, लेकिन T4 नॉर्मल है। इसमें कोई लक्षण नहीं होते या बहुत हल्के होते हैं। सामान्य लोगों में डॉक्टर अक्सर वेट-एंड-वॉच अप्रोच रखते हैं और हर 6 महीने में फिर से टेस्ट करवाते हैं।

लेकिन अगर आप प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं, तो सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज़्म का भी इलाज किया जाता है। क्योंकि TSH 2.5 से ऊपर होने पर मिसकैरेज का रिस्क थोड़ा बढ़ जाता है।

प्रेगनेंसी में TSH कितना होना चाहिए?

प्रेगनेंसी के दौरान थायरॉइड की ज़रूरत बढ़ जाती है क्योंकि बच्चे के विकास के लिए भी थायरॉइड हॉर्मोन चाहिए।

  • पहली तिमाही: बच्चे की थायरॉइड ग्लैंड 12 हफ्ते तक काम नहीं करती। वो पूरी तरह मां के थायरॉइड हॉर्मोन पर निर्भर होता है। इसीलिए पहली तिमाही में TSH 2.5 से कम होना बहुत ज़रूरी है।
  • दूसरी और तीसरी तिमाही: बच्चे की थायरॉइड काम करने लगती है, लेकिन मां का थायरॉइड भी सही होना चाहिए। TSH 3.0 से कम रखना बेहतर है।
  • दवाई की डोज़: प्रेगनेंसी में थायरॉइड हॉर्मोन की ज़रूरत 25-50% बढ़ जाती है। अगर आप दवाई ले रही हैं, तो प्रेगनेंसी कंफर्म होते ही डॉक्टर डोज़ बढ़ा सकते हैं।

    IVF के दौरान थायरॉइड क्यों ज़रूरी है?

    IVF या अन्य ART यानी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी में थायरॉइड ऑप्टिमाइज़ करना जरुरी है।

  • IVF से पहले TSH टारगेट: ज़्यादातर फर्टिलिटी क्लिनिक्स TSH 2.5 mIU/L से कम रखने की सलाह देते हैं। कुछ एक्सपर्ट्स 2.0 से कम रखना और भी बेहतर मानते हैं।
  • ओवेरियन स्टिम्युलेशन का असर: IVF में ओवरी को स्टिम्युलेट करने के लिए हॉर्मोन इंजेक्शन दिए जाते हैं। इससे एस्ट्रोजन बहुत बढ़ता है। एस्ट्रोजन बढ़ने से थायरॉइड हॉर्मोन की ज़रूरत भी बढ़ जाती है। इसीलिए IVF के दौरान दवाई की डोज़ बढ़ानी पड़ सकती है।
  • एम्ब्रीओ ट्रांसफर के बाद: ट्रांसफर के बाद भी TSH मॉनिटर किया जाता है। प्रेगनेंसी कंफर्म होने पर दवाई एडजस्ट की जाती है।
  • IVF सक्सेस रेट पर असर: कई स्टडीज़ में देखा गया है कि ऑप्टिमल TSH लेवल वाली महिलाओं में IVF की सक्सेस रेट बेहतर होती है और मिसकैरेज रेट कम होती है।

TSH टेस्ट की तैयारी (TSH test Preparation)

TSH टेस्ट एक सिंपल ब्लड टेस्ट है जो किसी भी लैब में हो जाता है।

  • फास्टिंग की ज़रूरत: TSH टेस्ट के लिए फास्टिंग ज़रूरी नहीं है। लेकिन सुबह खाली पेट करवाने से सबसे सही रिज़ल्ट आता है क्योंकि TSH लेवल दिन में थोड़ा बदलता रहता है।
  • दवाई का ध्यान: अगर आप थायरॉइड की दवाई ले रही हैं, तो टेस्ट से पहले दवाई न लें। पहले ब्लड सैंपल दें, फिर दवाई लें।
  • सबसे अच्छा समय: सुबह 8-10 बजे के बीच TSH लेवल सबसे स्थिर होता है।

एक्सपर्ट की सलाह

TSH टेस्ट सिर्फ थकान या वज़न की समस्या के लिए नहीं है। अगर आप TSH test in hindi पढ़ चुकी हैं और आप प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं, तो TSH चेक करवाना बहुत ही ज़रूरी है।

रिपोर्ट में नंबर देखकर घबराएं नहीं। बिना प्रेगनेंसी के 4.0 के अंदर होना नॉर्मल है, लेकिन फर्टिलिटी के लिए 2.5 के अंदर रखना बेहतर माना जाता है।

अगर TSH हाई है तो यह दवाई से आसानी से कंट्रोल हो जाता है। इसकी दवाई प्रेगनेंसी में पूरी तरह सेफ है और इसे बंद नहीं करना चाहिए। प्रेगनेंसी के दौरान हर तिमाही में TSH चेक करवाएं क्योंकि प्रेगनेंसी में थायरॉइड की ज़रूरत बदलती रहती है और दवाई की डोज़ एडजस्ट करनी पड़ सकती है।

IVF प्लान कर रही हैं तो साइकिल शुरू करने से पहले TSH ऑप्टिमाइज़ करवाएं। इससे IVF की सक्सेस रेट बेहतर होती है और मिसकैरेज का रिस्क कम होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

TSH हाई होने पर क्या होता है?

 

TSH हाई होने का मतलब है हाइपोथायरॉइडिज़्म यानी थायरॉइड कम काम कर रही है। इससे थकान, वज़न बढ़ना, बाल झड़ना, और पीरियड्स की समस्या हो सकती है।

क्या TSH हाई होने पर प्रेगनेंसी हो सकती है?

 

हो सकती है, लेकिन मिसकैरेज का रिस्क बढ़ जाता है। प्रेगनेंसी से पहले TSH कंट्रोल करना ज़रूरी है।

TSH टेस्ट खाली पेट करवाना ज़रूरी है?

 

ज़रूरी नहीं, लेकिन सुबह खाली पेट करवाने से सबसे सही रिज़ल्ट आता है। थायरॉइड दवाई टेस्ट के बाद लें।

IVF में TSH कितना होना चाहिए?

 

IVF से पहले TSH 2.5 mIU/L से कम रखना बेहतर माना जाता है। इससे IVF की सक्सेस रेट बेहतर होती है।

थायरॉइड की दवाई प्रेगनेंसी में बंद करनी चाहिए?

 

बिल्कुल नहीं। थायरॉइड की दवाई प्रेगनेंसी में सेफ है और इसे जारी रखना ज़रूरी है। प्रेगनेंसी में डोज़ बढ़ानी पड़ सकती है।

**Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
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