प्रेगनेंसी के दौरान जब अल्ट्रासाउंड होता है, तो रिपोर्ट में प्लेसेंटा के बारे में कई चीज़ें लिखी होती हैं जैसे Posterior Placenta, Anterior Placenta, Grade 2, Low-lying वगैरह- वगैरह। बिना यह जाने कि Placenta kya hota hai ये शब्द बहुत भारी भरकम लग सकते हैं और इन्हें पढ़कर अक्सर महिलाएं यह नहीं समझ पातीं कि सब ठीक है या कोई दिक्कत है। यह आर्टिकल उन गर्भवती महिलाओं के लिए एक गाइड की तरह है जो प्रेगनेंसी अल्ट्रासाउंड करवाने के बाद रिपोर्ट को खुद से भी समझना चाहती हैं। वे जानना चाहती हैं कि प्लेसेंटा की पोजीशन और ग्रेड का क्या मतलब होता है। यहाँ हम बताएंगे कि प्लेसेंटा की कौन सी पोजीशन सामान्य है, कौन सी ग्रेड किस समय ठीक है, और ऐसे कौन से मौके होते हैं जब डॉक्टर से परामर्श करने की आवश्यकता होती है।
प्लेसेंटा वो अंग है जो सिर्फ़ प्रेगनेंसी के दौरान महिला के शरीर के भीतर बनता है और डिलीवरी के बाद बाहर निकल जाता है। यह गर्भाशय की दीवार से जुड़ा होता है और अम्बिलिकल कॉर्ड यानी गर्भनाल के ज़रिए बच्चे से जुड़ा रहता है।
प्लेसेंटा आमतौर पर पहली तिमाही यानी फर्स्ट ट्राइमेस्टर के अंत तक बनकर तैयार हो जाता है और पूरी प्रेगनेंसी में बच्चे की लाइफलाइन बना रहता है। वैसे तो प्लेसेंटा ही बच्चे के विकास का आधार होता है, जिसके बहुत से कामों में मुख्य काम माँ और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे के बीच में पुल यानी ब्रिज का होता है।
अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में प्लेसेंटा की पोजीशन लिखी होती है। इसका मतलब है कि प्लेसेंटा गर्भाशय की किस दीवार से जुड़ा है। आइए समझते हैं कि कौन सी पोजीशन का क्या मतलब है।
पोस्टीरियर प्लेसेंटा का मतलब है कि प्लेसेंटा गर्भाशय की पीछे की दीवार पर यानी रीढ़ की तरफ बना है। यह सबसे कॉमन पोजीशन होती है जो पूरी तरह नार्मल है। इस पोजीशन में बच्चे की हलचल जल्दी और साफ महसूस होती है।
प्लेसेंटा को एंटीरियर प्लेसेंटा तब कहते हैं जब वह गर्भाशय की अगली दीवार पर यानी पेट की तरफ बनता है। यह पोजीशन भी बिल्कुल नॉर्मल है। इसमें बच्चे की किक थोड़ी देर से या हल्की महसूस हो सकती है क्योंकि प्लेसेंटा बच्चे और पेट के बीच में कुशन की तरह काम है।
फ़ंडल प्लेसेंटा गर्भाशय के ऊपरी हिस्से में बनता है। यह सबसे आइडियल पोजीशन मानी जाती है जो बिल्कुल सुरक्षित होती है।
इसका मतलब है कि प्लेसेंटा गर्भाशय के निचले हिस्से में बना है यानी उसकी पोजीशन सर्विक्स के पास है। लो-लाइंग प्लेसेंटा में थोड़ा ध्यान रखना पड़ता है। अच्छी बात यह है कि ज़्यादातर मामलों में प्रेगनेंसी बढ़ने के साथ जैसे-जैसे गर्भाशय बढ़ता है, प्लेसेंटा ऊपर की तरफ़ खिसक कर सेफ पोजीशन में आ जाता है।
अगर अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में प्लेसेंटा प्रिविआ लिखा है तो इसका मतलब है कि प्लेसेंटा सर्विक्स को पूरा या आंशिक रूप से ढक रहा है। प्लेसेंटा प्रीविआ गंभीर स्थिति है जिसमें ब्लीडिंग का ख़तरा होता है और नॉर्मल डिलीवरी संभव नहीं होती। इसमें डॉक्टर की निगरानी बहुत ज़रूरी है।
अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में Grade 0, Grade 1, Grade 2 या Grade 3 लिखा होता है। यह ग्रेड प्लेसेंटा की मैच्योरिटी बताता है, यानी प्लेसेंटा कितना परिपक्व हुआ है।
मतलब प्लेसेंटा अभी नया और बिल्कुल शुरुआती स्टेज में है। यह पहली और दूसरी तिमाही में सामान्य होता है।
इस ग्रेड का मतलब है कि प्लेसेंटा थोड़ा मैच्योर हो रहा है। अगर 18-29वें हफ्ते के बीच प्लेसेंटा का ग्रेड 1 है तो वह सामान्य है।
प्लेसेंटा की ग्रेड 2 बताता है कि प्लेसेंटा अब काफ़ी मैच्योर हो गया है। यह 30-38 हफ्ते के बीच सामान्य है।
ग्रेड 3 तक आते आते प्लेसेंटा पूरी तरह मैच्योर हो गया होता है। यह 39 हफ्ते के बाद सामान्य है। लेकिन अगर यह ग्रेड बहुत पहले जैसे 34-35वें हफ्ते में आ जाए तो इसे प्रीमैच्योर एजिंग कहते हैं जिसमें डॉक्टर की निगरानी ज़रूरी होती है।
यह सबसे ज़रूरी सेक्शन है। अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट देखकर समझें कि कब सब ठीक है और कब डॉक्टर से बात करनी है।
अगर प्लेसेंटा पोस्टीरियर (Posterior), एंटीरियर (Anterior) या फ़ंडल (Fundal) है तो यह सामान्य पोजीशन है। अगर ग्रेड प्रेगनेंसी के हफ्तों के हिसाब से सही है तो कोई दिक्कत की बात नहीं होती। अगर कोई असामान्य ब्लीडिंग या दर्द नहीं है तो आराम से रहें।
अगर प्लेसेंटा लो-लाइंग (Low-lying) या प्रिविआ (Previa) है तो फॉलो-अप ज़रूरी हो जाता है। अगर ग्रेड समय से पहले बढ़ गई है जैसे 32 हफ्ते में ग्रेड 3 आयी है तो डॉक्टर से परामर्श करें। अगर वेजाइनल ब्लीडिंग हो, चाहे हल्की भी, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें। अगर बच्चे की हलचल अचानक कम हो जाए तो देर न करें।
अगर भारी ब्लीडिंग हो तो यह इमरजेंसी का संकेत है। अगर पेट में तेज़ दर्द हो जो रुक नहीं रहा तो तुरंत हॉस्पिटल जाएं। ये प्लेसेंटल एब्रप्शन यानी प्लेसेंटा का समय से पहले अलग होने के संकेत हो सकते हैं।
IVF या किसी भी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) से हुई प्रेगनेंसी में प्लेसेंटा की पोजीशन नैचुरल प्रेगनेंसी जैसी ही होती है। IVF से प्लेसेंटा की पोजीशन प्रभावित नहीं होती।
लेकिन IVF प्रेगनेंसी में कुछ बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है।
ज़्यादा मॉनिटरिंग: IVF प्रेगनेंसी में वैसे भी ज़्यादा बार अल्ट्रासाउंड होते हैं, जो अच्छी बात है। इससे प्लेसेंटा की पोजीशन और ग्रोथ पर नज़र रहती है।
ट्विन्स या मल्टिपल प्रेगनेंसी: IVF में जुड़वाँ बच्चों की संभावना ज़्यादा होती है। ऐसे में हर बच्चे की प्लेसेंटा अलग हो सकती है या एक शेयर हो सकती है, दोनों स्थितियों में अलग-अलग निगरानी चाहिए।
प्लेसेंटा प्रीविया का थोड़ा ज़्यादा रिस्क: कुछ अध्ययनों के अनुसार IVF प्रेगनेंसी में प्लेसेंटा प्रीविया का ख़तरा थोड़ा बढ़ जाता है, इसलिए नियमित चेकअप बहुत ज़रूरी है।
घबराएं नहीं: अगर IVF के बाद अल्ट्रासाउंड में पोस्टीरियर या एंटीरियर प्लेसेंटा लिखा है, तो यह बिल्कुल सामान्य है। IVF प्रेगनेंसी में भी ज़्यादातर महिलाओं की प्लेसेंटा बिल्कुल ठीक होती है।
प्लेसेंटा की सेहत सीधे बच्चे की सेहत से जुड़ी है। कुछ आसान बातें जो मदद करती हैं।
पौष्टिक खाना खाएं: आयरन, फोलिक एसिड, प्रोटीन से भरपूर खाना खायें। हरी सब्ज़ियाँ, दालें, अंडे, दूध, फल रोज़ाना खाएं।
पानी पर्याप्त पिएं: डिहाइड्रेशन से प्लेसेंटा में ब्लड फ्लो कम हो सकता है। पर्याप्त हाइड्रेशन बनाये रखने के लिए दिन में 8 से 10 गिलास पानी ज़रूर पिएं।
धूम्रपान और शराब से दूर रहें: ये वो चीज़ें हैं जो प्लेसेंटा को सीधे नुकसान पहुँचाते हैं और बच्चे के विकास को प्रभावित करते हैं।
तनाव कम करें: ज़्यादा तनाव से ब्लड प्रेशर बढ़ता है जो प्लेसेंटा के काम को प्रभावित कर सकता है।
नियमित चेकअप: डॉक्टर की बताई तारीख़ पर अल्ट्रासाउंड और चेकअप ज़रूर करवाएं।
प्लेसेंटा माँ और बच्चे के बीच की लाइफलाइन है जो प्रेगनेंसी के दौरान बच्चे को पोषण और ऑक्सीजन देती है। Placenta kya hota hai जानने के बाद अब अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में प्लेसेंटा के बारे में जो लिखा है, उसे आसानी से समझ सकते हैं। प्लेसेंटा की पोस्टीरियर, एंटीरियर और फ़ंडल पोजीशन सामान्य हैं। लो लाइंग और प्रिविआ में डॉक्टर की निगरानी की जरुरत पड़ती है। ग्रेड का नंबर प्रेगनेंसी के हफ्तों के हिसाब से होना चाहिए।
जब भी कोई भी शंका हो तो डॉक्टर से खुलकर बात करें। IVF प्रेगनेंसी में भी घबराने की ज़रूरत नहीं, बस नियमित चेकअप करवाती रहें।
Anterior में प्लेसेंटा पेट की तरफ़ होती है, Posterior में रीढ़ की तरफ़। दोनों सामान्य हैं। Posterior में बच्चे की हलचल जल्दी महसूस होती है।
अगर तीसरी तिमाही तक प्लेसेंटा ऊपर खिसक जाए तो नॉर्मल डिलीवरी संभव है। अगर नीचे ही रहे तो C-section की ज़रूरत पड़ सकती है।
इसे प्रीमैच्योर प्लेसेंटल एजिंग कहते हैं। इससे बच्चे को पोषण कम मिल सकता है। डॉक्टर ज़्यादा बार मॉनिटरिंग करते हैं।
बिल्कुल नहीं। यह पूरी तरह मिथक है। प्लेसेंटा की पोजीशन और बच्चे के लिंग का कोई संबंध नहीं है।
नहीं, प्लेसेंटा बिल्कुल नैचुरल प्रेगनेंसी जैसी ही होती है। IVF से प्लेसेंटा प्रभावित नहीं होती।