पीसीओडी (PCOD) यानी पॉलीसिस्टिक ओवेरियन डिज़ीज़ (polycystic ovarian disease) एक हॉर्मोनल कंडीशन है जिसमें ओवरी यानी अंडाशय (ovary) में बहुत सारे छोटे-छोटे अंडे ठीक से मैच्योर नहीं हो पाते और सिस्ट (cyst) की तरह जमा हो जाते हैं। इसका सबसे कॉमन असर पीरियड्स की अनियमितता, वज़न बढ़ना, मुँहासे, और प्रेगनेंसी में दिक्कत के रूप में सामने आता है।
AIIMS के 2020 के डेटा के अनुसार भारत में हर 5 में से करीब 1 महिला पीसीओडी से प्रभावित है। यह 15 से 30 साल की उम्र में सबसे ज़्यादा दिखता है, लेकिन कई बार शुरुआती संकेत अनदेखे रह जाते हैं। पीसीओडी क्या होता है यह समझना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि सही समय पर पहचान और लाइफस्टाइल बदलाव से इसे काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। यह कोई लाइलाज बीमारी नहीं है, बल्कि एक मैनेज की जा सकने वाली कंडीशन है।
इस आर्टिकल में जानेंगे कि पीसीओडी के लक्षण क्या हैं, यह क्यों होता है, PCOD और PCOS में क्या फ़र्क है, प्रेगनेंसी पर इसका क्या असर पड़ता है, इलाज के क्या ऑप्शन हैं, और कब डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है।
पीसीओडी (PCOD) एक ऐसी कंडीशन है जिसमें ओवरी के अंदर हर महीने अंडा यानी एग (egg) पूरी तरह मैच्योर नहीं हो पाता। नॉर्मल साइकल में हर महीने ओवरी में कई फ़ॉलिकल्स (follicles) बनते हैं, उनमें से एक डॉमिनेंट फ़ॉलिकल मैच्योर होता है, और ओव्यूलेशन (ovulation) के दौरान वह एग रिलीज़ करता है। पीसीओडी में यह प्रोसेस बिगड़ जाती है। PCOD में फ़ॉलिकल्स तो कई बनते हैं, लेकिन कोई भी पूरा मैच्योर नहीं होता और ये छोटी-छोटी सिस्ट के रूप में ओवरी में जमा होती रहती है।
इसकी वजह से तीन मुख्य बदलाव होते हैं। पहला, एंड्रोजन (androgen) यानी मेल हॉर्मोन का लेवल सामान्य से बढ़ जाता है। दूसरा, इंसुलिन (insulin) का लेवल बढ़ सकता है क्योंकि बॉडी इंसुलिन को ठीक से यूज़ नहीं कर पाती। तीसरा, ओव्यूलेशन अनियमित हो जाता है या कभी-कभी बंद ही हो जाता है।
अल्ट्रासाउंड पर देखने पर ओवरी का साइज़ बढ़ा हुआ दिखता है और उसमें 12 या उससे ज़्यादा छोटे फ़ॉलिकल्स दिखते हैं, जिनका साइज 2 mm से 9 mm होता है। इसे पॉलीसिस्टिक ओवरी कहते हैं। लेकिन सिर्फ़ अल्ट्रासाउंड पर सिस्ट दिखने का मतलब पीसीओडी कन्फर्म नहीं होती। डायग्नोसिस के लिए दूसरे कई लक्षण देखे जाते हैं और हॉर्मोन से संबंधित टेस्ट भी किये जाते हैं।
ध्यान रखने के लिए सबसे ज़रूरी बात यह है कि पीसीओडी कोई बीमारी नहीं है। यह एक हॉर्मोनल कंडीशन है जो सही लाइफस्टाइल और ज़रूरत पड़ने पर ट्रीटमेंट से मैनेज की जा सकती है। WHO के अनुसार दुनिया भर में 10 से 13% रिप्रोडक्टिव एज की महिलाएँ इससे प्रभावित हैं।
पीसीओडी के लक्षण हर महिला में अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ महिलाओं में सिर्फ़ एक-दो लक्षण होते हैं, कुछ में कई लक्षण दिखाई दे सकते हैं। हर महिला में लक्षणों की गंभीरता भी अलग-अलग होती है।
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लक्षण |
कैसे पहचानें |
क्यों होता है |
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अनियमित पीरियड्स |
35 दिन से ज़्यादा का गैप, या कई महीने पीरियड्स न आना |
ओव्यूलेशन न होने से हॉर्मोनल साइकल बिगड़ती है |
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वज़न बढ़ना |
ख़ासकर पेट के आसपास चर्बी |
इंसुलिन रेज़िस्टेंस फैट स्टोरेज बढ़ाता है |
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मुँहासे (एक्ने) |
चेहरे, पीठ, छाती पर बार-बार |
बढ़ा हुआ एंड्रोजन ऑयल ग्लैंड्स को ओवरएक्टिव करता है |
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बाल झड़ना |
सिर की बीच की माँग पर पतले बाल |
एंड्रोजन हेयर फ़ॉलिकल को कमज़ोर करता है |
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अनचाहे बाल (हिर्सुटिज़्म) |
ठोड़ी, ऊपरी होंठ, पेट पर बाल |
एंड्रोजन मेल-पैटर्न हेयर ग्रोथ बढ़ाता है |
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त्वचा पर काले धब्बे |
गर्दन, बगल, कमर के नीचे |
इंसुलिन रेज़िस्टेंस का संकेत (एकैन्थोसिस नाइग्रिकेन्स) |
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हैवी ब्लीडिंग |
जब पीरियड्स आएँ तो बहुत ज़्यादा |
लंबे समय तक ओव्यूलेशन न होने से यूटरस की लाइनिंग मोटी हो जाती है |
यह सबसे कॉमन लक्षण है। जब ओव्यूलेशन नहीं होता, तो प्रोजेस्टेरॉन (progesterone) नहीं बनता और पीरियड्स का नॉर्मल साइकल बिगड़ जाता है। कुछ को साल में 8 से कम पीरियड्स आते हैं, कुछ को 2 से 3 महीने का गैप रहता है।
पीसीओडी वाली महिलाओं में वज़न बढ़ा हुआ पाया जाता है। ख़ासकर पेट के आसपास फैट जमा होना इसका ख़ास पैटर्न है। लेकिन पतली महिलाओं को भी पीसीओडी हो सकता है।
बढ़ा हुआ एंड्रोजन स्किन के ऑयल ग्लैंड्स (sebaceous glands) को ओवरएक्टिव कर देता है, जिससे चेहरे, जॉ-लाइन, और पीठ पर गहरे मुँहासे निकलते हैं। साथ ही, जहाँ बाल नहीं चाहिए वहाँ बढ़ते हैं (ठोड़ी, पेट, छाती), और सिर के बाल पतले होते हैं।
पीसीओडी अक्सर प्यूबर्टी (puberty) के आसपास शुरू होता है, लेकिन इसके शुरुआती लक्षणों पर अक्सर ध्यान नहीं जाता और वे अनदेखे रह जाते हैं।
अगर इनमें से दो-तीन संकेत एक साथ दिखें तो डॉक्टर से चेकअप करवाएँ। ACOG (American College of Obstetricians and Gynecologists) की गाइडलाइन कहती है कि मेनार्की (Menarche) यानी किसी लड़की के जीवन के सबसे पहला पीरियड (First Period) के 2 साल बाद भी साइकल 45 दिन से ज़्यादा की हो, तो डॉक्टर से परामर्श लेना ज़रूरी होता है।
पीसीओडी क्या होता है जानने के बाद सबसे ज़रूरी सवाल यह है कि यह क्यों होता है। इसके एकदम ठोस कारणों का अभी तक पूरी तरह पता नहीं चला है, लेकिन रिसर्च ने कुछ क्लियर फ़ैक्टर्स पहचाने हैं।
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कारण |
कैसे प्रभावित करता है |
कितनी आम है |
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इंसुलिन रेज़िस्टेंस |
ज़्यादा इंसुलिन ओवरी को एंड्रोजन बनाने के लिए स्टिमुलेट करता है |
70% पीसीओडी केसों में |
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हॉर्मोनल इम्बैलेंस |
LH बढ़ना, FSH कम होना, एंड्रोजन बढ़ना |
लगभग सभी केसों में |
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जेनेटिक्स |
माँ/बहन को हो तो चांस 50% तक बढ़ते हैं |
40-60% केसों में फैमिली हिस्ट्री |
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लाइफस्टाइल |
मोटापा, खराब डाइट, स्ट्रेस लक्षण बढ़ाते हैं |
ट्रिगरिंग फ़ैक्टर |
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क्रॉनिक इंफ्लेमेशन |
बॉडी में लो-ग्रेड इंफ्लेमेशन एंड्रोजन बढ़ाता है |
रिसर्च में बढ़ता एविडेंस |
यह पीसीओडी का सबसे अहम कारण माना जाता है। जब बॉडी की सेल्स इंसुलिन को ठीक से रिस्पॉन्ड नहीं करतीं, तो पैंक्रियास (pancreas) और ज़्यादा इंसुलिन बनाता है। यह ज़्यादा इंसुलिन ओवरी को सीधे सिग्नल देता है कि ज़्यादा एंड्रोजन बनाओ, जो फ़ॉलिकल ग्रोथ बिगाड़ता है और ओव्यूलेशन रोकता है। Diabetes Care (2011) के अनुसार 65 से 70% पीसीओडी वाली महिलाओं में इंसुलिन रेज़िस्टेंस पाया जाता है, फिर चाहे वो मोटी हों या पतली।
LH (ल्यूटिनाइज़िंग हॉर्मोन) बढ़ जाता है जबकि FSH (फ़ॉलिकल स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन) कम रहता है। LH:FSH रेशियो 2:1 या उससे ज़्यादा हो जाता है। ज़्यादा LH ओवरी की थीका सेल्स (theca cells) को एंड्रोजन बनाने के लिए स्टिमुलेट करता है। SHBG (sex hormone binding globulin) कम होने से फ्री टेस्टोस्टेरोन और बढ़ जाता है।
अगर आपकी माँ या बहन को पीसीओडी है, तो आपको होने के चांस 40 से 60% तक बढ़ जाते हैं। एक रिसर्च के अनुसार ऐसे 70 से ज़्यादा जीन्स की पहचान हुई है जो पीसीओडी के रिस्क से जुड़े हैं।
मोटापा, सेडेंटरी लाइफस्टाइल, हाई-शुगर डाइट, और क्रॉनिक स्ट्रेस पीसीओडी को ट्रिगर या बढ़ा सकते हैं। पीसीओडी वाली महिलाओं में लो-ग्रेड क्रॉनिक इंफ्लेमेशन होता है जो एंड्रोजन प्रोडक्शन बढ़ाता है।
पीसीओडी और पीसीओएस दोनों नाम अक्सर एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल होते हैं। मेडिकली ये एक ही स्पेक्ट्रम के अलग-अलग लेवल हैं।
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पैरामीटर |
पीसीओडी (PCOD) |
पीसीओएस (PCOS) |
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क्या है |
ओवरी में इमैच्योर अंडों का जमा होना |
एक एंडोक्राइन (मेटाबॉलिक) डिसऑर्डर |
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गंभीरता |
कम गंभीर, मैनेज करना आसान |
ज़्यादा गंभीर, लॉन्ग-टर्म असर |
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हॉर्मोनल इम्बैलेंस |
हल्का से मॉडरेट |
ज़्यादा (एंड्रोजन काफी बढ़ा हुआ) |
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ओव्यूलेशन |
कभी-कभी होता है |
अक्सर रुक जाता है |
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फर्टिलिटी पर असर |
कम, ज़्यादातर नेचुरली कंसीव कर लेती हैं |
ज़्यादा, ट्रीटमेंट की ज़रूरत बढ़ती है |
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इंसुलिन रेज़िस्टेंस |
हो भी सकता है, नहीं भी |
ज़्यादातर केसों में मौजूद |
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मेटाबॉलिक रिस्क |
कम |
डायबिटीज़, हार्ट डिज़ीज़ का रिस्क बढ़ा |
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ट्रीटमेंट |
लाइफस्टाइल बदलाव से काफी सुधार |
दवाइयों की ज़रूरत ज़्यादा |
दोनों के लिए रॉटरडैम क्राइटेरिया (Rotterdam criteria, 2003) इस्तेमाल होता है। तीन में से कम से कम दो मौजूद हों तो डायग्नोसिस मानी जाती है:
इसके अलावा थायरॉइड, प्रोलैक्टिन, और कंजेनिटल एड्रिनल हाइपरप्लेज़िया (CAH) जैसी दूसरी कंडीशन को रूल आउट करना ज़रूरी है।
प्रैक्टिकली, पीसीओडी वाली ज़्यादातर महिलाएँ लाइफस्टाइल बदलाव से ही बेहतर हो जाती हैं। पीसीओएस में दवाइयों और लंबे ट्रीटमेंट की ज़रूरत ज़्यादा पड़ती है। लेकिन दोनों में एक बात कॉमन है: दोनों ट्रीटेबल हैं और दोनों में प्रेगनेंसी पूरी तरह संभव है।
बहुत सी महिलाएँ PCOD सुनकर सोचती हैं कि अब माँ बनना मुश्किल है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। पीसीओडी महिला निःसंतानता (female infertility) का एक कॉमन कारण ज़रूर है, लेकिन यह उन कारणों में से एक है, जिनका इलाज सबसे ज्यादा अच्छी तरह किया जा सकता है।
Fertility and Sterility (2016) की एक बड़ी स्टडी में पाया गया कि पीसीओडी वाली महिलाओं में ओव्यूलेशन इंडक्शन से 70 से 80% में ओव्यूलेशन हासिल किया गया और उनमें से करीब 50 से 60% महिलाएँ 6 साइकल के अंदर कंसीव कर गईं।
बहुत सी महिलाएँ सिर्फ वज़न कम करने और लाइफस्टाइल सुधारने से नेचुरली कंसीव कर लेती हैं। जिन्हें दवा की ज़रूरत पड़ती है, उनमें दवाइयों से ओव्यूलेशन करवाया जाता है। और अगर इससे भी न हो, तो IUI या IVF से प्रेगनेंसी के बहुत अच्छे चांस रहते हैं।
प्रेगनेंसी के लिए मैच्योर एग का रिलीज़ होना, एग और स्पर्म का मिलना, औरएम्ब्रियो का गर्भाशय यानी यूट्रस (uterus) में इम्प्लांट होना जरूरी है। पीसीओडी का सबसे ज्यादा असर प्रेगनेंसी के पहले स्टेप पर ही पड़ता है।
ओव्यूलेशन की दिक्कत: जब एग रिलीज़ नहीं होता, तो फर्टिलाइज़ेशन (fertilization) संभव नहीं है। अनियमित ओव्यूलेशन से फर्टाइल विंडो (fertile window) का अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल होता है।
एग क्वालिटी: बढ़ा हुआ एंड्रोजन और इंसुलिन एग और एम्ब्रियो (embryo) की क्वालिटी प्रभावित कर सकते हैं।
एंडोमीट्रियम: अनियमित हॉर्मोन से एंडोमीट्रियम (endometrium) यानी गर्भाशय की परत ठीक से तैयार नहीं होती। इंसुलिन रेज़िस्टेंस इम्प्लांटेशन (implantation) को भी प्रभावित करता है।
पीसीओडी का इलाज आपके लक्षणों और आपके लक्ष्य पर निर्भर करता है। अगर प्रेगनेंसी प्लान नहीं कर रही हैं तो फ़ोकस लक्षणों को मैनेज करने पर होता है। अगर प्रेगनेंसी प्लान कर रही हैं तो ओव्यूलेशन को फिर से ठीक करना प्राथमिकता होती है।
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ट्रीटमेंट |
किसके लिए |
कैसे काम करता है |
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लाइफस्टाइल बदलाव |
सभी पीसीओडी केस |
इंसुलिन रेज़िस्टेंस कम, वज़न कंट्रोल, हॉर्मोन बैलेंस |
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मेटफ़ॉर्मिन |
इंसुलिन रेज़िस्टेंस |
इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाता है |
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OCP (ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव) |
पीरियड्स रेगुलर करने के लिए |
एंड्रोजन कम करता है, साइकल रेगुलर |
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लेट्रोज़ोल/क्लोमीफ़ीन |
प्रेगनेंसी चाहने वाली |
ओव्यूलेशन इंडक्शन |
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गोनाडोट्रोपिन इंजेक्शन |
ओरल दवाई से रिस्पॉन्स न हो |
सीधे ओवरी को स्टिमुलेट |
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IUI/IVF |
एडवांस्ड ट्रीटमेंट |
जब बेसिक ट्रीटमेंट काम न करे |
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एंटी-एंड्रोजन |
मुँहासे/हिर्सुटिज़्म |
एंड्रोजन का इफेक्ट ब्लॉक |
यह पीसीओडी के इलाज की फाउंडेशन है। Cochrane Review (2019) के अनुसार लाइफस्टाइल में बदलाव यानी डाइट और एक्सरसाइज़ से ही ओव्यूलेशन रेट 30 से 40% तक सुधार सकता है। सिर्फ 5 से 10% वज़न कम करने से पीरियड्स रेगुलर होने लगते हैं, इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर होती है, और ओव्यूलेशन के चांस बढ़ते हैं।
इंसुलिन रेज़िस्टेंस के लिए: कुछ दवाइयाँ इंसुलिन रेज़िस्टेंस को कम करने और ओव्यूलेशन को सपोर्ट करने के लिए दी जाती हैं, खासकर तब जब पीसीओडी के साथ वजन बढ़ना या शुगर मेटाबॉलिज्म की समस्या भी हो।
पीरियड्स रेगुलर करने के लिए: अगर फिलहाल प्रेगनेंसी प्लान नहीं हो रही हो, तो हार्मोनल दवाओं की मदद से पीरियड्स को रेगुलर करने और एंड्रोजन लेवल को कंट्रोल करने की कोशिश की जाती है। इससे मुंहासे, अनचाहे बाल और अनियमित पीरियड्स जैसे लक्षणों में राहत मिल सकती है।
ओव्यूलेशन के लिए: प्रेगनेंसी प्लान करने वाली महिलाओं में ओव्यूलेशन शुरू कराने के लिए अलग तरह की दवाइयाँ दी जाती हैं, ताकि सही समय पर एग रिलीज हो सके। अगर शुरुआती इलाज से रिजल्ट न मिले, तो इंजेक्शन आधारित ट्रीटमेंट भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जिनकी निगरानी फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट द्वारा की जाती है
पीसीओडी में बहुत ज़्यादा वज़न कम करना जरूरी नहीं होता। कई बार सिर्फ 5 से 10% वज़न कम होने से भी शरीर में अच्छे बदलाव दिखने लगते हैं। WHO हफ्ते में कम से कम 150 मिनट मॉडरेट फिजिकल एक्टिविटी की सलाह देता है।
पीसीओडी मैनेजमेंट में डाइट का रोल दवाइयों जितना ही अहम है। सही डाइट का उद्देश्य इंसुलिन स्पाइक कम करना, इंफ्लेमेशन घटाना, और हॉर्मोनल बैलेंस सुधारना होता है.
लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) फूड्स: ब्राउन राइस, ओट्स, दालें, होल व्हीट रोटी, बाजरा इत्यादि को अपने भोजन में शामिल करें। ये ब्लड शुगर धीरे-धीरे बढ़ाते हैं, इंसुलिन स्पाइक नहीं होता।
प्रोटीन-रिच फूड्स: हर मील में प्रोटीन शामिल करें। अंडे, पनीर, दही, दालें, चना, राजमा, और नॉन-वेज खाती हैं तो चिकन/मछली को अपनी डाइट का हिस्सा बनाएं। प्रोटीन ब्लड शुगर को स्थिर यानी स्टेबल रखता है।
हेल्दी फैट्स: अखरोट, बादाम, अलसी (flaxseed), चिया सीड्स, ऑलिव ऑयल को अपनी डाइट में शामिल करें। Clinical Endocrinology (2018) की स्टडी में 12 हफ्ते ओमेगा-3 लेने से पीसीओडी में टेस्टोस्टेरोन और इंसुलिन दोनों कम हुए।
फ़ाइबर-रिच फूड्स: हरी सब्ज़ियाँ, फल (सेब, पपीता, बेरीज़), ओट्स, बीन्स आपके भोजन में जरूर शामिल होने चाहिए। फ़ाइबर इंसुलिन रेज़िस्टेंस कम करता है।
एंटी-इंफ्लेमेटरी फूड्स: हल्दी, अदरक, ग्रीन टी, बेरीज़, पत्तेदार सब्ज़ियाँ बहुत जरूरी हैं
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स्थिति |
कब मिलें |
किससे मिलें |
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पीरियड्स 3 महीने से ज़्यादा मिस हों |
तुरंत |
गाइनेकोलॉजिस्ट |
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6 महीने कोशिश के बाद प्रेगनेंसी न हो |
जल्दी |
फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट |
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मुँहासे/हिर्सुटिज़्म बढ़ रहे और कंट्रोल न हो |
जल्दी |
एंडोक्रिनोलॉजिस्ट या गाइनेकोलॉजिस्ट |
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वज़न बहुत तेजी से बढ़ रहा |
जल्द |
गाइनेकोलॉजिस्ट और डाइटिशियन |
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फैमिली में डायबिटीज़/हार्ट डिज़ीज़ हिस्ट्री |
प्रिवेंटिव चेकअप |
गाइनेकोलॉजिस्ट |
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बहुत हैवी या बहुत लंबे पीरियड्स |
तुरंत |
गाइनेकोलॉजिस्ट |
पीसीओडी में प्रेगनेंसी के लिए एक साल इंतज़ार की ज़रूरत नहीं। 6 महीने की कोशिश के बाद ही फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से मिलें।
ज़्यादातर पीसीओडी केसों में IVF की ज़रूरत नहीं पड़ती। पीसीओडी में ट्रीटमेंट कई स्टेप में किया जाता है।
पहला स्टेप: 3 से 6 महीने लाइफस्टाइल बदलाव के लिए कहा जाता है। बहुत सी महिलाएँ इसी स्टेप में कंसीव कर लेती हैं।
दूसरा स्टेप: 3 से 6 साइकल तक ओव्यूलेशन इंडक्शन के लिए दवाइयां दी जाती हैं। इसमें सक्सेस रेट बहुत अच्छी होती है।
तीसरा स्टेप: अगर ओव्यूलेशन इंडक्शन से काम न बने तो ओव्यूलेशन इंडक्शन के लिए इंजेक्शन के साथ IUI ट्रीटमेंट किया जाता है। IUI में स्पर्म को डायरेक्ट यूट्रस में पहुँचाया जाता है जिससे चांस बढ़ जाते हैं।
चौथा स्टेप: जब ऊपर के सभी स्टेप्स 6 से 12 महीने में काम न करें, पुरुष पार्टनर में भी फर्टिलिटी की दिक्कत हो, महिला की उम्र 35 से ऊपर हो और टाइम सीमित हो, या ट्यूबल फ़ैक्टर भी हो तब IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन प्रेगनेंसी के लिए सबसे असरदार विकल्प है।
पीसीओडी में IVF के रिज़ल्ट अच्छे आते हैं क्योंकि ओवरी में फ़ॉलिकल्स ज़्यादा होते हैं, जिससे ज़्यादा एग्स मिलते हैं। पीसीओडी में IVF का लाइव बर्थ रेट नॉन पीसीओडी यानी जिन महिलाओं को पीसीओडी नहीं है के बराबर या बेहतर होता है।
पीसीओडी एक हॉर्मोनल कंडीशन है जो ओव्यूलेशन, पीरियड्स, और मेटाबॉलिज़्म को प्रभावित करती है। लेकिन यह कोई लाइलाज बीमारी नहीं है और न ही इसका मतलब है कि माँ बनना संभव नहीं।
सही डाइट, रेगुलर एक्सरसाइज़, और वज़न मैनेजमेंट से बहुत से लक्षण कंट्रोल हो जाते हैं। प्रेगनेंसी के लिए ओव्यूलेशन इंडक्शन बहुत असरदार है। ज़रूरत पड़ने पर IUI या IVF से भी माँ बनने का सपना पूरा किया जा सकता है। सबसे ज़रूरी है कि शुरुआती संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें, डॉक्टर से मिलें, सही डायग्नोसिस करवाएँ, और एक क्लियर ट्रीटमेंट प्लान बनाएँ।
PCOD आमतौर पर 15 से 35 साल की उम्र में सबसे ज़्यादा देखा जाता है। लेकिन यह किसी भी प्रजनन उम्र यानी फ़र्टिलिटी ऐज में हो सकता है।
अगर माँ या बहन को PCOD है तो आपको होने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन लाइफस्टाइल भी उतनी ही बड़ी भूमिका निभाता है सही खान-पान और एक्सरसाइज़ से जेनेटिक रिस्क को भी कम किया जा सकता है।
यह गलतफहमी है। करीब 20 से 30% PCOD केस "लीन PCOD" के होते हैं जहाँ महिला का वज़न नॉर्मल होता है । इसलिए सिर्फ वज़न से PCOD का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता।
अल्ट्रासाउंड में ओवरी का साइज़ बढ़ा हुआ दिखता है और किनारों पर छोटे-छोटे फॉलिकल्स माला की तरह दिखते हैं। अगर एक ओवरी में 12 या उससे ज़्यादा फॉलिकल्स हैं, तो यह PCOD का लक्षण माना जाता है।
PCOD में इंसुलिन रेज़िस्टेंस होता है जो आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज़ का रिस्क बढ़ाता है। इसीलिए PCOD का सही मैनेजमेंट सिर्फ फर्टिलिटी के लिए नहीं, बल्कि लॉन्ग-टर्म हेल्थ के लिए भी ज़रूरी है।
यह PCOD की गंभीरता पर निर्भर करता है। शुरुआती स्टेज में 3 से 6 महीने की लाइफस्टाइल में बदलाव से सुधार दिखने लगता है। एडवांस केसेस में 6 से 12 महीने या उससे ज़्यादा समय लग सकता है।
पीसीओडी एक हॉर्मोनल कंडीशन है जिसमें ओवरी में छोटी-छोटी सिस्ट बन जाती हैं, एंड्रोजन बढ़ता है, और ओव्यूलेशन अनियमित हो जाता है। इससे पीरियड्स, वज़न, स्किन, और फर्टिलिटी प्रभावित होती है।
अनियमित पीरियड्स, पेट पर वज़न बढ़ना, मुँहासे, बाल झड़ना, चेहरे/शरीर पर अनचाहे बाल, और त्वचा पर काले धब्बे। हर महिला में सभी लक्षण नहीं होते।
पीसीओडी ज़्यादा कॉमन और कम गंभीर है, लाइफस्टाइल बदलाव से सुधरता है। पीसीओएस एक मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है जिसमें हॉर्मोनल इम्बैलेंस ज़्यादा होता है और दवाइयों की ज़रूरत ज़्यादा पड़ती है। दोनों में प्रेगनेंसी संभव है।
हाँ, बिल्कुल। बहुत सी महिलाएँ नेचुरली या ट्रीटमेंट (ओव्यूलेशन इंडक्शन, IUI, IVF) से माँ बनती हैं। ओव्यूलेशन इंडक्शन से 70 से 80% में ओव्यूलेशन हासिल किया जा सकता है।
इंसुलिन रेज़िस्टेंस (70% केसों में), हॉर्मोनल इम्बैलेंस, जेनेटिक्स जैसे फैमिली हिस्ट्री, और लाइफस्टाइल फैक्टर मुख्य कारण हैं। ठोस कारणों का पूरी तरह पता नहीं है।
"क्योर" नहीं होता, लेकिन बहुत अच्छे से मैनेज किया जा सकता है। सही डाइट, एक्सरसाइज़, और वज़न कंट्रोल से लक्षण लगभग गायब हो सकते हैं और पीरियड्स नॉर्मल हो जाते हैं।
ओव्यूलेशन न होने से प्रोजेस्टेरॉन नहीं बनता, एंडोमीट्रियम को शेड होने का सिग्नल नहीं मिलता, और पीरियड्स लेट या मिस हो जाते हैं। बहुत देर बाद पीरियड आने पर हैवी ब्लीडिंग होती है।
हाँ, खासकर पेट के आसपास। इंसुलिन रेज़िस्टेंस फैट स्टोरेज बढ़ाता है। लेकिन पतली महिलाओं को भी पीसीओडी हो सकता है (lean PCOS)।
लो GI फूड्स जैसे ब्राउन राइस, ओट्स, दालें), प्रोटीन, हेल्दी फैट्स जैसे अखरोट, अलसी, फ़ाइबर, और एंटी-इंफ्लेमेटरी फूड्स जैसे हल्दी, ग्रीन टी रिफ़ाइंड शुगर, मैदा, और प्रोसेस्ड फूड से बचें।
हाँ, बढ़ा हुआ एंड्रोजन हेयर फ़ॉलिकल कमजोर करता है। सही ट्रीटमेंट से हॉर्मोन कंट्रोल होने पर बाल झड़ना कम हो सकता है।
ब्लड टेस्ट में FSH, LH, टेस्टोस्टेरोन, DHEA-S, fasting इंसुलिन, HbA1c, थायरॉइड, प्रोलैक्टिन और पेल्विक अल्ट्रासाउंड मुख्य टेस्ट हैं।
हाँ, क्रॉनिक स्ट्रेस कॉर्टिसोल बढ़ाता है जो इंसुलिन रेज़िस्टेंस और हॉर्मोनल इम्बैलेंस को बिगाड़ता है। स्ट्रेस मैनेजमेंट पीसीओडी मैनेजमेंट का अहम हिस्सा है।
हाँ, यही मुख्य दिक्कत है। अंडा मैच्योर नहीं होता या रिलीज़ नहीं होता (ऐनोव्यूलेशन)। ओव्यूलेशन इंडक्शन दवाइयों से इसे बहाल किया जा सकता है।
पीसीओडी महिला निःसंतानता का कॉमन कारण है, लेकिन यह सबसे इलाज योग्य समस्या है। सही ट्रीटमेंट से प्रेगनेंसी पूरी तरह संभव है।
पीसीओडी हो और 6 महीने कोशिश के बाद प्रेगनेंसी न हो, पीरियड्स 3 महीने से ज़्यादा मिस हों, या उम्र 35 वर्ष से ज्यादा हो तो फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से मिलें।
ज़्यादातर केसों में नहीं। पहले लाइफस्टाइल बदलाव, फिर ओव्यूलेशन इंडक्शन, फिर IUI ट्राई किया जाता है। 6 से 12 महीने में काम न करे तब IVF आता है। पीसीओडी में IVF रिज़ल्ट अच्छे आते हैं।
बहुत फ़ायदा। इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ती है, वज़न कंट्रोल होता है, एंड्रोजन कम होता है। रोज़ 30 से 45 मिनट मॉडरेट एक्सरसाइज़ जैसे कार्डियो और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग काफी असरदार होती है।
रिफ़ाइंड शुगर, मैदा, प्रोसेस्ड फूड, सॉफ्ट ड्रिंक्स, ट्रांस फैट, और ज़्यादा कैफ़ीन। ये इंसुलिन स्पाइक करते हैं और इंफ्लेमेशन बढ़ाते हैं।
नहीं, शादी से पीसीओडी का कोई संबंध नहीं है। यह हॉर्मोनल कंडीशन है जो लाइफस्टाइल और ट्रीटमेंट से मैनेज होती है, शादी से नहीं।
लॉन्ग-टर्म कंडीशन है। प्रेगनेंसी के लिए कुछ महीने का ट्रीटमेंट काफी हो सकता है। लक्षण मैनेजमेंट के लिए लाइफस्टाइल बदलाव लंबे समय तक जारी रखने होते हैं।