भ्रूण प्रत्यारोपण (इन व्रिटो फर्टिलाइज़ेशन) में गर्भाशय से बाहर शुक्राणुओं द्वारा अंड कोशिकाओं का कृत्रिम परिवेश में निषेचन किया जाता है। भ्रूण प्रत्यारोपण के बाद की सावधानी जानिये|
एम्ब्रीयो ट्रांसफर (Embryo Transfer) इन-विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (IVF) ट्रीटमेंट का अंतिम और महत्वपूर्ण चरण (लास्ट एंड इम्पोर्टेन्ट स्टेप) है। इस चरण में निषेचित भ्रूण (फ़र्टिलाइज़्ड एम्ब्रीओ) को महिला के गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है। इसके पश्चात अगले दस से चौदह दिन अत्यंत संवेदनशील माने जाते हैं क्योंकि इसी अवधि में भ्रूण का स्थापन (इम्प्लांटेशन) होता है। इस समय शरीर में कई हार्मोनल परिवर्तन होते हैं जो गर्भाशय को भ्रूण के विकास हेतु उपयुक्त बनाते हैं। अतः, आईवीएफ के बाद सावधानियाँ (IVF transfer ke baad savdhaniya) अपनाना भ्रूण के सफल इम्प्लांटेशन तथा गर्भधारण की संभावना को बढ़ाने के लिए आवश्यक होता है।
एम्ब्रीयो ट्रांसफ़र के बाद भ्रूण गर्भाशय की भीतरी परत (यूटेरिन लाइनिंग), जिसे एंडोमेट्रियम (endometrium) कहा जाता है, से जुड़ने का प्रयास करता है। इस प्रक्रिया को इम्प्लांटेशन (Implantation) कहा जाता है। इम्प्लांटेशन प्रायः ट्रांसफर के छठे से दसवें दिन के बीच होता है। दौरान शरीर प्रेगनेंसी हार्मोन बनाना शुरू कर देता है और महिला के शरीर में प्रोजेस्टेरोन और एचसीजी (hCG) ह्यूमन कोरिओनिक गोनाडोट्रोपिन (Human Chorionic Gonadotropin) हार्मोन की मात्रा बढ़ जाती है।
प्रोजेस्टेरोन का काम गर्भाशय की परत (यूटेरिन लाइनिंग) को मोटा करना, यूटेरिन कॉन्ट्रैक्शंस को रोकना जिससे महिला को समय से पहले लेबर में न जाना पड़े और उसके शरीर को प्रसव पश्चात् स्तनपान के लिए तैयार करना होता है।
लेकिन इस स्टेज पर प्रोजेस्टेरोन का मुख्य काम गर्भ को भ्रूण के स्थापन (एम्ब्रीओ इम्प्लांटेशन) के लिए तैयार करना होता है । वहीं, एचसीजी हार्मोन गर्भावस्था की पुष्टि और भ्रूण के विकास के लिए जरुरी आधार बनाता है।
अतः इस समय ज्यादा एक्टिविटी, मानसिक तनाव बचना चाहिए और पोषणयुक्त भोजन (न्यूट्रिशनल डाइट) करना चाहिए अन्यथा गर्भाशय के रक्त प्रवाह और हार्मोन का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे इम्प्लांटेशन की संभावना घट सकती है।
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भ्रूण के सुरक्षित स्थापन के लिए निम्नलिखित सावधानियों का पालन करना आवश्यक है:
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कुछ गतिविधियाँ भ्रूण के इम्प्लांटेशन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं। अतः IVF के बाद इनसे परहेज़ करना चाहिए। जैसे-
एम्ब्रीओ ट्रांसफर के पश्चात शरीर में कुछ हल्के परिवर्तन सामान्य रूप से देखे जाते हैं। ये परिवर्तन हार्मोनल बदलाव और भ्रूण के इम्प्लांटेशन के कारण होते हैं।
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निम्नलिखित परिस्थितियों में तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना आवश्यक होता है:
ये संकेत किसी संक्रमण, हार्मोन में असंतुलन या गर्भाशय में असामान्य प्रतिक्रिया के हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में जल्दी से जल्दी डॉक्टर लेना भ्रूण की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
आईवीएफ और एम्ब्रीओ ट्रांसफर के बाद सावधानियाँ गर्भधारण की सफलता में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। भ्रूण को सइम्प्लांटेशन के लिए जरुरी वातावरण देने हेतु शरीर को पर्याप्त आराम, संतुलित आहार, नियमित दवा और मानसिक स्थिरता की आवश्यकता होती है। इन छोटे-छोटे उपायों से इम्प्लांटेशन की संभावना काफी बढ़ोत्तरी हो सकती है।
अतः IVF ट्रीटमेंट करवाने वाली प्रत्येक महिला को उल्लिखित नियमों का पालन दृढ़ता और संयम के साथ करना चाहिए।
नहीं। रिसर्च के अनुसार, हल्की एक्टिविटीज़ ब्लड सर्कुलेशन को नार्मल रखती हैं। जब तक डॉक्टर न कहे तब तक कम्पलीट बेड रेस्ट से लाभ की पुष्टि नहीं हुई है।
पहले 5–7 दिनों तक लंबी यात्रा से बचना चाहिए। छोटी दूरी की यात्रा की जा सकती है, बशर्ते डॉक्टर ने अनुमति दी हो।
आमतौर पर भ्रूण ट्रांसफर के 14 दिन बाद बीटा hCG ब्लड टेस्ट कराया जाता है। यही गर्भधारण की पुष्टि करता है।
आमतौर पर अंडाणु निषेचन के 3 या 5 दिन बाद भ्रूण ट्रांसफर किया जाता है, जो भ्रूण की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।
नियमित दवा सेवन, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव नियंत्रण IVF की सफलता दर बढ़ाते हैं।
सामान्यतः 12–14 दिनों के बाद बीटा hCG स्तर बढ़ने लगता है और टेस्ट पॉजिटिव आता है।