IVF ट्रीटमेंट के दौरान सबसे महत्वपूर्ण पल वह होता है जब भ्रूण यानी एम्ब्रीओ (embryo) को गर्भाशय यानी यूट्रस (uterus) में ट्रांसफर किया जाता है। इसी को embryo transfer in ivf कहते हैं।
कई महिलाएँ इस दिन को लेकर बेहद चिंतित रहती हैं, लेकिन असल में एम्ब्रीओ ट्रांसफर के दौरान किसी भी तरह की तकलीफ नहीं होती। असली चुनौती एम्ब्रीओ ट्रांसफर के बाद प्रेगनेंसी कन्फर्म होने के इंतज़ार में होती है। Embryo transfer in ivf in hindi आर्टिकल में आइए समझते हैं कि यह होता कैसे है और आप अपनी तरफ़ से क्या कर सकती हैं।
एग और स्पर्म को लैब में मिलाया जाता है, मिलने के बाद फर्टिलाइजेशन होता है और भ्रूण यानी एम्ब्रीओ बनता है। इस एम्ब्रीओ को 3 से 5 दिन तक लैब में ही बड़ा किया जाता है।
तीसरे दिन के एम्ब्रीओ को क्लीवेज स्टेज (cleavage stage) कहते हैं जिसमें 6 से 8 कोशिकाएँ यानी सेल्स (cells) होती हैं। पाँचवें दिन तक एम्ब्रीओ ब्लास्टोसिस्ट (blastocyst) बन जाता है, जिसमें सौ से ज़्यादा सेल्स होती हैं।
आजकल ज़्यादातर डॉक्टर पाँचवें दिन का एम्ब्रीओ ट्रांसफर करना पसंद करते हैं। इसकी वजह यह है कि जो एम्ब्रीओ पाँचवें दिन तक पहुँच जाता है वह सबसे हेल्दी और स्ट्रांग साबित हो चुका होता है। इसके यूट्रस की परत से जुड़ने के चांस भी ज़्यादा होते हैं। हालाँकि, अगर एम्ब्रीओ कम बने हों तो तीसरे दिन ही ट्रांसफर किया जा सकता है ताकि एम्ब्रीओ को शरीर का माहौल मिल सके।
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एम्ब्रीओ दो तरह से ट्रांसफर किया जा सकता है, फ्रेश यानी जो हाल ही में फर्टिलाइज हुआ हो या फ्रोजेन यानी जो पहले कभी फर्टिलाइज हुआ हो लेकिन उसे फ्रीज़ कर लिया गया हो।
फ्रेश एम्ब्रीओ उसी साइकल में ट्रांसफर किया जाता है जिस साइकल में एग निकाले गए थे। फ्रोजन एम्ब्रीओ पिछली साइकल में तैयार करके फ्रीज़ कर लिए जाते हैं और बाद में उन्हें इस्तेमाल कर लिया जाता है।
पिछले कुछ सालों में फ्रोज़न एम्ब्रीओ (FET) के नतीजे फ्रेश एम्ब्रीओ जितने ही अच्छे आ रहे हैं, बल्कि कई केसों में उससे भी अच्छे रिजल्ट मिल रहे हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जिस साइकल में एग निकाले जाते हैं, उस समय दवाइयाँ भी दी जाती हैं जिससे गर्भाशय की परत यानी एंडोमेट्रियम भी बदल सकती है। लेकिन उसके अगली साइकल में यूट्रस पहले के मुकाबले अच्छा तैयार होता है।
डॉक्टर कई बार OHSS (ओवेरियन हाइपरस्टिम्यूलेशन) का खतरा हो, प्रोजेस्टेरॉन (progesterone) का स्तर बहुत ज़्यादा हो, या PGT (भ्रूण की जाँच) हो रही हो, तो जमा करके बाद में रखने की सलाह देते हैं।
एम्ब्रीओ ट्रांसफर का प्रोसीजर 10 से 15 मिनट का होता है। सबसे पहले डॉक्टर अल्ट्रासाउंड से यूट्रस को देखते हैं। अल्ट्रासाउंड के दौरान आपका ब्लैडर भरा होना चाहिए जिससे कि इमेज साफ़ दिखाई दे।
फिर एक पतली, मुलायम नली कैथेटर (catheter) को गर्भाशय ग्रीवा यानी सर्विक्स (cervix) से होते हुए यूट्रस के अंदर ले जाया जाता है। इस कैथेटर में एम्ब्रीओ पहले से लोड होता है। अल्ट्रासाउंड पर देखते हुए एम्ब्रीओ को सबसे सही जगह छोड़ दिया जाता है।
ज्यादातर महिलाओं को इसमें हल्की चुभन या दबाव महसूस हो सकता है, लेकिन दर्द नहीं होता, इसीलिए डॉक्टर आमतौर पर एनेस्थीसिया यानी बेहोशी की दवा नहीं देते।
प्रोसीजर के बाद 15 से 30 मिनट आराम करने को कहा जाता है। उसके बाद आप घर जा सकती हैं। पूरी तरह बेडरेस्ट की ज़रूरत नहीं होती, आप अपनी सामान्य हल्की दिनचर्या जारी रख सकती हैं।
कुछ महिलाओं को एम्ब्रीओ ट्रांसफर के बाद हल्की ऐंठन या पेट के नीचे दबाव जैसा महसूस हो सकता है, यह पूरी तरह नॉर्मल है जो एक-दो दिन में ठीक हो जाता है।
भ्रूण को जुड़ने के लिए गर्भाशय की भीतरी परत (endometrium) का मोटा और तैयार होना बहुत ज़रूरी है। जमे हुए भ्रूण वाले चक्र में डॉक्टर एस्ट्रोजन (estrogen) की गोलियाँ या पैच देते हैं जो इस परत को बढ़ाते हैं।
अल्ट्रासाउंड से परत की मोटाई नापी जाती है। 8 मिलीमीटर या उससे ज़्यादा मोटी परत को अच्छा माना जाता है। जब मोटाई सही हो जाती है तो प्रोजेस्टेरॉन शुरू किया जाता है जो परत को और पका कर भ्रूण को जुड़ने लायक बनाता है।
अगर परत पतली रह रही है तो डॉक्टर कुछ अतिरिक्त उपाय कर सकते हैं जैसे खून का बहाव बढ़ाने वाली दवाई या विटामिन ई। कभी-कभी एस्पिरिन (aspirin) की छोटी खुराक भी दी जाती है जो गर्भाशय तक खून का बहाव सुधारती है। हर महिला का शरीर अलग तरह से काम करता है इसलिए इसमें धैर्य रखना पड़ता है।
कुछ मामलों में डॉक्टर एंडोमेट्रियल स्क्रैचिंग (endometrial scratching) की सलाह भी दे सकते हैं। इसमें गर्भाशय की परत में हल्का खरोंच लगाई जाती है जिससे भ्रूण के जुड़ने के मौके बेहतर हो सकते हैं। यह सबके लिए ज़रूरी नहीं होती, डॉक्टर आपकी स्थिति देखकर फ़ैसला करते हैं।
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एम्ब्रीओ ट्रांसफर के बाद के 10 से 14 दिन सबसे कठिन होते हैं, इस दौरान कुछ बातों का ध्यान रखें।
Embryo transfer के बाद खाने पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है।
दिन भर में 8 से 10 गिलास पानी पिएँ, ताकि शरीर हाइड्रेट रहे और ब्लड सर्कुलेशन सही बना रहे।
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एम्ब्रीओ ट्रांसफर एक छोटा और आसान प्रोसीजर है, लेकिन इस दौरान शरीर को सही सपोर्ट देना सबसे ज़रूरी होता है। Embryo transfer के बाद समय पर दवाइयाँ पर लेना, हल्की दिनचर्या रखना और अनावश्यक तनाव से दूर रहना चाहिए।
आपको हर छोटे लक्षण को लेकर घबराने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि इस समय हल्की ऐंठन या स्पॉटिंग हो सकती है, जो नॉर्मल होती है। सबसे सही तरीका यही है कि आप अपने डॉक्टर की सलाह पर भरोसा रखें और शरीर को अपना काम करने दें।