Overview
इस ब्लॉग में Embryo यानी भ्रूण का मतलब, IVF में इसके बनने और विकसित होने की प्रक्रिया और दिन 3 से दिन 5 तक इसके अलग-अलग चरणों को आसान भाषा में समझाया गया है। इसमें एम्ब्रियो ग्रेडिंग, 5AA और 4BB जैसे ग्रेड का मतलब, ग्रेडिंग की सीमाएँ, एम्ब्रियो फ्रीजिंग और एक या अधिक एम्ब्रियो ट्रांसफर करने से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं की जानकारी दी गई है।
IVF की पूरी प्रक्रिया में एक शब्द बार-बार सुनने को मिलता है - एम्ब्रियो। और अक्सर इसके साथ एक और चीज़ आती है जो कपल को सबसे ज़्यादा परेशान करती है - ग्रेडिंग।
"आपके एम्ब्रियो का ग्रेड बी है" सुनते ही मन में सवाल उठता है - इसका मतलब क्या? क्या ग्रेड ए वाले से बच्चा नहीं होगा? क्या बी वाला कमज़ोर है?
तो इस लेख में दो बातें साफ़ होंगी - एम्ब्रियो असल में है क्या, और ग्रेडिंग को लेकर वो सच जो घबराहट को काफ़ी कम कर देता है।
पहले बुनियाद से।
बहुत आसान शब्दों में - जब अंडा (egg) और शुक्राणु (sperm) मिलते हैं, तो जो नई कोशिका बनती है वो बढ़ना और विभाजित होना शुरू करती है। शुरुआती कुछ दिनों में बनने वाले इसी विकसित होते हुए ढाँचे को एम्ब्रियो (Embryo) यानी भ्रूण कहते हैं।
इसे ऐसे समझिए - ये बच्चे का सबसे शुरुआती रूप है, जब वो सिर्फ़ कुछ कोशिकाओं का समूह होता है। धीरे-धीरे ये कोशिकाएँ बढ़ती हैं, बँटती हैं, और एक ख़ास ढाँचा लेती हैं।
IVF में यही एम्ब्रियो लैब में बनाया जाता है, कुछ दिन उसकी देखभाल की जाती है, और फिर उसे गर्भाशय में रखा जाता है (एम्ब्रियो ट्रांसफ़र)।
IVF में एम्ब्रियो का सफ़र कुछ तय पड़ावों से गुज़रता है। इन्हें जान लेना अच्छा रहता है, क्योंकि इन्हीं के आधार पर डॉक्टर फ़ैसले लेते हैं।
दिन 0 - निषेचन (Fertilization). अंडे और शुक्राणु को लैब में मिलाया जाता है। जब निषेचन हो जाता है, तो जो बनता है उसे ज़ायगोट (Zygote) कहते हैं - एक अकेली कोशिका।
दिन 1 से 3 - क्लीवेज स्टेज (Cleavage Stage). अब ये अकेली कोशिका बँटना शुरू करती है - 2, फिर 4, फिर 8 कोशिकाएँ। एक दिलचस्प बात - इस दौरान एम्ब्रियो का आकार नहीं बढ़ता, बस कोशिकाएँ बँटती जाती हैं। इसे पिज़्ज़ा की तरह समझिए - आप उसे जितने टुकड़ों में काटें, टुकड़े बढ़ते हैं पर पिज़्ज़ा बड़ा नहीं होता। एक अच्छा दिन-3 एम्ब्रियो आमतौर पर 6 से 10 कोशिकाओं का होता है।
दिन 4 - मोरुला (Morula). कोशिकाएँ अब आपस में और क़रीब आकर एक गुच्छा बनाती हैं।
दिन 5 से 6 - ब्लास्टोसिस्ट (Blastocyst). ये सबसे अहम पड़ाव है। अब एम्ब्रियो दो साफ़ हिस्सों में बँट जाता है - एक बाहरी परत जो आगे चलकर प्लेसेंटा बनेगी, और अंदर एक कोशिका-समूह जो आगे चलकर बच्चा बनेगा।
यही ब्लास्टोसिस्ट वाला चरण IVF में बहुत मायने रखता है, और इसका कारण आगे आता है।
IVF में एम्ब्रियो ट्रांसफ़र आमतौर पर या तो दिन-3 (क्लीवेज स्टेज) पर होता है या दिन-5 (ब्लास्टोसिस्ट) पर।
दिन-5 तक इंतज़ार करने का एक बड़ा फ़ायदा है। जब एम्ब्रियो को दिन-5 तक बढ़ने दिया जाता है, तो कुदरती तौर पर सबसे मज़बूत एम्ब्रियो ही इस चरण तक पहुँचते हैं - यानी एक तरह की छँटाई अपने आप हो जाती है। शोध बताते हैं कि ब्लास्टोसिस्ट (दिन-5) ट्रांसफ़र में इम्प्लांटेशन की दर दिन-3 के मुक़ाबले लगभग दोगुनी तक हो सकती है।
पर हर एम्ब्रियो दिन-5 तक नहीं पहुँचता, और कुछ स्थितियों में डॉक्टर दिन-3 पर ही ट्रांसफ़र का फ़ैसला ले सकते हैं। कौन सा आपके लिए ठीक है, ये आपकी स्थिति, एम्ब्रियो की संख्या और गुणवत्ता देखकर विशेषज्ञ तय करते हैं। दोनों में से कोई "ग़लत" नहीं है - बस अलग स्थितियों के लिए अलग रास्ते हैं।
ये वो हिस्सा है जो कपल को सबसे ज़्यादा परेशान करता है, इसलिए इसे ध्यान से समझते हैं।
एम्ब्रियो ग्रेडिंग का मतलब है - माइक्रोस्कोप के नीचे एम्ब्रियो की बनावट देखकर उसे एक स्कोर देना। इसका मक़सद है सबसे अच्छी संभावना वाले एम्ब्रियो को ट्रांसफ़र या फ़्रीज़ के लिए चुनना।
दिन-3 और दिन-5 की ग्रेडिंग अलग तरीक़े से होती है।
दिन-3 (क्लीवेज स्टेज) की ग्रेडिंग में दो चीज़ें देखी जाती हैं - कोशिकाओं की संख्या, और उनकी बनावट (यानी कोशिकाएँ एक जैसी और सम आकार की हैं या नहीं, और उनमें टूट-फूट (fragmentation) तो नहीं)।
दिन-5 (ब्लास्टोसिस्ट) की ग्रेडिंग में तीन चीज़ें देखी जाती हैं - एक नंबर (कितना फैला है, 1 से 6) और दो अक्षर (अंदरूनी कोशिका-समूह की गुणवत्ता, और बाहरी परत की गुणवत्ता, A से C तक)। इसीलिए आप "5AA" या "4BB" जैसे स्कोर सुनते हैं।
यहाँ तीन बातें हैं जो हर उस कपल को जाननी चाहिए जो अपनी रिपोर्ट देखकर परेशान है।
पहली - ग्रेड कोई गारंटी नहीं है, न किसी तरफ़। ऊँचा ग्रेड इम्प्लांटेशन की संभावना बढ़ाता ज़रूर है, पर ये सफलता की गारंटी नहीं देता। और उल्टा भी सच है - कम ग्रेड का मतलब "नहीं होगा" नहीं है। ग्रेडिंग सिर्फ़ बनावट देखती है, और बनावट पूरी कहानी नहीं।
दूसरी - ग्रेडिंग में कुछ हद तक व्यक्तिपरकता (subjectivity) होती है। शोध में दर्ज है कि अलग-अलग एम्ब्रियोलॉजिस्ट एक ही एम्ब्रियो को थोड़ा अलग स्कोर दे सकते हैं। यानी ग्रेड एक अनुमान है, कोई पत्थर की लकीर नहीं।
तीसरी - और ये सबसे राहत देने वाली है। अगर आपका एम्ब्रियो दिन-5 (ब्लास्टोसिस्ट) पर अच्छा पहुँच गया है, तो उसका दिन-3 वाला ग्रेड लगभग बेमानी हो जाता है। एक अध्ययन में पाया गया कि एक ही गुणवत्ता के ब्लास्टोसिस्ट में, चाहे वो दिन-3 पर अच्छे ग्रेड के रहे हों या ख़राब, प्रेग्नेंसी और जीवित जन्म की दर में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा।
इसका मतलब सीधा है - अगर एम्ब्रियो ब्लास्टोसिस्ट तक अच्छे से पहुँच गया, तो रास्ते में उसका दिन-3 ग्रेड "बी" या "सी" था, इससे ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता। मंज़िल मायने रखती है, रास्ते का हर पड़ाव नहीं।
तो अगर आप अपनी रिपोर्ट का एक-एक अक्षर देखकर परेशान हो रही हैं - थोड़ा रुकिए। ग्रेड आपके डॉक्टर के लिए एक चुनाव का औज़ार है, आपके लिए फ़ैसले का ऐलान नहीं।
IVF में अक्सर एक से ज़्यादा अच्छे एम्ब्रियो बन जाते हैं। एक ट्रांसफ़र होता है, बाक़ी को फ़्रीज़ (freeze) करके रखा जा सकता है - इसे क्रायोप्रिज़र्वेशन कहते हैं।
इसका फ़ायदा ये है कि अगर पहली बार सफलता न मिले, या भविष्य में दूसरे बच्चे की योजना हो, तो दोबारा पूरी स्टिमुलेशन प्रक्रिया से गुज़रे बिना इन्हीं फ़्रोज़न एम्ब्रियो का इस्तेमाल हो सकता है। आधुनिक तकनीक से फ़्रीज़ किए गए एम्ब्रियो के नतीजे अच्छे रहते हैं।
ये फ़ैसला बहुत मायने रखता है। एक समय माना जाता था कि ज़्यादा एम्ब्रियो डालने से सफलता की संभावना बढ़ती है। पर इससे जुड़वाँ या उससे ज़्यादा बच्चों की संभावना भी बढ़ती है, जो माँ और बच्चों दोनों के लिए जोखिम बढ़ा देती है।
आज अच्छी गुणवत्ता वाले एक ब्लास्टोसिस्ट का ट्रांसफ़र (single embryo transfer) कई मामलों में सबसे सुरक्षित और असरदार तरीक़ा माना जाता है। कितने एम्ब्रियो ट्रांसफ़र करने हैं, ये आपकी उम्र, एम्ब्रियो की गुणवत्ता और आपकी स्थिति देखकर विशेषज्ञ तय करते हैं।