अगर डॉक्टर ने आपको PCOD बताया है तो बिना घबराये पहले यह जानें कि PCOD kya hota hai और क्या यह कोई गंभीर समस्या है? अगर आप संतान के लिए प्रयास कर रही हैं तो PCOD की वजह से गर्भधारण यानी प्रेगनेंसी (Pregnancy) में कोई समस्या आ सकती है या माँ बनना बिलकुल भी संभव नहीं होगा?
PCOD होना सिर्फ ओवरी में सिस्ट होना ही नहीं होता, इस कंडीशन में शरीर के अंदर कई बदलाव होते हैं। जिसमें मुख्य है हॉर्मोन में गड़बड़ी होना।
यह आर्टिकल उन महिलाओं के लिए है जिन्हें अभी-अभी PCOD का पता चला है या जो समझना चाहती हैं कि उनके शरीर में असल में हो क्या रहा है। यहाँ हम वो पूरी कड़ी समझेंगे जिससे होकर शरीर PCOD होने के दौरान गुजरता है। एक बार यह चेन समझ में आ गई, तो अच्छे स्वास्थ्य और माँ बनने का रास्ता खुद साफ हो जाएगा।
PCOD kya hota hai इसे समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि एक हेल्दी मेंस्ट्रुएशन साइकिल में क्या होता है।
आपकी ओवरी में हर महीने कई छोटे-छोटे फॉलिकल्स बनते हैं। इनमें से एक फॉलिकल बड़ा होता है और उसके अंदर एग मैच्योर होता है। जब यह एग पूरी तरह तैयार हो जाता है, तो फॉलिकल फटता है और एग बाहर आता है इसे ओव्यूलेशन कहते हैं।
यह सब कंट्रोल करते हैं दो हॉर्मोन FSH यानी फॉलिकल स्टिम्युलेटिंग हॉर्मोन जो फॉलिकल को बढ़ाता है, और LH यानी ल्यूटिनाइज़िंग हॉर्मोन जो ओव्यूलेशन ट्रिगर करता है। जब यह प्रोसेस सही चलता है, पीरियड्स समय पर आते हैं और प्रेगनेंसी संभव होती है।
अब समझिए कि PCOD में क्या बदल जाता है।
PCOD की शुरुआत अक्सर इंसुलिन से होती है। जब शरीर इंसुलिन को ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाता, जिसे इंसुलिन रेज़िस्टेंस कहते हैं, तो पैंक्रियाज़ और ज़्यादा इंसुलिन बनाता है। यह एक्स्ट्रा इंसुलिन सीधे ओवरी पर असर डालता है।
बढ़ा हुआ इंसुलिन ओवरी को सिग्नल देता है कि ज़्यादा एंड्रोजन यानी मेल हॉर्मोन बनाओ। यही वो पॉइंट है जहाँ से सारी गड़बड़ी शुरू होती है।
एंड्रोजन बढ़ने से फॉलिकल्स का नॉर्मल ग्रोथ पैटर्न बिगड़ जाता है। फॉलिकल छोटे-छोटे रह जाते हैं, कोई एक बड़ा नहीं हो पाता, और एग रिलीज़ नहीं होता।
जब एग रिलीज़ नहीं होता, तो ओव्यूलेशन नहीं होता। बिना ओव्यूलेशन के पीरियड्स या तो देर से आते हैं या आते ही नहीं।
जो फॉलिकल्स मैच्योर नहीं हुए, वो ओवरी में जमा होते रहते हैं। अल्ट्रासाउंड में ये छोटे-छोटे सिस्ट जैसे दिखते हैं इसीलिए इसे "पॉलीसिस्टिक" कहा जाता है।
यह कोई कैंसर वाली गांठ नहीं है। ये बस अनडेवलप्ड फॉलिकल्स हैं जो अपना काम पूरा नहीं कर पाए।
जब PCOD kya hota hai समझ में आ जाए, तो हर लक्षण का कारण भी साफ हो जाता है।
PCOD कोई बीमारी नहीं है। यह एक हॉर्मोन में असंतुलन की वजह से होता है। जिसका कारण आपकी लाइफस्टाइल, जेनेटिक्स, और मेटाबॉलिज्म हो सकता है। PCOD में आपकी ओवरी खराब नहीं होती है बस हॉर्मोन्स का तालमेल बिगड़ जाता है। अच्छी बात यह है कि हॉर्मोन्स की गड़बड़ी को वापस ठीक किया जा सकता है।
हर PCOD एक जैसा नहीं होता। कुछ महिलाओं में यह शुरुआती स्टेज में होता है, कुछ में एडवांस।
PCOD की शुरुआती स्टेज में लाइफस्टाइल बदलाव से काफी सुधार हो जाता है। एडवांस स्टेज में दवाइयों और कभी-कभी फर्टिलिटी ट्रीटमेंट की ज़रूरत पड़ती है。
अगर आप माँ बनने की प्लानिंग का रही हैं तो PCOD सुनते ही मन में पहला डर यही आता है। लेकिन यह सच नहीं है।
PCOD में ओव्यूलेशन अनियमित होता है, लेकिन बिलकुल बंद नहीं होता। इसका मतलब है कि प्रेगनेंसी में थोड़ा समय लग सकता है, लेकिन असंभव नहीं है।
आंकड़े देखें तो 70-80% PCOD वाली महिलाएं सही इलाज से माँ बन जाती हैं। कई तो सिर्फ लाइफस्टाइल बदलाव से नैचुरली कंसीव कर लेती हैं।
PCOD में एक अच्छी बात यह है कि एग रिज़र्व आमतौर पर अच्छा होता है। ओवरी में फॉलिकल्स की कमी नहीं होती बस उन्हें सही तरीके से मैच्योर करवाना होता है।
अगर लाइफस्टाइल बदलाव और दवाइयों से भी कंसीव नहीं हो रहा, तो निराश होने की ज़रूरत नहीं। आज मेडिकल साइंस के पास ART यानी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (Assisted Reproductive Technology) के कई विकल्प हैं।
ओव्यूलेशन इंडक्शन: पहले स्टेप में दवाइयों से ओवरी को स्टिम्युलेट किया जाता है ताकि एग सही से मैच्योर हो और रिलीज़ हो। PCOD में इस तरीके से कई महिलाएं कंसीव कर लेती हैं।
IUI यानी इंट्रायूटेराइन इनसेमिनेशन: अगर ओव्यूलेशन हो रहा है लेकिन नैचुरली प्रेगनेंसी नहीं हो रही, तो IUI एक आसान और कम खर्चीला विकल्प है। इसमें प्रोसेस्ड स्पर्म को सीधे यूटेरस में ट्रांसफर किया जाता है।
IVF यानी इन-विट्रो फर्टिलाइज़ेशन: जब दूसरे तरीके काम न करें, तो IVF सबसे भरोसेमंद विकल्प है। PCOD पेशेंट्स के लिए IVF की सक्सेस रेट काफी अच्छी होती है क्योंकि इनमें एग रिज़र्व अच्छा होता है।
ज़रूरी बात यह है कि जितनी जल्दी फर्टिलिटी एक्सपर्ट से मिलें, उतना अच्छा होता है क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ एग क्वालिटी कम होती है, इसलिए अगर 6 से 12 महीने कोशिश के बाद भी प्रेगनेंसी नहीं हो रही, तो देर न करें और तुरंत किसी भरोसेमंद फ़र्टिलिटी क्लीनिक से संपर्क करें।
PCOD एक चेन रिएक्शन है जो इंसुलिन से शुरू होती है, एंड्रोजन बढ़ाती है, ओव्यूलेशन रोकती है, और इसके तमाम लक्षण पैदा करती है।
जब आप PCOD kya hota hai को समझती हैं, तो इसका इलाज भी समझ में आता है कि इंसुलिन कंट्रोल करो, वज़न कम करो, और हॉर्मोन्स बैलेंस में आ जाएंगे।
PCOD न तो कोई लाइलाज बीमारी है और न ही माँ बनने में स्थायी रुकावट। लाइफस्टाइल में बदलाव से लेकर ओव्यूलेशन इंडक्शन, IUI और IVF तक आज हर स्टेज के लिए इलाज मौजूद है। तो बिना घबराए PCOD को सही करने की दिशा में पहला कदम उठाएं。
PCOD आमतौर पर 15 से 35 साल की उम्र में सबसे ज़्यादा देखा जाता है। लेकिन यह किसी भी प्रजनन उम्र यानी फ़र्टिलिटी ऐज में हो सकता है।
अगर माँ या बहन को PCOD है तो आपको होने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन लाइफस्टाइल भी उतनी ही बड़ी भूमिका निभाता है सही खान-पान और एक्सरसाइज़ से जेनेटिक रिस्क को भी कम किया जा सकता है।
यह गलतफहमी है। करीब 20 से 30% PCOD केस "लीन PCOD" के होते हैं जहाँ महिला का वज़न नॉर्मल होता है । इसलिए सिर्फ वज़न से PCOD का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता।
अल्ट्रासाउंड में ओवरी का साइज़ बढ़ा हुआ दिखता है और किनारों पर छोटे-छोटे फॉलिकल्स माला की तरह दिखते हैं। अगर एक ओवरी में 12 या उससे ज़्यादा फॉलिकल्स हैं, तो यह PCOD का लक्षण माना जाता है।
PCOD में इंसुलिन रेज़िस्टेंस होता है जो आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज़ का रिस्क बढ़ाता है। इसीलिए PCOD का सही मैनेजमेंट सिर्फ फर्टिलिटी के लिए नहीं, बल्कि लॉन्ग-टर्म हेल्थ के लिए भी ज़रूरी है।
यह PCOD की गंभीरता पर निर्भर करता है। शुरुआती स्टेज में 3 से 6 महीने की लाइफस्टाइल में बदलाव से सुधार दिखने लगता है। एडवांस केसेस में 6 से 12 महीने या उससे ज़्यादा समय लग सकता है।