सारांश (Overview)
एनोमली स्कैन को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि इसे बच्चे की पूरी और आखिरी जांच मान लिया जाता है। रिपोर्ट नॉर्मल आने पर लगता है कि अब सब पक्का ठीक है, और कुछ मिल जाए तो लगता है नतीजा तय हो गया।
असल में यह एक स्क्रीनिंग स्कैन है, जो कुछ कंडीशन को पकड़ने में बहुत अच्छा है और कुछ में इसकी पकड़ सीमित रहती है। यही बात रिपोर्ट पढ़ते समय सबसे ज्यादा काम आती है।
भारत में एनोमली स्कैन को लेवल 2 अल्ट्रासाउंड या TIFFA स्कैन भी कहा जाता है। एनोमली स्कैन (anomaly scan in hindi) को समझने के लिए जानना जरूरी है कि इस टेस्ट के माध्यम से कौन सी चीज़ें देखी जाती हैं और कौन सी नहीं देखी जाती। आगे हम जानेंगे कि यह कब और कैसे होता है, इसमें क्या देखा जाता है, रिपोर्ट कैसे पढ़ें, इसकी सटीकता कितनी है, और यह सामान्य अल्ट्रासाउंड से कैसे अलग है।
यह एक विस्तृत अल्ट्रासाउंड (detailed ultrasound) है, जिसमें पेट के अंदर पल रही संतान के सिर से पैर तक हर अंग की बनावट क्रम से देखी जाती है, ताकि पता चले कि अंग सही तरह बने हैं या नहीं।
NHS के कार्यक्रम में इस स्कैन से 11 खास स्थितियों की जांच की जाती है, और साथ में बच्चे की ग्रोथ, प्लेसेंटा की स्थिति और गर्भाशय में खून का बहाव भी देखा जाता है। अल्ट्रासाउंड की तरंगों से किया जाने वाला यह स्कैन मां और संतान दोनों के लिए सुरक्षित माना जाता है।
एनोमली स्कैन उद्देश्य कपल्स के अंदर डर पैदा करना नहीं, बल्कि उनकी संतान के बारे में समय रहते जानकारी देना है।
दिमाग, रीढ़, चेहरा, दिल, पेट, किडनी और हाथ-पैर की हड्डियां क्रम से देखी जाती हैं, ताकि बनावट की कोई कमी पकड़ी जा सके।
सिर, पेट और जांघ की हड्डी की माप ली जाती है, जिससे पता चलता है कि संतान की ग्रोथ हफ्तों के हिसाब से ठीक चल रही है या नहीं।
किसी कंडीशन के बारे में पता चलने पर आगे की जांच, डिलीवरी की योजना और जन्म के बाद के इलाज की तैयारी पहले से हो जाती है। कई बार इसी वजह से संतान को समय पर सही इलाज मिल पाता है।
यह स्कैन आमतौर पर 18 से 21 हफ्ते के बीच होता है, भारत में ज्यादातर डॉक्टर इसे 18 से 22 हफ्ते के बीच करवाते हैं।
समय का यह चुनाव सोच-समझकर किया गया है। इससे पहले अंग इतने विकसित नहीं होते कि साफ दिखें, और बहुत देर होने पर बच्चा बड़ा हो जाता है और उसकी स्थिति की वजह से कुछ हिस्से देखना मुश्किल हो जाता है।
आपको पीठ के बल लिटाकर पेट पर जेल लगाया जाता है और प्रोब घुमाया जाता है। इसमें दर्द नहीं होता, बस ठंडा जेल और हल्का दबाव महसूस होता है, और आमतौर पर 30 मिनट के आसपास लगते हैं।
कई बार बच्चे की स्थिति ऐसी होती है कि कुछ हिस्से साफ नहीं दिखते। तब डॉक्टर थोड़ा टहलकर आने या करवट बदलने को कह सकते हैं, और जरूरत पड़ने पर दोबारा बुलाते हैं। यह चिंता की बात नहीं, पूरी जांच सुनिश्चित करने का तरीका है।
खाली पेट रहने की जरूरत नहीं होती। कुछ जगहों पर स्कैन से पहले पानी पीकर आने को कहा जाता है, इसलिए अपने सेंटर से पूछ लें।
ऐसे कपड़े पहनकर जाएं जिनसे पेट आसानी से खुल सके, और पिछली रिपोर्ट साथ रखें, खासकर पहली तिमाही की स्क्रीनिंग की, क्योंकि डॉक्टर उन्हें साथ मिलाकर देखते हैं।
इसका मतलब है कि जांचे गए अंगों की बनावट में उस समय कोई साफ कमी नहीं दिखी। यह भरोसा देने वाली बात है, पर इसका मतलब हर स्थिति खारिज होना नहीं, क्योंकि कुछ कंडीशन इस स्कैन में दिखती ही नहीं और कुछ बाद में विकसित होती हैं।
रिपोर्ट में अगर कोई एब्नॉर्मलिटी आती है तो ऐसे में आपको फीटल मेडिसिन विशेषज्ञ के पास भेजा जाता है, जहां जरूरत के हिसाब से फीटल इकोकार्डियोग्राफी, MRI या एम्नियोसेंटेसिस की सलाह दी जा सकती है। यह समझ लें कि हर एब्नॉर्मलिटी गंभीर नहीं होती, कुछ अपने आप ठीक हो जाती हैं और कुछ का इलाज जन्म के बाद संभव होता है।
इसकी सटीकता हर कंडीशन में अलग होती है। NHS कार्यक्रम में तय की गई अपेक्षित दरें कुछ इस तरह हैं।
कंडीशन | पकड़ में आने की दर |
|---|---|
एनेंसेफली | 98% |
गैस्ट्रोशाइसिस | 98% |
ओपन स्पाइना बिफिडा | 90% |
एक्सोम्फेलोस | 80% |
कटा होंठ | 75% |
डायफ्रामैटिक हर्निया | 60% |
हार्ट की गंभीर समस्याएं | 50% |
हार्ट वाली पंक्ति ही सबसे साफ बताती है कि यह स्कैन सब कुछ नहीं पकड़ पाता। हालांकि एक स्टडी में ज्यादातर कंडीशन में असल प्रदर्शन इन अपेक्षाओं से बेहतर रहा है। रिपोर्ट की सटीकता मां के वजन, बच्चे की कंडीशन और स्कैन करने वाले के अनुभव पर भी निर्भर करती है।
क्या देखें | सामान्य अल्ट्रासाउंड | एनोमली स्कैन |
स्कैन का उद्देश्य | प्रेगनेंसी की पुष्टि, बच्चे की धड़कन, प्रेगनेंसी के हफ्ते या ग्रोथ देखने के लिए | बच्चे के अंगों और उनकी बनावट को विस्तार से देखने के लिए |
स्कैन में क्या देखते हैं? | जरूरत के हिसाब से जरूरी चीज़ों की जांच की जाती है | बच्चे के अलग अलग अंगों की तय क्रम में जांच की जाती है
|
माप और तस्वीरें | जरूरत के अनुसार माप लिए जाते हैं | हर जरूरी अंग की तस्वीरें और माप दर्ज किए जाते हैं |
कितना समय लगता है | आमतौर पर कम समय लगता है | ज्यादा समय लगता है, क्योंकि जांच ज्यादा डिटेल में होती है |
किससे करवाना चाहिए | प्रशिक्षित रेडिओलॉजिस्ट से | प्रशिक्षित और अनुभवी रेडिओलॉजिस्ट से |
रिपोर्ट में कुछ समझ न आए तो उसे इंटरनेट पर खोजने के बजाय डॉक्टर से पूछें, क्योंकि एक ही शब्द के अलग संदर्भ में अलग मायने होते हैं। दोबारा स्कैन के लिए बुलाया गया हो तो उसे टालें नहीं।
इसके अलावा स्कैन के बाद भी अगर ब्लीडिंग, पानी जैसा रिसाव, तेज पेट दर्द हो या बच्चे की हलचल में कमी लगे, तो तुरंत संपर्क करें। एक और जरूरी बात, यह स्कैन बच्चे का लिंग बताने के लिए नहीं होता, और भारत में गर्भ में लिंग की जांच कानूनन अपराध है।
एनोमली स्कैन प्रेगनेंसी के 18 से 21 हफ्ते के बीच किया जाने वाला एक विस्तृत अल्ट्रासाउंड है। इसमें बच्चे के अंगों की बनावट, ग्रोथ, प्लेसेंटा और एम्नियोटिक फ्लूइड की जांच की जाती है। जांच में दर्द नहीं होता और इसे पूरा होने में आमतौर पर करीब आधा घंटा लगता है।
इसकी मदद से कई तरह की असामान्यताओं का पता लगाया जा सकता है, लेकिन इसकी सटीकता हर स्थिति में एक जैसी नहीं होती। इसलिए सामान्य रिपोर्ट का मतलब यह है कि जांच में कोई असामान्यता नहीं दिखी, लेकिन यह हर समस्या की पूरी गारंटी नहीं है। अगर स्कैन में कुछ असामान्य दिखता है, तो घबराने के बजाय फीटल मेडिसिन विशेषज्ञ से आगे की जांच कराएं, क्योंकि हर असामान्यता गंभीर नहीं होती।
सबसे जरूरी बात यह है कि एनोमली स्कैन सही समय पर करवाएं और रिपोर्ट का मतलब अपने डॉक्टर से समझें।