सारांश (Overview)
दो बार या उससे ज्यादा मिसकैरेज होने के बाद डॉक्टर एंटीफॉस्फोलिपिड सिंड्रोम (Antiphospholipid Syndrome) की जांच की सलाह दे सकते हैं। लेकिन APLA टेस्ट में एक बार एंटीबॉडी पॉजिटिव आने का मतलब यह नहीं है कि आपको एंटीफॉस्फोलिपिड सिंड्रोम है। निदान के लिए जरूरी है कि एंटीबॉडी 12 हफ्ते के अंतर पर दो बार पॉजिटिव आएं।
इस आर्टिकल में जानिए इसके तीन मुख्य टेस्ट कौन से हैं, जांच कब करानी चाहिए, एक पॉजिटिव रिपोर्ट को दोबारा जांचने की जरूरत क्यों पड़ती है, प्रेगनेंसी में इसका इलाज क्या है और IVF के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
एंटीफॉस्फोलिपिड सिंड्रोम एक ऑटोइम्यून कंडीशन है। इसमें शरीर की सुरक्षा प्रणाली गलती से अपने ही शरीर में मौजूद कुछ पदार्थों के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने लगती है। इन्हें एंटीफॉस्फोलिपिड एंटीबॉडी कहा जाता है।
इन एंटीबॉडी की वजह से खून में थक्का बनने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। इससे शरीर की नसों में खून का बहाव रुक सकता है।
प्रेगनेंसी में इसका असर प्लेसेंटा पर पड़ सकता है। प्लेसेंटा के जरिए बच्चे तक ऑक्सीजन और पोषण पहुंचता है। अगर वहां खून का बहाव कम हो जाए या थक्का बन जाए, तो प्रेगनेंसी के रुकने या दूसरी जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है। यही वजह है कि बार-बार मिसकैरेज APS की एक अहम पहचान हो सकता है।
यह कंडीशन अकेले भी हो सकती है और ल्यूपस जैसी दूसरी ऑटोइम्यून बीमारी के साथ भी।
इन लक्षणों में से कोई एक होने का मतलब यह नहीं है कि आपको APS है। कई लोगों में कोई भी लक्षण दिखाई नहीं देता और APS का पता किसी दूसरी जांच या प्रेगनेंसी से जुड़ी समस्या की जांच के दौरान चलता है।
APS की जांच के लिए तीन मुख्य टेस्ट किए जाते हैं। APLA पैनल करवाते समय यह देखना जरूरी है कि इन तीनों की जांच शामिल है या नहीं।
टेस्ट | क्या देखता है | ध्यान देने की बात |
|---|---|---|
ल्यूपस एंटीकोआगुलंट (LA) | खून में ल्यूपस एंटीकोआगुलंट की मौजूदगी | खून पतला करने की दवा चल रही हो तो रिपोर्ट गलत आ सकती है |
एंटीकार्डियोलिपिन (aCL) IgG और IgM | एक खास एंटीबॉडी की मात्रा | हल्की बढ़त और ज्यादा बढ़त का मतलब अलग होता है |
एंटी-बीटा-2-ग्लाइकोप्रोटीन I (anti-β2GPI) IgG और IgM | दूसरी खास एंटीबॉडी | अक्सर पैनल में छूट जाता है, पूछकर करवाइए |
APS की डायग्नोसिस के लिए यही तीन जांचें होती हैं, ल्यूपस एंटीकोआगुलंट, एंटीकार्डियोलिपिन IgG या IgM, और एंटी-बीटा-2-ग्लाइकोप्रोटीन I IgG या IgM।
गाइडलाइन के अनुसार मिसकैरेज वाली महिलाओं को ल्यूपस एंटीकोआगुलंट और एंटीकार्डियोलिपिन IgG तथा IgM की जांच की सलाह दी जाती है, और एंटी-बीटा-2-ग्लाइकोप्रोटीन I की भी जांच करवाने के लिए कहा जाता है। इसलिए रिपोर्ट लेते समय देख लीजिए कि तीनों जांचें उसमें हैं या नहीं।
एक बार एंटीफॉस्फोलिपिड एंटीबॉडी पॉजिटिव आने से एंटीफॉस्फोलिपिड सिंड्रोम की पुष्टि नहीं होती। सही डायग्नोसिस के लिए वही एंटीबॉडी 12 हफ्ते के अंतर पर दो बार पॉजिटिव आनी चाहिए।
कई बार इन्फेक्शन, बुखार और कुछ दूसरी कंडीशन में ये एंटीबॉडी कुछ समय के लिए बढ़ सकती हैं और बाद में अपने आप नॉर्मल हो सकती हैं। इसका APS से कोई लेना देना नहीं होता।
2023 में ACR और EULAR ने APS की पहचान के लिए नए क्राइटेरिया जारी किए। इनकी स्पेसिफिसिटी 99% थी, इस नए क्राइटेरिया यानी गलत तरीके से APS मान लिए जाने की संभावना कम रखने पर खास जोर दिया गया।
2023 में ACR और EULAR ने APS की पहचान के लिए एक नया क्राइटेरिया (criteria) जारी किया है। इसकी ‘स्पेसिफिसिटी’ 99% है, यानी इस नए क्राइटेरिया को फॉलो करने पर किसी दूसरे रोग के मरीज को गलती से APS का मरीज मान लिए जाने की संभावना बहुत कम रहती है।
दो या उससे ज्यादा प्रेगनेंसी लॉस होने पर एंटीफॉस्फोलिपिड एंटीबॉडी की जांच करवा लेनी चाहिए। लेकिन APS की डायग्नोसिस में हर प्रेगनेंसी लॉस को एक जैसा नहीं माना जाता। इन तीन कंडीशन को खास तौर पर देखा जाता है।
प्रेगनेंसी में क्या हुआ? | APS के क्राइटेरिया में कब आता है? |
|---|---|
दस हफ्ते से पहले लगातार मिसकैरेज | तीन या उससे ज्यादा बार हुआ हो और कोई दूसरी वजह न मिली हो |
दस हफ्ते या उसके बाद प्रेगनेंसी रुकना | एक बार भी हुआ हो, लेकिन बच्चे की बनावट सामान्य रही हो |
34 हफ्ते से पहले डिलीवरी | एक्लैंप्सिया, प्री-एक्लैंप्सिया या प्लेसेंटा से जुड़ी समस्या की वजह से हुई हो |
बार-बार मिसकैरेज वाली महिलाओं में करीब 20% में एंटीफॉस्फोलिपिड एंटीबॉडी पॉजिटिव मिलती हैं। इसलिए हर मिसकैरेज की वजह APS हो, ऐसा जरूरी नहीं है।
APS की वजह से प्लेसेंटा तक ब्लड फ्लो प्रभावित हो सकता है। इसके कारण प्रेगनेंसी में नीचे दी हुयी दिक्कतें आ सकती हैं।
APS कन्फर्म होने पर प्रेगनेंसी में आमतौर पर कम डोज वाली एस्पिरिन और हेपरिन दी जाती है। साथ में प्रेगनेंसी के दौरान बच्चे की ग्रोथ, बीपी और प्री-एक्लैंप्सिया जैसी कम्प्लेक्सिटी पर नजर रखी जाती है।
दवा | कब शुरू होती है | क्या करती है |
|---|---|---|
कम डोज वाली एस्पिरिन | कंसीव करने से पहले से | ब्लड क्लॉट बनने का रिस्क कम करना |
प्रोफाइलैक्टिक डोज हेपरिन या LMWH | प्रेगनेंसी टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद से | प्लेसेंटा तक खून का बहाव बनाए रखने में मदद |
रेगुलर निगरानी | पूरी प्रेगनेंसी | ग्रोथ स्कैन, बीपी और प्री-एक्लैंप्सिया पर नजर |
लेकिन इलाज कितना असर करता है, इस पर रिसर्च पूरी तरह एक जैसी नहीं है। अकेली एस्पिरिन की तुलना में एस्पिरिन और हेपरिन साथ लेने पर जीवित जन्म की संभावना बेहतर पाई गई। हालांकि, इस रिजल्ट पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें शामिल स्टडीज से मिलने वाले प्रूफ सीमित थे।
अगर APS के तीनों टेस्ट ल्यूपस एंटीकोआगुलंट के साथ एंटीकार्डियोलिपिन और एंटी-बीटा-2-ग्लाइकोप्रोटीन पॉजिटिव आते हैं, तो इसे ट्रिपल पॉजिटिव कहा जाता है। इस कंडीशन में ब्लड क्लॉट बनने और प्रेगनेंसी में दिक्कत होने का रिस्क ज्यादा हो सकता है।
इसलिए रिपोर्ट में सिर्फ पॉजिटिव या नेगेटिव न देखें। तीनों टेस्ट की वैल्यू और नॉर्मल वैल्यू भी देखें और डॉक्टर से इसका मतलब समझें।
IVF में एग रिट्रीवल और एम्ब्रीओ ट्रांसफर की तारीख पहले से तय होती है। अगर आप एस्पिरिन या हेपरिन जैसी दवा ले रही हैं, तो इसकी जानकारी IVF टीम को पहले ही दें, ताकि प्रोसीजर के हिसाब से दवा को मैनेज किया जा सके।
अगर बार-बार इम्प्लांटेशन फेल हो रहा है और APLA की जांच कराई जाती है, तो एक पॉजिटिव रिपोर्ट को APS का पक्का डायग्नोसिस न मानें। जरूरत होने पर 12 हफ्ते बाद दोबारा जांच की जाती है।
APS का इलाज चल रहा हो, तब भी थायरॉइड, गर्भाशय की बनावट और एम्ब्रीओ की क्वालिटी जैसी दूसरी वजहों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
बार-बार मिसकैरेज के बाद APS (Antiphospholipid syndrome) का पता चलना चिंता की बात हो सकती है, लेकिन यह ऐसी कंडीशन है जिसे इलाज और निगरानी के साथ मैनेज किया जा सकता है। सबसे जरूरी बात है कि सिर्फ एक पॉजिटिव रिपोर्ट के आधार पर APS मानकर इलाज शुरू न किया जाए।
अगर आपकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है, तो डॉक्टर से यह जरूर पूछें कि क्या 12 हफ्ते बाद दोबारा जांच की जरूरत है और क्या बार-बार मिसकैरेज की दूसरी वजहों की भी जांच हो चुकी है। इससे आगे का इलाज सही वजह को ध्यान में रखकर तय किया जा सकेगा।