एनेजैकुलेशन में समस्या तीन अलग-अलग जगहों पर हो सकती है: नर्व सिग्नल में, पेल्विक मसल्स में, या पुरुष की साइकोलॉजी में। इसीलिए इलाज का पहला स्टेप एनेजैकुलेशन का सही कारण पहचानना होता है। PVS यानी पेनाइल वाइब्रेटरी स्टिम्युलेशन (penile vibratory stimulation) और EEJ यानी इलेक्ट्रोइजैकुलेशन (electroejaculation) जैसी तकनीकें स्पर्म निकालने में मदद करती हैं। और अगर इनसे भी इजैकुलेशन नहीं हो, तो TESE यानी टेस्टिकुलर स्पर्म एक्स्ट्रैक्शन (testicular sperm extraction) के ज़रिए ICSI करके प्रेगनेंसी संभव हो सकती है।
एनेजैकुलेशन वह कंडीशन है जिसमें यौन उत्तेजना पूरी होने और ऑर्गेज़्म (orgasm) आने के बावजूद वीर्य यानी सीमेन (semen) बाहर नहीं आता।
एनेजैकुलेशन किसी कपल के लिए सबसे बड़ी चुनौती तब बनती है जब वे संतान के लिए कोशिश कर रहे हों। क्योंकि प्रेगनेंसी के लिए जरुरी स्पर्म नेचुरल रास्ते से फैलोपियन ट्यूब एक पहुँच ही नहीं पाता। लेकिन आधुनिक प्रजनन चिकित्सा यानी मॉडर्न रिप्रोडक्टिव मेडिसिन (reproductive medicine) ने इस समस्या के इलाज के कई तरीके डेवलप कर लिए हैं।
शरीर में इजैकुलेशन एक कॉम्प्लेक्स रिफ्लेक्स एक्शन है, जिसमें ब्रेन, स्पाइनल कॉर्ड, ऑटोनॉमिक नर्व्स, सोमैटिक नर्व्स और पेल्विक फ्लोर मसल्स मिलकर काम करते हैं। जब प पुरुष में यौन उत्तेजना एक निश्चित स्तर तक पहुँचती है, तो ब्रेन और स्पाइनल कॉर्ड मिलकर इजैकुलेशन रिफ्लेक्स को एक्टिव करते हैं।
सबसे पहले एमिशन फेज़ (Emission Phase) होता है। इस स्टेप में स्पाइनल कॉर्ड के T10-L2 सेगमेंट से निकलने वाली सिम्पैथेटिक नर्व्स एक्टिव होती हैं। ये वास डेफ़ेरेंस, सेमिनल वेसिकल्स और प्रोस्टेट को सिकुड़ने का सिग्नल देती हैं, जिससे स्पर्म और सेमिनल फ्लूइड यूरेथ्रा के शुरुआती हिस्से यानी पोस्टीरियर यूरेथ्रा (posterior urethra) में पहुँच जाते हैं।
इसके बाद इजैकुलेशन या एक्सपल्शन फेज़ (Expulsion Phase) शुरू होता है। इस स्टेप में S2-S4 से निकलने वाली सोमैटिक नर्व्स, विशेष रूप से पुडेंडल नर्व, पेल्विक फ्लोर मसल्स में तेज और रिदमिक कॉन्ट्रैक्शन करवाती हैं, जिससे वीर्य शरीर के बाहर निकलता है।
इसमें किसी भी कंडीशन में इजैकुलेशन नहीं होता। नींद के दौरान, हस्तमैथुन यानी मास्टरबेशन (masterbation) के समय, या पार्टनर के साथ, किसी भी कंडीशन में वीर्य बाहर नहीं आता। यह सबसे सीरियस कंडीशन है और ऐसा आमतौर पर न्यूरोलॉजिकल कारणों जैसे स्पाइनल कॉर्ड इंजरी (spinal cord injury) या डायबिटिक न्यूरोपैथी (diabetic neuropathy) से होता है।
यहाँ कुछ सिचुएशन में इजैकुलेशन होता है और कुछ में नहीं। उदाहरण के लिए नींद में नॉर्मल इजैकुलेशन हो लेकिन पार्टनर के साथ न हो, या मास्टरबेशन के समय हो लेकिन इंटरकोर्स में न हो। यह मनोवैज्ञानिक कारणों से ज़्यादा जुड़ा होता है।
स्पाइनल कॉर्ड इंजरी एनेजैकुलेशन का सबसे आम न्यूरोलॉजिकल कारण है। अगर चोट T10 के ऊपर हुई है, तो ब्रेन से आने वाले कंट्रोल सिग्नल प्रभावित हो सकते हैं। वहीं T10 के नीचे की चोट में कुछ लोगों में इजैकुलेशन रिफ्लेक्स बचा रह सकता है, जिसे पेनाइल वाइब्रेटरी स्टिमुलेशन (PVS) से ट्रिगर किया जा सकता है।
मल्टीपल स्क्लेरोसिस (multiple sclerosis) में नसों को ढकने वाली माइलिन शीथ (myelin sheath) को नुकसान पहुँचता है, जिससे नर्व सिग्नल्स का आदान-प्रदान प्रभावित हो सकता है। लंबे समय तक अनकंट्रोल्ड डायबिटीज़ रहने पर पेरिफेरल न्यूरोपैथी (peripheral neuropathy) हो सकती है, जो इजैकुलेशन से जुड़ी नसों को भी प्रभावित कर सकती है।
पार्किंसन्स डिजीज (Parkinson's disease) में डोपामाइन (dopamine) की कमी से ऑटोनोमिक नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है। वहीं रेट्रोपेरिटोनियल लिम्फ नोड डिसेक्शन (retroperitoneal lymph node dissection) जैसी टेस्टिकुलर कैंसर सर्जरी के दौरान इजैकुलेशन को कण्ट्रोल करने वाली सिम्पैथेटिक नर्व्स को नुकसान पहुँचने का रिस्क रहता है।
परफॉर्मेंस एंग्ज़ाइटी (performance anxiety), यानी 'क्या होगा' की चिंता, पेल्विक मसल्स में तनाव पैदा करती है जो इजैकुलेशन को रोक देता है। यह खासकर उन कपल में होता है जहाँ प्रेगनेंसी के लिए दबाव हो।
पुराना ट्रॉमा, रिलेशनशिप में तनाव, धार्मिक या सांस्कृतिक दबाव, और किसी तरह का अपराध बोध यानी गिल्ट (guilt) जैसे कारणों से सिचुएशनल एनेजैकुलेशन हो सकता है। Cleveland Clinic के अनुसार, मनोवैज्ञानिक कारणों में सेक्स थेरेपिस्ट से मदद ली जा सकती है।
कुछ मेडिसिन की वजह से भी एनेजैकुलेशन हो सकता है क्योंकि ये मेडिसिन इजैकुलेशन रिफ्लेक्स को दबा देती हैं। SSRI एंटीडिप्रेसेंट (SSRI antidepressants) जैसे फ्लुओक्सेटीन और पैरॉक्सेटीन लेने वाले पुरुषों में यह समस्या अपेक्षाकृत अधिक देखी जाती है। अल्फ़ा ब्लॉकर्स (alpha blockers), जो आमतौर पर हाई ब्लड प्रेशर या प्रोस्टेट की समस्याओं के लिए दी जाती हैं, वे भी एमिशन फेज़ को प्रभावित कर सकती हैं।
इसके अलावा एंटीसाइकोटिक्स (antipsychotics) और कुछ पेनकिलर मेडिसिन भी इजैकुलेशन में दिक्कत पैदा कर सकती हैं।
प्रोस्टेट की TURP यानी ट्रांस्युरेथ्रल रिसेक्शन ऑफ प्रोस्टेट (transurethral resection of prostate) सर्जरी के बाद ब्लैडर नेक की मसल्स कमजोर हो जाती हैं, जिससे इजैकुलेशन प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा रेक्टल सर्जरी और पेल्विक सर्जरी में भी नर्व्स को नुकसान पहुँच सकता है।
डायग्नोसिस के लिए पहले विस्तृत मेडिकल और सेक्शुअल हिस्ट्री ली जाती है। कब से समस्या है, किन सिचुएशन में एनेजैकुलेशन होता है, कौन सी दवाइयाँ चल रही हैं, कोई पुरानी सर्जरी तो नहीं, और क्या कोई न्यूरोलॉजिकल कंडीशन है, ये सब पता किया जाता है।
न्यूरोलॉजिकल जाँच में पेनाइल वाइब्रेटरी थ्रेशोल्ड (penile vibratory threshold) टेस्ट किया जाता है जो नर्व सेंसिटिविटी बताता है। हॉर्मोन प्रोफ़ाइल में FSH, LH, टेस्टोस्टेरोन, और प्रोलैक्टिन (prolactin) टेस्ट किये जाते हैं। स्क्रोटल अल्ट्रासाउंड (scrotal ultrasound) से टेस्टिकल की कंडीशन देखी जाती है।
पेनाइल वाइब्रेटरी स्टिम्युलेशन (PVS) एनेजैकुलेशन के इलाज का पहला और सबसे कम इनवेसिव ऑप्शन है। इसमें पेनिस के ग्लान्स (glans penis) पर एक मेडिकल-ग्रेड वाइब्रेटर लगाया जाता है, जो विशेष फ्रीक्वेंसी पर कंपन पैदा करता है। यह कंपन इजैकुलेशन से जुड़े S2-S4 रिफ्लेक्स को एक्टिव करने की कोशिश करता है
जब PVS काम न करे तब EEJ अगला ऑप्शन होता है। इसमें पेशेंट को जनरल एनेस्थीसिया देकर उसके रेक्टम में एक प्रोब डाली जाती है जो सिम्पैथेटिक नर्व्स को इलेक्ट्रिकल स्टिम्युलेशन देती है। यह प्रोस्टेट और सेमिनल वेसिकल्स को कॉन्ट्रैक्ट करती है और स्पर्म बाहर आता है।
NIH StatPearls के अनुसार, EEJ से मिला स्पर्म सीधे IVF या ICSI में उपयोग होता है। इस प्रक्रिया में स्पर्म की क्वालिटी PVS से कुछ कम हो सकती है, लेकिन ICSI के लिए पर्याप्त होती है।
मनोवैज्ञानिक एनेजैकुलेशन में कभी-कभी कुछ दवाइयाँ दी जाती हैं जो सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम को स्टिम्युलेट करती हैं। अगर समस्या किसी मेडिसिन के साइड इफेक्ट की वजह से शुरू हुई हो, तो डॉक्टर दवाई बदलने या उसकी डोज़ कम करने की सलाह दे सकते हैं।
अगर PVS और EEJ दोनों से पर्याप्त स्पर्म न मिले या स्पर्म की क्वालिटी ICSI के लिए भी कम हो, तो TESE यानी टेस्टिकुलर स्पर्म एक्सट्रैक्शन (Testicular Sperm Extraction) किया जाता है। TESE में सीधे टेस्टिकल से छोटी बायोप्सी करके स्पर्म निकाला जाता है।
TESE से मिला स्पर्म ICSI यानी इंट्रासाइटोप्लाज़्मिक स्पर्म इंजेक्शन (intracytoplasmic sperm injection) में उपयोग होता है। ICSI में एक स्पर्म सीधे एग में इंजेक्ट किया जाता है। यानी एनेजैकुलेशन के बावजूद पिता बनना पूरी तरह संभव है।
IVF की सक्सेस रेट पार्टनर की उम्र, एग की क्वालिटी, और एम्ब्रीओ की क्वालिटी पर निर्भर करती है। एनेजैकुलेशन IVF सफल न होने का मुख्य कारण नहीं है, क्योंकि स्पर्म निकालने के बहुत से ऑप्शन उपलब्ध हैं।
एनेजैकुलेशन एक ऐसी चुनौती है जो बाहर से नहीं दिखती लेकिन बच्चे की चाह रखने वाले जोड़ों के लिए बहुत बड़ी होती है। अच्छी बात यह है कि आधुनिक तकनीकों से इस रुकावट को पार करना संभव है। सही डायग्नोसिस, सही तकनीक, और सही समय पर इलाज से एनेजैकुलेशन वाले पुरुष भी पिता बन सकते हैं। शर्मिंदगी और देरी ही सबसे बड़ी बाधा है।
हाँ। PVS, EEJ, या TESE से स्पर्म निकालकर ICSI की मदद से बच्चा पूरी तरह संभव है। कई जोड़े इस रास्ते से सफल हो चुके हैं। स्पाइनल इंजरी की जगह और गंभीरता के हिसाब से सही तकनीक चुनी जाती है।
कई पुरुषों में ऑर्गेज़्म की अनुभूति होती है लेकिन स्खलन नहीं होता। यह इसलिए होता है क्योंकि ऑर्गेज़्म ब्रेन की संवेदना है जबकि इजैकुलेशन एक मसल रिफ्लेक्स। दोनों के अलग-अलग नर्व पाथवे हैं।
हाँ, डॉक्टर के निर्देशन में मेडिकल-ग्रेड वाइब्रेटर घर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे निकाले गए स्पर्म को सही तापमान में क्लिनिक पहुँचाना ज़रूरी है। सामान्य दुकान का वाइब्रेटर काम नहीं करता, वह मेडिकल स्पेसिफिकेशन पर नहीं होता।
PVS पहला विकल्प है क्योंकि यह non-invasive है। TESE तब किया जाता है जब PVS और EEJ से काफी स्पर्म न मिले। TESE से बेहतर क्वालिटी स्पर्म मिल सकता है क्योंकि वह सीधे टेस्टिकल से होता है।
EEJ जनरल एनेस्थीसिया के तहत होता है इसलिए प्रक्रिया के दौरान कोई दर्द नहीं होता। जिन पुरुषों में स्पाइनल कॉर्ड इंजरी हो और सेंसेशन न हो, उनमें बिना एनेस्थीसिया के भी किया जा सकता है।