विटामिन E कैप्सूल आज लगभग हर घर में है। कोई बाल-त्वचा के लिए ले रहा है, कोई कमज़ोरी के लिए, और बहुत से कपल फर्टिलिटी के नाम पर।
पर इसके फर्टिलिटी वाले फ़ायदे को लेकर जितना दावा किया जाता है, और सबूत असल में जितना कहते हैं - इन दोनों में फ़र्क़ है। और वही फ़र्क़ समझना इस लेख का मक़सद है।
तो सीधी और ईमानदार बात करेंगे - न ज़रूरत से ज़्यादा उम्मीद, न पूरी तरह ख़ारिज।
विटामिन E एक फैट में घुलनशील विटामिन है, और शरीर में इसका मुख्य काम एक "एंटीऑक्सिडेंट" (Antioxidant) का है।
इसे ऐसे समझिए - शरीर की कोशिकाओं में रोज़मर्रा की प्रक्रिया से कुछ हानिकारक कण बनते हैं, जिन्हें फ्री रेडिकल्स कहते हैं। ये कोशिकाओं को नुक़सान पहुँचाते हैं, जैसे लोहे में जंग। एंटीऑक्सिडेंट इसी जंग को रोकने का काम करते हैं। विटामिन E उन्हीं में से एक है।
इसके आम फ़ायदे - त्वचा और बालों की सेहत, कोशिकाओं की सुरक्षा, और शरीर में विटामिन E की कमी को पूरा करना - काफ़ी हद तक स्थापित हैं। असली बहस फर्टिलिटी वाले हिस्से पर है।
फर्टिलिटी में विटामिन E की बात इसी एंटीऑक्सिडेंट वाले गुण से जुड़ी है।
पुरुषों में शुक्राणुओं को "ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस" नुक़सान पहुँचाता है - यानी वही फ्री रेडिकल्स वाली जंग, जो शुक्राणु की गतिशीलता, बनावट और DNA को प्रभावित करती है। माना जाता है कि पुरुष बांझपन के एक बड़े हिस्से में ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस की भूमिका होती है।
तर्क सीधा है - अगर एंटीऑक्सिडेंट इस जंग को कम करते हैं, तो वो शुक्राणुओं की सुरक्षा में मदद कर सकते हैं। विटामिन E इसी उम्मीद के साथ दिया जाता है।
पर तर्क अच्छा होना और सबूत का मज़बूत होना - दो अलग बातें हैं। तो सबूत देखते हैं।
यहाँ तस्वीर मिली-जुली है, और यही ईमानदार जवाब है।
कुछ अध्ययनों में अच्छे नतीजे मिले हैं, ख़ासकर जब विटामिन E अकेले नहीं, बल्कि सेलेनियम जैसे दूसरे एंटीऑक्सिडेंट के साथ दिया गया। एक बड़े व्यवस्थित विश्लेषण में विटामिन E और सेलेनियम साथ देने पर शुक्राणुओं की गतिशीलता, बनावट और जीवंतता में सुधार देखा गया।
DNA नुक़सान के मामले में भी संकेत मिले हैं। एक अध्ययन में विटामिन E और C साथ देने पर शुक्राणुओं का DNA नुक़सान कम हुआ - हालाँकि उसी अध्ययन में गतिशीलता और संख्या जैसे मुख्य मापदंडों पर कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं दिखा।
और सबसे बड़ी तस्वीर - Cochrane की समीक्षा, जो सबसे भरोसेमंद मानी जाती है, में 90 अध्ययन और 10,303 पुरुष शामिल थे। उसका निष्कर्ष संतुलित है: एंटीऑक्सिडेंट सप्लीमेंट फर्टिलिटी इलाज करा रहे कपल में जीवित जन्म और प्रेग्नेंसी दर बेहतर कर सकते हैं और शुक्राणु के DNA नुक़सान को कम कर सकते हैं।
पर उसी समीक्षा में एक बड़ी चेतावनी भी है - मौजूदा सबूत निर्णायक नहीं हैं, क्योंकि अध्ययनों की गुणवत्ता कमज़ोर रही, नमूने छोटे थे, और जीवित जन्म पर डेटा कम था। और अहम बात - कोई एक एंटीऑक्सिडेंट दूसरे से बेहतर साबित नहीं हुआ।
तो निष्कर्ष क्या निकला? विटामिन E (ख़ासकर दूसरे एंटीऑक्सिडेंट के साथ) कुछ पुरुषों में मदद कर सकता है, पर ये कोई गारंटी वाला इलाज नहीं है, और अकेले विटामिन E को "फर्टिलिटी की दवा" मानना सबूत से आगे जाना है।
यहाँ सबूत और भी कम और कमजोर हैं, इसलिए ईमानदारी और भी ज़रूरी है।
महिला फर्टिलिटी में विटामिन E की ख़ास, अकेली भूमिका को लेकर मज़बूत प्रमाण नहीं हैं। कुछ छोटे अध्ययनों में गर्भाशय की परत या अंडे की गुणवत्ता को लेकर संकेत मिले हैं, पर ये इतने पक्के नहीं कि इसे सबके लिए सिफ़ारिश किया जा सके।
तो अगर किसी महिला को सिर्फ़ "फर्टिलिटी बढ़ाने" के नाम पर अकेला विटामिन E दिया जा रहा है, तो इसका सबूत आधार कमज़ोर है। ये फ़ैसला डॉक्टर की सलाह से ही होना चाहिए, किसी सामान्य धारणा से नहीं।
ये हिस्सा सबसे ध्यान से पढ़िए, क्योंकि यहीं सबसे ज़्यादा नुक़सान होता है।
एंटीऑक्सिडेंट को लेकर एक ग़लत धारणा है कि "जितना ज़्यादा, उतना अच्छा।" ये ग़लत है, और ख़तरनाक भी।
विटामिन E एक फैट में घुलने वाला विटामिन है - यानी ये शरीर में जमा होता रहता है, पानी में घुलने वाले विटामिन की तरह बाहर नहीं निकल जाता। बहुत ज़्यादा मात्रा में लंबे समय तक लेने से नुक़सान हो सकता है, जिसमें ख़ून के थक्के बनने की प्रक्रिया पर असर भी शामिल है।
इसीलिए दो बातें ज़रूरी हैं। पहली - इसे अपने आप, मनमानी मात्रा में मत लीजिए। दूसरी - अगर कोई सर्जरी होने वाली है (जैसे कोई फर्टिलिटी प्रक्रिया), तो डॉक्टर को बताइए कि आप विटामिन E ले रही हैं।
कितनी मात्रा सुरक्षित और सही है, ये आपकी स्थिति देखकर डॉक्टर तय करेंगे। इसीलिए इस लेख में किसी डोज़ का आँकड़ा जानबूझकर नहीं दिया जा रहा है।
फर्टिलिटी की तैयारी में विटामिन E एक छोटा हिस्सा हो सकता है, पर वो पूरी तस्वीर नहीं है।
बहुत से कपल महीनों तक सप्लीमेंट खाते रहते हैं और असली जाँच टालते रहते हैं। यही सबसे बड़ी ग़लती है। अगर एक साल से (या 35 के बाद छह महीने से) कोशिश के बावजूद प्रेग्नेंसी नहीं हो रही, तो सिर्फ़ कैप्सूल पर भरोसा करने के बजाय दोनों पार्टनर की जाँच ज़रूरी है - पुरुष की सीमन रिपोर्ट, महिला की ओव्यूलेशन और बाक़ी जाँचें।
सप्लीमेंट असली जाँच और इलाज का विकल्प नहीं है, बस एक सहायक हिस्सा हो सकता है। इस फ़र्क़ को समझना सबसे ज़रूरी है।