सारांश (Overview)
प्रेगनेंसी का नौवां महीना वह समय है जब हर छोटा बदलाव लेबर का संकेत लगने लगता है। पेट कड़ा हुआ तो लगता है शुरू हो गया, कमर में दर्द उठा तो लगता है अस्पताल जाना पड़ेगा। इसीलिए इस महीने की सबसे काम की जानकारी यह है कि किस बदलाव पर घर पर रुकना है और किस पर तुरंत अस्पताल जाना है।
इस महीने बच्चा जन्म की तैयारी पूरी कर रहा होता है और ज्यादातर बच्चे सिर नीचे की ओर वाली पोजीशन में आ जाते हैं, इस पोजीशन को सिफैलिक पोजीशन भी कहते हैं।
आगे हम समझेंगे कि नौ महीने की प्रेगनेंसी में बच्चे की ग्रोथ कहां तक पहुंचती है, इस समय आपकी डाइट क्या होनी चाहिए, डिलीवरी की तैयारी कैसे करें, लेबर के असली सिग्नल कौन से हैं, और किन लक्षणों में इंतजार नहीं करना चाहिए।
नौवां महीना करीब 36 से 40 हफ्ते तक चलता है, और इसी दौरान प्रेगनेंसी फुल टर्म तक पहुंचती है, जो 37 हफ्ते के बाद माना जाता है। बच्चे का ज्यादातर विकास पूरा हो चुका होता है और अब मुख्य काम वजन बढ़ाना और फेफड़ों को तैयार करना रह जाता है। डिलीवरी 37 से 42 हफ्ते के बीच कभी भी हो सकती है, इसलिए डेट का इंतजार करने के बजाय तैयारी पहले से रखें।
इस महीने के ज्यादातर लक्षण बच्चे के नीचे खिसकने से जुड़े होते हैं।
बच्चा पेल्विस में नीचे उतर जाता है, जिसे लाइटनिंग कहते हैं। इसके बाद सांस लेना आसान लगता है और सीने की जलन कम हो जाती है, पर नीचे दबाव बढ़ जाता है। पहली प्रेग्नेंसी में यह डिलीवरी से कुछ हफ्ते पहले होता है।
बच्चे का सिर मूत्राशय पर दबाव डालता है, इसलिए बार-बार पेशाब आता है। यह सामान्य है, पर साथ में जलन या दर्द हो तो यूरिन इंफेक्शन की जांच जरूरी है।
कमर में भारीपन और पेल्विस में ऐसा दबाव महसूस होना कि बार-बार टॉयलेट जाने का मन करे, इस महीने आम है। यह बच्चे का सिर नीचे आने की वजह से होता है।
पेट कुछ सेकंड के लिए कड़ा होकर ढीला पड़ जाता है। ये कॉन्ट्रैक्शन अनियमित होते हैं और चलने-फिरने या पानी पीने से अक्सर शांत हो जाते हैं। इसके विपरीत, असली लेबर पेन समय के साथ लंबा, तेज और नियमित होता जाता है।
यह महीना वजन बढ़ाने का होता है। 40 हफ्ते तक औसत लंबाई करीब 50 cm और वजन करीब 3400 ग्राम होता है, हालांकि इससे कम या ज्यादा वजन वाले बच्चे भी स्वस्थ होते हैं।
फेफड़े सबसे आखिर में तैयार होते हैं और इसी महीने काम करने लायक बनते हैं। त्वचा के नीचे चर्बी की परत जमती है, जिससे जन्म के बाद बच्चा अपना तापमान संभाल पाता है।
ज्यादातर बच्चे इस महीने तक सिर नीचे कर लेते हैं, जिसे सेफेलिक पोजीशन कहते हैं। बच्चा पैर या कूल्हे नीचे रखे हो, जिसे ब्रीच कहते हैं, तो डॉक्टर स्थिति देखकर डिलीवरी का तरीका तय करते हैं।
क्या देखा जाता है | नौवें महीने में स्थिति |
|---|---|
वजन | तेजी से बढ़ता है, 40 हफ्ते तक औसतन करीब 3400 ग्राम |
लंबाई | करीब 50 cm |
फेफड़े | इसी महीने पूरी तरह तैयार होते हैं |
स्थिति | ज्यादातर बच्चों में सिर नीचे की ओर |
हलचल | पहले जैसी ही बनी रहनी चाहिए |
इस महीने पेट पर दबाव ज्यादा होता है, इसलिए एक बार में ज्यादा खाने के बजाय थोड़ा-थोड़ा और कई बार खाना आरामदायक रहता है।
प्रोटीन बच्चे की बढ़त और कैल्शियम हड्डियों तथा दांतों के विकास के लिए जरूरी है। दूध, दही, पनीर, दालें और अंडा रोज की डाइट में रखें।
डिलीवरी में होने वाले ब्लड लॉस के लिए हीमोग्लोबिन का ठीक रहना जरूरी है। हरी सब्जियां, चना, गुड़ और खजूर मदद करते हैं, और डॉक्टर की दी आयरन टैबलेट जारी रखें।
इस महीने कब्ज की शिकायत बढ़ जाती है। फल, सलाद और साबुत अनाज के अलावा दिनभर थोड़ा थोड़ा पानी पीते रहना सबसे जरुरी होता है।
पोषक तत्व | क्या खाएं | क्यों जरूरी है |
|---|---|---|
प्रोटीन | दालें, अंडा, पनीर, दूध | बच्चे की बढ़त और मां की ताकत |
कैल्शियम | दूध, दही, तिल, रागी | हड्डियों और दांतों का विकास |
आयरन | हरी सब्जियां, गुड़, खजूर | हीमोग्लोबिन बनाए रखना |
फाइबर | फल, सलाद, साबुत अनाज | कब्ज से बचाव |
अपना हॉस्पिटल बैग 36वें हफ्ते तक तैयार कर लें, ताकि आखिरी समय जल्दबाजी में कुछ छूटे नहीं, और उसे ऐसी जगह रखें जहां घर का कोई भी सदस्य उठा सके।
अस्पताल तक पहुंचने का साधन तय रखें, और रात के लिए भी विकल्प सोच लें। अस्पताल का नंबर, डॉक्टर का नंबर और ब्लड ग्रुप घर में सबको बता दें।
बैग में क्या रखें | जरूरी दस्तावेज |
|---|---|
मां के ढीले कपड़े और सूती अंडरवियर | सभी रिपोर्ट और स्कैन की फाइल |
मैटरनिटी पैड और टॉयलेटरीज | आधार कार्ड और अस्पताल का कार्ड |
बच्चे के कपड़े, टोपी, मोजे, कंबल | बीमा या योजना से जुड़े कागज |
चप्पल, तौलिया, फोन चार्जर | डॉक्टर की पर्ची और दवाएं |
असली लेबर में संकुचन धीरे-धीरे लंबे, मजबूत और नियमित होते जाते हैं। जब ये हर पांच मिनट में आने लगें, तो अस्पताल से संपर्क करें।
पानी की थैली अचानक तेज बहाव के साथ फट सकती है या धीरे-धीरे पानी रिस सकता है। आमतौर पर पानी साफ या हल्के रंग का होता है। अगर इसमें खून हो, रंग हरा या भूरा हो या बदबू आए, तो तुरंत अस्पताल जाएं। पानी की थैली फटने के बाद आमतौर पर 24 घंटे के अंदर लेबर शुरू हो जाता है। अगर ऐसा न हो, तो इंफेक्शन के खतरे को देखते हुए इंडक्शन की सलाह दी जा सकती है।
गाढ़ा, जेली जैसा गुलाबी म्यूकस निकलना शो कहलाता है। यह सर्विक्स के खुलने का संकेत हो सकता है। इसके बाद लेबर कुछ घंटों में भी शुरू हो सकता है और कुछ दिन भी लग सकते हैं। लेकिन अगर इससे ज्यादा ब्लीडिंग हो रही हो, तो तुरंत अस्पताल को बताएं।
पहचान | ब्रेक्सटन हिक्स | असली लेबर पेन |
|---|---|---|
कॉन्ट्रैक्शन का समय | अनियमित होते हैं | रेगुलर इंटरवल पर आते हैं |
कॉन्ट्रैक्शन की तीव्रता | ज्यादातर एक जैसी रहती है | धीरे धीरे तेज होती जाती है |
कॉन्ट्रैक्शन के बीच का अंतर | कभी कम, कभी ज्यादा हो सकता है | धीरे-धीरे अंतर कम होता जाता है |
आराम करने या स्थिति बदलने पर | अक्सर कम या बंद हो जाते हैं | आराम करने या स्थिति बदलने से नहीं रुकते |
दर्द की जगह | ज्यादातर पेट के आगे या एक जगह महसूस होता है | दर्द कमर से शुरू होकर पेट के आगे की ओर आ सकता है |
समय के साथ बदलाव | कुछ समय बाद कम हो सकते हैं | समय के साथ ज्यादा नियमित और तेज होते जाते |
एक गलतफहमी दूर कर लें। यह मानना कि आखिरी हफ्तों में जगह कम होने से बच्चा कम हिलता है, गलत है। हलचल लेबर तक और लेबर के दौरान भी वैसी ही रहनी चाहिए।
नौवां महीना 36 से 40 हफ्ते का होता है और इसी दौरान प्रेगनेंसी फुल टर्म तक पहुंचती है। इस समय बच्चे का वजन बढ़ता है, फेफड़े तैयार होते हैं और ज्यादातर बच्चे सिर नीचे कर लेते हैं। मां को पेट नीचे आना, बार-बार पेशाब, पेल्विक दबाव और ब्रेक्सटन हिक्स जैसे बदलाव महसूस हो सकते हैं। डाइट में प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन और फाइबर रखें और अस्पताल का बैग 36 हफ्ते तक तैयार कर लें। लेबर में कॉन्ट्रैक्शन नियमित और तेज होते जाते हैं। बच्चे की हलचल कम लगे, तो तुरंत अस्पताल से संपर्क करें।