ओलिगोस्पर्मिया क्या है? स्पर्म काउंट कम होने के कारण, जाँच और इलाज (Oligospermia in Hindi)

Last updated: June 26, 2026

Overview

कई बार पुरुष पूरी तरह स्वस्थ होते हैं, लेकिन फिर भी प्रेगनेंसी नहीं ठहरती। ऐसे में सीमेन एनालिसिस (Semen Analysis) करवाने पर पता चलता है कि स्पर्म काउंट यानी वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या सामान्य से कम है। इस स्थिति को ओलिगोस्पर्मिया (Oligospermia) कहते हैं। WHO के मानकों के अनुसार, अगर सीमेन में स्पर्म काउंट 15 मिलियन प्रति मिलीलीटर से कम हो, तो उसे ओलिगोस्पर्मिया माना जाता है। स्पर्म काउंट जितना कम होगा, फर्टिलाइजेशन की संभावना उतनी कम होगी — क्योंकि अंडे तक पहुँचने की दौड़ में जितने ज़्यादा स्पर्म होंगे, सफलता की संभावना उतनी बेहतर होगी।

ओलिगोस्पर्मिया के पीछे वैरिकोसील (Varicocele), हॉर्मोनल असंतुलन, जेनेटिक कारण या लाइफस्टाइल जिम्मेदार हो सकते हैं। अच्छी बात यह है कि सही कारण की पहचान और इलाज से कई मामलों में स्पर्म काउंट में सुधार संभव है। और गंभीर मामलों में भी IVF-ICSI जैसी आधुनिक तकनीकों से पिता बनना पूरी तरह संभव है।

स्पर्म बनने की प्रक्रिया

स्पर्म बनने की प्रक्रिया को स्पर्मेटोजेनेसिस (spermatogenesis) कहते हैं। यह पूरी तरह टेस्टिकल की सेमिनिफेरस ट्यूब्यूल्स (seminiferous tubules) में होती है और इसकी पूरी साइकल 72 से 74 दिन की होती है।

स्पर्म बनने के लिए ब्रेन का हाइपोथैलेमस पहले GnRH (gonadotropin-releasing hormone) सिग्नल देता है। इस सिग्नल पर पिट्यूटरी ग्लैंड FSH (follicle-stimulating hormone) और LH (luteinizing hormone) बनाती है। FSH सर्टोली सेल्स (Sertoli cells) को स्पर्म के पोषण का काम सौंपता है और LH लेडिग सेल्स (Leydig cells) को टेस्टोस्टेरोन बनाने का सिग्नल देता है। यह पूरी चेन मिलकर स्पर्म प्रोडक्शन सुनिश्चित करती है।

परिपक्व स्पर्म बनने के बाद एपिडिडाइमिस (epididymis) में जाता है जहाँ 2 से 3 हफ्ते में उसे तैरने की क्षमता यानी मोटिलिटी मिलती है। इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी रुकावट या गड़बड़ी से स्पर्म काउंट कम हो सकता है। इसीलिए ओलिगोस्पर्मिया में इसके होने का कारण ढूँढना इलाज जितना ही ज़रूरी है।

ओलिगोस्पर्मिया की कैटेगरी

कैटेगरी

स्पर्म काउंट

नेचुरल प्रेगनेंसी

ART विकल्प

हल्की (Mild)

10-14 मिलियन/mL

कम लेकिन संभव

IUI या IVF-ICSI

मध्यम (Moderate)

5-9 मिलियन/mL

बहुत कम

IUI या IVF-ICSI

गंभीर (Severe)

1-4 मिलियन/mL

बहुत मुश्किल

IVF-ICSI

क्रिप्टोज़ूस्पर्मिया

<1 मिलियन/mL

लगभग नहीं

ICSI या TESE+ICSI

केटेगरी जितनी गंभीर होगी, नेचुरल प्रेगनेंसी की संभावना उतनी कम होगी। लेकिन क्रिप्टोज़ूस्पर्मिया यानी बहुत कम स्पर्म की स्थिति में भी ICSI से सफलता मिलती है। अब ICSI में एम्ब्रियोलॉजिस्ट एक जीवित स्पर्म को सीधे अंडे में इंजेक्ट कर सकते हैं, इसलिए यह स्थिति अब उतनी निराशाजनक नहीं रही।

हॉर्मोनल कारण

हाइपोगोनाडोट्रोपिक हाइपोगोनाडिज़्म (hypogonadotropic hypogonadism) में ब्रेन से FSH और LH का सिग्नल ही कमज़ोर होता है। इसमें टेस्टोस्टेरोन कम होता है और स्पर्म का प्रोडक्शन नहीं होता। इलाज में FSH और HCG इंजेक्शन से स्पर्म प्रोडक्शन शुरू हो सकता है।

एनाबॉलिक स्टेरॉइड (anabolic steroids) लेने वाले पुरुषों में FSH और LH दोनों दब जाते हैं और शरीर की खुद की स्पर्म प्रोडक्शन रुक जाता है।

हाइपोथायरॉइडिज़्म (hypothyroidism) और हाइपरप्रोलैक्टिनेमिया (hyperprolactinemia) यानी प्रोलैक्टिन का बढ़ना, दोनों भी हॉर्मोनल इम्बैलेंस करते हैं। थायरॉइड और प्रोलैक्टिन का इलाज होने पर स्पर्म काउंट में सुधार आता है।

स्ट्रक्चरल कारण और वैरिकोसील

वैरिकोसील (varicocele) ओलिगोस्पर्मिया का सबसे आम और इलाज किया जा सकने वाला स्ट्रक्चरल कारण है। इसमें टेस्टिकल के आसपास की नसों में सूजन आ जाती है और ब्लड का बैकफ्लो होता है। इससे टेस्टिकल में ऑक्सीजन की कमी होती है, तापमान बढ़ता है, और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है। ये तीनों मिलकर स्पर्मेटोजेनेसिस को नुकसान पहुँचाते हैं।

NIH StatPearls के अनुसार, वैरिकोसेलेक्टमी (varicocelectomy) यानी वैरिकोसील सर्जरी के बाद स्पर्म काउंट और मोटिलिटी में महत्वपूर्ण सुधार देखा जाता है। माइक्रोसर्जिकल वैरिकोसेलेक्टमी में सबसे अच्छे नतीजे मिलते हैं। सर्जरी के 3 से 6 महीने बाद सीमेन एनालिसिस से असर का पता चलता है।

क्रिप्टोर्किडिज़्म (cryptorchidism) यानी जन्म से टेस्टिकल का सही जगह न होना भी एक कारण है। पेट के गर्म वातावरण में ज़्यादा समय रहने से टेस्टिकल को स्थायी नुकसान हो सकता है। पुरानी एपिडिडाइमाइटिस (epididymitis) से एपिडिडाइमिस में स्कार टिशू बन सकता है जो स्पर्म के रास्ते को प्रभावित करता है।

जेनेटिक और लाइफस्टाइल कारण

जेनेटिक कारण

क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम (Klinefelter syndrome) यानी 47,XXY क्रोमोसोम पैटर्न में टेस्टिकल का सामान्य विकास नहीं होता और स्पर्म प्रोडक्शन बहुत कम या शून्य हो सकता है। Y क्रोमोसोम माइक्रोडिलीशन (Y chromosome microdeletion) में स्पर्म बनाने के लिए ज़िम्मेदार AZF जीन्स मिसिंग होते हैं। AZFa और AZFb क्षेत्रों के डिलीशन में TESE से भी स्पर्म नहीं मिलता, लेकिन AZFc में mTESE कामयाब हो सकती है।

लाइफस्टाइल कारण

स्मोकिंग सीधे स्पर्म के DNA को नुकसान पहुँचाती है। सिगरेट में मौजूद निकोटिन और अन्य केमिकल ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस बढ़ाते हैं जो स्पर्म की संरचना को तोड़ते हैं। मोटापे में शरीर की अतिरिक्त चर्बी एस्ट्रोजन बनाती है जो टेस्टोस्टेरोन के लेवल को दबाती है।

  • गोद में लैपटॉप रखकर काम करने से टेस्टिकल का तापमान बढ़ सकता है।
  • टाइट अंडरवियर पहनने से टेस्टिकल्स के आसपास की गर्मी बढ़ती है।
  • गर्म पानी के टब, स्टीम बाथ या सौना का ज़्यादा उपयोग नुकसानदायक हो सकता है।
  • टेस्टिकल का तापमान शरीर के तापमान से 2-4°C कम रहना चाहिए।
  • तापमान बढ़ने पर स्पर्मेटोजेनेसिस (Spermatogenesis) प्रभावित हो सकती है।

जाँच क्या-क्या होती है?

पहली और सबसे ज़रूरी जाँच सीमेन एनालिसिस (semen analysis) है। 2 से 5 दिन के एब्स्टिनेंस के बाद सैंपल लिया जाता है और एक घंटे के अंदर लैब पहुँचाना ज़रूरी है। एक रिपोर्ट से निश्चित डायग्नोसिस नहीं होती, इसलिए 3 से 4 हफ्ते बाद दोबारा टेस्ट करवाया जाता है। 

हॉर्मोन टेस्ट

FSH, LH, टेस्टोस्टेरोन, प्रोलैक्टिन और TSH की जाँच की जाती है। अगर FSH बहुत ज़्यादा हो, तो इसका मतलब हो सकता है कि ब्रेन बार-बार सिग्नल दे रहा है लेकिन टेस्टिकल ठीक से काम नहीं कर रहा। वहीं FSH का बहुत कम होना हाइपोथैलेमस या पिट्यूटरी ग्लैंड की समस्या का लक्षण हो सकता है।

स्क्रोटल अल्ट्रासाउंड

स्क्रोटल अल्ट्रासाउंड (Scrotal Ultrasound) से वैरिकोसील (Varicocele) की पुष्टि की जाती है और टेस्टिकल का आकार देखा जाता है। अगर टेस्टिकल सामान्य से छोटा हो, तो यह टेस्टिकुलर फेलियर (Testicular Failure) का संकेत हो सकता है।

जेनेटिक टेस्ट

जब स्पर्म काउंट बहुत कम हो, खासकर 5 मिलियन/mL से नीचे, तो जेनेटिक कारणों की जाँच की जाती है। इसके लिए कैरियोटाइप (Karyotype) और Y क्रोमोसोम माइक्रोडिलीशन (Y Chromosome Microdeletion) टेस्ट करवाए जाते हैं।

स्पर्म DNA फ्रैगमेंटेशन इंडेक्स (DFI)

कई बार सीमेन एनालिसिस सामान्य आता है, लेकिन फिर भी प्रेग्नेंसी नहीं ठहरती, IVF बार-बार फेल होता है या मिसकैरेज होता है। ऐसी स्थिति में स्पर्म DNA फ्रैगमेंटेशन इंडेक्स (DFI) करवाया जा सकता है। DFI 25% से ज़्यादा होने पर एम्ब्रीओ क्वालिटी और इम्प्लांटेशन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

इलाज और फर्टिलिटी विकल्प

हल्की और मध्यम ओलिगोस्पर्मिया

  • स्मोकिंग छोड़ने, वज़न कम करने, टेस्टिकल्स को गर्मी से बचाने और पर्याप्त नींद लेने से कई पुरुषों में 3 महीने के भीतर सीमेन पैरामीटर्स में सुधार देखा जा सकता है।
  • कोएन्ज़ाइम Q10 (Coenzyme Q10), विटामिन E (Vitamin E), L-कार्निटीन (L-Carnitine), ज़िंक (Zinc) और सेलेनियम (Selenium) जैसे एंटीऑक्सिडेंट ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कम करने में मदद कर सकते हैं।
  • IUI यानी इंट्रायूटेरिन इनसेमिनेशन (Intrauterine Insemination) तब एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है जब वॉश के बाद कम से कम 5 मिलियन मोटाइल स्पर्म उपलब्ध हों।

गंभीर ओलिगोस्पर्मिया और क्रिप्टोज़ूस्पर्मिया

IVF-ICSI में सिर्फ एक जीवित स्पर्म पर्याप्त होता है। एम्ब्रियोलॉजिस्ट सबसे अच्छे स्पर्म को चुनकर उन्हें सीधे एग में इंजेक्ट करते हैं। क्रिप्टोज़ूस्पर्मिया में सीमेन को बहुत ध्यान से देखा जाता है। अगर सीमेन में स्पर्म बिल्कुल न हो तो TESE (testicular sperm extraction) से टेस्टिकल से सीधे स्पर्म निकाला जाता है और ICSI में उपयोग होता है।

कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

अगर सीमेन एनालिसिस में काउंट 15 मिलियन से कम आए, या एक साल की नियमित कोशिश के बाद प्रेगनेंसी न हो, तो फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से तुरंत मिलें। एक रिपोर्ट पर निर्णय न लें। दोबारा टेस्ट और हॉर्मोन जाँच के बाद ही सही तस्वीर आती है।

अगर पार्टनर की उम्र 35 साल से ज़्यादा है तो 6 महीने में ही डॉक्टर से मिलें। उम्र के साथ महिला की अंडों की क्वालिटी घटती है, इसलिए देर करना समझदारी नहीं है।

निष्कर्ष (Conclusion)

Oligospermia एक कॉमन कंडीशन है जिसका इलाज आसानी से हो सकता है। सही इलाज के लिए सबसे पहले कारण का पता लगाना ज़रूरी है, क्योंकि इलाज उसी पर निर्भर करता है। कई पुरुषों में लाइफस्टाइल बदलाव, दवाइयों या सर्जरी से स्पर्म काउंट में सुधार आ सकता है। वहीं गंभीर मामलों में भी IVF-ICSI और TESE जैसी आधुनिक तकनीकों की मदद से पिता बनना संभव है। इसलिए निराश न हों और सही समय पर फर्टिलिटी विशेषज्ञ से सलाह लें।

Oligospermia के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

क्या ओलिगोस्पर्मिया में नेचुरल प्रेगनेंसी हो सकती है?

 

हल्की ओलिगोस्पर्मिया में नेचुरल प्रेगनेंसी संभव है लेकिन समय लग सकता है। मध्यम और गंभीर में संभावना बहुत कम हो जाती है। ART, खासकर IVF-ICSI, से सफलता दर काफी बेहतर हो जाती है।

क्या ICSI में सिर्फ एक स्पर्म से बच्चा हो सकता है?

 

हाँ। ICSI में एम्ब्रियोलॉजिस्ट एक जीवित स्पर्म को सीधे अंडे में इंजेक्ट करते हैं। स्पर्म का तैरना ज़रूरी नहीं, सिर्फ जीवित होना चाहिए। एक पर्याप्त है।

OAT सिंड्रोम क्या है और इसका इलाज क्या है?

 

OAT सिंड्रोम में काउंट कम, मोटिलिटी कम, और मॉर्फोलॉजी खराब, तीनों एक साथ होते हैं। यह सबसे जटिल स्थिति है। IVF-ICSI में सबसे प्रभावी है और ज़्यादातर कपल्स को इससे सफलता मिल जाती है।

क्या एक बार ओलिगोस्पर्मिया हमेशा रहता है?

 

ज़रूरी नहीं। अगर वैरिकोसील, हॉर्मोनल दिक्कत, या लाइफस्टाइल, तो स्पर्म काउंट सुधर सकता है। जेनेटिक कारण में स्थायी सुधार नहीं होता, लेकिन ICSI से संतान होना संभव है।

स्पर्म DNA फ्रैगमेंटेशन टेस्ट कब करवाएँ?

 

यह टेस्ट तब करवाएँ जब बार-बार IVF या IUI फेल हो, बार-बार मिसकैरेज हो, या सीमेन एनालिसिस सामान्य हो लेकिन फिर भी प्रेगनेंसी न हो रही हो। DFI 25% से ज़्यादा हो तो ICSI अधिक प्रभावी रहती है।

**Disclaimer: The information provided here serves as a general guide and does not constitute medical advice. We strongly advise consulting a certified fertility expert for professional assessment and personalized treatment recommendations.
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