साराँश (Overview)
डबल मार्कर टेस्ट की सबसे बड़ी उलझन यही है कि इसकी रिपोर्ट हां या ना में जवाब नहीं देती। यह नहीं बताता कि होने वाली संतान में कोई क्रोमोसोम से संबंधित समस्या है या नहीं, बल्कि बताता है कि उस कंडीशन की संभावना कितनी है, वह भी एक अनुपात में। इसीलिए 1:800 और 1:180 जैसे नंबर देखकर लोग घबरा जाते हैं, जबकि दोनों का मतलब अलग है। double marker test in hindi को समझने के लिए सबसे पहले यही समझना जरूरी है कि यह स्क्रीनिंग टेस्ट है, डायग्नोस्टिक नहीं, और स्क्रीनिंग का काम सिर्फ यह छांटना है कि किसे आगे की जांच चाहिए। आगे हम जानेंगे कि यह कब और कैसे होता है, रिस्क रेशियो कैसे पढ़ा जाता है, और हाई रिस्क आने पर आगे कौन सी जांच होती है।
यह मां के खून की जांच है जिसमें दो चीजें नापी जाती हैं, इसीलिए इसे डबल मार्कर कहते हैं। इसके रिजल्ट को NT स्कैन, उम्र और प्रेग्नेंसी के हफ्तों के साथ जोड़कर अनुपात निकाला जाता है, जिसे कंबाइंड फर्स्ट ट्राइमेस्टर स्क्रीनिंग कहते हैं।
इससे तीन कंडीशन की संभावना देखी जाती है। इन कंडीशन को डाउन सिंड्रोम यानी ट्राइसोमी 21, एडवर्ड सिंड्रोम यानी ट्राइसोमी 18, और पटाऊ सिंड्रोम यानी ट्राइसोमी 13 कहते हैं।
क्रोमोसोमल कंडीशन किसी भी उम्र की प्रेग्नेंसी में हो सकती है, हालांकि उम्र के साथ संभावना बढ़ती है। इसीलिए यह जांच सभी को दी जाती है, सिर्फ 35 से ऊपर वालों को नहीं। इसका मकसद इलाज नहीं, समय रहते जानकारी देना है ताकि आगे की जांच पर सोच-समझकर फैसला हो सके।
यह टेस्ट पहली तिमाही यानी फर्स्ट ट्राइमेस्टर में किया जाता है, आमतौर पर 11 हफ्ते से 13 हफ्ते 6 दिन के बीच यह टेस्ट किया जाता है। इसके बाद इन मार्कर से मिलने वाली जानकारी भरोसेमंद नहीं रहती। यह समय निकल जाए तो डबल मार्कर के बजाय क्वाड्रपल मार्कर टेस्ट कराया जाता है, जो 14 से 20 हफ्ते के बीच होता है।
इस टेस्ट के ज़रिये ब्लड में दो चीजें देखी जाती हैं, जो प्लेसेंटा से बनती हैं।
इसका पूरा नाम प्रेग्नेंसी एसोसिएटेड प्लाज्मा प्रोटीन-A है और डाउन सिंड्रोम में इसका स्तर आमतौर पर कम मिलता है। ACOG के अनुसार बहुत कम PAPP-A का संबंध बच्चे की ग्रोथ कम रहने और प्रीएक्लेम्पसिया से भी देखा गया है, हालांकि अकेले इस मार्कर से कुछ तय नहीं होता।
यह प्रेगनेंसी हार्मोन hCG का एक हिस्सा है। डाउन सिंड्रोम में इसका लेवल आमतौर पर बढ़ा मिलता है, जबकि ट्राइसोमी 18 और 13 में दोनों मार्कर कम आने का पैटर्न दिखता है।
यह सामान्य ब्लड टेस्ट है। बांह की नस से सैंपल लेकर लैब भेजा जाता है और कोई सुई गर्भाशय के अंदर नहीं डाली जाती, इसलिए होने वाली संतान को खतरा नहीं होता। सैंपल के साथ उम्र, वजन, हफ्ते, NT स्कैन की माप और यह भी भेजा जाता है कि प्रेगनेंसी IVF से है या नहीं। कोई जानकारी गलत हो तो रिपोर्ट बदल जाती है।
खाली पेट रहने की जरूरत नहीं होती और न कोई दवा बंद करनी पड़ती है। बस दो बातें जरूरी हैं। पहली, हफ्तों की गिनती सही होनी चाहिए, इसीलिए यह अक्सर डेटिंग स्कैन के साथ होता है। दूसरी, थायरॉइड, डायबिटीज या पिछली प्रेग्नेंसी की कोई क्रोमोसोमल कंडीशन डॉक्टर को पहले बता दें।
रिपोर्ट में दो चीजें होती हैं, मार्कर की वैल्यू और उनसे निकला रिस्क रेशियो। निर्णायक फैसला रिस्क रेशियो से होता है।
ज्यादातर महिलाओं की रिपोर्ट लो रिस्क आती है। NHS की सीमा के हिसाब से 1 में 150 से कम संभावना लो रिस्क मानी जाती है। इसका मतलब आगे जांच की जरूरत नहीं है, पर यह भी नहीं कि आगे किसी टेस्ट की संभावना बिलकुल ही नहीं है।
पॉसिबिलिटी अगर 1 में 2 से 1 में 150 के बीच आए तो उसे हाई रिस्क कहते हैं और आगे की जांच का ऑप्शन दिया जाता है। सबसे जरूरी बात यह है कि हाई रिस्क आने का मतलब क्रोमोज़ोम से संबंधित कंडीशन होना नहीं है।
1:250 का मतलब है कि ऐसी 250 प्रेग्नेंसी में से एक में यह कंडीशन मिलने की संभावना है। नंबर जितना बड़ा होगा, क्रोमोज़ोम से संबंधित कंडीशन होने संभावना उतनी कम होगी, इसीलिए 1:1000 वाली रिपोर्ट 1:200 से ज्यादा आश्वस्त करने वाली है।
मार्कर के मान MoM यानी मल्टीपल ऑफ मीडियन में लिखे जाते हैं, जो बताता है कि उसी हफ्ते की बाकी महिलाओं के औसत की तुलना में आपका स्तर कितना है। आमतौर पर 0.5 से 2.0 MoM सामान्य माना जाता है, हालांकि हर लैब की रेंज अलग हो सकती है। किसी एक मार्कर का ऊपर-नीचे होना अपने आप में समस्या नहीं, निष्कर्ष रिस्क रेशियो से निकलता है।
इसका मतलब सिर्फ इतना है कि आपकी प्रेग्नेंसी उस समूह में आ गई है जिसे आगे की जांच का विकल्प दिया जाना चाहिए। हाई रिस्क रिपोर्ट पाने वाली ज्यादातर महिलाओं का बच्चा इन कंडीशन के बिना ही जन्म लेता है। इसीलिए इस रिपोर्ट पर कोई बड़ा फैसला नहीं लिया जाता, अगला कदम हमेशा जांच होता है।
यह भी खून की जांच है, जिसमें मां के खून में मौजूद प्लेसेंटा के DNA के टुकड़े देखे जाते हैं। NHS में हाई रिस्क रिपोर्ट के बाद यही अगला विकल्प दिया जाता है। यह ज्यादा सटीक है, पर स्क्रीनिंग ही है, फाइनल जांच नहीं।
NT स्कैन में बच्चे की गर्दन के पीछे जमा तरल की मोटाई नापी जाती है। यह बढ़ी हो तो आगे की जांच की सलाह दी जाती है, और 18 से 20 हफ्ते के अनोमली स्कैन में अंगों की बनावट देखी जाती है।
यही फाइनल यानी डायग्नोस्टिक जांच हैं। RCOG के अनुसार CVS 11 से 13 हफ्ते 6 दिन के बीच और एम्नियोसेंटेसिस 15 हफ्ते के बाद किया जाता है, और अनुभवी डॉक्टर के हाथों इनसे मिसकैरेज का अतिरिक्त खतरा 0.5 प्रतिशत से कम रहता है।
ACOG के आंकड़ों के अनुसार कंबाइंड फर्स्ट ट्राइमेस्टर स्क्रीनिंग 11 हफ्ते में लगभग 87 प्रतिशत, 12 हफ्ते में 85 प्रतिशत और 13 हफ्ते में 82 प्रतिशत मामलों को पकड़ पाती है, वह भी 5 प्रतिशत फॉल्स पॉजिटिव के साथ।
यानी जितनी जल्दी यह टेस्ट हो, नतीजा उतना बेहतर रहता है, और कुछ मामले छूट भी सकते हैं।
दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। NT स्कैन गर्दन के पीछे की मोटाई बताता है और डबल मार्कर खून में मार्कर का स्तर, और इन्हें उम्र के साथ जोड़कर रिस्क रेशियो बनता है। सिर्फ ब्लड टेस्ट कराकर और NT स्कैन छोड़ देने पर समस्या पकड़ने की क्षमता घट जाती है।
रिपोर्ट हाई रिस्क आने पर इंटरनेट पर नंबर खोजने के बजाय डॉक्टर से मिलें और आगे के विकल्प समझें। पिछली प्रेग्नेंसी में कोई क्रोमोसोमल कंडीशन रही हो या उम्र 35 से ज्यादा हो, तो पहली विजिट पर ही चर्चा कर लें ताकि सही हफ्ते में जांच हो सके।
डबल मार्कर टेस्ट पहली तिमाही की ब्लड जांच है जिसमें PAPP-A और फ्री बीटा-hCG देखे जाते हैं। यह NT स्कैन और मां की उम्र के साथ मिलकर डाउन, एडवर्ड और पटाऊ सिंड्रोम की संभावना का अनुपात बताता है। यह 11 से 13 हफ्ते 6 दिन के बीच सबसे सही रहता है और खाली पेट रहने की जरूरत नहीं। रिपोर्ट का असल नतीजा रिस्क रेशियो है, मार्कर के अलग-अलग मान नहीं। हाई रिस्क का मतलब सिर्फ इतना है कि आगे NIPT या जरूरत पड़ने पर CVS और एम्नियोसेंटेसिस का विकल्प खुलता है, इसलिए घबराने के बजाय डॉक्टर से उसका मतलब समझें।